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लाखों लोगों का हक मारने वाली ममता सरकार बेनकाब, SC से सीएम को झटका, होली से पहले भरनी होगी झोली

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पश्चिम बंगाल के लाखों लोगों का हक मारने वाली ममता सरकार बेनकाब हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने ममता सरकार को झटका देते हुए होली से पहले लाखों कर्मचारियों को डीए देने के आदेश जारी किए हैं। भाजपा नेता शुभेंदु चौधरी की पहल पर कर्मचारियों को सुप्रीम कोर्ट से यह खुशखबरी मिली है। दरअसल, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां न्यायपालिका ने उसे कई बार जन-विरोधी फैसलों के लिए फटकार लगाई है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में 20 लाख सरकारी कर्मचारियों को होली से पहले डीए (महंगाई भत्ता) देने के आदेश जारी कर ममता सरकार की एक और गलती सुधारी है। यह आदेश जो केवल तकनीकी रूप से महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि सामाजिक और मानवीय दृष्टि से भी अटल न्याय का प्रतीक है। यह आदेश प्रकट करता है कि जब राज्य सरकार संवैधानिक दायित्वों में लापरवाही करती है, तब सर्वोच्च न्यायालय बाध्यात्मक कदम उठाता है। यह सिर्फ एक आदेश नहीं, बल्कि यह उन लाखों लोगों की अपेक्षा का प्रतिरोध है जो हर मजदूर और कर्मचारी को अपने हक की मांग करने का अधिकार देता है।ममता सरकार की कार्यप्रणाली में लापरवाही ज्यादा
ममता सरकार की कार्यप्रणाली पर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की लगातार प्रतिक्रिया यह दर्शाती है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद को सर्वोच्च अदालत से भी ऊपर समझ रही हैं। तृणमूल सरकार को अदालतें बार-बार यह याद दिला चुकी हैं कि संवैधानिक ढांचा किसी भी सरकार के राजनीतिक हितों से ऊपर है। चाहे वह शिक्षक भर्ती का मामला हो या कर्मचारियों के भत्तों का मामला हो। न्यायपालिका का यह दखल यह संकेत देता है कि कानूनी प्रक्रिया और शासन के बीच संतुलन को बनाए रखना कितना जरूरी है। यह संतुलन तब होता है जब निर्णय निष्पक्ष, पारदर्शी और संवैधानिक निर्देशों के अनुरूप हों।ममता को कर्मचारियों और उनके परिवार की जरा भी चिंता नहीं
पश्चिम बंगाल सरकार की आलोचना का मूल भाव यही है कि उसे अपने राज्य के कर्मचारियों और उनके परिवारों की लेशमात्र भी चिंता नहीं है। अधिकारी, कर्मचारी और उनके परिवार लंबे समय से लंबित डीए के भुगतान का इंतजार कर रहे थे। उनके बार-बार आवेदनों पर भी ममता सरकार के कान में जूं तक नहीं रेंगी। तब जाकर अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ा। यह केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि यह संकेत है कि शासन में निर्णय लेने की प्रक्रिया में प्राथमिकता गलत दिशा में है। राजनीति व्यक्तिगत रणनीतियों की बजाय जनहित की आवश्यकता के लिए होनी चाहिए, लेकिन ममता राज में उल्टा ही हो रहा है। जब कार्यपालिका अपने दायित्वों का पालन नहीं करती, तब न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ा तो यह लोकतंत्र की विफलता नहीं, बल्कि उसकी मजबूती है। पश्चिम बंगाल में जिस तरह से कई सरकारी फैसलों को अदालतों से झटका मिला है, वह यह दर्शाता है कि शासन-प्रणाली में संवैधानिक मर्यादा की गंभीर कमी है।

