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बिना किसी नतीजे के ममता बनर्जी की ‘नौटंकी’ खत्म, चुनाव आयोग के घेरने के बाद बंगाल में राष्ट्रपति शासन की आहट

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में जिस तरह पांच दिनों तक धरना देकर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ नौटंकी की। उसको अंततः बिना किसी ठोस परिणाम के ही समाप्त होना था और वही हुआ। यह धरना केवल एक राजनीतिक स्टंट भर नहीं था, बल्कि इसने राज्य की तृणमूल सरकार को भी सवालों के कठघरे में ला दिया है। पांच दिन तक चले इस धरने को तृणमूल कांग्रेस ने अचानक खत्म कर दिया तो स्वाभाविक रूप से राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे राजनीतिक नौटंकी करार दिया है। सवाल यह भी उठता है कि SIR को लेकर दिए इस धरने को बिना किसी परिणाम के ही खत्म करना था, तो फिर इतने दिन यह प्रपंच क्यों किया गया? दरअसल, ममता बनर्जी की अनावश्यक अड़ंगेबाजी के चलते लगातार हो रही देरी और राज्य सरकार तथा चुनाव आयोग के बीच टकराव ने एक नई बहस को जन्म दिया है। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज हो गई है कि यदि समय पर मतदाता सूची को अंतिम रूप नहीं दिया गया, तो विधानसभा चुनाव कराने में कठिनाई हो सकती है। ऐसी स्थिति में संविधान के प्रावधानों के तहत राष्ट्रपति शासन की संभावना को लेकर भी अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि यह अभी केवल राजनीतिक चर्चा का विषय है, लेकिन इससे राज्य की राजनीति में अस्थिरता की झलक जरूर मिलती है।धरना खत्म और ममता सरकार के खिलाफ सवाल बरकरार
सीएम ममता बनर्जी द्वारा धरना खत्म करने की मजबूरी के बाद पश्चिम बंगाल सरकार की राजनीति पर सवाल उठने लगे हैं। चुनाव आयोग और राज्य सरकार के बीच टकराव का मुख्य कारण मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया, यानी एसआईआर है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध और पारदर्शी बनाना है, ताकि मृत, स्थानांतरित या फर्जी नामों को हटाया जा सके। लेकिन तृणमूल कांग्रेस ने बार-बार ये अनावश्यक आरोप लगाए कि इस प्रक्रिया के माध्यम से लाखों वैध मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश की जा रही है। जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि यह केवल मतदाता सूची को सही और अद्यतन बनाने की नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण चुनावी लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मतदान का अधिकार केवल उन्हीं नागरिकों को मिले जो वास्तव में पात्र हैं। पश्चिम बंगाल में इस प्रक्रिया के दौरान व्यापक स्तर पर सत्यापन किया गया। इस प्रक्रिया को लेकर ममता बनर्जी ने राजनीतिक विवाद खड़ा किया, लेकिन प्रशासनिक दृष्टि से यह चुनावी पारदर्शिता की दिशा में एक बेहद जरूरी और आवश्यक कदम माना जाता है।58 लाख से अधिक ‘फेक’ मतदाताओं के नाम प्रारूप सूची से हटाए
चुनाव आयोग द्वारा जारी प्रारूप मतदाता सूची के अनुसार एसआईआर प्रक्रिया के दौरान पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में नाम हटाए गए हैं। चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक करीब 58 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम प्रारूप सूची से हटाए गए। इनमें लगभग 24 लाख मृत मतदाता, 19 लाख स्थानांतरित या दूसरे स्थान पर चले गए लोग, करीब 12 लाख ऐसे मतदाता जो लंबे समय से अनुपस्थित या अज्ञात पाए गए, और लगभग 1.3 लाख डुप्लीकेट नाम शामिल हैं। इस प्रक्रिया के बाद राज्य के मतदाताओं की संख्या करीब 7.66 करोड़ से घटकर लगभग 7.08 करोड़ रह गई। हालांकि बाद की समीक्षा में यह संख्या और बढ़ने की भी संभावना जताई गई और कुछ रिपोर्टों में कुल हटाए गए नामों का आंकड़ा 60 लाख से अधिक बताया गया। इसी मुद्दे को लेकर ममता बनर्जी ने धरना शुरू किया था। लेकिन चुनाव आयोग ने मुख्यमंत्री के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि जिन मतदाताओं के नाम सूची से हटे हैं, उन्हें आपत्ति दर्ज कराने और दोबारा नाम जोड़ने का पूरा अवसर दिया गया है। आयोग का दावा है कि कोई भी पात्र मतदाता मतदान के अधिकार से वंचित नहीं रहेगा।राजनीतिक विवाद की जड़ दखलंदाजी, राष्ट्रपति शासन की आहट 
एसआईआर प्रक्रिया में सीएम ममता बनर्जी द्वारा लगातार दखलंदाजी से हो रही देरी और राज्य सरकार तथा चुनाव आयोग के बीच टकराव ने एक नई बहस को जन्म दिया है। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज हो गई है कि यदि समय पर मतदाता सूची को अंतिम रूप नहीं दिया गया, तो विधानसभा चुनाव कराने में कठिनाई हो सकती है। ऐसी स्थिति में संविधान के प्रावधानों के तहत राष्ट्रपति शासन की संभावना को लेकर भी अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि यह अभी केवल राजनीतिक चर्चा का विषय है, लेकिन इससे राज्य की राजनीति में अस्थिरता की झलक जरूर मिलती है। पिछली बार तो अब तक पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की घोषणा भी हो गई थी, लेकिन इस बार तो अभी मतदाता सूची पर ही बेवजह की तकरार चल रही है।मतदाता सूची को पारदर्शी बनाना आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी
