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कांग्रेस की गहलोत सरकार यानी यू-टर्न वाली सरकार : जानिए वह 10 कमजोर और अविवेकपूर्ण फैसले जो सरकार ने जोर-शोर से लिए और शर्मिंदगी के साथ वापस लेने पड़े

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मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार के तीन साल पूरे हो रहे हैं। सरकार का आधे से ज्यादा समय तो अपनों के साथ सियासी लड़ाई लड़ने, परस्पर दोषारोपण करने, विरोधियों को ठिकाने लगाने और फिर मान-मनोव्वल करने में ही बीत गया। इस सियासी झगड़े में जो समय बचा उसमें भी सरकार अपने ही फैसलों को पलटने के लिए ज्यादा चर्चित रही। संभवत: यह कांग्रेस ही पहली यू-टर्न सरकार होगी, जिसने तीन साल में अपने ही दस बड़े फैसलों को पलट दिया। इससे साबित हुआ कि सरकार ने बिना सोचे-विचारे कमजोर और अविवेकपूर्ण फैसले लिए और बाद में थूककर चाटने को मजबूर होना पड़ा।

सियासी फायदा देखते ही यू-टर्न लेने में माहिर हैं अशोक गहलोत
गहलोत सरकार ने अपने इतने फैसले पलटे हैं कि वह विपक्ष तो छोड़िए, कांग्रेसियों में भी यू-टर्न लेने वाली सरकार के नाम पर हंसी का पात्र बनती है। तीन साल में बीजेपी राज के कई बड़े फैसलों को पलटने के साथ-साथ गहलोत सरकार खुद अपने फैसले पलटकर भी विवादों और चर्चाओं में रही है। 2019 से ही सरकार के यू टर्न लेने की शुरुआत हो गई, जो अब तक जारी है। जुलाई 2020 में सचिन पायलट खेमे की बगावत के बाद बर्खास्त किए गए मंत्रियों को 16 महीने बाद वापस मंत्री बनाना ताजा यू टर्न है। सचिन पायलट को बगावत के बाद खुद सीएम गहलोत ने नाकारा-निकम्मा कहा, बाद में जब सुलह हुई तो फॉरगेट एंड फॉरगिव की बात कहकर रुख बदल लिया।

आइये तीन साल में गहलोत सरकार द्वारा लिए गए दस बड़े यू टर्न और उसके कारणों पर नजर डालते हैं…


निकाय प्रमुखों का चुनाव सीधे जनता के कराने का अपना ही निर्णय खारिज किया
फैसला No-1: कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार ने राजे सरकार का फैसला पलटते हुए नगर निगमों के मेयर, नगरपालिका चेयरमैन,  नगर परिषद सभापति के चुनाव पार्षदों की जगह सीधे जनता से करवाने का फैसला लिया था।
U-Turn : विधानसभा चुनाव तो कांग्रेस जैसे-तैसे जीत गई, लेकिन इसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में 25 की 25 सीटें कांग्रेस हार गई। इसके बाद पार्टी के नेताओं ने ही सुझाव दिया कि अगर शहरी निकाय प्रमुखों के सीधे चुनाव करवाए गए तो भारी नुकसान होगा। अक्टूबर 2019 में गहलोत सरकार ने अपने ही फैसले को पलटते हुए वापस पार्षदों के जरिए ही निकाय प्रमुखों के चुनाव करवाने का प्रावधान कर दिया।

चेयरमैन व मेयर के लिए पुराना फॉर्मूला ही लागू किया
फैसला No-2 : वर्ष 2019 में उपचुनाव के दौरान शहरी निकायों में गैर पार्षद के भी चेयरमैन व मेयर बनने का प्रावधान रखा गया।
U-Turn : डिप्टी सीएम रहते सचिन पायलट ने इसे बैकडोर एंट्री बताते हुए विरोध किया। गहलोत-पायलट के बीच मतभेद का सबसे पहला कारण यही रहा। पार्टी में अंदरखाने विरोध होने के बाद सरकार को अपना फैसला तुरंत वापस लेना पड़ा। स्पष्ट किया चेयरमैन व मेयर के लिए पुराना फॉर्मूला ही रहेगा।

पहले लॉकडाउन नहीं लगाने का फैसला, फिर लगाया सख्त लॉकडाउन
फैसला No-3:  कोरोना काल में सीएम ने 15 अप्रैल को कहा था कि लॉकडाउन नहीं लगाएंगे। लोगों की आजीविका प्रभावित होती है।
U-Turn : अप्रैल में ही कोरोना से हालात बिगड़ने लगे। अचानक से मौतों और संक्रमित मरीजों का आंकड़ा बढ़ने लगा। कोरोना के हालातों को देखते हुए सख्त लॉकडाउन लगाया गया। नाइट कर्फ्यू से लेकर शादियों तक पर पाबंदी लगाई गई।

अपनी पार्टी के सरपंचों के विरोध से बैकफुट पर आई सरकार
फैसला No-4 : वर्ष 2021 में ही प्रदेश भर में ग्राम पंचायतों को उनके अकाउंट की जगह नए पीडी अकाउंट खुलवाने का आदेश जारी किया।
U-Turn : बजट पंचायत की जगह पीडी खाते में जाने लगा तो सरपंचों का अधिकार खत्म हो गया। प्रदेश में सरपंचों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। कांग्रेस समर्थित सरपंच भी इसका विरोध करने लगे। सरपंचों का विरोध देखते हुए सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा और बजट सीधे पंचायत को देने का फैसला लिया।

