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मनमोहन राज की अपेक्षा मोदी राज में दंगों में भारी कमी, 35 हजार कम हुईं घटनाएं

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मई 2014 में देश की बागडोर संभाली, तो उन्होंने लोगों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी। लोगों की जान-माल की सुरक्षा के लिए हर स्तर पर प्रयास किया। हालांकि पिछले साढ़े पांच सालों में उनकी सरकार को बदनाम करने और देश में माहौल खराब करने के लिए हर तरह के प्रयास किए गए, लेकिन मोदी सरकार की मुस्तैदी ने हर मंसूबों को नाकाम किया। जब देश में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) लागू हुआ, तो कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने देश को अस्थिर करने के लिए लोगों को भड़काना शुरू किया, जिसका नतीजा देश भर में शाहीनबाग जैसा धरना देखने को मिला।

मनमोहन सिंह की तुलना में 35,793 घटनाएं कम

एनसीआरबी ने 2009 से लेकर 2018 तक देशभर में हुई हिंसा के आंकडों को जारी किया। इसमें छात्र, किसान और राजनीतिक आंदोलन के साथ ही जातीय और सांप्रदायिक हिंसा शामिल है। इन आंकड़ों को आधार बनाकर मनमोहन सिंह सरकार के दूसरे कार्यकाल और मोदी सरकार के पहले कार्यकाल की तुलना की की गई है। इस तुलना से जो तस्वीर उभर कर सामने आती है, उससे पता चलता है कि मनमोहन सरकार की तुलना में मोदी सरकार में 35793 घटनाएं कम हुईं। इसकी पुष्टि इन आंकड़ों से होती है। 

मोदी राज में हर वर्ष घटनाओं में आई कमी

इन आंकड़ों के देखने से पता चलता है कि मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में 2009 से 2013 तक कुल 345772 हिंसक घटनाएं हुईं, जबकि मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में 2014 से 2018 तक कुल 309979 हिंसक घटनाएं हुईं। अगर आंकड़ों को वार्षिक आधार पर देखें, तो इससे स्पष्ट तौर पर पता चलता है कि जहां मनमोहन सिंह के कार्यकाल में हर वर्ष घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है, वहीं प्रधानमंत्री मोदी के केंद्र की सत्ता संभालने के बाद हर साल हिंसक घटनाओं में गिरावट दर्ज की गई है।

मोदी सरकार ने दिलाया सिखों को इंसाफ
30 साल से इंसाफ के लिए तरस रहे 1984 सिख विरोधी हिंसा पीड़ितों को मोदी सरकार में 3 साल में इंसाफ मिल गया। दिल्ली की पटियाला हाऊस कोर्ट ने दो सिख युवकों की नृशंस हत्या के मामले में यशपाल सिंह को फांसी और नरेश सहरावत को उम्र कैद की सजा दी। हैरत की बात ये है कि 1994 में कांग्रेस सरकार के दबाव में दिल्ली पुलिस ने ये केस बंद कर दिया था। लेकिन मोदी सरकार ने 2015 में सिखों को इंसाफ दिलाने के लिए एसआईटी बनाई और एक केस में सजा भी दिला दी।

आइए एक नजर डालते हैं कांग्रेस के शासनकाल में हुए दंगों के इतिहास पर…. 

1984 की सिख विरोधी हिंसा देश के इतिहास में काला अध्याय है। इस हिंसा में देशभर में हजारों सिखों का कत्लेआम हुआ, हजारों मां-बहनों की आबरू से खिलवाड़ किया गया और अरबों रुपये की संपत्ति लूटी गई, लेकिन इसमें शामिल कांग्रेस नेताओं को सरकार लगातार बचाती रही। और तो और तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अमानवीय बयान देकर इस हत्याकांड को सही ठहराने की कोशिश भी की। बहरहाल सिख संगठनों और पीड़ितों को इंसाफ दिलाने की सबसे गंभीर पहल वाजपेयी सरकार ने साल 2000 में शुरू की लेकिन 2004 में कांग्रेस की सरकार बनने के साथ ही ये प्रक्रिया पटरी से उतर गई। नरसंहार के सबसे बड़े गुनहगार सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर को कांग्रेस ने 2004 में न केवल सांसद बनाया बल्कि सिखों के जख्मों पर नमक छिड़कने के लिए टाइटलर को 2005 में मंत्री भी बना दिया।

कांग्रेस राज में सबसे अधिक दंगे हुए ऐसा नहीं है, कि कांग्रेस ने सत्ता के मद में 1984 में पहली बार देश में नरसंहार करवाया। देश की आजादी के बाद कांग्रेस की सत्ता के नीचे सैकड़ों नरसंहार हुए हैं। इन नरसंहारों पर नजर डालने पर दिल दहल उठता है। विभाजन की त्रासदी को झेल चुके देश में 1960 तक सामाजिक माहौल आमतौर पर शांत रहा था लेकिन 1961 के बाद से देश में दंगों की संख्या बढ़ने लगी। 1960 में जहां मात्र 26 दंगे हुए थे वहीं 1961 में 1070 दंगों की घटनाऐं हुईं। 