चुनाव आयोग ने साफ कहा है कि मतदाता सूची को पारदर्शी बनाना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है। आयोग के अधिकारियों का कहना है कि वर्षों से मतदाता सूची में मृत या स्थानांतरित लोगों के नाम बने हुए थे, जिससे चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। एसआईआर का उद्देश्य किसी को मतदान से वंचित करना नहीं, बल्कि सूची को अधिक सटीक बनाना है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि जिन लोगों के नाम हटे हैं, वे निर्धारित प्रक्रिया के तहत दावा और आपत्ति दर्ज कर सकते हैं। पश्चिम बंगाल की मौजूदा स्थिति भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण सबक भी देती है। चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनाए रखना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि राजनीतिक दल इस प्रक्रिया को अनावश्यक विवाद का विषय न बनाएं। यदि मतदाता सूची में त्रुटियां हैं तो उन्हें सुधारना लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के लिए आवश्यक है। लेकिन यदि इस प्रक्रिया को राजनीतिक टकराव का हथियार बना दिया जाए, तो लोकतंत्र की साख पर सवाल उठ सकते हैं।दरअसल, पश्चिम बंगाल मैं जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे ममता बनर्जी सरकार का असली चेहरा खुलकर सामने आने लगा है। मुस्लिम तुष्टिकरण, अवैध घुसपैठ पर नरमी, संवैधानिक संस्थाओं से टकराव और प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग, इन सबने मिलकर बंगाल की जनता को भीतर तक झकझोर दिया है। बांग्लादेशी में जीते रहमान को मिठाई भेजने से लेकर SIR जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में अड़ंगा डालने तक, ममता सरकार के कदम साफ संकेत दे रहे हैं कि सत्ता बचाने के लिए राज्य की सुरक्षा और लोकतांत्रिक मर्यादाओं को भी गिरवी रखा जा सकता है। यही वजह है कि अब बंगाल का आम नागरिक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। चुनाव आयोग की सख्ती और सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी ने ममता बनर्जी की राजनीति की बुनियाद हिला दी है। चुनाव आयोग ने एसआईआर के काम में लापरवाही बरतने पर ममता सरकार से सात अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया है। यह सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि उस अहंकार पर प्रहार है, जो खुद को संविधान से ऊपर समझ बैठे हैं।अब “मां-माटी-मानुष” नहीं, बल्कि सुरक्षा, विकास और सुशासन की मांग
ममता सरकार की इन्हीं कारगुजारियों से बंगाल में बदलाव का आहट सुनाई देने लगी है। यहीं से बंगाल में बदलाव की कहानी शुरू होती है। तुष्टिकरण की थकी हुई राजनीति के मुकाबले राष्ट्रवाद, विकास और सुशासन की बात करने वाली भाजपा तेजी से जनता का भरोसा जीतती दिख रही है। ममता सरकार की घुसपैठ पर चुप्पी, वोट बैंक की राजनीति और ईडी-आयोग जैसी संस्थाओं से टकराव वाली नीतियां आने वाले चुनाव में बीजेपी के लिए सबसे बड़ा हथियार बन रही हैं। ममता बनर्जी अपनी जिद और तुष्टिकरण की राजनीति से बीजेपी के लिए रेड कार्पेट बिछा रही हैं। हर गलत फैसला, हर पक्षपाती कदम और हर संवैधानिक टकराव जनता को यह एहसास दिला रहा है कि अब बदलाव जरूरी है। यही कारण है कि बंगाल की फिजा में अब “मां-माटी-मानुष” नहीं, बल्कि सुरक्षा, विकास और स्थिरता की मांग गूंजने लगी है।तुष्टिकरण के लिए तारिक रहमान को बधाई और मिठाई
राज्य में विधानसभा चुनाव की आहट तेज हुई, वैसे ही ममता बनर्जी की राजनीति एक बार फिर उसी पुराने ट्रैक पर लौट आई यानी मुस्लिम तुष्टिकरण। बांग्लादेश में जीत हासिल करने वाले तारिक रहमान को जीत की बधाई के साथ मिठाई भेजना केवल औपचारिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि बंगाल की सियासत में एक गहरा संदेश है। यह संदेश साफ है—वोट बैंक सर्वोपरि है, चाहे राज्य की सुरक्षा और सामाजिक संतुलन दांव पर क्यों न लग जाए। विडंबना देखिए कि जिस बंगाल में सबसे ज्यादा अवैध घुसपैठियों की शिकायतें सामने आती रही हैं, जहां सीमावर्ती जिलों में जनसांख्यिकी तेजी से बदल रही है, उसी बंगाल की मुख्यमंत्री बांग्लादेशी नेता को मिठाई भेजने में संकोच नहीं करतीं। सवाल यह है कि क्या राज्य के मूल निवासियों की चिंता से ज्यादा जरूरी विदेश के ‘भाई’ से रिश्ते निभाना है? यह दोहरा चरित्र अब किसी से छिपा नहीं रहा।

