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चीफ जस्टिस को निशाना बनाकर अपने ही बुने जाल में फंस गई कांग्रेस

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कांग्रेस जब सत्ता में नहीं होती है तो वह न मतदाताओं पर भरोसा करती है और न ही चुनी हुई सरकार पर। सेना पर और सीबीआई जैसी संवैधानिक संस्थाओं पर भी कांग्रेस पार्टी अविश्वास जताती है। नीति आयोग, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और सीएजी जैसी संवैधानिक संस्थाओं तक को कांग्रेस पार्टी ने कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है।

चुनाव दर चुनाव लगातार हार से बौखलाई कांग्रेस पार्टी एक-एक कर देश की सभी संवैधानिक संस्थाओं को टारगेट कर रही है। अब उसने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक को अपने निशाने पर ले लिया है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पर महाभियोग का प्रस्ताव लाना भी कांग्रेस की इसी कुत्सित राजनीति का परिणाम है। दरअसल स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहली घटना है कि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ‘महाअभियुक्त’ के कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की गई।

दूसरी ओर कांग्रेस ‘सविधान बचाओ’ अभियान के नाम पर दलित पॉलिटिक्स को परवान चढ़ाने की कोशिश कर रही है और समाज को ‘डिवाइड एंड रूल’ के रास्ते पर ले जाने की साजिश रच रही है। कितनी बड़ी विडंबना है कि आपातकाल में संविधान को बंधक बनाने वाली कांग्रेस संविधान बचाने निकली है। हालांकि कांग्रेस की इस ‘डर्टी पॉलिटिक्स’ को लोग समझ चुके हैं और पार्टी खुद ही एक्सपोज भी होती जा रही है।

महाभियोग प्रस्ताव को उपराष्ट्रपति ने किया नामंजूर
मुख्य न्यायाधीश पर महाभियोग प्रस्ताव को राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने खारिज कर दिया है। गौरतलब है कि प्रस्ताव पर सात रिटायर्ड सासंदों के दस्तखत थे, जो तकनीकी दृष्टिकोण से अनुचित था। इसके साथ ही उपराष्ट्रपति ने इस प्रस्ताव में कोई मेरिट भी नहीं देखा। गौरतलब है कि 22 अपैल को उपराष्ट्रपति ने संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप के अलावा पूर्व विधि सचिव पीके मल्होत्रा, पूर्व विधाई सचिव संजय सिंह और राज्यसभा सचिवालय के अधिकारियों से गहन विमर्श किया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज बी सुदर्शन रेड्डी से भी राय ली जिसके बाद इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया।

प्रस्ताव पर कांग्रेस के भीतर से उठी विरोध की आवाज
सवाल उठ रहे हैं कि महाभियोग प्रस्ताव पर कांग्रेस के भीतर ही अतर्विरोध को क्यों नहीं सुना गया? पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने इसे पहली नजर में ही खारिज कर दिया था। कांग्रेस पार्टी के कानूनी दिग्गज- वीरप्पा मोइली, चिदंबरम, सलमान खुर्शीद और अश्वनी कुमार (पूर्व कानून मंत्री) जैसे लोगों ने भी उस याचिका पर दस्तखत करने से मना कर दिया था। इस अंतर्विरोध को देखा जाए तो कांग्रेस जैसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में यह कदम किसी बगावत से कम नहीं माना जा सकता।

टीएमसी-डीएमके-आरजेडी जैसे दलों ने नहीं दिया साथ
मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ यह महाभियोग प्रस्ताव कांग्रेस समेत छह राजनीतिक दलों की ओर से पेश किया गया। आश्चर्य यह है कि कांग्रेस को इस ‘ऐतिहासिक’ कार्रवाई करने के लिए महज छह विरोधी दलों का ही साथ मिल पाया। बड़ी बात यह कि विपक्षी दलों में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी टीएमसी ने भी इस प्रस्ताव पर साथ देने से मना कर दिया। डीएमके और आरजेडी जैसे महत्वपूर्ण सहयोगियों ने भी इस मुद्दे पर कांग्रेस से किनारा कर लिया। सवाल यह उठ रहा है कि बाकी लगभग दो दर्जन दलों ने कांग्रेस की इस महान पहल को नापसंद क्यों कर दिया?

जस्टिस लोया केस में एक्सपोज हुई कांग्रेस की राजनीति
6 अप्रैल को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा था कि जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग लाने का मुद्दा खत्म हो गया है। 19 अप्रैल को जज लोया पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया, जिसमें लोया की मौत की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग खारिज कर दी गई। अगले ही दिन यानि 20 अप्रैल को कांग्रेस ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग लाने का फैसला कर लिया।  मतलब यह कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आपके पक्ष में ना हो तो आप चीफ जस्टिस पर ही सवाल खड़ा कर दें?

चीफ जस्टिस का बायकॉट कर संविधान पर आघात कर रहे कपिल सिब्बल
इस पूरे प्रकरण में सबसे दुखद यह है कि जिस संस्था पर संवैधानिक प्रावधानों के संरक्षण की सर्वोच्च जवाबदेही है, उसे ही मुद्दा बनाने की कोशिश की गई है। कपिल सिब्बल ने जब कहा कि 23 अप्रैल से वह चीफ जस्टिस की कोर्ट में नहीं जाएंगे, तो यह कांग्रेस पार्टी की धमकाने की एक और कोशिश मानी जा रही है। दरअसल जस्टिस दीपक मिश्रा के कोर्ट में ही राम मंदिर मुद्दे की सुनवाई चल रही है, जिसे कपिल सिब्बल ने 2019 के आम चुनावों के बाद सुनवाई करने को कहा था। हालांकि जस्टिस दीपक मिश्रा ने सिब्बल की इस अपील को ठुकरा दिया था। तो यह माना जाए कि मुख्य न्यायाधीश को राम मंदिर के मामले में कांग्रेस की बात नहीं मानने का खामियाजा उठाना पड़ा है!

न्यायाधीशों को भी धमकी देने पर उतर आई है कांग्रेस
महाभियोग प्रस्ताव में मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध जो पांच आरोप लगाए गए हैं, उन्हें तीन पूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने निराधार घोषित कर दिया था। अगर इस प्रस्ताव को स्वीकार भी कर लिया जाता तो इसे तीन सदस्यीय कमेटी के पास भेजा जाता जो आरोपों की जांच करती। इस प्रक्रिया में कम से कम छह महीने लगते और तब तक (अक्टूबर) चीफ जस्टिस रिटायर भी कर जाएंगे। साफ है कि कांग्रेस की यह पहल न्यायिक कम, राजनीतिक अधिक थी। उसे इस बात की कतई चिंता नहीं है कि न्यायपालिका की प्रतिष्ठा पर आंच आ रही है। जाहिर है कि कांग्रेस जब सत्ता में रहती है तो वह संवैधानिक संस्थाओं को खत्म करने की कोशिश करती है और जब विपक्ष में होती है तो वह संवैधानिक सस्थाओं को चोट पहुंचाती है।

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