कोरोना में स्कूल खोलने की घोषणा कर दबाव में पीछे हटी सरकार
फैसला No-5: कोरोना का असर कम होने पर 24 जुलाई को गहलोत कैबिनेट की बैठक के बाद तत्कालीन शिक्षा मंत्री ने 2 अगस्त से स्कूल खोलने की घोषणा कर दी।
U-Turn :  अभिभावकों और स्कूल संचालकों ने इसका विरोध किया। पेरेंट्स समेत स्कूल प्रबंधन ने भी स्कूल खोलने से मना कर दिया। इस फैसले का विरोध बढ़ा तो स्कूल-कॉलेज खोलने के फैसले के लिए मंत्रियों की कमेटी बना दी। दो अगस्त से स्कूल खोलने के शिक्षा मंत्री की घोषणा पर रोक लगा दी। कमेटी की रिपोर्ट पर ​15 सितंबर से फेज मैनर में स्कूल खोलने पर फैसला किया।

पहले आतिशबाजी पर पूर्णत प्रतिबंध, फिर दो घंटे की मोहलत
फैसला No-6: कोरोना गाइडलाइन का हवाला देते हुए अक्टूबर में पहले दिवाली, न्यू ईयर सहित हर मौकों पर आतिशबाजी पर प्रतिबंध लगाया।
U-Turn : प्रदेशभर में पटाखा व्यापारी इस फैसले का विरोध करने लगे। उनका कहना था कि कोरोनाकाल में करोड़ों रुपए का नुकसान हुआ। दिवाली से पहले गृह विभाग की गाइडलाइन में बदलाव करते हुए दो घंटे के लिए ग्रीन पटाखों से आतिशबाजी करने की अनुमति दे दी।

वैट घटाने से इंकार, बीजेपी समेत चौतरफा दबाव के बाद झुके
फैसला No-7: केंद्र सरकार के पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी कम करके सस्ता करने के फैसले के बाद गहलोत ने प्रदेश में वैट कम करने से साफ मना कर दिया।
U-Turn : सीएम केंद्र को ही एक्साइज ड्यूटी और कम करने का कहते रहे। प्रदेश में सबसे ज्यादा पेट्रोल-डीजल था। कांग्रेस समर्थित राज्यों में भी वैट कम करने से सरकार पर सवाल खड़े हुए। बीजेपी ने भी इसे मुद्दा बनाया। पड़ोसी और कांग्रेस शासित राज्य पंजाब ने एकदम से दाम घटा दिए। चौतरफा 9 नवंबर को जोधपुर जिले के दौरे में पेट्रोल-डीजल पर वैट कम करने की घोषणा कर दी। बाद में वैट घटाकर पेट्रोल-डीजल पर 5 रुपए की कमी की गई।

जिन दो मंत्रियों को हटाया, उन्हीं को फिर दिया मंत्री पद का ताज
फैसला No-8 : सचिन पायलट कैंप की बगावत के वक्त विश्वेन्द्र सिंह और रमेश मीणा को मंत्री पद से हटा दिया।
U-Turn : गहलोत ने ही मंत्रिमंडल विस्तार के समय 16 माह बाद फिर से दोनों विधायकों को मंत्री बना दिया। विश्वेंद्र सिंह को तो उनका पुराना पर्यटन विभाग ही देना पड़ा।

बाल विवाह को बढ़ावा देने के आरोप लगे तो बिल लिया वापस
फैसला No-9: मानसून सत्र के दौरान सितंबर महीने में बाल विवाह के भी रजिस्ट्रेशन का प्रावधान गहलोत सरकार ने भारी विरोध के बीच पारित करवाया।
U-Turn : हाईकोर्ट में इस बिल को लेकर याचिका लगाई। राज्यपाल ने इस बिल को रोके रखा। सवाल खड़े हुए कि सरकार बाल विवाह को बढ़ावा दे रही है। सरकार की छवि खराब होते देख सीएम अशोक गहलोत ने इस बिल को वापस लेने की घोषणा की। बाद में इस बिल को राजभवन से वापस ले लिया गया।

पहले पायलट निकम्मे-आवारा, फिर ‘अपने तो अपने होते हैं’
फैसला No-10 : सचिन पायलट कैंप पर एक महीने तक मुख्यमंत्री से लेकर समर्थक मंत्री-विधायक खूब जुबानी हमले करते रहे। इसके अलावा विधायक खरीद फरोख्त मामले में पहले सचिन पायलट और समर्थक विधायकों पर राजद्रोह की धाराओं में केस दर्ज करवाया।
U-Turn : सचिन पायलट और उनके समर्थकों के बगावत से लौटते ही विधायक दल की बैठक में गहलोत ने ‘अपने तो अपने होते हैं’ का बयान दिया। इतना ही नहीं विधायक खरीद फरोख्त मामले में पहले सचिन पायलट और समर्थक विधायकों पर राजद्रोह की धाराओं में केस दर्ज मामले में भी एफआर लगवा दी। कोर्ट में दायर मुकदमा भी वापस ने लिया।

 

 

 

 

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