लोकतांत्रिक जवाबदेही और बीते फैसलों का एक पैटर्न
पिछले कुछ वर्षों में अदालतों ने कई बार राज्य सरकार के निर्णयों पर आपत्ति जताई है। शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं के कारण नियुक्तियों को अवैध घोषित करना, कर्मचारियों के बकाया भत्तों को तुरंत प्रभाव से वितरण का आदेश देना, और कई अन्य मामलों में सरकारी तर्कों को अस्वीकार कर देना। यह सिर्फ अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि एक पैटर्न बनाती हैं—एक ऐसा खतरनाक पैटर्न जिसमें शासन की प्राथमिकताएं संवैधानिक निर्देशों और नागरिक अपेक्षाओं से कट रही हैं। लोकतंत्र में सरकार को जवाबदेह होना चाहिए। न सिर्फ जनता के प्रति, बल्कि कानून के प्रति भी। जब न्यायपालिका बार-बार किसी सरकार के निर्णयों को चुनौती देती है, तो यह संकेत है कि निर्णयों के पीछे की प्रक्रिया और उसके तर्क पर्याप्त नहीं रहे। यह सिर्फ अदालतों का मामला नहीं है। यह शासन की संगठनात्मक क्षमता, नीति-निर्माण की गुणवत्ता और नागरिक अपेक्षाओं की पूर्ति का मामला भी है।

राजनीति से ऊपर न्यायपालिका, एक आदेश से ही बड़ा संदेश
भाजपा नेता शुभेंदु चौधरी की पहल को जब कर्मचारी खुशखबरी के रूप में देखते हैं, तो वह सिर्फ विरोध-राजनीति नहीं है, बल्कि यह एक लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया है। न्यायपालिका यदि फटकार लगाती है और सरकार को आदेश देती है, तो यह संकेत है कि शासन के निर्णयों में जनता का भरोसा क्षीण हो रहा है। राजनीति में विरोध-प्रतिक्रियाएं स्वाभाविक हैं, पर जब न्यायपालिका तक मामला पहुंचता है, तो यह शासन की जवाबदेही की परीक्षा बन जाता है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश केवल एक वित्तीय भुगतान का निर्देश नहीं है। यह संदेश है कि किसी भी सरकार को अपने संवैधानिक दायित्वों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। कर्मचारियों की आशाएं, उनके परिवारों की अपेक्षाएं और उनकी रोजमर्रा की जि़ंदगी से जुड़ी जरूरी आवश्यकताए केवल राजनैतिक घोषणाओं तक सीमित नहीं रह सकतीं। यह आदेश इस बात का प्रमाण है कि जब शासन पीछे हटता है, तो न्यायपालिका कैसे आगे आती है।

20 लाख कर्मचारियों को 25 प्रतिशत डीए देने के आदेश
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार को बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा फैसला दिया है, जो ममता सरकार के खिलाफ और बंगाल के लोगों के हक में है। पश्चिम बंगाल के करीब 20 लाख लोगों को मिली सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। डीए से जुड़े केस में सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व फैसले को बरकरार रखा है। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार के कर्मचारियों को बकाया महंगाई भत्ता (डीए) का भुगतान करना होगा। आदेश के मुताबिक, राज्य सरकार को होली के आसपास तक बकाया डीए का 25 प्रतिशत भुगतान करना होगा और शेष 75 प्रतिशत डीए को भी जल्द ही किस्तों में देना होगा। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल ने अपने फैसले में कहा कि महंगाई भत्ता (डीए) परिवर्तनशील है। डीए का भुगतान एआईसीपीआई के अनुसार होना चाहिए। कर्मचारियों की डीए की मांग कानूनी रूप से वैध है। इसलिए, डीए में देरी नहीं होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि डीए का भुगतान अविलंब करके लाखों परिवारों को राहत दी जानी चाहिए।भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी की पहल पर मिली बड़ी राहत
दरअसल, पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी की पहल और मदद पर सरकारी कर्मचारियों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। पश्चिम बंगाल के सरकारी कर्मचारियों को राहत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 20 लाख लोगों को महंगाई भत्ता देना होगा। अदालत ने साल 2008 से 2019 तक का बकाया महंगाई भत्ता दिए जाने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसके पहले दिए गए अंतरिम आदेश के मुताबिक बकाया DA का 25 प्रतिशत हिस्सा 6 मार्च तक दिया जाए। इसके साथ ही बकाया का बाकी हिस्सा किस्तों मे दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए शीर्ष अदालत की पूर्व जज इंदु मल्होत्रा की अध्यक्षता मे कमेटी का गठन भी किया है।