चुनाव आयोग का सख्त संदेश: अब लापरवाही नहीं चलेगी
इस बीच चुनाव आयोग ने ममता सरकार को करारा झटका दिया है। SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया में अड़ंगा डालने वाले मुख्यमंत्री के सात अधिकारियों को सस्पेंड कर यह स्पष्ट कर दिया गया कि संवैधानिक कार्यों में बाधा किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जाएगी। यह कार्रवाई सिर्फ प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि तृणमूल सरकार की मनमानी पर सीधा तमाचा है। सात अफसर निलंबित हो गए, लेकिन असली सवाल यह है कि उन्हें ऐसा करने का साहस कहां से मिला? क्या बिना मुख्यमंत्री के इशारे के इतने बड़े स्तर पर चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप संभव है? अफसरों को मोहरा बनाकर खुद को पाक-साफ दिखाने की यह पुरानी राजनीति अब जनता समझ चुकी है। दरअसल, ममता सरकार की राजनीति का केंद्र बिंदु वर्षों से एक ही रहा है और वह है एक वर्ग विशेष को खुश रखना। अवैध घुसपैठ, फर्जी दस्तावेज, राशन कार्ड और वोटर आईडी जैसे गंभीर मुद्दों पर सरकार की ढिलाई किसी भूल का नतीजा नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति प्रतीत होती है।

सुप्रीम कोर्ट की दो टूक: एसआईआर में दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं
हाल ही में सर्वोच्च अदालत ने भी ममता सरकार को साफ शब्दों में चेताया कि SIR प्रक्रिया में किसी तरह की अनावश्यक दखलंदाजी स्वीकार नहीं की जाएगी। देश की सर्वोच्च अदालत को यह कहना पड़े, यह अपने आप में बताता है कि बंगाल में लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कितना दबाव बनाया जा रहा है। यह पहला मौका नहीं है जब ममता बनर्जी संवैधानिक संस्थाओं से भिड़ती नजर आई हों। कभी राज्यपाल से टकराव, कभी केंद्रीय एजेंसियों पर आरोप, ईडी की टीम से टकराव और अब चुनाव आयोग व सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी, यह एक ऐसे नेतृत्व की तस्वीर पेश करता है, जो कानून से ऊपर खुद को मान बैठा है।

अब इंफ्रास्ट्रक्चर, निवेश और रोजगार पर जोर दे रही जनता
एक ओर जहां देश के दूसरे हिस्से इंफ्रास्ट्रक्चर, निवेश और रोजगार पर बात कर रहे हैं, वहीं बंगाल की राजनीति आज भी पहचान और तुष्टिकरण के इर्द-गिर्द घूम रही है। उद्योग पलायन कर रहे हैं, युवा बेरोजगार हैं, लेकिन मुख्यमंत्री का फोकस बांग्लादेशी नेताओं को मिठाई भेजने और वोट बैंक साधने पर है। अब बंगाल का आम नागरिक सवाल पूछ रहा है, क्या यही सुशासन है? क्या यही ‘मां-माटी-मानुष’ का मॉडल है? जिन इलाकों में स्थानीय लोग खुद को अल्पसंख्यक महसूस करने लगे हैं, वहां सरकार की चुप्पी बहुत कुछ बयां करती है। जनता समझ रही है कि यह सब अचानक नहीं हो रहा, बल्कि वर्षों की राजनीतिक प्रयोगशाला का नतीजा है।तुष्टिकरण की राजनीति अब भारी पड़ेगा विकास और सुशासन
सात अफसरों का निलंबन केवल प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों से पहले एक स्पष्ट संदेश है कि अब सिस्टम से खिलवाड़ नहीं चलेगा। यह ममता सरकार के लिए आखिरी चेतावनी भी हो सकती है कि लोकतंत्र में सत्ता स्थायी नहीं होती, जवाबदेही जरूर होती है। ममता बनर्जी आज उसी जाल में फंसती दिख रही हैं, जिसे उन्होंने खुद बुना है। मुस्लिम तुष्टिकरण, अवैध घुसपैठ पर नरमी, संवैधानिक संस्थाओं से टकराव और अफसरशाही का दुरुपयोग, ये सब मिलकर उनकी सरकार की विश्वसनीयता को तेजी से खोखला कर रहे हैं। चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की सख्ती इस बात का संकेत है कि अब मनमानी का दौर खत्म होने वाला है। बंगाल बदलाव चाहता है। वह विकास और सुशासन चाहता है। वह महिला शक्ति का आत्मसम्मान और युवाओ के लिए रोजगार चाहता है। और शायद इस बार वोट सिर्फ भावनाओं पर नहीं, बल्कि सच्चाई, सुरक्षा, सुशासन और विकास के लिए ही पड़ेगा।

 

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