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नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में बुनियादी शिक्षा पर जोर, स्कूली शिक्षा का बदला स्वरूप, शिक्षा के अधिकार का बढ़ा दायरा

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भारत की शिक्षा प्रणाली में एक बहुत बड़ा परिवर्तन करते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 29 जुलाई, 2020 को एक नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को मंजूरी दी। यह नीति स्कूली शिक्षा के सभी स्तरों प्री-स्कूल से माध्यमिक स्तर तक सबके लिए एकसमान पहुंच सुनिश्चित करने पर जोर देती है। इसमें स्कूली शिक्षा प्रणाली को 5+3+3+4 के रूप में बदला गया है। इसमें पहले 5 वर्ष अर्ली स्कूलिंग के होंगे। 3 से 6 वर्ष के बच्चों को भी स्कूली शिक्षा के अंतर्गत शामिल किया जाएगा।

  • एनसीईआरटी 8 ​​वर्ष की आयु तक के बच्चों के लिए प्रारंभिक बचपन देखभाल और शिक्षा (एनसीपीएफईसीसीई) के लिए एक राष्ट्रीय पाठ्यक्रम और शैक्षणिक ढांचा विकसित करेगा। जिससे आगे चलकर बच्चों का बेहतर विकास होगा।
  • प्ले स्कूल शहरों और प्राइवेट स्कूलों तक ही सीमित है। लेकिन नई शिक्षा नीति के तहत अब प्ले स्कूल गांवों में भी खुलेंगे। गरीब-अमीर, गांव-शहर, हर जगह और हर व्यक्ति के बच्चे प्ले स्कूल में शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं।
  • टेक्नोलॉजी ने बहुत तेजी से और बहुत कम खर्च में समाज के आखिरी छोर पर खड़े विद्यार्थियों तक पहुंचने का माध्यम दिया है। इसका नई शिक्षा नीति में ज्यादा से ज्यादा उपयोग करने पर जोर दिया गया है।
  • स्कूल और उच्च शिक्षा, दोनों की ई-शिक्षा या ऑनलाइन शिक्षा की जरूरतों को पूरा करने के लिए एमएचआरडी में डिजिटल अवसंरचना, डिजिटल कंटेंट और क्षमता निर्माण के उद्देश्य से एक समर्पित इकाई बनाई जाएगी।

शिक्षा के अधिकार का बढ़ा दायरा

  • नई शिक्षा नीति में शिक्षा के अधिकार (RTE) का दायरा बढ़ गया है। यह पहले 6 से 14 साल के बच्चों के लिए था, जो अब बढ़कर 3 से 18 साल के बच्चों के लिए हो गया है और उनके लिए प्राथमिक, माध्यमिक और उत्तर माध्यमिक शिक्षा अनिवार्य हो गई है।
  • यह पहला मौका है जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने स्कूल में दाखिले से पहले की पढ़ाई (प्री-स्कूलिंग) के लिए सरकारी मदद देने या सरकार द्वारा हस्तक्षेप करने की बात कही है। प्री-स्कूलिंग में नर्सरी और केजी स्तर की शिक्षा आती है।
  • मूलभूत शिक्षा पर ध्यान राष्ट्रीय शिक्षा नीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। इसके तहत बुनियादी साक्षरता और संख्या-ज्ञान के विकास को एक राष्ट्रीय मिशन के रूप में लिया जाएगा।
  • इसके अलावा बच्चों को ‘21वीं सदी के कौशल’ से लैस करने पर ध्यान दिया गया है। इसके लिए कक्षा 6 से कोडिंग जैसे नए विषयों की शुरुआत की जाएगी।
  • सरकार ने इसके साथ ही स्कूली शिक्षा में 2030 तक नामांकन अनुपात यानी ग्रास इनरोलमेंट रेशियो (जीईआर) को 100 प्रतिशत और उच्च शिक्षा में इसे 50 प्रतिशत तक करने का लक्ष्य रखा है।