जनता का हित बनाम संवैधानिक मर्यादा की आवश्यकता
आज जिस तरह से ममता सरकार को अदालतों द्वारा दिये गए आदेशों से बार-बार झटका मिला है, वह संकेत करता है कि शासन-निर्णय केवल राजनीतिक लाभ के लिए नहीं होने चाहिए। लोकतंत्र में प्रत्येक निर्णय का आधार संविधान, पारदर्शिता और जनहित होना चाहिए। जब यह तीनों कारक संतुलित रहते हैं, तो शासन सही दिशा में चलता है। अन्यथा, न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ता है—और यही स्थिति आज पश्चिम बंगाल में देखने को मिल रही है। शासन की प्राथमिकताओं में अक्सर राजनैतिक रणनीतियां शामिल होती हैं—चुनावी तैयारियाँ, जनमत सर्वेक्षण और राजनीति-संचालित निर्णय। पर जब जनता के मूल हितों और संवैधानिक दायित्वों में टकराव होता है, तो शासन को न्यायपालिका से निर्देशों का पालन करना चाहिए। यह सिर्फ कानून का पालन नहीं है, बल्कि यह जनता की अपेक्षा का सम्मान भी है।

आइए, अब जानते हैं कि ममता बनर्जी सरकार को पिछले कुछ समय में किन मामलों में कोर्ट ने गलत ठहराया है…

 

अप्रैल 2025 : शिक्षक भर्ती को एससी ने अवैध माना
• माह/साल: अप्रैल 2025
• मामला: सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल स्कूल सर्विस कमीशन (SSC) द्वारा 2016 में किए गए लगभग 25,753 शिक्षकों और कर्मचारियों की नियुक्तियों को अवैध/त्रुटिपूर्ण घोषित कर दिया।
• नतीजा: नियुक्तियाँ रद्द, रिक्त पदों के लिए नए नियमों के तहत प्रक्रिया शुरू करनी होगी। इसके बाद भी ममता बनर्जी ने कहा कि फैसले को “मानवीय दृष्टिकोण से स्वीकार नहीं कर सकती”, लेकिन अदालत के आदेश का सम्मान तो करना होगा।

जनवरी 2026 : I-PAC/ED रेड के खिलाफ याचिका हाईकोर्ट में खारिज
• माह/साल: जनवरी 2026
• मामला: TMC की याचिका, जिसमें I-PAC पर ED की छापों को चुनौती दी गई थी, को कलकत्ता हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया।
• नतीजा: इससे ममता सरकार को अदालत में बड़ा झटका लगा। अदालत ने राजनीतिक गोपनीय डेटा सुरक्षा की दलील को स्वीकार नहीं किया।

फरवरी 2026 : SIR विवाद में सुप्रीम कोर्ट की दखलअंदाजी
• माह/साल: फरवरी 2026
• मामला: विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ ममता बनर्जी की याचिका पर सुनवाई हुई।
• नतीजा: सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निर्णय की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया, चुनाव आयोग से जवाब मांगा और मूल मुद्दों को अदालत के सामने सुपुर्द किया।
• अदालत के दखल से ममता के दृष्टिकोण को चुनौती मिली।

फरवरी 2026 : सुप्रीम कोर्ट का बकाया DA के भुगतान का आदेश
• माह/साल: फरवरी 2026
• मामला: सुप्रीम कोर्ट ने लगभग 20 लाख सरकारी कर्मचारियों को लंबित DA (Dearness Allowance) का भुगतान करने का आदेश दिया।
• निर्णय: 2008–2019 की अवधि के लिए बकाया DA का कम से कम 25 प्रतिशत तुरंत देने को कहा गया। यह निर्णय राज्य सरकार को कर्मचारियों के प्रति उत्तरदायी बनाने वाला माना गया।

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