कश्मीर में हिंदुओं के नरसंहार के लिए कांग्रेस जिम्मेदार
1986 में हिंदुओं का नरसंहार किया गया। मंदिरों को तोड़ा गया, हिंदू महिलाओं की इज्जत से खिलवाड़ किया गया। उस समय केंद्र में कांग्रेस की ही सरकार थी, लेकिन उसने जान बूझकर आंखें मूंदे रखी। कांग्रेस ने हिंदुओं के कत्लेआम करने की खुली छूट दे रखी थी। दो हजार से अधिक लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया और 4 लाख 50 हजार से अधिक कश्मीरी हिंदुओं को अपना घर-बार छोड़ना पड़ा। कांग्रेस का हिंदुओं से नफरत इस स्तर पर है कि दंगा करने वालों के खिलाफ मुकदमा तक चलाने में बेरूखी दिखाई। विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं को न तो मुआवजा दिया गया और न ही उन्हें दोबारा कश्मीर में बसाने के लिए कोई नीति ही बनाई गई।

बंटवारे के वक्त भी हिंदुओं के नरसंहार में कांग्रेस का हाथ
स्वतंत्रता प्राप्ति के वक्त हुए दंगों में 30 लाख हिंदुओं का कत्ल करवाने की दोषी कांग्रेस ही है। दरअसल कांग्रेस ने सत्ता की कुर्सी पाने के लिए धर्म की आड़ में ये सब किया। कलकत्ता दंगे में ही करीब एक लाख से अधिक हिंदुओं का नरसंहार किया गया। इसके बाद 1948 में हैदराबाद में निजाम की सेना ने हिंदुओं पर जुल्म ढाए गए। हिंदू महिलाओं की अस्मत को तार-तार किया जाता रहा। बावजूद इसके तत्‍कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू मूकदर्शक बनकर देखते रहे, क्‍योंकि इसमें उनका राजनीतिक हित जुड़ा था।

कांग्रेस के नेताओं ने देश ही नहीं, दिल भी बांट दिया
कांग्रेस ने न सिर्फ देश को बांटा है, बल्कि धार्मिक आधार पर भेदभाव करने और हिंदुओं को जातियों में बांटकर रखने की भी दोषी है। 1971 में पूर्वी पाकिस्‍तान में लाखों हिंदुओं के कत्‍लेआम और महिलाओं के बलात्कार को इंदिरा गांधी ने ब्‍लैक आउट करा दिया था। मतलब साफ था कि हिंदुओं को एकजुट होने से रोको और मुसलमानों के एकमुश्‍त वोट के बल पर सत्‍ता हासिल करो।

इसी तरह 1969 में अहमदाबाद में भीषण सांप्रदायिक दंगा कांग्रेस के मुख्यमंत्री हितेंद्र भाई देसाई के समय हुआ। इसके बाद 1985, 1987, 1990 और 1992 में अहमदाबाद में भीषण सांप्रदायिक दंगे हुए और इन दंगों के दौरान गुजरात की बागडोर कांग्रेसी मुख्‍यमंत्रियों के हाथ में रही। इसके बावजूद न तो दंगाइयों को सजा मिली और न ही दंगा पीड़ितों को इंसाफ।

Public Policy Research Centre का दंगों पर किया गया शोध कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को हमारे सामने रखता है-
• प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के शासनकाल में 1950 से 1964 के दौरान 16 राज्यों में 243 सांप्रदायिक दंगे हुए।

• प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के शासन काल में 1966-77 तक और 1980-84 तक, 15 राज्यों में 337 सांप्रदायिक दंगे हुए। सभी प्रधानमंत्रियों में सबसे अधिक दंगे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के काल में हुए। इंदिरा गांधी के शासन काल के दौरान देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था बहुत ही नाजुक रही।

• प्रधानमंत्री राजीव गांधी के शासनकाल 1984-89 के दौरान 16 राज्यों में 291 सांप्रदायिक दंगे हुए। इसमें 1984 का सबसे भीषण सिक्ख दंगा रहा।

• 1950-1995 तक के दंगों पर किये गये इस शोध से तथ्य सामने आता है कि इन वर्षों में कुल 1,194 दंगे हुए जिसमें 871 दंगे यानि 72.95 प्रतिशत दंगे नेहरु, इंदिरा और राजीव गांधी के शासनकाल के दौरान हुए।

• इसमें सबसे अधिक गुजरात राज्य दंगों की चपेट में रहा। इस दौरान अहमदाबाद को छोड़कर पूरे राज्य में 244 दंगे जिसमें 1601 लोगों की हत्या हुई। जबकि अकेले अहमदाबाद में 71 दंगे हुए जिसमें 1701 लोग मारे गये। सारे ही दंगें कांग्रेस राज में हुए। अहमदाबाद का सबसे भीषण दंगा सितंबर-अक्टूबर 1969 में हुआ जिसमें 512 लोग मारे गये और 6 महिनों तक दंगा चला था। 

आइए आजादी के समय के नरसंहार को छोड़कर कुछ बड़े नरसंहारों पर नजर डालते हैं, जो कांग्रेस की सत्ता में हुए हैं-

  • 1969      अहमदाबाद             512 लोग मारे गये 
  • 1970      जलगांव                 100 लोग मारे गये 
  • 1980      मुरादाबाद               1500 लोग मारे गये 
  • 1983      नेयली, आसाम         1819 लोग मारे गये 
  • 1984      भिवंडी                  146 लोग मारे गये 
  • 1984      दिल्ली                   2733 लोग मारे गये 
  • 1985     अहमदाबाद             300 लोग मारे गये 
  • 1989      भागलपुर               1161 लोग मारे गये 
  • 1990      अलीगढ़                 150 लोग मारे गये 
  • 1992      सूरत                   152 लोग मारे गये 
  • 1993      मुंबई                   872 लोग मारे गये

धर्मनिरपेक्षता और गांधी की अहिंसा को आदर्श मानने वाली कांग्रेस का यह असली चरित्र है, जो धर्मों और जातियों को लड़ा कर इस देश की सत्ता में बने रहने का कुचक्र रचती रही है।

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