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एंटी-इनकम्बेंसी और मजबूत विपक्षी गठबंधन से बदलेंगे तमिलनाडु के सियासी समीकरण, दो अंकों में बीजेपी की सीटें

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चुनाव आयोग ने 23 अप्रैल का तमिनना़डु में इलेक्शन की घोषणा के साथ ही इस राज्य में भी चुनावी बिगुल बजा दिया है। दक्षिण भारत की राजनीति में तमिलनाडु हमेशा से एक विशिष्ट प्रयोगशाला रहा है। यहां की राजनीति लंबे समय तक द्रविड़ विचारधारा और क्षेत्रीय अस्मिता के इर्द-गिर्द घूमती रही है। पिछले पांच दशकों से सत्ता का केंद्र लगभग दो दलों द्रविड़ मुनेद्र कझगम (DMK) और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) के बीच बंटा रहा है। लेकिन आगामी विधानसभा चुनाव इस पारंपरिक द्वंद्व से आगे निकलकर नए राजनीतिक समीकरणों की आहट दे रहा है। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के नेतृत्व वाली सरकार के “द्रविड़ मॉडल” पर इस बार एंटी-इनकम्बेंसी, कानून-व्यवस्था, हिंदुत्व विरोध और परिवारवाद के मुद्दे हावी हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव में DMK ने स्पष्ट बहुमत हासिल कर लगभग दस वर्ष बाद सत्ता में वापसी की थी। उस समय जनता ने तत्कालीन AIADMK सरकार के खिलाफ एंटी-इनकम्बेंसी और नेतृत्व संकट को देखते हुए परिवर्तन का फैसला किया था। लेकिन राजनीति में पांच वर्ष लंबा समय होता है। अब वही DMK सरकार जनता की कसौटी पर है। क्योंकि इस अवधि की ढेर सारी कमियों का चुनावी हथियार विपक्ष के हाथ लग गया है।

तमिलनाडु का चुनावी परिदृश्य और राजनीतिक पृष्ठभूमि
तमिलनाडु की राजनीति में हमेशा से क्षेत्रीय पहचान, भाषा और सामाजिक न्याय के मुद्दे महत्वपूर्ण रहे हैं। द्रविड़ आंदोलन की विरासत ने यहां की राजनीति को इस तरह आकार दिया कि राष्ट्रीय दल लंबे समय तक हाशिये पर रहे। लेकिन हाल के वर्षों में भाजपा ने राज्य में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत बनाई है। विशाल भाजपा कार्यकर्ता नेटवर्क के सहारे जमीनी पकड़ और मजबूत करने के कारण आगामी विधानसभा चुनाव केवल दो क्षेत्रीय दलों की लड़ाई नहीं, बल्कि क्षेत्रीय मुद्दे बनाम राष्ट्रीय राजनीति की एक नई परीक्षा बन गया है। आने वाले महीनों में राजनीतिक बयानबाजी, गठबंधन की रणनीतियां और चुनावी अभियान यह तय करेंगे कि द्रविड़ राजनीति की यह धरती एक बार फिर पुरानी परंपरा को दोहराएगी या नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत करेगी।

इस बार एंटी-इनकम्बेंसी फैक्टर हो सकता है अधिक प्रभावी
तमिलनाडु की राजनीति में एंटी-इनकम्बेंसी का इतिहास मजबूत रहा है। कई चुनावों में देखा गया कि सत्ता में बैठी पार्टी अगले चुनाव में हार गई। ऐसा परिदृश्य इस बार और पुरजोर अंदाज में दिखाई दे रहा है। खासकर दलित, वंचित, ग्रामीण और गरीब वर्गों के उत्थान के लिए डीएमके सरकार ने कोई करिश्माई काम नहीं किया है। इसके चलते चुनाव में डीएमके को इन वर्गों का व्यापक समर्थन मिलता नहीं दिख रहा है। इसलिए एंटी-इनकम्बेंसी डीएमके को नुकसान पहुंचा सकती है। ग्रामीण क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं में देरी, बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दे धीरे-धीरे असंतोष पैदा कर रहे हैं। विपक्ष इन्हीं मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठा रहा है, जो चुनावी परिणाम प्रभावित कर सकते हैं।

