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विरोध सिर्फ आज नहीं हो रहा है: कांग्रेस के 10 पाप जब संविधान को ताक पर रख दिया गया!

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हमारा संविधान ये सिर्फ अनेक धाराओं का संग्रह नहीं है, हमारा संविधान सहस्त्रों वर्ष की महान परंपरा, अखंड धारा उस धारा की आधुनिक अभिव्यक्ति है। – प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 

संविधान दिवस पर देश के पहले राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद की एक चिट्ठी को ट्वीटर पर शेयर करते हुए पीएम मोदी ने लिखा है कि-कोई भी संविधान चाहे वह कितना ही सुंदर, सुव्यवस्थित और सुदृढ़ क्यों न बनाया गया हो, यदि उसे चलाने वाले देश के सच्चे, निस्पृह, निस्वार्थ सेवक न हों तो संविधान कुछ नहीं कर सकता। डॉ. राजेंद्र प्रसाद की यह भावना पथ-प्रदर्शक की तरह है। 

लेकिन संविधान दिवस पर मौके पर भी जब बात संविधान के गौरव की हो रही है, लोकहित में उसके इस्तेमाल की बात कही जा रही है तो भी कांग्रेस सहित कई मोदी विरोधी पार्टियों को ये बात हजम नहीं हो रही है। लेकिन ये वही कांग्रेस पार्टी है जिसने सत्ता में बने रहने के लिए कई बार संवैधानिक संस्थाओं के साथ खिलवाड़ किया। देश में कांग्रेस की सरकारों ने सत्ता में बने रहने के लिए संविधान को औजार के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की। आम लोगों के के मौलिक अधिकार को कुचलने की कोशिश की गई, यही नहीं राजनीतिक फायदे के लिए संविधान की मूल आत्मा को भी नजरअंदाज कर दिया गया। ऐसा भी कई बार हुई कि लोगों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अदालतों के दरवाजे खटखटाने पड़े। 

1 पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लगाई इमरजेंसी 

कांग्रेस के साशन काल में कई बार संविधान को ताक पर रख कर, देश का शासन चलाने के प्रयास किए गए। 1975 में जयप्रकाश नरायण के आंदोलन के दौरान, जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा के चुनाव को गलत बताते हुए उसे रद्द कर दिया तो 25 जून 1975 को देश पर इमरजेंसी थोप दी गई। 22 जुलाई 1975 को संविधान का 38वाँ संशोधन करके आपातकाल पर न्यायिक समीक्षा का रास्ता भी बंद कर दिया। अदालत के आदेश की अवहेलना करते हुए इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़ने के बदले देश के लोगों को लोकतांत्रिक अधिकारों को छीन लिया। ये अधिकार कांग्रेस पार्टी ने नहीं, देश के संविधान ने लोगों को दिए थे। इस दौरान बिना किसी अदालती कार्यवाही के संसद से विपक्षी सदस्यों को हिरासत में ले लिया गया. एक लाख से ज़्यादा लोगों को जेल में डाला गया। 

2 कांग्रेस राज में संविधान से छोड़छाड़ की कोशिश 

कांग्रेस ने अपने शासन के दौरान भारत के संविधान में तरह-तरह से छेड़छाड़ करने की कोशिश की थी। कांग्रेस ने संसद की अवधि भी पांच से बढ़ा कर छह साल कर दी और संविधान में बदलाव का प्रस्ताव लाया गया था जिसमें इंदिरा गांधी को ताउम्र प्रधानमंत्री बनाने और न्यायपालिका को सरकार की नीतियों के साथ चलने का प्रस्ताव लाया गया था। बीजेपी सहित कई पार्टियों के विरोध के बाद भी संविधान में 42वें संशोधन के दौरान संविधान के प्रस्तावना में समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष जैसे शब्दों को जोड़ा गया। 

3 शहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदला 

23 अप्रैल 1985 को  मोहम्मद अहमद खान वर्सेस शहबानो केस में कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदला। इस फऐसले में 60 वर्षीय महिला शाहबानो के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने शाहबानो और उसके पांच बच्चों को भरण पोषण के लिए उसके पति द्वारा भत्ता दिए जाने की बात कही गयी। लेकिन राजनीतिक फायदे के लिए मुस्लिम तुष्टीकरण को ध्यान में रखते हुए, राजीव गाँधी ने सदन में मुस्लिम महिला अधिनियम 1986 लाकर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया।

4 कांग्रेस ने बार बार किया राष्ट्रपति शासन का दुरुपयोग

धारा 356 को कांग्रेस खिलौने की तरह इस्तेमाल करती रही। हलांकि इसके तहत राष्ट्रपति शासन संवैधानिक अधिकारों के दायरे में आता है। लेकिन कांग्रेस राजनीतिक फायदे के लिए बार -बार इसका दुरूपयोग करती रही। देश में राष्ट्रपति शासन लगाने का कांग्रेस का सबसे लंबा इतिहास रहा है। hindi.news18.com के मुताबिक  जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री काल में 8 बार राष्ट्रपति शासन लगा तो वहीं इंदिरा गांधी के कार्यकाल में 50 बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया था। 1980 में केवल तीन दिनों के भीतर ही नौ राज्यों में बहुमत वाली सरकारों को बर्खास्त कर दिया गया था। 

कई बार तो ऐसा भी हुआ जब कांग्ररेस आलाकमान को कोई मुख्यमंत्री पसंद नहीं आया, तो जनभावनाओं को दरकिनार करते हुए उसे हटा दिया गया। इस तरह के फैसले कर कांग्रेस देश के संविधान का अपमान करती रही। कांग्रेस ने अपने शासनकाल में संविधान की भावना के खिलाफ कई फैसले लिए।

