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पीएम मोदी के विरोध में बदला तीन नए कृषि कानून के खिलाफ किसान आंदोलन

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देश का एक खेमा, जिसमें कुछ बुद्धिजीवियों और वाम रूझान वाले पत्रकारों की संख्या अधिक है, शुरू से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को बदनाम करने में जुटा हुआ है। यह गैंग अच्छी तरह जानता है कि जब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे पाक साफ और उम्दा छवि वाले नेता सरकार की कमान थामे रहेगा तब तक भाजपा को हराना आसान नहीं। इसलिए पीएम मोदी की छवि को ही धूमिल करने का प्रयास किया जाए। यहीकारण रहा कि संसद में पास हुए तीन नए कृषि कानून के खिलाफ शुरू हुआ तथाकथित किसान आंदोलन शुरू से ही किसानों के हित के बजाए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध में बदल गया। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान इन्हीं लोगों ने असहिष्णुता का बिगुल फूंकते हुए अवार्ड वापसी की नौटंकी रची थी। लेकिन दोनों बार ही यह गैंग असफल रहा है, क्योंकि अपने काम की बदौलत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समय की कसौटी पर हमेशा खड़े उतरे हैं और पहले से अधिक लोकप्रियता अर्जित की है।

पश्चिम बंगाल को पंजाब और यूपी में दुहराने की मंशा

पश्चिम बंगाल में भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के बाद ये गैंग अब इसे पंजाब और उत्तर प्रदेश में दुहराने की बात कह रहे है। इससे साफ हो गया है कि इस गैंग का तथाकथित किसान आंदोलन से कोई लेना देना नहीं रहा है। उन्हें तो महज किसान आंदोलन के नाम का सहारा चाहिए। स्‍पष्‍ट है किसान आंदोलन अब राजनीतिक विरोध में तब्‍दील हो चुका है। यही कारण है कि आम किसान इस आंदोलन से दूरी बनाने लगे हैं। सबसे बड़ी समस्‍या यह है कि आंदोलन करने वाले उन गलतियों से सबक सीखने को तैयार नहीं हैं, जिनके चलते किसान बदहाली के शिकार बने। यही कारण है कि मोदी सरकार ने किसानों के हित में जो काम किए हैं और उसका जो परिणाम सामने आया है उससे अधिकांश किसान संगठन तथाकथित किसान आंदोलन से नाता तोड़ने लगे हैं।   

गेहूं की सरकारी खरीद का बना रिकॉर्ड

एक तरफ देश के किसानों के हित के नाम पर किसान आंदोलन से जुड़े कुछ किसान संगठन कृषि कानूनों की प्रतियां जलाकर विरोध दर्ज करा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मोदी सरकार देश में एमएसपी पर गेहूं की रिकॉर्ड स्तर पर खरीद कर रही है। अब तक 44.4 लाख किसानों से 76,000 करोड़ रूपये का गेहूं खरीदा जा चुका है। सबसे बड़ी बात यह है कि गेहूं खरीद की रकम बिना किसी बिचौलियों के सीधे किसानों के बैंक खातों में पहुंच चुकी है। सीधे भुगतान पाने वालों में पंजाब-हरियाणा के किसान अग्रणी रहे हैं। उदाहरण के लिए कुल भुगतान में से 26,000 करोड़ रूपये पंजाब और 16,700 करोड़ रुपये हरियाणा के गेहूं किसानों के बैंक खातों में भेजे गए। जहां गेहूं की खरीद न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य (एमएसपी) पर हो रही है वहीं खुले बाजार में सरसों की कीमतें रिकार्ड बना रही हैं। देश की कई मंडियों में सरसों 8000 रूपये प्रति क्‍विंटल की दर से बिकी है जबकि सरसों का एमएसपी 4650 रूपये प्रति क्‍विंटल है।

पूर्ववर्ती सरकारों का पूरा जोर सब्सिडी पर

भारत में कृषि की सबसे बड़ी समस्‍या यह रही कि पूर्ववर्ती सरकारों का पूरा जोर दूरगामी महत्‍व वाले निवेश पर न होकर सब्‍सिडी देने पर रहा। यानि उस दौर में कृषि नीति नकारात्मक सोच से संचालित रही। इसका नतीजा यह निकला कि विविध फसलों की खेती करने वाला भारतीय किसान चुनिंदा फसलों की खेती में उलझा रहा। हरित क्रांति रूपी एकांगी कृषि विकास से शुरू में तो खेती में खुशहाली आई लेकिन शीघ्र ही उसकी सीमाएं प्रकट होने लगीं। सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि सरकारों ने हरित क्रांति की इन खामियों को दूर न कर के सब्‍सिडी, मुफ्त बिजली-पानी, कर्ज माफी जैसे चुनावी पासें फेंकना शुरू कर दिया। इससे समस्या और गंभीर होती चली गई। इस प्रकार धीरे-धीरे खेती-किसानी घाटे के सौदे में तब्‍दील हो गई। बदहाली में फंसी कृषि को उबारने के लिए कृषि विशेषज्ञ लंबे समय से सुझाव दे रहे हैं कि विविधीकृत फसल प्रणाली अपनाई जाए। लेकिन गेहूं-धान केंद्रित फसल चक्र को तोड़ना आसान नहीं था। कृषि की इन्हीं खामियों को दूर करने और कृषि के आधुनिकीकरण के लिए मोदी सरकार ने तीन नए कृषि कानून बनाए। मोदी सरकार द्वारा गेहूं और सरसों की खरीद–बिक्री के बनते रिकार्ड से साफ तौर पर किसान संगठनों द्वारा तीनों कृषि कानूनों का विरोध बेमानी लगता है। तभी तो किसान संगठन अब कृषि कानूनों के विरोध से आगे बढ़कर भारतीय जनता पार्टी को हराने की मुहिम में जुट गए हैं।

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