मजबूत संगठनात्मक विस्तार से दो अंकों में पहुंच सकती है भाजपा
तमिलनाडु में BJP की स्थिति धीरे-धीरे मजबूत हो रही है। पिछले कुछ वर्षों में पार्टी ने संगठनात्मक विस्तार और वैचारिक अभियान के माध्यम से अपनी उपस्थिति बढ़ाने के तेज प्रयास किए हैं। AIADMK और BJP का गठबंधन मजबूत होने के चलते कई सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय होने के बजाय सीधे सत्तारूढ़ गठबंधन और विपक्ष के बीच हो सकता है। इस स्थिति में BJP को अतिरिक्त सीटें मिल सकती हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का अनुमान है कि BJP पिछले चुनाव की तुलना में इस बार बड़ी छलांग लगा सकती है। गठबंधन राजनीति के सहारे उसकी सीटें पहले से बेहतर होकर दो अंकों में पहुंच सकती हैं। इससे राज्य की राजनीति में उसकी भूमिका अधिक महत्वपूर्ण बन सकती है।

बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष नैनार नागेंद्रन को तमिल राजनीति का लंबा अनुभव
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष नैनार नागेंद्रन अभी तिरुनेलवेली से विधायक है। वे 2021 में तीसरी बार जीते थे। 19 मई 2001 से 12 मई 2006 तक, उन्होंने तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्रियों जे. जयललिता और ओ पन्नीरसेल्वम के नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल में तमिलनाडु के मंत्री के रूप में कार्य किया। वह 3 जुलाई 2020 से बीजेपी तमिलनाडु (TNBJP) के उपाध्यक्ष हैं। उन्होंने 2006 और 2011 में अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) उम्मीदवार के रूप में और 2021 में बीजेपी उम्मीदवार के रूप में तिरुनेलवेली निर्वाचन क्षेत्र से तमिलनाडु विधानसभा चुनाव जीता है। ऐसे में नैनार नागेंद्रन को तमिलनाडु की राजनीति का लंबा अनुभव है।

