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किसानों की आड़ में नरेश टिकैत की राजनीति, कांग्रेस और वामपंथियों का मोहरा बन पश्चिम बंगाल में करेंगे प्रोपेगेंडा

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भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत ने जिस तरह पश्चिम बंगाल में बीजेपी के खिलाफ मुहिम चलाने का ऐलान किया है, उससे उनके राजनीतिक महत्वाकांक्षा का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। नरेश टिकैत और राकेश टिकैत जिस तरह महापंचायत करते फिर रहे हैं, उसका मकसद आंदोलन की आड़ में अपनी राजनीति चमकाना है। साथ ही कांग्रेस और वामपंथियों का मोहरा बनकर उनको सियासी फायदा पहुंचाना है। 

नरेश टिकैत ने 25 फरवरी, 2021 को अयोध्या में बीजेपी को धमकी देते हुए कहा कि किसान पश्चिम बंगाल में बीजेपी के उम्मीदवारों के खिलाफ प्रचार करेंगे। उन्होंने अपने भावी कार्यक्रमों का जिक्र करते हुए कहा कि हम पश्चिम बंगाल भी जाएंगे और लोगों को बताएंगे की किसी को भी वोट दो लेकिन बीजेपी को नहीं। इनकी कथनी और करनी में अंतर है।

नरेश टिकैत ने कहा कि हमें आंदोलन से उठने का मौका नहीं मिल रहा है। हम उन किसानों को क्या जवाब देंगे जो हमारे साथ हैं। सुप्रीम कोर्ट उठाना चाहे तो उठा दे। किसान संयुक्त मोर्चा के साथ सरकार वार्ता करे। कृषि कानूनों में संशोधन की जरूर हो तो वह भी करे। किसानों पर दर्ज मामले वापस हो। हम चाह रहे हैं कि बातचीत सही हो। दूध का दूध और पानी का पानी होना चाहिए।

पहली बार नरेश टिकैत के बयानों में बदलाव दिख रहा है। उन्होंने कानूनों को निरस्त करने की मांग नहीं की और इसके बजाय मोदी सरकार को उन प्रावधानओं में संशोधन करने को कहा जो उनके अनुसार, किसानों के हित में नहीं हैं। टिकैत ने कहा कि अगर जरूरत है तो नए कानूनों को किसान समर्थन में संशोधित किया जाए, लेकिन पूरी पारदर्शिता के साथ।

नरेश टिकैत और राकेश टिकैत एमएसपी को कानूनी मान्यता देने के साथ ही तीनों कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। नये कृषि कानून अन्य चीजों के अलावा किसानों को अपनी उपज खुले बाजार में बेचने की आजादी देते हैं। लेकिन राकेश टिकैत इस आजादी को किसानों के हित में नहीं मानते हैं। वो इन कानूनों को वापस लेने के लिए सरकार पर लगातार दबाव डाल रहे हैं। लेकिन इनके पिता महेंद्र सिंह टिकैत ने 27 साल पहले इन्हीं सुधारों की मांग को लेकर आंदोलन किया था।

आइए देखते हैं 27 साल पहले महेंद्र सिंह टिकैत ने तत्कालीन कांग्रेस सरकार से किन सुधारों की मांग की थी-

27 साल पहले महेंद्र सिंह टिकैत और भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के चार अन्य नेताओं ने तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के निमंत्रण पर उनसे मुलाकात की थी। तब महेंद्र सिंह टिकैत ने प्रधानमंत्री राव को देने के लिए किसान समस्याओं का एक ज्ञापन तैयार किया था। उसी ज्ञापन में पहली बार किसानों के लिए पूरे देश का बाजार खोले जाने की मांग की गई थी। ताकि किसान फसल को जहां अच्छे दाम मिले वहां जाकर बेच सके। उसे किसी मंडी के लाइसेंसधारी(आढ़तियों) को फसल बेचने की बाध्यता नहीं हो।

उस प्रतिनिधिमंडल में शामिल भारतीय किसान यूनियन के तत्कालीन जिलाध्यक्ष रहे वीरेंद्र सिंह प्रमुख ने कहा कि उस वार्ता के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने किसानों की मांगों को तत्काल पूरा करने में असमर्थता जता दी थी। बाद में महेन्द्र सिंह टिकैत ने किसानों को अपनी उपज पूरे देश में कहीं भी लेजाकर बेचने की छूट दिए जाने की मांग को जोर शोर से उठाया। हालांकि महेंद्र सिंह टिकैत द्वारा किसानों के लिए किए गए आंदोलनों के बावजूद इस मांग को उनके जीवनकाल में पूरा नहीं किया जा सका। 2011 में उनकी मृत्यु हो गई। मृत्यु के नौ साल बाद केंद्र की मोदी सरकार ने महेंद्र सिंह टिकैत और किसानों की दशकों पुरानी इस मांग को पूरा कर दिया। 

अब वही भारतीय किसान यूनियन और टिकैत के बेटे उन कानूनों का विरोध कर रहे हैं, जो 27 साल पहले टिकैत की मांगों के अनुरूप हैं। मोदी सरकार ने किसान और ग्राहक के बीच जो बिचौलिए होते हैं, जो किसानों की कमाई का बड़ा हिस्सा खुद ले लेते हैं, उनसे बचाने के लिए कानून बनाया है। सरकार ने कानून के तहत किसानों के लिए रक्षा कवच प्रदान किया हैं। किसानों पर से कानून का बंधन खत्म कर दिया गया है। अब किसानों को जहां मन आएगा, अपनी उपज बेचेगा। किसान अब किसी बिचौलिए का मोहताज नहीं रहेगा और अपनी उपज के साथ अपनी आय भी बढ़ाएगा। 

गौरतलब है कि आज बीकेयू के अध्यक्ष महेंद्र सिंह टिकैत के बड़े बटे नरेश टिकैत हैं। लेकिन, संगठन की बागडोर असल मायनों में महेंद्र सिंह टिकैत के छोटे बेटे राकेश टिकैत ने संभाल रखी है। केंद्र सरकार से बातचीत करने वाले किसानों में राकेश टिकैत भी शामिल थे। 

 

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