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पुराण से भी पुराना है बनारस, जानिए जीवन में कम से कम एक बार क्यों जाना चाहिए बाबा विश्वनाथ की नगरी वाराणसी

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बनारस यानी बना रहे रस। पुराणों से भी पुराना शहर बनारस, जहां के लोगों के जीवन में एक अलग ही रस, आनंद और फक्कड़पन है। बनारस एक तरह से जीने का नाम है। दुनिया के सबसे प्राचीन शहरों में से एक बनारस का दिल आज आधुनिकता के बीच धड़कता है। पवित्र गंगा नदी के किनारे बसा यह शहर वाराणसी और काशी के नाम से दुनिया भर में प्रसिद्ध है। काशी हिंदु धर्म के श्रद्धालुओं के साथ बौद्ध और जैन धर्म के अनुयायिसों के लिए भी आस्था का एक प्रमुख केंद्र है।

वरुना और असि नदी के संगम पर बसा वाराणसी बाबा विश्वनाथ की नगरी है। यहां देवों के देव महादेव का एक भव्य काशी-विश्वनाथ मंदिर है। इस मंदिर पर मुस्लिम आक्रमणकारियों ने बार-बार आक्रमण किया। इस मंदिर को मुस्लिम शासकों ने बार-बार तोड़ा और हर हमले के बाद इसका पुनर्निर्माण कराया गया। वर्तमान मंदिर का निर्माण इंदौर की महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने 1777-78 में कराया था। इस काशी विश्वनाख मंदिर को नया स्वरूप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिया है।

काशी विश्वनाथ मंदिर को स्थानीय लोग स्वर्ण मंदिर भी कहते हैं। इसका यह नाम मंदिर के शिखर पर चढ़ी सोने की परत के कारण पड़ा। महाराजा रंजीत सिंह ने 1853 में इसके शिखर पर सोने का छ्त्र बनवाया था। बाबा विश्वनाथ का काले पत्थर से बना शिवलिंग चांदी की चौकी पर विराजमान है। ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव आज भी साक्षात काशी में विराजमान हैं।

काशी विश्वनाथ मंदिर देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। हिंदू धर्म के लोगों के लिए इस मंदिर का विशेष महत्व है। हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले लोगों में काशी सबसे बड़े तीर्थ के रूप में जाना जाता है। मान्यता है कि गंगा स्नान कर इस मंदिर में भगवान शिव के दर्शन मात्र से सारे पाप और कष्ट नष्ट हो जाते हैं। इसके साथ ही यहां मृत्यु प्राप्त होने और अंतिम संस्कार होने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।

लोगों का कहना है कि वाराणसी में 3000 से भी ज्यादा शिव मंदिर हैं। यहां कोने-कोने में मंदिर और शिवलिंग स्थापित हैं। यहां बाबा विश्वनाथ मंदिर के बाद सबसे ज्यादा प्रसिद्ध काल भैरव मंदिर है। भगवान काल भैरव को काशी का कोतवाल यानी वाराणसी का रक्षक माना जाता है। इसके साथ ही यहां के कुछ प्रसिद्ध मंदिरों में संकट मोचन मंदिर, शीतला मंदिर, चौसठ योगिनी मंदिर, तुलसी मानस मंदिर, भारत माता मंदिर, दुर्गा मंदिर, केदारेश्वर मंदिर शामिल हैं।

काशी को घाटों का शहर भी कहते हैं। गंगा नदी के किनारे बने इन घाटों में अस्सी घाट, दशाश्वमेध घाट, आदि केशव घाट, पंचगंगा घाट, मणिकर्णिका घाट, हरिश्चंद्र घाट, ललिता घाट प्रमुख है। सूर्योदय के साथ इन घाटों पर गंगा स्नान कर श्रद्धालु मंदिर में जल चढ़ाने जाते हैं। यहां सुबह-सवेरे स्नान के साथ पूजा-अर्चना करने वाले श्रद्धालुओं के अलावा योग और ध्यान लगाने वाले लोग भी दिख जाते हैं। मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट के किनारे चौबीसों घंटे दाह-संस्कार चलता रहता है।

मंदिरों में पूजा कर गंगा घाट पर बैठ या घूमकर समय बिताना आध्यात्मिक स्तर पर मन और चित्त को शुद्ध करने वाला अनुभव होता है। इसके साथ ही गंगा नदी में नाव की सवारी कर आप असीम शांति का अनुभव करेंगे। शाम में गंगा घाट पर गंगा आरती को देखना अपने-आप में एक स्वर्गिक आनंद प्रदान करता है। आप खुद को देवलोक में महसूस करेंगे। वाराणसी प्राचीन काल से शिक्षा, धर्म, दर्शन, योग, आयुर्वेद, ज्योतिष शास्त्र, गीत-संगीत, कला-साहित्य और आध्यात्मिकता का सांस्कृतिक केंद्र भी रहा है।

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