दबाव, तनाव और बोझ से मुक्ति

नई शिक्षा नीति में बच्चों की रुचि, प्रतिभा और इच्छाओंको प्राथमिकता दी गई है। अब बच्चे अपनी रूचि और प्रतिभा के हिसाब से पढ़ाई कर सकेंगे। स्ट्रीम चयन को लेकर जो बच्चों पर दबाव रहता था, वो अब हटा दिया गया है। पहले पारिवारिक इच्छा या दबाव के कारण विद्यार्थी अपनी क्षमता के बाहर कोई स्ट्रीम चुन लेते थे। इससे उनका प्रदर्शन प्रभावित होता था।

  • परीक्षा का स्वरूप बदल कर अब छात्रों की ‘क्षमताओं का आकलन’ किया जाएगा, ना कि उनके यादाश्त का। मार्क्सशीट और नंबरों का दवाब इससे ख़त्म होगा। परीक्षा के मानसिक तनाव से बच्चों को निकालना राष्ट्रीय शिक्षा नीति का एक मुख्य उद्देश्य है।
  • नई शिक्षा नीति को इसी तरह तैयार किया गया है ताकि सिलेबस को कम किया जा सके और फंडामेंटल चीजों पर ध्यान केंद्रित किया जा सके। कौन सी जानकारी हासिल करनी है, क्या पढ़ना है। इस बात को ध्यान में रखकर पढ़ाई के लिए लंबे-चौड़े पाठ्यक्रम और किताबों के बोझ को कम किया गया है।
  • नई शिक्षा नीति में इस बात पर भी ध्यान दिया गया है कि शिक्षा केवल डिग्री-डिप्लोमा और नौकरी पाने भर तक सीमित न रहे, बल्कि इससे व्यक्ति का सर्वांगीण विकास के साथ उनके सोचने-समझने की क्षमता भी बढ़े।

शिक्षा  में लचीलापन

मल्टीपल एंट्री-एक्जिट सिस्टम के माद्यम से उच्च शिक्षा को लचीला बनाने की कोशिश की गई है। ग्रेजुएशन में प्रवेश लेकर पहले साल में कोर्स छोड़ने पर सर्टिफ़िकेट, दूसरे साल के बाद डिप्लोमा और तीसरे साल के बाद ग्रेजुएशन की डिग्री दी जाएगी। चार साल बाद की डिग्री शोध के साथ होगी ।

  • छात्रों के परफॉर्मेंस का डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के लिए क्रेडिट ट्रांसफर और एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट का प्रावधान किया गया है ताकि छात्रों को अपने पाठ्यक्रम को फिर से शुरू करने के लिए बीच में एक कोर्स छोड़ने और बाद में उनका उपयोग करने की स्वतंत्रता हो सके।
  • अब युवाओं को जिंदगी भर किसी एक प्रोफेशन में टिके रहने की जरूरत नहीं है। वह जॉब कर सकता है। वह अपने कोर्स से ब्रेक लेकर दूसरा कोर्स ज्वॉइन कर सकता है।
  • हर विद्यार्थी को अपनी पसंद, अपनी सुविधा और ज़रूरत के हिसाब से किसी डिग्री या कोर्स में दाखिला लेने और छोड़ने की आजादी होगी।
  • नई शिक्षा नीति मे मल्टीपल डिस्प्लिनरी एजुकेशन की बात कही गई है। अब कोई भी छात्र विज्ञान के साथ कला और सामाजिक विज्ञान के विषयों को भी दसवीं-बारहवीं बोर्ड और ग्रेजुएशन में चुन सकता है। इसमें कोई एक स्ट्रीम मेजर और दूसरा माइनर होगा।

सीखने की ललक

नई शिक्षा नीति पढ़ने के बजाय सीखने पर जोर देती है। इसमें पाठ्यक्रम से आगे बढ़कर विद्यार्थियों में विश्लेषणात्मक सोच विकसित करने पर ध्यान दिया गया है, ताकि युवा अपनी रुचि के अनुसार कौशल सीख सकेंगे।

