पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीति आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां सत्ता का संतुलन नहीं, बल्कि सत्ता की असहायता सबसे अधिक दिखाई दे रही है। टीएमसी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब विपक्ष नहीं, बल्कि उनकी अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के भीतर से उठती वह बेलगाम आवाज़ें हैं, जो सरकार की साख, संवैधानिक मर्यादा और कानून-व्यवस्था तीनों को एक साथ चुनौती दे रही हैं। एक के बाद एक टीएमसी नेताओं के विवादित कदम यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या ममता बनर्जी अपनी पार्टी पर नियंत्रण खो चुकी हैं? क्या इस बार के विधानसभा चुनाव ममता बनर्जी के लिए भारी मुश्किलों को सबब बनने जा रहे हैं? पश्चिम बंगाल में छात्राओं और महिलाओं के यौन शोषण के मामले में पहले ही टीएमसी नेताओं के नाम आ चुके हैं। पिछले महीने टीएमसी के विधायक रहे हुमायूं कबीर ने ममता बनर्जी की राजनीति में बड़ा बवाल कर दिया। अब फरक्का से टीएमसी विधायक मोनिरुल इस्लाम द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त को खुलेआम दी गई धमकी केवल एक बयान नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पर सीधा हमला है। चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक निकाय के खिलाफ ‘कब्र से बाहर खींच लाने’ जैसी भाषा का प्रयोग यह दर्शाता है कि सत्ताधारी दल के कुछ नेता खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं।
बाबरी मस्जिद विवाद: तुष्टिकरण की राजनीति का बोझ
पश्चिम बंगाल में कुछ महीने बाद ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। लेकिन राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीति के लिए पिछला कुछ समय अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने वाला साबित हो रहा है। पहले देशभर में चर्चित हुए संदेशखाली यौन प्रकरण में टीएमसी नेता का ही नाम आने से ममता बनर्जी को बगलें झांकने को मजबूर होना पड़ा था। एक बार फिर ममता के लिए मुश्किल की शुरुआत टीएमसी के पूर्व विधायक हुमायूं कबीर के उस दावे से हुई, जिसमें उन्होंने पिछले माह छह दिसंबर को पश्चिम बंगाल में बाबरी मस्जिद के निर्माण का शिलान्यास करा दिया। यह कोई साधारण कदम नहीं था, बल्कि एक ऐसा राजनीतिक विस्फोट था, जिसने ममता बनर्जी को असहज कर दिया। वर्षों से तुष्टिकरण की राजनीति के सहारे सत्ता संभालने वाली मुख्यमंत्री इस मुद्दे पर न तो खुलकर विरोध कर सकीं और न ही समर्थन करने का साहस दिखा पाईं। विरोध करतीं तो अपने वोट बैंक से नाराजगी का डर, समर्थन करतीं तो संवैधानिक और राजनीतिक संकट के साथ-साथ बहुसंख्यक वोट बैंक की नाराजगी। परिणामस्वरूप, चुप्पी को रणनीति बना लिया गया।
फरक्का विधायक का जहर और संवैधानिक संस्थाओं पर हमला
ममता बनर्जी की यही चुप्पी ही उनके गले की हड्डी बन गई है। उनकी पार्टी के नेता ही ऐसी हरकतें कर रहे हैं, जो उनके लिए चुनाव में काफी मुश्किलों का कारण बन सकती हैं। दरअसल, अब यह संकट एक और टीएमसी विधायक के बिगड़े बोल से एक बड़े स्तर पर पहुंच चुका गया है। फरक्का से टीएमसी विधायक मोनिरुल इस्लाम ने सीधे-सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त को कब्र से खींच लाने की धमकी दे डाली है। दरअसल, मोनिरुल इस्लाम की खुलेआम दी गई धमकी केवल एक बयान नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पर हमला है। चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के खिलाफ ‘कब्र से बाहर खींच लाने’ जैसी भाषा का प्रयोग यह दर्शाता है कि सत्ताधारी दल के कुछ नेता खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं। यह वही चुनाव आयोग है, जिसे लोकतंत्र का प्रहरी कहा जाता है, लेकिन बंगाल में उसे खलनायक बनाने की कोशिश की जा रही है।