5 महाभियोग पर कांग्रेस की आपातकाल मानसिकता 

चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा के ख़िलाफ़ महाभियोग प्रस्ताव के लिए नोटिस देने वाली कांग्रेस ने 25 साल पहले सत्ता में रहते हुए ऐसी ही कार्यवाही का विरोध किया था। कांग्रेस के शासन काल के दौरान ऐसे तीन मौके आए जब महाभियोग प्रस्ताव लाए गए थे। पहली बार सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति वी रामास्वामी पर मई 1993 में महाभियोग चलाया गया था।  2009 में कर्नाटक हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस पी डी दिनाकरन पर महाभियोग चलाने को लेकर राज्‍यसभा के 75 सांसदों ने सभापति हामिद अंसारी को पत्र सौंपा था। 2011 में कोलकाता हाई कोर्ट के जज सौमित्र सेन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था तब भी केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी।

 

पीएम और पीएमओ से ऊपर नेशनल एडवाइजरी काउंसिल 

रिमोट कंट्रोल से सरकार चलाने की कांग्रेस के नेताओं की कोशिशों का नतिजा था, राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (National Advisory Council) 2011 में यूपीए सरकार के दौरान सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम बिल (Prevention of Communal Violence Bill 2011) पेश किया गया था। इस बिल को राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (National Advisory Council) ने ही तैयार किया था। इस परिषद की अध्यक्ष सोनिया गांधी थी, सांप्रदायिक दंगों को रोकने के लिए लाए गए इस बिल का देशभर में जोरदार विरोध हुआ था।

 

7 जम्मू-कश्मीर में 370 लागू करना  

कांग्रेस की सरकार चाहती तो विलय के वक्त ही देश का संविधान जम्मू-कश्मीर में लागू करवा सकती थी, लेकिन संविधान को दरकिनार कर जम्मू-कश्मीर को अंधेरे में धकेला गया। कश्मीर भारत का मुकुटमणि है, लेकिन कांग्रेस की गलत नीतियों की वजह से ही उसकी पहचान, बम, बंदूक और अलगाववाद की बन गई । कश्मीर की आइडेंटिटी को दफना दिया गया था। वहां से कश्मीरी पंडितों को भगाने पर मजबूर कर दिया गया। कश्मीर से 370 हटाने पर कांग्रेस को मिर्ची लग गई, लेकिन इसी कांग्रेस ने कश्मीर के नेताओं की जहरीली बोली पर चुप्पी साध ली थी।

 

 8 आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद भी-किसानों को भड़काने में जुटी रही कांग्रेस 

आंदोलन के नाम पर सड़कें जाम कर रहे और हिंसक प्रदर्शन कर रहे किसानों के आंदोलन पर देश की सबसे बड़ी आदालत की सख्ती के बाद भी, कांग्रेस पार्टी महज राजनीतिक फायदे के लिए किसानों को भड़काने में जुटी है। जिससे आम लोगों को बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। 

9 कांग्रेस जैसी पारिवारिक पार्टियां संविधान की भावना के खिलाफ

देश में पारिवारिक पार्टियों का बढ़ता प्रभाव संविधान की मूल भावना के  खिलाफ है , पीएम मोदी ने भी कहा है कि जिन पार्टियों में लोकतंत्र नहीं है, वे देश के लोकतंत्र की रक्षा कैसे कर सकती है, पीएम मोदी ने कहा है कि-पारिवारिक पार्टियां लोकतंत्र में आस्था रखने वालों के लिए चिंता का विषय हैं। कांग्रेस जैसे पार्टियों में परिवारवाद से संविधान की भावना को चोट पहुंची है। ऐसी पार्टी पीढ़ी दर पीढ़ी एक परिवार चलाता रहे। पार्टी की सारी व्यवस्था परिवारों के पास रहे, वह लोकतंत्र के लिए संकट की बात है। पीएम मोदी ने कहा, ‘जब मैं कहता हूं पारिवारिक पार्टियां। इसका मतलब मैं यह नहीं कहता हूं कि एक परिवार से एक से ज्यादा लोग राजनीति में न आएं.. योग्यता के आधार पर.. जनता के आशीर्वाद से.. किसी परिवार से एक से अधिक लोग राजनीति में जाएं.. इससे पार्टी परिवारवादी नहीं बन जाती है।’ राजनीतिक दल पार्टी फॉर द फैमिली, पार्टी बाय द फैमिली.. और आगे कहने की जरूरत मुझे नहीं लगती है।

10 नेहरू सरकार ने शुरू किया संविधान में बदलाव

संविधान को दरकिनार कर राजनीति की परंपरा साल 1951 में शुरू हुई थी , तब नेहरू सरकार ने संविधान में पहला संशोधन कर दिया। 951 में मुख्यमंत्रियों को भेजे गए एक पत्र में नेहरू ने लिखा कि संविधान के मुताबिक न्यायपालिका की भूमिका चुनौती देने से बाहर है। लेकिन अगर संविधान हमारे रास्ते के बीच में आ जाए तो हर हाल में संविधान में परिवर्तन करना चाहिए। नेहरू ने सत्ता में आने के बाद सत्ता में बने रहने के लिए पत्र में लिखे बातों का अक्षरशः पालन करते हुए संविधान में बदलाव की नींव रखी दी। 

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