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जानिए कांग्रेस और उसकी सहयोगी सरकारों ने कब-कब किया मीडिया का दमन

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महाराष्ट्र में महाविकास आघाडी की सरकार है, जिसमें कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसपी) और शिवसेना शामिल है। हालांकि राज्य सरकार की अगुवाई उद्धव ठाकरे कर रहे हैं, लेकिन सरकार पर पूरा नियंत्रण कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी और एनसीपी प्रमुख शरद पवार का है। उद्धव इन दोनों के इशारों पर नाच रहे हैं। मीडिया का गला घोंटने में कांग्रेस को महारत हासिल है, क्योंकि अपने खिलाफ उठ रही आवाज को दबाने का उसके पास 70 सालों का अनुभव है। इस अनुभव का लाभ उद्धव ठाकरे को भी मिल रहा है। इसकी पुष्टि बुधवार सुबह रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन चीफ अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तरी से हुई है। आइए देखते हैं कांग्रेस और उसकी सहयोगी सरकारों ने कब-कब और किस तरह मीडिया का दमन किया।

रिपब्लिक टीवी की आवाज दबाने की कोशिश

पालघर मॉब लिंचिंग, सुशांत सिंह मौत मामला, कंगना रौनत के ऑफिस पर बुल्डोजर चलाने का मामला और कोरोना से लड़ाई में उद्धव सरकार की नाकामी से लोगें में काफी नाराजगी थी। रिपब्लिक टीवी ने लोगों की आवाज को और मजबूती दी, जिससे उद्धव सरकार की किरकिरी होने लगी। जनता में गिरती छवि से परेशान उद्धव सरकार ने रिपब्लिक टीवी के दमन का फैसला किया। उसके खिलाफ फर्जी टीआरपी केस तैयार कर फंसाने की कोशिश की गई। इसके बाद मुंबई पुलिस ने बंद पड़े एक आत्महत्या के मामले में अर्नब गोस्वामी को गिरफ्तार कर लिया और अपने खिलाफ उठ रही आवाज को दबाने की कोशिश की।

सोनिया से सवाल क्या पूछ लिया, कांग्रेस हमले पर उतर आई

हिंदी में एक कहावत है कि रस्सी जल जाती है लेकिन बल नहीं जाता है। कांग्रेस पार्टी के साथ यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है। कांग्रेस की रस्सी तो जल गई लेकिन बल नहीं गया। पत्रकारिता और पत्रकारों के प्रति असहिष्णु रवैया अभी तक जारी है। नामी पत्रकार अर्णब गोस्वामी पर वहीं हमला हुआ है जहां कांग्रेस सत्ता में है। खास बात है कि अर्णब गोस्वामी के सोनिया गांधी से सवाल पूछने के बाद ही राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अर्नब गोस्वामी को रिपब्लिक भारत से हटान की मांग की थी और उन्हें सनकी तक घोषित कर दिया था। इसके बाद ही रात को उन पर हमला हो गया।   

राहुल ने महिला पत्रकार पर की अमर्यादित टिप्पणी

अपनी ड्योढ़ी पर खुद के सुविधानुसार पत्रकारों को इंटरव्यू देने के आदि राहुल गांधी ने स्मिता प्रकाश जैसी वरिष्ठ पत्रकार पर अपने प्रश्नों का स्वयं उत्तर देने का आरोप लगाते हुए उन पर हमला किया था। यह वाकया उस समय का है जब स्मिता प्रकाश ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का साक्षात्कार किया था, और उसकी चर्चा भी काफी हुई थी। उसी समय राहुल गांधी ने भद्दे तरीके से उस पर आरोप लगाते हुए हमला किया था। वरिष्ठ महिला पत्रकार के खिलाफ राहुल गांधी के इस अमर्यादित हमले के बाद भी किसी ने राहुल गांधी से सवाल पूछने की हिम्मत नहीं कर पाई। यूपीए के कार्यकाल में पत्रकार सुधीर चौधरी पर हमला

यूपीए-2 के कार्यकाल में भी पत्रकारिता और पत्रकारों की आवाज दबाने के लिए पर हमले होते रहे। इसके लिए कांग्रेस ने हमेशा साम दाम दंड और भेद का इस्तेमाल किया है। साल 2012 में कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल ने वरिष्ठ पत्रकार सुधीर चौधरी पर अपनी कंपनी के कथित तौर पर कोयला घोटाले में शामिल होने की खबर प्रसारित नहीं करने के बदले में 100 करोड़ रुपये मांगने का आरोप लगाया था। इस आरोप के चलते सुधीर चौधरी को जेल तक जाना पड़ा। हालांकि बाद में सुधीर चौधरी ने कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल के खिलाफ मानहानि का मामला दाखिल किया। उन्होंने जिंदल पर उन्हें एफआईआर में झूठे तरीके से फंसाने और संवाददाता सम्मेलन में झूठा बयान देने का आरोप लगाया।

भ्रम फैलाने का आरोप लगाकर अदालत में खींचा

15 सितंबर, 2009 को ‘द हिन्दू’ में “Two ITBP jawans injured in China border firing” शीर्षक से एक खबर प्रकाशित हुई थी, जिसमेंं लिखा गया था, “चीन द्वारा सीमा पर की गई फायरिंग में आईटीबीपी के दो जवान घायल हुए हैं।” इस खबर पर तत्कालीन मनमोहन सरकार ने प्रतिक्रिया देते हुए झूठा करार दिया था। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कहा कि उन्होंने इस खबर को गंभीरता से लिया है और इसे आपराधिक कृत्य मानते हुए वो FIR दर्ज कराने जा रहा है। पत्रकारों को अदालत में पेश होने को कहा गया और खबर का सूत्र बताने को कहा गया। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने तो इस मुद्दे को ही मीडिया हाइप करार दिया था। उनका कहना था कि ऐसी खबरों से कोई अपना नियंत्रण खो सकता है और सचमुच में बड़ी घटना हो सकती है। आज ऐसी हजारों रिपोर्ट्स प्राकशित होती हैं, जिसमें मोदी सरकार और देश के विरोध में लिखा जाता है, लेकिन मोदी सरकार ने किसी को अदालत में नहीं खींचा।

