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पलटू चाचा के लिए दूरदर्शी भतीजे की भविष्यवाणी, 2024 के आम चुनाव के बाद कुर्सी देख किसी भी दल के साथ भाग सकते हैं नीतीश

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बिहार में नीतीश कुमार बीजेपी से अलग होकर आरजेडी के समर्थन से आठवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं। ये पहली बार नहीं है कि जब नीतीश पलटे हैं। साल 1994 में नीतीश कुमार ने अपने सबसे पुराने सहयोगी लालू यादव का साथ छोड़ा था। इसके बाद अपने सहयोगियों को छोड़ने का जो सिलसिला शुरू हुआ वो आज भी जारी है। 2013 में एनडीए से अलग हो कर 17 साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया। 2015 में उन्होंने पुराने सहयोगी लालू यादव के साथ गठबंधन किया, लेकिन 20 महीने के बाद 2017 में आरजेडी से अलग हो कर फिर एनडीए का दामन थामा लिया था। 2022 में एनडीए से अलग हो कर फिर घर वापसी की। चाचा नीतीश कुमार के इस पलटीमार स्वाभाव को लेकर दूरदर्शी मुहबोले भतीजे और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने भविष्यवाणी की थी, जो आज सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है।

चाचा के लिए भतीजे की भविष्यवाणी

दरअसल 2019 के आम चुनाव से ठीक पहले तेजस्वी यादव ने नीतीश कुमार के बारे में भविष्यवाणी की थी। साथ ही 2024 को लेकर सवाल भी किया था, जो काफी दिलचस्प है। तेजस्वी ने 3 मार्च, 2019 को एक ट्वीट किया था, जिसमें उन्होंने लिखा था, “क्या नीतीश जी आज मोदी जी के समक्ष मंच से सार्वजनिक रूप से यह संकल्प लेंगे और शपथ पत्र देंगे कि वो 2024 आम चुनाव तक बीजेपी छोड़कर और पलटी मारकर किसी दूसरे से समझौता नहीं करेंगे अगर वो ऐसा नहीं करते हैं तो स्वष्ट है, वो आम चुनाव के बाद कुर्सी देख किसी भी दल के साथ भाग सकते हैं।”

2024 के आम चुनाव के बाद नीतीश किधर जाएंगे ?

इस ट्वीट से पता चलता है कि भतीजा तेजस्वी को भरोसा था कि चाचा जरूर साथ आएंगे। इसलिए सवाल के साथ आशंका जतायी थी कि चाचा नीतीश 2024 आम चुनाव तक बीजेपी छोड़कर और पलटी मारकर किसी दूसरे से समझौता कर कर सकते हैं। तेजस्वी की यह आशंका सही साबित हुई है। आज नीतीश कुमार की घर वापसी हो चुकी है। लेकिन तेजस्वी के इस ट्वीट में 2024 के बाद की भविष्यवाणी भी है, जिसमें कहा गया है कि आम चुनाव के बाद कुर्सी देख किसी भी दल के साथ भाग सकते हैं।

“नीतीश हर 2 साल में सांप की तरह नया चमड़ा धारण करते हैं”

तेजस्वी यादव की तरह उनके पिता लालू प्रसाद यादव भी दूरदर्शी है। उन्होंने 3 अगस्त, 2017 को भविष्यवाणी की थी। उन्होंने ट्वीट किया था,” नीतीश सांप है, जो सांप केंचुला छोड़ता है, वैसे ही नीतीश भी केंचुल छोड़ता है और हर 2 साल में सांप की तरह नया चमड़ा धारण कर लेता है। किसी को शक ?” 2024 का आम चुनाव भी करीब दो साल के बाद होगा। अगर नीतीश कुमार को यूपीए गठबंधन की तरफ से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया जाता है और गठबंधन की सरकार नहीं बनती है, तो नीतीश कुमार के सामने दो विकल्प होंगे- या तो राजनीति से सन्यास लेंगे या किसी दूसरे गठबंधन का हिस्सा बनेंगे। क्योंकि तेजस्वी यादव चाचा की जगह खुद मुख्यमंत्री बनना चाहेंगे। 

