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मनमोहन सिंह के साथ जब नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन भी रेनकोट पहनकर नहाने पहुंचे… तो देखिए क्या हुआ…

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 08 फरवरी, 2017 को लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा का जवाब देते हुए जब कहा, “पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में इतने भ्रष्टाचार हुए, लेकिन उन पर एक दाग तक नहीं लगा। बाथरूम में रेनकोट पहनकर नहाने की कला तो कोई डॉक्टर साहब से सीखे”। उस वक्त देश की जनता के सामने, उन डॉ. मनमोहन सिंह की ईमानदार छवि से रहस्य का पर्दा उठा था, जिसे वर्षों से कांग्रेसी मीडिया ने डाला हुआ था। आज जब वर्तमान नालंदा विश्वविद्यालय की स्थिति की तुलना उसके गौरवशाली आतीत से करें, जिसे प्राप्त करने की कल्पना पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल्ल कलाम ने की थी, तो पता चलेगा कि डॉ. मनमोहन सिंह और उनके जिगरी दोस्त डॉ. अमर्त्य सेन, दोनों ने इस योजना में एकसाथ रेनकोट पहनकर किस प्रकार जमकर नहाया है। आइए! डॉक्टर साहब की इस कला के बारे में जानते हैं-

28 मार्च, 2006 को बिहार विधान सभा के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करते हुए पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने नांलदा विश्वविद्यालय की स्थापना करने का विचार सामने रखा था। देश में पहली बार राष्ट्रपति किसी राज्य में विधानसभा को संबोधित कर रहे थे। इस संबोधन में उन्होंने बिहार को 2015 तक विकसित राज्यों की श्रेणी में लाने का रोडमैप दिया था। इसी रोडपैम में 800 साल पहले बिहार के राजगीर में स्थित विश्वस्तर के ज्ञान के केन्द्र नांलदा विश्विद्यालय को उसके पुराने रूप में विकसित करने की योजना थी।

नालंदा विश्वविद्यालय से डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को दूर किया
लेकिन इस योजना को मूर्तरूप देने वाली डॉ. मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के इस स्वप्न के साथ ऐसा भद्दा मजाक करना शुरू किया कि खिन्न होकर डॉ. कलाम ने 04 जुलाई, 2011 को विश्वविद्यालय के पहले विजिटर पद से इस्तीफा दे दिया। त्यागपत्र देने से पहले उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को नांलदा विश्वविद्यालय के साथ हो रहे खिलवाड़, मनमानी और भ्रष्टाचार की बातों को रोकने के लिए समझाया, लेकिन मौनी बाबा डॉ. मनमोहन सिंह इन सुझावों पर मौन रहे।

देश के राष्ट्रपति की बात पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इसलिए मौन रहे, क्योंकि नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की बागडोर उन्होंने अपने पचास साल के लंगोटिया मित्र डॉ. अमर्त्य सेन को दे रखी थी। अमर्त्य सेन और डॉ. मनमोहन सिंह पचास के दशक में कैंब्रिज विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र में एक साथ पढ़ाई करने के दौरान मित्र बने थे। डॉ. मनमोहन सिंह और अमर्त्य सेन की मित्रता यह बताती है कि नालंदा विश्वविद्यालय की योजना में डॉ. मनमोहन सिंह ने रेनकोट पहनकर बाथरूम में कैसे स्नान किया। आप भी उनके इस तरीके को पढ़कर हैरान रह जाएंगे।

डॉ. मनमोहन सिंह ने अमर्त्य सेन को नांलदा विश्वविद्यालय सौंप दिया
नालंदा विश्वविद्यालय को अंतरराष्ष्ट्रीय स्तर के केन्द्र के रूप में स्थापित करने के लिए डॉ. मनमोहन सिंह को डॉ. अमर्त्य सेन से अच्छा कोई व्यक्ति नजर नहीं आया। पहली नजर में यह सभी को पसंद भी आ गया क्योंकि अर्थशास्त्र के लिए अमर्त्य सेन को नोबेल पुरस्कार मिल चुका था और विश्व में उनकी पहचान का फायदा नालंदा विश्वविद्यालय को मिलना स्वाभाविक था। लेकिन सतह से दिखने वाले इस कारण के पीछे सबसे बड़ा कारण कुछ और ही था। वह कारण यह था कि मनमोहन सिंह और अमर्त्य सेन पचास साल के लंगोटिया मित्र थे। इस विश्वविद्यालय को भारत सरकार की किसी भी तरह की दखलंदाजी से दूर रखने के लिए डॉ. मनमोहन सिंह ने नालंदा विश्वविद्यालय को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के साथ-साथ मानव संसाधन मंत्रालय से भी अलग रखा और इसे अंतरराष्ष्ट्रीय स्तर का बनाने के लिए इसकी जिम्मेदारी विदेश मंत्रालय के हाथों में दे दी। तत्कालीन विदेश मंत्री एस एम कृष्णा थे।

