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पीएम मोदी के नेतृत्व में पूर्वोत्तर लिख रहा है विकास की नई कहानी!

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यह दुर्भाग्‍य की बात रही कि आजाद भारत की कांग्रेसी सरकारों द्वारा न तो पूर्वोत्‍तर राज्‍यों के आर्थिक विकास के लिए ठोस जमीनी प्रयास किए गए और न ही उनके सामरिक महत्‍व की पहचान करने पर ही ध्यान दिया गया। इस वजह से इस हिस्से के प्रति शेष देश में सहज अपनत्व की भावना कम ही रही है। हालांकि 2014 में केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने के बाद पूर्वोत्तर भारत पूर्ण विकास पर जोर दिया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सपना है कि देश के हर राज्य का संतुलित और तीव्र विकास हो ताकि देश आत्मनिर्भर बन सके। इस सपने को साकार करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी सत्तर साल से उपेक्षित पूर्वोतर भारत में विकास की नई कहानी गढ़ रहे हैं। पिछले सात वर्षों में पूर्वोत्तर के 8 राज्यों में अभूतपूर्व परिवर्तन देखने को मिला है। मोदी सरकार ने पूर्वोत्तर के लिए ‘एक्ट ईस्ट’ का संकल्प लिया है। इसके तहत इस क्षेत्र को मिले प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर लोगों को सामर्थ्यवान बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है। एक अनुमान के मुताबिक़ देश की आजादी के बाद सभी प्रधानमंत्री पूर्वोत्तर राज्यों के दौरे पर जितनी बार गए हैं, प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी अकेले उससे अधिक बार (50 से अधिक) पूर्वोत्तर के राज्यों का दौरा कर चुके हैं, इससे यहां विकास को तेज रफ्तार मिल रही है। इसके अलावा उनकी ‘एक्ट ईस्ट’ विदेश नीति का लाभ पूर्वोत्तर के राज्यों को मिल रहा है। भारत-म्‍यांमार-थाइलैंड सुपर हाईवे इसी का नतीजा है। साथ ही, पूर्वोत्तर के लिए अलग टाइम जोन की मांग पर भी अब विचार किया जा रहा है।

अब भारत के विकास का गेटवे बन रहा पूर्वोत्तर

पूर्वोत्तर को लेकर दिल्ली की सोच में आए इस परिवर्तन का नतीजा है कि वहां उग्रवाद में कमी भी देखने को मिल रही है। दिल्ली के लिए पूर्वोत्तर और उसके मुद्दे महत्वपूर्ण हो गए हैं। पूर्वोत्तर में बदलाव की ये बयार और तेज होती जाएगी। यहां विकास और पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। पूर्वोत्तर क्षेत्र की इन संभावनाओं को साकार करने के लिए अब काम हो रहा है और पूर्वोत्तर अब भारत के विकास का गेटवे बन रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘लोकल फॉर ग्लोबल’ का मंत्र देकर इस क्षेत्र के विकास को गति दी है। वहां के प्राकृतिक सौंदर्य, आर्थिक और पर्यटन क्षमता को देश और दुनिया के पटल पर लाने की कोशिश हो रही है। इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी ने हीरा (HIRA) हाइवे, इन्लैन्ड वाटरवे, रेलवे और एयरवे के विकास पर जोर दिया है। इससे पूर्वोत्तर के राज्यों, शेष भारत और राजधानी दिल्ली के बीच की दूरी को खत्म करने में मदद मिली है। इन प्रयासों के साथ ही पूर्वोत्तर क्षेत्र को कृषि निर्यात हब बनाने की दिशा में तेजी से काम हो रहा है और इसमें पीएम मोदी विशेष रुचि ले रहे हैं।

अरुणाचल में ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे डोनी पोलो हवाई अड्डा का उद्घाटन

पूर्वोत्तर के विकास के इसी क्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने अरुणाचल प्रदेश में पहले ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे ‘डोनी पोलो हवाई अड्डा, ईटानगर’ का उद्घाटन 19 नवंबर 2022 को किया। इस हवाई अड्डे का शिलान्यास प्रधानमंत्री ने स्वयं फरवरी 2019 में किया था। इस दौरान कोविड महामारी की चुनौतियों के बावजूद इस हवाई अड्डे का कार्य बहुत कम समय में पूरा किया गया है। इसके साथ ही पीएम मोदी ने 600 मेगावाट कामेंग हाइड्रो पावर स्टेशन भी राष्ट्र को समर्पित किया। प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर कहा कि डोनी पोलो हवाई अड्डा अरुणाचल प्रदेश के लिए चौथा परिचालित हवाई अड्डा होगा, इससे पूर्वोत्तर क्षेत्र में हवाई अड्डों की कुल संख्या 16 हो जाएगी। 1947 से 2014 तक, इस पूर्वोत्तर क्षेत्र में केवल 9 हवाई अड्डे बनाए गए थे। लेकिन पिछले आठ वर्षों की छोटी सी अवधि में ही पूर्वोत्तर में सात हवाई अड्डे बनाए गए हैं। इस क्षेत्र में हवाई अड्डों का तेजी से विकास पूर्वोत्तर क्षेत्र में कनेक्टिविटी बढ़ाने के बारे में प्रधानमंत्री के विशेष महत्व को दर्शाता है। उन्होंने यह भी कहा कि पूर्वोत्तर भारत को जोड़ने वाली उड़ानों की संख्या भी दोगुनी हो गई है। पीएम मोदी ने कहा कि डोनी पोलो हवाई अड्डा अरुणाचल प्रदेश के इतिहास और संस्कृति का साक्षी बन रहा है। इस हवाई अड्डे के नामकरण पर प्रकाश डालते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘डोनी’ का अर्थ सूर्य है जबकि ‘पोलो’ का अर्थ है चंद्रमा। प्रधानमंत्री ने सूर्य और चंद्रमा की रोशनी की तुलना राज्य के विकास से करते हुए कहा कि हवाई अड्डे का विकास उतना ही जरूरी है जितना गरीबों का विकास।