“गिरगिट जैसे रंग बदलता रहता है”

लालू प्रसाद यादव नीतीश कुमार को पहचानने का दावा करते हैं। उन्होंने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा था, “नीतीश कुमार को देश और दुनिया पहचानता नहीं है। मैं पहचानता हूं। गिरगिट जैसे रंग बदलता रहता है, वैसे नीतीश कुमार रंग बदलते रहते हैं समय समय पर।” लालू यादव की इस बात पर यकीन किया जा सकता है। नीतीश कुमार के गिरगिट की तरह बदलते रंग को देखते हुए कहा जा सकता है कि 2024 के आम चुनाव के बाद नीतीश यूपीए को भी धोखा दे सकते हैं। क्योंकि नीतीश कुमार की फितरत “इस्तेमाल करो और फेंको” की है।

जनता के बीच नीतीश की स्वीकार्यता पर सवाल

नीतीश कुमार जनाधार विहीन नेता है। वे आज तक अपने दम पर सरकार बनाने में असमर्थ रहे हैं। उन्हें किसी न किसी बैशाखी की जरूरत है। सबसे दिलचस्प बात ये है कि वो विधान परिषद के सदस्य के रूप में ही मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते रहे हैं। नीतीश साल 2004 के बाद से जनता के बीच से चुनकर नहीं आए हैं। नीतीश बिहार विधानसभा के सदस्य के रूप में पहली और आखिरी बार 1985 में हरनौत से जनता के बीच से चुनकर आए थे। मगर चुनाव को लोकतंत्र का महापर्व इसलिए भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें नेताओं के पास जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता का पता चलता है।

कांग्रेस को जनाधार विहीन नेता की जरूरत

नीतीश की जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता की कमजोरी यूपीए गठबंधन का नेतृत्व करने वाली कांग्रेस की रणनीति के हिसाब से उपयोगी है। कांग्रेस चाहती है कि यूपीए का नेतृत्व ऐसा आदमी करे, जो दूसरों पर निर्भर हो, ताकि मनमोहन सिंह की तरह आगे भी कांग्रेस उसे अपने इशारे पर नचा सके। सोनिया गांधी ने बिहार में महागठबंधन का नेता बनने पर उन्हें बधाई देने के साथ-साथ यूपीए के संयोजक बनने का भी प्रस्ताव दिया है। माना जा रहा है कि सोनिया गांधी के प्रस्ताव को नीतीश कुमार स्वीकार करेंगे।

2019 के आम चुनाव से पहले थी नीतीश पर नजर

2019 के चुनाव से पहले भी ऐसी कोशिश की गई थी लेकिन आंध्र प्रदेश से चंद्राबाबू नायडू और पश्चिम बंगाल की मुख्यंत्री ममता बनर्जी कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार करने की मूड में नहीं थे। दोनों खुद की दावेदारी पीएम पद के लिए मजबूत करने में जुटे थे। कांग्रेस इनकी दावेदारी को अपने लिए खतरा मान रही थी, क्योंकि ये दोनों मजबूत जनाधार वाले नेता है। उस समय नीतीश कुमार का भी नाम कई समीकरण के तहत आ रहा था। कहा यह भी जा रहा था कि अगर एनडीए बहुमत से दूर रहता है तो बाकी पार्टियों का समर्थन जुटाने के लिए नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री पद के लिए आगे किया जा सकता है। 

आखिरी चुनाव बताकर बिहार की जनता से धोखा

2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान प्रचार के अंतिम दिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मंच से ऐलान किया था कि यह उनका आखिरी चुनाव है। लेकिन उनकी पार्टी जेडीयू के नेता समय-समय पर उनको पीएम मटेरियल बताते रहे हैं। ऐसे में उनके चाटुकारों और यूपीए के मित्रों ने उन्हें 2024 में प्रधानमंत्री बनने का सपना दिखाया है। नीतीश को भी लगता है कि 2024 के बाद बीजेपी भी उनको भाव देने वाली नहीं है। इसलिए पलटी मारने में माहिर नीतीश कुमार ने एक बड़ा राजनीतिक दांव चलने का फैसला किया।

 

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