Home समाचार सत्ता के नशे में चूर उद्धव पार्टी नेताओं को ही भूल गए,...

सत्ता के नशे में चूर उद्धव पार्टी नेताओं को ही भूल गए, रामदास कदम ने कहा- आदित्य मुझे अंकल बुलाते थे, पता नहीं था कि एक दिन मंत्रालय छीन लेंगे

464
SHARE

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को अब इस बात का अहसास हो रहा होगा कि किसी को धोखा देने का परिणाम क्या होता है। ठाकरे ने बीजेपी को धोखा देकर भले ही एनसीपी और कांग्रेस से मिलकर कुछ समय के लिए सरकार बना ली हो, लेकिन अब उसके हाथ से सत्ता और संगठन दोनों ही निकल गए हैं। महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना का गठबंधन 25 साल साल तक चला। देश में शायद ही ऐसा कोई उदाहरण होगा जहां दो पार्टियों ने 25 साल तक साथ मिलकर चुनाव लड़ा हो। लेकिन 2019 में हुए महाराष्ट्र चुनाव में शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे को सत्ता की लालसा इतनी जागी कि उन्होंने भाजपा से नाता तोड़ लिया। यहां तक कि बाला साहेब बाल ठाकरे की हिंदूवादी शिवसेना का चरित्र बदलकर उन्होंने सत्ता के लिए कांग्रेस और एनसीपी से गठजोड़ कर लिया। इससे महाराष्ट्र की जनता भी ठगी रह गई। क्योंकि उन्होंने तो भाजपा और शिवसेना को सत्ता में लाने के लिए वोट किया था। लेकिन उद्धव ठाकरे ने जनता के साथ धोखेबाजी करते हुए 28 नवंबर 2019 को मुख्यमंत्री पद की शपद ले ली। सत्ता लोलुप उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बनते ही शिवसेना के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं को इग्नोर करना शुरू कर दिया जिसने पार्टी में विद्रोह को जन्म दिया और शिवसेना के वरिष्ठ नेता एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना विधायकों ने विद्रोह की अलख जगा दी और उद्धव ठाकरे को 29 जून, 2022 को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। जनता से ठगी करने वाले उद्धव सत्ता से बाहर हो गए। शिवसेना के कई नेताओं, विधायकों एवं कार्यकर्ताओं ने पार्टी में महत्व नहीं मिलने और उपेक्षा का आरोप लगाया है।

उद्धव ठाकरे की हिंदू विरोधी नीतियों और सरकार में शरद पवार की मनमर्जी ज्यादा चलने के खिलाफ शिवसेना के विधायकों ने ठाकरे का पाला छोड़कर शिंदे कैंप बना लिया था। इससे ठाकरे की सत्ता का तख्तापलट हो गया। अब ताजा मामले में शिवसेना के वरिष्ठ नेता रामदास कदम ने उद्धव और उनके बेटे आदित्य ठाकरे पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

उद्धव ठाकरे को आत्मनिरीक्षण करना चाहिए

रामदास कदम ने कहा कि उद्धव ठाकरे को इस बारे में आत्मनिरीक्षण करना चाहिए कि आखिर 50 से अधिक विधायक और 12 सांसदों ने क्यों एकनाथ शिंदे का समर्थन करने का फैसला लिया। कदम ने यह भी दावा किया कि जब शिंदे गुवाहाटी में थे तो उनकी शिंदे से बात हुई थी। इसके बाद शिंदे पार्टी में वापस आने के लिए भी तैयार हो गए थे। लेकिन उनकी यह कोशिश इसलिए नाकाम हो गई, क्योंकि ठाकरे के आसपास मौजूद लोगों ने विधायकों को अपशब्द कहने शुरू कर दिए थे।

पार्टी से निकालने से पहले किसी ने बात नहीं की

उद्धव ठाकरे गुट द्वारा निकाले जाने के बाद शिंदे कैंप में पहुंचे शिवसेना नेता रामदास कदम ने नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए कहा कि पार्टी से निकालने से पहले मातोश्री से किसी ने एक बार भी उन्हें कॉल करने की जहमत तक नहीं उठाई। इतना ही नहीं कदम ने पार्टी मुखिया उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे को भी निशाने पर लिया है। उन्होंने कहा कि विधायकों के बारे में कुछ भी बोलने से पहले आदित्य को अपनी उम्र का ख्याल करना चाहिए।

एकनाथ शिंदे ने दिया सम्मान

महाराष्ट्र सरकार में मंत्री रहे रामदास कदम ने उद्धव ठाकरे गुट पर आरोपों की झड़ी लगा दी है। कदम के इस्तीफा देने के बाद उद्धव ठाकरे गुट ने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया। इसके बाद एकनाथ शिंदे ने उन्हें फिर से नेता नियुक्त कर दिया।

शरद पवार शिवसेना को तोड़ने में कामयाब रहे

कदम ने कहा कि एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार आखिरकार शिवसेना को तोड़ने में कामयाब हो गए। उनकी योजना सफल रही। बालासाहेब के जीवित रहते शरद पवार जो नहीं कर पाए, वह उन्होंने उद्धव ठाकरे के साथ किया। हम भाग्यशाली हैं कि शिवसेना में यह विभाजन ढाई साल में हुआ, नहीं तो पांच साल में पूरी शिवसेना खत्म हो जाती। इससे पहले भी रामदास कदम ने आरोप लगाया था कि एनसीपी के प्रमुख शरद पवार शिवसेना को नुकसान पहुंचा रहे हैं और उन्होंने इस संबंध में सबूत शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे को सौंपे थे। कदम ने कहा कि पवार ने शिवसेना को व्यवस्थित रूप से कमजोर किया गया। उन्होंने दावा किया कि कुछ विधायकों ने इस पर चिंता व्यक्त की थी लेकिन ठाकरे पवार से अलग होने को तैयार नहीं थे।