चुनाव आयोग के खिलाफ ममता सरकार का पुराना नैरेटिव
टीएमसी विधायक मोनिरुल इस्लाम का यह अनर्गल आरोप है कि चुनाव आयोग बंगाल के लोगों को परेशान कर रहा है। जबकि चुनाव आयोग सिर्फ एसआईआर का अपना काम कर रहा है, जिसे अदालत बने भी सही ठहराया है। लेकिन इसको लेकर तृणमूल सरकार के नेता और विधायक ऊल-जलूल बयानबाजी पर उतर आए हैं। दरअसल, यह वही पुराना नैरेटिव है, जिसे ममता बनर्जी बार-बार दोहराती रही हैं। हर संवैधानिक संस्था को ‘बाहरी हस्तक्षेप’ बताना, हर जांच को ‘राजनीतिक साजिश’ कहना। लेकिन जब यही भाषा धमकी और डंडे के जोर पर काम कराने तक पहुंच जाए, तो सवाल उठता है कि क्या यह सरकार लोकतंत्र में विश्वास रखती है या भीड़तंत्र में। ममता बनर्जी खुद भी कुछ दिन पहले आई-पैक पर प्रवर्तन निदेशालय के छापे के दौरान भीड़तंत्र का हिस्सा बनकर मौके पर जा पहुंची थी, और वहां के ग्रीन फाइल समेत कई अहम कागजात उठाकर ले आईँ थीं। इस पर कोर्ट ने भी नाराजगी जताई थी।
TMC विधायक के समर्थकों ने तोड़फोड़ कर सरकारी काम रोका
विधानसभा चुनाव से पहले उनकी पार्टी टीएमसी के दूसरे विधायक ने जहर उगला है। पश्चिम बंगाल के फरक्का से टीएमसी विधायक मोनिरुल इस्लाम ने मुख्य चुनाव आयुक्त को खुलेआम धमकी देकर नया विवाद खड़ा कर दिया है। यह सारा हंगामा तब शुरू हुआ जब विधायक अपने समर्थकों के साथ फरक्का के बीडीओ (BDO) दफ्तर पहुंचे। वहां चल रही मतदाता सूची की सुनवाई के दौरान समर्थकों ने जमकर तोड़फोड़ की और सरकारी काम रुकवा दिया। अधिकारियों के कमरों के दरवाजे जबरन खोले गए और उनके साथ बदसलूकी की गई। हैरान करने वाली बात यह है कि सरेआम हुई इस हिंसा और गाली-गलौज के बाद भी अब तक पुलिस ने विधायक पर कोई एक्शन नहीं लिया है। इस घटना के बाद विपक्ष ने ममता सरकार को घेरा है। पूर्व कॉन्ग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी ने आरोप लगाया कि यह सब मुख्यमंत्री के इशारे पर हो रहा है। उन्होंने कहा कि बंगाल में कानून-व्यवस्था पूरी तरह खत्म हो चुकी है और अब चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को भी डराया जा रहा है। विधायक की इस हरकत से सरकारी अधिकारियों में भी डर का माहौल है।
महिला सुरक्षा पर शर्मनाक चुप्पी, भ्रष्टाचार का गहराता दलदल
विडंबना यह है कि एक महिला मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाले राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के आंकड़े लगातार डराने वाले होते जा रहे हैं। यौन शोषण, बलात्कार, तस्करी और हिंसा के मामलों में पश्चिम बंगाल बार-बार सुर्खियों में रहा है। लेकिन ममता सरकार की प्रतिक्रिया या तो इनकार में होती है या फिर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहती है। सत्ता के संरक्षण में पनपता अपराध और उस पर सरकारी चुप्पी इस बात का प्रमाण है कि शासन का संवेदनशील चेहरा अब खोखला हो चुका है। शिक्षक भर्ती घोटाला, कोयला तस्करी, पशु तस्करी, राशन घोटाला—ये कोई आरोप नहीं, बल्कि वे मामले हैं जिनमें ममता सरकार के मंत्री, विधायक और शीर्ष नेता जांच एजेंसियों के घेरे में आ चुके हैं। भ्रष्टाचार अब अपवाद नहीं, बल्कि शासन का स्थायी चरित्र बनता जा रहा है। ऐसे में पार्टी नेताओं की बेलगाम बयानबाज़ी सरकार की कमजोरियों को और उजागर करती है।