  • नई शिक्षा नीति ‘कैसे सोचें’ पर जोर देती है। इसमें बच्चों के लिए सवाल जवाब-आधारित, खोज-आधारित, चर्चा आधारित, विश्लेषण आधारित और मनोरंजन आधारित सीखने के तरीकों पर बल दिया गया है। ताकि कक्षाओं में सीखने और भाग लेने की उनकी ललक बढ़ेगी।
  • पूरे प्रारंभिक और माध्यमिक स्कूल पाठ्यक्रम के दौरान एक मजबूत सतत रचनात्मक और अनुकूल मूल्यांकन प्रणाली के साथ विशेष रूप से प्रत्येक बच्चे का सीखना ट्रैक किया जाएगा।

3 लैंग्वेज फ़ॉर्मूला

नई शिक्षा नीति में 3 लैंग्वेज फ़ॉर्मूले की बात की गई है। पांचवीं कक्षा तक की शिक्षा में मातृभाषा/स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा को अध्ययन के माध्यम के रूप में अपनाने पर बल दिया गया है। साथ ही मातृभाषा को कक्षा-8 और आगे की शिक्षा के लिए प्राथमिकता देने का सुझाव दिया गया है।

  • स्कूली और उच्च शिक्षा में छात्रों के लिए संस्कृत और तमिल, तेलुगू और कन्नड़ जैसी अन्य प्राचीन भारतीय भाषाओं का विकल्प उपलब्ध होगा, परंतु किसी भी छात्र पर भाषा के चुनाव की कोई बाध्यता नहीं होगी।
  • भारतीय संकेत भाषा यानि साइन लैंग्वेज को देश भर में मानकीकृत किया जाएगा और बधिर विद्यार्थियों द्वारा उपयोग किए जाने के लिए राष्ट्रीय एवं राज्य स्‍तरीय पाठ्यक्रम सामग्री विकसित की जाएंगी।

शिक्षकों की गुणवत्ता में सुधार

नई शिक्षा नीति में शिक्षकों की गुणवत्ता का स्तर और ऊपर उठाने के लिए कई प्रावधान किए गए हैं। अब स्कूली शिक्षा व्यवस्था का स्ट्रक्चर चार हिस्सों में बंटा होगा – फाउंडेशन, प्रीपेरेटरी, मिडल और सेकेंडरी। इसी के मुताबिक टीईटी का पैटर्न भी सेट किया जाएगा।

  • विषय शिक्षकों की भर्ती के समय टीईटी या संबंधित विषय में एनटीए टेस्ट स्कोर भी चेक किया जा सकता है। सभी विषयों की परीक्षाएं और कॉमन एप्टीट्यूट टेस्ट का आयोजन नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) करेगी।
  • शिक्षामित्र, एडहॉक, गेस्ट टीचर जैसे पद धीरे-धीरे समाप्त किए जाएंगे और बेहतर चयन प्रक्रिया का गठन कर स्कूली और उच्च शिक्षा दोनों में नियमित और स्थायी अध्यापकों की नियुक्ति की जाएगी।
  • नई शिक्षा नीति के मुताबिक अब इंटरव्यू शिक्षक भर्ती प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा होगा। इंटरव्यू में देखा जाएगा कि शिक्षक क्षेत्रीय भाषा में बच्चों को सहजता के साथ पढ़ाने के काबिल है या नहीं।
  • नई शिक्षा नीति में कहा गया है कि शिक्षक बनने के लिए चार वर्षीय बीएड डिग्री साल 2030 से न्यूनतम क्वालिफिकेशन होगी। साल 2022 तक राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद शिक्षकों के लिए एक साझा राष्ट्रीय पेशेवर मानक तैयार करेगी।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शिक्षकों की गरिमा का भी विशेष ध्यान रखा गया है। जहां शिक्षक अच्छे पेशेवरों और अच्छे नागरिकों को तैयार कर सकेंगे।

 

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