कदम का आदित्य ठाकरे पर हमला

कदम ने उद्धव के बेटे आदित्य पर निशाना साधते हुए कहा कि युवा राजनेता को अपने विधायकों के बारे में बातें करते समय अपनी उम्र का ध्यान रखना चाहिए। 2014 से 2019 तक राज्य में पर्यावरण मंत्री रहे कदम ने कहा कि उन्होंने ही 2018 में सिंगल-यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाया था, इसका सारा श्रेय आदित्य को दिया गया था।

अंकल कहने वाले ने मंत्रालय छीन लिया

कदम ने कहा कि आदित्य ठाकरे मेरे साथ मंत्री के केबिन में डेढ़ साल तक बैठते थे जब मैं पर्यावरण मंत्री था। उस समय मैंने नहीं सोचा था कि आदित्य ठाकरे, जो मुझे ‘अंकल’ कहते थे, आगे बढ़कर मेरा मंत्रालय छीन लेंगे। मैंने अपने पूरे जीवन में इस तरह की राजनीति कभी नहीं की। कोई बाहरी व्यक्ति मंत्री के केबिन में बैठकर इस तरह बैठक नहीं कर सकता। लेकिन आदित्य, उद्धव ठाकरे के बेटे थे, इसलिए मैंने कुछ नहीं कहा।

कंगना रनौत ने कहा था…कल तेरा घमंड टूटेगा

उद्धव ठाकरे की सरकार के नेतृत्व में बीएमसी ने कंगना रनौत के मुंबई ऑफिस पर बुलडोजर चला दिया था। उस समय कंगना रनौत ने कहा था कि उद्धव ठाकरे आज मेरा घर टूटा है कल तेरा घमंड टूटेगा। उद्धव ठाकरे के इस्तीफे के बाद कंगना ने कहा कि 1975 के बाद ये समय भारत के लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण समय है। 1975 में लोक नेता जेपी नारायण की एक ललकार से सिंहासन खाली करो कि जनता आती है, सिंहासन गिर गए थे। साल 2020 में मैंने कहा था कि लोकतंत्र एक विश्वास है और सत्ता के घमंड में आकर जनता का विश्वास तोड़ता है तो उनका घमंड टूटना भी निश्चित होता है। ये किसी व्यक्ति की शक्ति नहीं है। ये शक्ति है एक सच्चे चरित्र की है। और दूसरी बात… हनुमान जी को शिव का 12वां अवतार माना जाता है और जब शिवसेना ही हनुमान चालीसा को बैन कर दे तो उन्हें शिव भी नहीं बचा सकते।

उद्धव बाला साहेब की विरासत को भुना नहीं पाए

एकनाथ शिंदे की बगावत से शुरू हुआ शिवसेना में बिखराव लगातार जारी है। पिछले एक महीने में उद्धव ठाकरे को जितने झटके मिले हैं, शायद ही उन्हें पूरे राजनीतिक करियर में इतने झटके लगे हों। शिवसेना में हो रही टूट इस तरफ इशारा कर रही है कि उद्धव ठाकरे का अपने विधायकों और सांसदों पर से नियंत्रण कम हो रहा है। ये सब दर्शाता है कि उद्धव ठाकरे अपने पिता और पार्टी के संस्थापक दिवंगत बाला साहेब की विरासत को भुना नहीं पाए। आखिर उद्धव ठाकरे से कहां गलती हो गई?

उद्धव से कहां गलती हुई?

राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, 1966 में शिवसेना की स्थापना करने वाले बाल ठाकरे और उद्धव ठाकरे के बीच एक बुनियादी अंतर है। उन्होंने दावा किया कि पुत्र को पिता की विरासत स्वत: मिली क्योंकि पिता ने उन्हें (पुत्र को) नेतृत्व की भूमिका सौंपी। उद्धव ठाकरे ने अपना नेतृत्व स्थापित करने के लिए बहुत प्रयास नहीं किया। उन्होंने हर चीज को हल्के में लिया।

राणे और राज ठाकरे की बगावत रोकने के लिए बाला साहेब थे

उद्धव ठाकरे ने 2003 में शिवसेना का नेतृत्व संभाला और उन्हें तब से नारायण राणे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के प्रमुख तथा अपने चचेरे भाई राज ठाकरे जैसे नेताओं के असंतोष का सामना करना पड़ा। उस समय बाल ठाकरे जीवित थे। राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, अपनी विरासत और पार्टी पर पकड़ खोने की परिणति पिछले महीने एकनाथ शिंदे के विद्रोह के रूप में दिखी जब बाल ठाकरे मौजूद नहीं थे। बाल ठाकरे का नवंबर 2012 में निधन हो गया था।

शिवसेना के गढ़ ठाणे भी नहीं बचा पाए उद्धव

पिछले महीने शिवसेना विधायक दल में विभाजन हो गया था। उसके बाद उद्धव ठाकरे नीत शिवसेना को मंगलवार को एक और झटका लगा, जब लोकसभा में उसके 19 सदस्यों में से 12 ने मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के प्रति निष्ठा जताई और शिंदे गुट के शिवसेना सांसद राहुल शेवाले को लोकसभा में पार्टी का नेता चुना गया। शिवसेना का गढ़ माने जाने वाले ठाणे जिले के कुछ स्थानीय कार्यकर्ता भी शिंदे खेमे में शामिल हो चुके हैं।

Leave a Reply