चुनाव से पहले बिखरता अनुशासन और सीएम का राजनीतिक द्वंद्व
विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आ रहे हैं, टीएमसी के भीतर अनुशासन पूरी तरह बिखरता दिख रहा है। कोई विधायक धार्मिक उकसावे में बयान दे रहा है, कोई संवैधानिक पदों को धमका रहा है और मुख्यमंत्री हर बार ‘निजी बयान’ कहकर पल्ला झाड़ लेती हैं। सवाल यह है कि अगर ये निजी बयान हैं, तो पार्टी की जिम्मेदारी कहां है? और अगर पार्टी की जिम्मेदारी नहीं, तो सरकार की नैतिक जिम्मेदारी कैसे तय होगी? ममता बनर्जी आज एक ऐसे राजनीतिक द्वंद्व में फंसी हैं, जहां हर फैसला उन्हें नुकसान की ओर ले जा रहा है। तुष्टिकरण की राजनीति अब बोझ बन चुकी है और कानून-व्यवस्था पर नरमी सत्ता के खिलाफ माहौल तैयार कर रही है। न वे अपने नेताओं पर सख्ती कर पा रही हैं, न ही खुले तौर पर संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान सुनिश्चित कर पा रही हैं।
लोकतंत्र बनाम अराजकता की लड़ाई ममता पर भारी पड़ेगी
पश्चिम बंगाल की राजनीति अब विकास बनाम विनाश की नहीं, बल्कि लोकतंत्र बनाम अराजकता की लड़ाई बनती जा रही है। जब सत्ताधारी दल के विधायक चुनाव आयोग को धमकाएं, धार्मिक विवादों को हवा दें और सरकार आंख मूंदे बैठी रहे, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक पतन का संकेत होता है। ममता बनर्जी के लिए यह समय आत्ममंथन का है, लेकिन उनकी राजनीति आत्ममंथन से अधिक आत्मरक्षा में उलझी दिखती है। सवाल अब यह नहीं है कि टीएमसी के नेता क्या कह रहे हैं, सवाल यह है कि मुख्यमंत्री उन्हें रोक क्यों नहीं पा रही हैं। आने वाले विधानसभा चुनाव में जनता केवल नारों से नहीं, बल्कि शासन के इस पूरे रिकॉर्ड से फैसला करेगी। जहां तुष्टिकरण, भ्रष्टाचार, अपराध और अराजकता एक साथ खड़े नजर आते हैं। सत्ता की लगाम अगर यूं ही ढीली रही, तो फैसला जनता के हाथ में होगा, और वह फैसला शायद सत्ता के लिए बहुत कठोर साबित हो।
अपराधों में जेल जाने से बचने के लिए टीएमसी बना रही दबाव
बता दें कि अभी कुछ समय पहले ही पश्चिम बंगाल की राजनीति एकदम से सुर्खियों में आई थी। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का रुख और टीएमसी नेताओं को सड़क पर उतारना, दरअसल उस राजनीति का परिचित दृश्य बना था, जिसमें जांच को “राजनीतिक प्रतिशोध” बताकर असली सवालों से ध्यान भटकाने की कोशिश की जाती है। मनी लॉन्ड्रिंग, अवैध तस्करी और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में जब एजेंसियां सवाल पूछती हैं, तो जवाब देने के बजाय नेता आंदोलन का रास्ता अपनाने लग जाते हैं। बिहार में राजद और दिल्ली में आप नेताओं के ऐसे कई उदाहरण हैं। अब इसी लकीर पर टीएमसी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी चल निकली हैं। ईडी बनाम दीदी की यह लड़ाई दरअसल एजेंसी बनाम नेता की नहीं, बल्कि जवाबदेही बनाम दबाव की राजनीति की है। लोकतंत्र में जांच एजेंसियों पर सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन जांच से भागा नहीं जा सकता। पश्चिम बंगाल की जनता अब यह समझने लगी है कि सच्ची ताकत नारों, सड़कों पर शोर-शराबे में नहीं, बल्कि भाजपा के सुशासन में होती है। यदि टीएमसी सरकार इन सवालों का ठोस जवाब नहीं देती, तो आने वाले विधानसभा चुनावों में जनादेश अपना फैसला सुनाने से बिल्कुल नहीं हिचकेगा।