पत्रकारिता विभाग के हेड से कांग्रेसियों ने की मारपीट

जब 1988 में बोफोर्स घोटाला सामने आया उस समय राजीव गांधी के खिलाफ ‘गली-गली में शोर है राजीव गांधी चोर है’ का नारा काफी प्रचलन में था। 27 मई 1988 को पटना रेडियो स्टेशन में एक कार्यक्रम के प्रसारण के दौरान जब एक लड़की से चुटकुला सुनाने को कहा गया तो उसने ‘गली गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है’ बोल दिया। बाद में इस घटना को लेकर सागर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग की प्रवेश परीक्षा में एक सवाल पूछा गया था कि ‘ऑल इंडिया रेडियो के किस स्टेशन ने ‘राजीव गांधी चोर है’ वाक्य प्रसारित किया था?’ राजीव गांधी पर पूछा गया यह सवाल पत्रकारिता विभाग के हेड ऑफ द डिपार्टमेंट प्रदीप कृष्णात्रेय पर बहुत भारी पड़ा। युवक कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने पत्रकारिता विभाग में जाकर प्रोफेसर के साथ न केवल जमकर मारपीट की, बल्कि  उनके चेहरे पर कालिख पोतकर पूरे कैंपस में घुमाया।

राजीव गांधी लाए थे पत्रकारों के खिलाफ मानहानि विधेयक

स्वतंत्र और निष्पक्ष आवाज हमेशा से कांग्रेस के कान में चुभती रही है। तभी तो कांग्रेस हमेशा से देश में एक बंधुआ प्रेस के पक्ष में रही है। पत्रकारों के खिलाफ समय-समय पर कानून बनाना कांग्रेस की पुरानी आदत रही है। इंदिरा गांधी ने पत्रकारिता को खत्म करने के लिए आपातकाल के दौरान प्रतिबंध लगा दिया तो राजीव गांधी ने अपने कार्यकाल के दौरान पूरी पत्रकारिता को ही खत्म करने की ठान ली थी। तभी तो राजीव गांधी पत्रकारों की आवाज बंद करने के उद्देश्य से संसद में पत्रकारों के खिलाफ मानहानि विधेयक लेकर आए थे। वे अपने खिलाफ उठने वाली आवाज को बंद करने के लिए ही इस प्रकार का कानून लाए थे।

रामनाथ गोयनका को झुकाने के लिए विज्ञापन किए गए बंद

पत्रकारों के अधिकारों को कम करने की सबसे पहली पहल देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ही की थी। बाद में आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने तो पूरे प्रेस पर ही बंदिश लगा दी थी। इतना ही नहीं पत्रकारिता की दुनिया के प्रमुख हस्ती रहे रामनाथ गोयनका को झुकाने के लिए उन्होंने उनके अखबार को दिए जाने वाले विज्ञापन बंद करवा दिए। इतना ही नहीं, इंदिरा गांधी ने अपने प्रशासनिक हनक के माध्यम से अखबार छपने के समय बिजली कटवा देती थी, ताकि समय पर लोगों को अखबार नहीं मिले।

प्रेस पर कड़ी सेंसरशिप

25 जून 1975 की रात 11 बजकर 45 मिनट पर तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने, देश पर आपातकाल की घोषणा करने वाले सरकारी पत्र पर हस्ताक्षर कर दिया और आपातकाल लागू हो गया। 26 जून की सुबह तक जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई समेत तमाम बड़े नेताओं को गिरफ्तार करके जेल में ठूंस दिया गया। रामलीला मैदान में सुबह हुई रैली की खबर देश के लोगों तक न पहुंचे इसलिए, दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित सभी बड़े अखबारों के दफ्तरों की बिजली रात में ही काट दी गई। अगले दिन सिर्फ हिंदुस्तान टाइम्स और स्टेट्समैन ही छप पाए, क्योंकि उनके प्रिंटिंग प्रेस बहादुर शाह जफर मार्ग पर नहीं थे।

दमन के लिए MISA का इस्तेमाल

MISA साल 1971 में लागू किया गया था लेकिन इसका इस्तेमाल आपातकाल के दौरान कांग्रेस विरोधियों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेल में डालने के लिए किया गया। इस कानून में आपातकाल के दौरान कई संशोधन किए गए और इंदिरा गांधी की निरंकुश सरकार ने इसके जरिए अपने राजनीतिक विरोधियों और पत्रकारों को कुचलने का काम किया।

दफ्तरों की काटी गई बिजली  

प्रेस सेंसर कर दिया गया था। अगले दिन प्रकाशित करने से पहले सभी समाचार पत्रों को सरकार के पास मंजूरी के लिए भेजना जरूरी था। अखबार (संपादकों) द्वारा आपातकाल के विरोध में किसी तरह की सामग्री छापने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इतना ही नहीं कई अखबारों के दफ्तरों की बिजली काट दी गई, इससे समाचार पत्र प्रिंटर भी ठहर गए। वहीं, कई समाचार पत्रों के संपादकों ने अपना विरोध दर्ज कराने के लिए कई तरह की रणनीतियों का भी इस्तेमाल किया। 

 

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