सत्तारूढ़ डीएमके सरकार की कमजोरियां बनीं सियासी चुनौतियाँ
गठबंधन प्रबंधन – DMK का गठबंधन कई दलों से मिलकर बना है। इसके चलते सीट बंटवारे और स्थानीय नेतृत्व के बीच समन्वय बनाए रखना चुनाव के समय उसके लिए बहुत कठिन हो गया है। DMK के सहयोगी दल, कांग्रेस, वाम दल और अन्य, सीट बँटवारे को लेकर लगातार दबाव बना रहे हैं। कई दौर की बातचीत के बाद भी अंतिम सहमति नहीं बन पाई है।
परिवारवाद – डीएमके सरकार में परिवारवाद किसी से छिपा नहीं है। खासतौर पर मुख्यमंत्री के परिवार के कई सदस्यों की राजनीति में सक्रियता को लेकर विरोध है। इसलिए विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि पार्टी और सरकार में मुख्यमंत्री के परिवार का प्रभाव अत्यधिक है। चुनाव के दौरान यह मुद्दा बार-बार उठेगा, जिसका खामियाजा डीएमके को भुगतना पड़ सकता है।
ग्रामीण असंतोष – कई जिलों में विकास परियोजनाओं में देरी और किसानों की समस्याएं राजनीतिक मुद्दा बन रही हैं। यह असंतोष व्यापक रूप लेता नजर आ रहा है, इससे सत्ता पक्ष को नुकसान हो सकता है।
विवादों का असर – सीएम एम.के. स्टानिल के राजनीतिक जीवन में विवाद भी कम नहीं रहे हैं। केंद्र सरकार की नीतियों विशेषकर शिक्षा और आरक्षण से जुड़े मुद्दों पर उनके तीखे बयान कई बार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बने हैं। इसके अलावा भाजपा के साथ उनका राजनीतिक टकराव भी अक्सर सुर्खियों में रहता है। कुछ मौकों पर विपक्ष ने उन पर कानून-व्यवस्था की स्थिति को लेकर भी सवाल उठाए हैं। द्रविड़ राजनीति बनाम राष्ट्रवाद चुनाव का प्रमुख मुद्दा
भाजपा नेता के. अन्नामलाई द्रविड़ राजनीति को इसीलिए दोष देते हैं, क्योंकि इसने तमिलनाडू को शेष भारत से अलग-थलग कर दिया है। दूसरी ओर भाजपा काशी-तमिल संगमम जैसे कार्यक्रमों से तमिल को उत्तर भारत से जोड़ रही है। भाजपा नेता सनातन और राष्ट्रवाद का मुद्दा उठाकर डीएमके पर ठीक ही प्रहार कर रहे हैं।
कानून-व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा
मुख्यमंत्री स्टालिन की सरकार पर विपक्ष यह आरोप सही है कि राज्य में अपराध की घटनाएं बेहताशा बढ़ी हैं। खासकर महिलाओं की सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बनती जा रही है। चुनावी माहौल में यह मुद्दा बेहद प्रभावी साबित हो सकता है।
आर्थिक दबाव से विकास प्रभावित
कुछ क्षेत्रों में अधूरी परियोजनाएं भी राजनीतिक असंतोष पैदा कर रही हैं। उदाहरण के लिए धर्मपुरी जिले में एक लंबे समय से लंबित बांध परियोजना को लेकर ग्रामीणों ने चुनाव बहिष्कार की चेतावनी तक दे दी। विपक्ष का तर्क है कि राज्य सरकार के झूठे वादों के साथ-साथ कुनीतियों से राज्य की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ रहा है और दीर्घकालिक विकास प्रभावित हो सकता है।
केंद्र बनाम राज्य संबंध का विवाद
तमिलनाडु की राजनीति में केंद्र के साथ टकराव नया नहीं है। BJP इस टकराव को इसलिए राजनीतिक नाटक करार देती है, क्योंकि राज्य सरकार अपनी प्रशासनिक विफलताओं को छिपाने के लिए केंद्र पर अनाश्यक और झूठा दोषारोपण करती है। एलपीजी आपूर्ति संकट और आर्थिक देनदारियों को लेकर भी राज्य सरकार और केंद्र के बीच राजनीतिक टकराव सामने आया है।

चुनाव सत्ता परिवर्तन का नहीं, द्रविड़ राजनीति के भविष्य का परीक्षण
तमिलनाडु का आगामी विधानसभा चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का संघर्ष नहीं, बल्कि द्रविड़ राजनीति के भविष्य का भी परीक्षण है। AIADMK-BJP गठबंधन एंटी-इनकम्बेंसी, कानून-व्यवस्था और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर चुनाव को धार देने की कोशिश कर रहा है। यदि विपक्ष एकजुट होकर मजबूत अभियान चलाता है तो मुकाबला कड़ा होगा। इस प्रकार यह चुनाव केवल सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि तमिलनाडु की राजनीतिक दिशा तय करने वाला निर्णायक संघर्ष बन सकता है। भाजपा समेत विपक्ष अप्रत्याशित प्रदर्शन राज्य की राजनीति में नए गठबंधन और नई रणनीतियों का दौर शुरू कर सकता है। इसी कारण आगामी चुनाव को केवल सीटों की गणना के रूप में नहीं बल्कि तमिलनाडु की सामाजिक-राजनीतिक चेतना की नई परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है।

 

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