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बुद्ध अवशेष प्रदर्शनी: यह दौर युद्ध का नहीं, बुद्ध का है, पीएम मोदी बोले- जहां विवाद, वहां संवाद और शांति का मार्ग जरूरी

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार, 3 जनवरी को दिल्ली के ऐतिहासिक किला राय पिथौरा परिसर में भगवान बुद्ध के पवित्र पिपरहवा अवशेषों की अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। इस आध्यात्मिक अवसर को वैश्विक मंच देते हुए पीएम ने दोटूक कहा कि आज की दुनिया को युद्ध की नहीं, बल्कि बुद्ध के करुणा और संवाद वाले मार्ग की जरूरत है।

आज की वैश्विक परिस्थितियों पर बात करते हुए पीएम मोदी ने साफ किया कि भारत की भूमिका एकदम साफ है। उन्होंने कहा, ‘भगवान बुद्ध ने दुनिया को संघर्ष और प्रभुत्व के बजाय, साथ चलने का रास्ता दिखाया। और यही भारत की मूल सोच रही है। हमने विचारों के बल पर, संवेदनाओं के धरातल पर, मानवता के हित में ही विश्व कल्याण का मार्ग अपनाया है। इसी सोच के साथ भारत, 21वीं सदी की दुनिया में अपना योगदान दे रहा है। इसलिए, आज जब हम कहते हैं, कि ये दौर युद्ध का नहीं बुद्ध का है, तो भारत की भूमिका एकदम स्पष्ट है, जो मानवता के दुश्मन हैं, उनके विरुद्ध शक्ति आवश्यक है। लेकिन जहां सिर्फ विवाद हैं, वहां संवाद और शांति का मार्ग जरूरी है।’

सवा सौ साल के लंबे इंतजार के बाद भारत वापस आई धरोहर को देश के सामने रखते हुए प्रधानमंत्री भावुक भी दिखे और गौरवान्वित भी। इसे 2026 का अपना पहला सार्वजनिक कार्यक्रम बताते हुए उन्होंने कामना की कि भगवान बुद्ध के आशीर्वाद से यह साल पूरी दुनिया के लिए शांति और सद्भाव का नया दौर लेकर आए।

प्रधानमंत्री ने कहा कि गुलामी सिर्फ राजनीतिक या आर्थिक नहीं होती, वह हमारी विरासत को भी तबाह कर देती है। उन्होंने बताया कि कैसे ये पवित्र अवशेष सवा सौ साल पहले भारत से छीन लिए गए थे। उन्होंने कहा कि जिन लोगों के पास ये अवशेष थे, उनके लिए ये महज ‘एंटीक पीस’ थे और वे इन्हें नीलाम करना चाहते थे। लेकिन भारत के लिए ये हमारे आराध्य का अंश थे। उन्होंने इस मौके पर गोदरेज समूह का विशेष आभार जताया, जिनके सहयोग से ये अवशेष वापस अपनी मूल मिट्टी पर लौट सके।

प्रधानमंत्री ने हाल के महीनों का जिक्र करते हुए बताया कि बुद्ध के संदेशों की ताकत आज भी वैसी ही है। चाहे थाईलैंड हो, वियतनाम हो या रूस का काल्मिकिया क्षेत्र, जहां भी बुद्ध के अवशेष गए, वहां की आधी से ज्यादा आबादी दर्शन के लिए उमड़ पड़ी। मंगोलिया के लोगों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वहां लोग सिर्फ इसलिए भारतीय प्रतिनिधियों को छूना चाहते थे क्योंकि वे ‘बुद्ध की भूमि’ से आए थे। यह दिखाता है कि बुद्ध पूरी मानवता को जोड़ने वाली कड़ी हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने जीवन में बुद्ध के प्रभाव को साझा करते हुए बताया कि उनका जन्मस्थान वडनगर बौद्ध शिक्षा का केंद्र रहा है और उनकी कर्मभूमि सारनाथ बुद्ध के प्रथम उपदेश की साक्षी है। उन्होंने बताया कि अपनी विदेश यात्राओं के दौरान उन्होंने न केवल बुद्ध मंदिरों के दर्शन किए, बल्कि शांति के प्रतीक के रूप में बोधि वृक्ष के पौधे भी भेंट किए। हिरोशिमा के बॉटनिकल गार्डन में लगा बोधि वृक्ष आज पूरी दुनिया को तबाही के बीच मानवता का संदेश दे रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि पिछले 11 वर्षों में बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर और श्रावस्ती जैसे स्थलों को आधुनिक सुविधाओं से जोड़ा गया है। देश में एक बौद्ध सर्किट तैयार किया जा रहा है। हाल ही में ‘पाली’ भाषा को क्लासिकल लैंग्वेज का दर्जा देने पर उन्होंने कहा कि इससे बुद्ध की मूल वाणी को समझना और रिसर्च करना आसान होगा। जम्मू-कश्मीर के बारामूला में मिली नई बौद्ध साइट का संरक्षण भी अब तेजी से किया जा रहा है।

आखिर में प्रधानमंत्री ने देशभर के लोगों, खासकर स्कूली बच्चों और कॉलेज के छात्रों से आग्रह किया कि वे इस प्रदर्शनी को देखने जरूर आएं। उन्होंने कहा कि यह प्रदर्शनी हमारे गौरवशाली अतीत को भविष्य के सपनों से जोड़ने का एक बड़ा माध्यम है।

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