जून 2007 में विदेश मंत्रालय ने नालंदा मेंटर ग्रुप (NMG) का गठन किया और इसका अध्यक्ष डॉ. मनमोहन सिंह के लंगोटिया मित्र अमर्त्य सेन को बना दिया। बिहार के राजगीर में स्थापित होने वाले नालंदा विश्वविद्यालय पर नालंदा मेंटर ग्रुप (NMG) की पहली बैठक स्थापित होने के कुछ दिन बाद ही सिंगापुर में 13-15 जुलाई के बीच हुई। इस बैठक में 19 सदस्यों वाली एक अंतरराष्ष्ट्रीय परामर्श समीति का गठन किया गया, जिसे विश्वविद्यालय के विभिन्न पहलुओं पर सुझाव देना था। इस परामर्श समीति में भारत से जिन व्यक्तियों को शामिल किया गया, उनमें डॉ. मनमोहन सिंह की दोनों बेटियां डॉ. उपेन्दर सिंह, डॉ. दमन सिंह और इनकी सहेली डॉ. नवजोत लाहिरी थीं। अमर्त्य सेन को नालंदा विश्वविद्यालय के लिए धन की कोई कमी नहीं आने दी गई और उनके हर निर्णय को मानना सरकार के लिए आदेश के समान था।ग्रुप की पहली बैठक में इस निम्न सूची के व्यक्तियों को परामर्श समीति में शामिल किया गया-

नालंदा विश्वविद्यालय और अमर्त्य सेन की मनमानी
कहा जाता है कि जब सईंया कोतवाल बन जाते हैं तो डर खत्म हो जाता है, उसी तरह से भारत के प्रधानमंत्री के मित्र अमर्त्य सेन का डर एकदम खत्म हो गया था। वह नालंदा विश्वविद्यालय को अपने घर की योजना समझने लगे थे। इसके बारे में उनके द्वारा लिए गए किसी भी निर्णय पर सरकार कोई सवाल नहीं कर सकती थी। अमर्त्य सेन की अध्यक्षता वाले मेंटर ग्रुप को विदेश मंत्रालय को नौ महीनों के अंदर अपने सुझाव देने थे, लेकिन 2010 तक इस ग्रुप ने कोई सुझाव नहीं दिए। इसके बावजूद इस मेंटर ग्रुप के दिल्ली में स्थित कार्यालय और उसमें कार्यरत लोगों का खर्च सरकार बिना किसी सवाल के उठाती रही।

बिहार के राजगीर में जो विश्वविद्यालय निर्माणाधीन था, उसके लिए दिल्ली में वाइस चासंलर डॉ. गोपा सबरवाल और अन्य कई लोगों को अमर्त्य सेन ने मनमाने तरीके से नियुक्त कर दिया। इन सबकी सैलरी 50,000 से 55,000 डॉलर प्रति वर्ष थी, यानि रुपये के हिसाब से पचास से साठ लाख रुपये साल, मतलब हर माह 5 से 6 लाख रुपये। इतनी सैलरी तो भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को भी नहीं मिलती है, लेकिन अमर्त्य सेन ने मनमाने तरीके से लेडी श्रीराम कालेज की एक रीडर डॉ. गोपा सबरवाल को वाइसचांसलर बनाने में सभी नैतिकता को दर किनार कर दिया और उन्हें सैलरी मनमाने तरीके से दी। क्योंकि डॉ. गोपा सबरवाल और डॉ. मनमोहन सिंह की बेटियां मित्र थीं, या यूं कह लें नालंदा के मेंटर ग्रुप में इनका ही रौब चलता था। डॉ. सबरवाल की नियुक्ति से न केवल डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम, बल्कि विदेश मंत्रालय भी काफी नाराज हुआ था। डॉ. मनमोहन सिंह के मित्र अमर्त्य सेन के मनमाने तरीके से धन उड़ाने को लेकर सीएजी ने भी कई सवाल उठाए थे, लेकिन मनमोहन सिंह ने अपने मित्र से कुछ नहीं कहा, भले ही विश्वविद्यालय के पहले विजिटर ने इस्तीफा दे दिया।

डॉ. मनमोहन सिंह के मित्र अमर्त्य सेन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप
2700 करोड़ रुपये वाले नालंदा विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने मित्र को हर सरकारी निगरानी से मुक्त कर दिया था। नालंदा विश्वविद्यालय के लिए नालंदा मेंटर ग्रुप को सरकार के धन को खर्च करने की पूरी छूट दी गई थी, पी चिंदाबरंम का वित्त मंत्रालय सवाल तो खड़े करता था, परन्तु प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कारण कोई कदम नहीं उठा पाता था। 2010 में संसद से पारित नालंदा विश्वविद्यालय कानून के तहत नालंदा मेंटर ग्रुप को एक साल के लिए अंतरिम गवर्निंग बॉडी बनाया गया और यह प्रावधान किया गया कि एक साल के अंदर सरकार एक गवर्निंग बोर्ड बनाएगी, लेकिन यह बोर्ड सरकार ने कभी नहीं बनाया और नालंदा मेंटर ग्रुप का ही समय हर साल बढ़ाती रही। 2013 में डॉ. मनमोहन सिंह ने नालंदा मेंटर ग्रुप का कार्यकाल अनिश्चितकाल तक के लिए बढ़ा दिया। सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में नालंदा मेंटर ग्रुप की वित्तिय अनिमितताओं पर सवाल भी खड़े किए हैं-

जिस नालंदा मेंटर ग्रुप को 9 महीने के अंदर अपना काम समाप्त कर देना चाहिए था, उसे किसी न किसी तरह बने रहने का मौका डॉ. मनमोहन सिंह ने दिया। ऐसा करने में देश की जनता के हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ, जिसे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह दोनों हाथों से अपने मित्र पर लुटाते रहे और किसी को खबर भी नहीं लगी की कितने हजार करोड़ रुपये लुट गए। इस पर अगर उनके अपने ही वित्त मंत्रालय ने सवाल भी उठाना चाहा, तो डॉ. अमर्त्य सेन ने नालंदा विश्वविद्यालय को छोड़ने की धमकी देकर चुप करा दिया-

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