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राहुल की राजनीति पर अपनों का ‘सर्जिकल स्ट्राइक’: दिग्गज कांग्रेसी ही गाने लगे प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति के गुण

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गांधी परिवार के नेतृत्व वाली कांग्रेस इन दिनों एक अजीबोगरीब स्थिति से गुजर रही है। आजकल कांग्रेस पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष से नहीं, बल्कि अंदर से खड़ी होती नजर आ रही है। पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी जिस आक्रामक अंदाज में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की विदेश नीति पर हमलावर हैं, उसी तेजी से उनकी अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता उनके नैरेटिव की हवा निकालते जा रहे हैं।

राहुल गांधी लगातार यह माहौल बनाने में जुटे हैं कि देश की विदेश नीति फेल हो चुकी है और सरकार वैश्विक दबाव में झुकी हुई है। लेकिन सवाल यह है कि जब अपने ही अनुभवी नेता इस दावे को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं और उनकी अपनी ही टीम के ‘सेनापति’ प्रधानमंत्री की कूटनीति के मुरीद नजर आ रहे हैं, तो यह हमला कितना ठोस बचता है?

शशि थरूर- संयम कमजोरी नहीं, ताकत है
सबसे बड़ा झटका तब लगा जब पार्टी के सीनियर लीडर शशि थरूर ने साफ शब्दों में उस लाइन को नकार दिया, जिस पर राहुल गांधी राजनीति खड़ी कर रहे हैं। थरूर ने दो टूक कहा कि मौजूदा हालात में भारत का संयम कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत है। यानी जिस चुप्पी को राहुल गांधी निशाना बना रहे हैं, उसे उनकी ही पार्टी के दिग्गज रणनीतिक परिपक्वता बता रहे हैं।

कमलनाथ- गैस किल्लत नहीं
इसके बाद कमलनाथ जैसे पुराने कांग्रेसी वफादार का बयान आया, जिसने राहुल गांधी के आर्थिक हमलों की भी धार कुंद कर दी। जहां राहुल देश में गैस संकट और महंगाई का डर दिखा रहे हैं, वहीं कमलनाथ ने साफ कह दिया कि एलपीजी की कोई कमी नहीं है, सिर्फ माहौल बनाया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या राहुल गांधी मुद्दे गढ़ रहे हैं या उन्हें गलत जानकारी दी जा रही है? दोनों ही स्थितियां नेतृत्व की समझ पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।

आनंद शर्मा- कूटनीति को बताया परिपक्व और कुशल
वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा ने भी बिना लाग-लपेट के यह संकेत दे दिया कि राष्ट्रीय हित के मुद्दों पर राजनीति करना सही रास्ता नहीं है। उन्होंने मिडिल ईस्ट संकट में भारत की कूटनीति को परिपक्व और कुशल बताया, जो सीधे-सीधे राहुल गांधी के आरोपों के उलट खड़ा होता है।

मनीष तिवारी: यह संघर्ष भारत का नहीं है
इसी कड़ी में कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने भी साफ कर दिया कि यह कोई साधारण संघर्ष नहीं है, बल्कि बेहद जटिल वैश्विक स्थिति है, जहां संतुलन ही सबसे बड़ी ताकत है। तिवारी ने स्पष्ट संकेत दिया कि विदेश नीति जैसे संवेदनशील विषय को केवल राजनीतिक हमले का हथियार बनाना न केवल अपरिपक्वता, बल्कि जोखिम भरा दृष्टिकोण भी हो सकता है।

अश्विनी कुमार- प्रधानमंत्री का योगदान सराहनीय
इतना ही नहीं पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार ने कांग्रेस पार्टी को आईना दिखाते हुए ईरान-इजराइल युद्ध के मुद्दे पर मोदी सरकार के रुख की खुलकर सराहना की है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि इन कठिन परिस्थितियों में भारत के प्रधानमंत्री का योगदान सराहनीय है। उनका यह बयान कांग्रेस के झूठे प्रचार और दोहरे रवैये की पूरी तरह पोल खोलता है, क्योंकि जिस मुद्दे पर कांग्रेस लगातार भ्रम फैलाने की कोशिश कर रही थी, उसी पर उसके पूर्व वरिष्ठ नेता ने सच्चाई को स्वीकार करते हुए मोदी सरकार की नीति और नेतृत्व की प्रशंसा की है।

पूरी तस्वीर साफ है राहुल गांधी जिस मुद्दे पर सरकार को घेरना चाहते हैं, उसी मुद्दे पर उनकी अपनी पार्टी में ही सहमति नहीं है। अनुभवी नेता जहां कूटनीति में संतुलन और परिपक्वता की बात कर रहे हैं, वहीं राहुल गांधी हर मुद्दे को आक्रामक विरोध में बदलने की कोशिश कर रहे हैं। राजनीति में विरोध जरूरी है, लेकिन जब विरोध तथ्यों से ज्यादा नैरेटिव पर टिका हो और अपने ही साथी उस नैरेटिव को खारिज करने लगें, तो यह केवल रणनीति की विफलता नहीं, बल्कि नेतृत्व की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करता है। राहुल गांधी के लिए यह सिर्फ राजनीतिक चुनौती नहीं, बल्कि साख की परीक्षा बनती जा रही है, क्योंकि जब अपनों के बयान ही सबसे बड़ा विरोध बन जाएं, तो विपक्ष की जरूरत ही नहीं रह जाती।

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