वर्ष 2014 के बाद पूर्वोत्तर के विकास का नया अध्याय शुरू 

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि स्वतंत्रता मिलने के बाद भी लम्बी अवधि के दौरान पूर्वोत्तर क्षेत्र को उदासीनता और उपेक्षा का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि यह अटल बिहारी वाजपेयी की ही सरकार थी जिसने इस क्षेत्र पर ध्यान देते हुए पूर्वोत्तर के लिए एक अलग मंत्रालय का गठन किया था। बाद में विकास की गति थम गई लेकिन 2014 के बाद विकास का नया अध्याय शुरू हुआ। इससे पहले दूर-दराज के सीमावर्ती गांवों को अंतिम गांव माना जाता था लेकिन हमारी सरकार ने सीमावर्ती क्षेत्रों के गांवों को देश का पहला गांव मानकर काम किया है। इसके परिणामस्वरूप पूर्वोत्तर का विकास सरकार की प्राथमिकता बन गया है। पर्यटन हो या व्यापार, टेलीकॉम हो या टेक्सरटाइल, पूर्वोत्तर को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलती है। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि प्रौद्योगिकी हो या कृषि उड़ान, हवाई अड्डा कनेक्टिविटी हो या बंदरगाह कनेक्टिविटी, सरकार ने पूर्वोत्तर के विकास की प्राथमिकता निर्धारित की है। प्रधानमंत्री ने इस क्षेत्र में किए गए विकास कार्यों पर प्रकाश डालने के लिए देश के सबसे लंबे पुल, सबसे लंबे रेलमार्ग पुल, रेललाइन कनेक्टिविटी और राजमार्गों के रिकॉर्ड निर्माण करने के उदाहरण दिए। प्रधानमंत्री ने कहा कि यह अपेक्षाओं और आकांक्षाओं का एक नया युग है और आज का कार्यक्रम भारत के नए दृष्टिकोण का एक सटीक उदाहरण है।

640 करोड़ रुपये में बनकर तैयार हुआ डोनी पोलो हवाई अड्डा

पूर्वोत्तर में कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने के लिए उठाए गए एक महत्वपूर्ण कदम में प्रधानमंत्री ने अरुणाचल प्रदेश में पहले ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे- ‘डोनी पोलो हवाई अड्डा, ईटानगर’ का उद्घाटन किया। इस हवाई अड्डे का यह नाम अरुणाचल प्रदेश की परंपराओं और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत तथा सूर्य (‘डोनी’) और चंद्रमा (‘पोलो’) के लिए इसकी सदियों पुरानी स्वदेशी श्रद्धा को दर्शाता है। यह हवाई अड्डा, अरुणाचल प्रदेश का पहला ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा है जिसे 690 एकड़ से भी अधिक क्षेत्र में विकसित किया गया है और इसके निर्माण पर 640 करोड़ रुपये से अधिक की लागत आई है। इस हवाई अड्डे में 2300 मीटर रनवे है और यह सभी प्रकार मौसम में संचालन के लिए उपयुक्त है। हवाई अड्डा टर्मिनल एक आधुनिक भवन है, जो ऊर्जा दक्षता, नवीकरणीय ऊर्जा और संसाधनों के रिसाइक्लिंग को बढ़ावा देती है। ईटानगर में इस नए हवाई अड्डे के विकास से न केवल क्षेत्र की कनेक्टिविटी में सुधार होगा बल्कि यह व्यापार और पर्यटन के विकास के लिए एक प्रेरक के रूप में भी कार्य करेगा तथा इससे क्षेत्र के आर्थिक विकास को भी बढ़ावा मिलेगा। पांच पूर्वोत्तर राज्यों- मिजोरम, मेघालय, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड के हवाई अड्डों ने 75 सालों में पहली बार उड़ानें शुरू की हैं। पूर्वोत्तर में विमानों की आवाजाही में भी वर्ष 2014 के बाद से 113 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है जो वर्ष 2014 में 852 प्रति सप्ताह से बढ़कर वर्ष 2022 में 1817 प्रति सप्ताह तक पहुंच गई है।

600 मेगावाट कामेंग हाइड्रो पावर स्टेशन से अरुणाचल बनेगा विद्युत सरप्लस राज्य

8,450 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से विकसित और अरुणाचल प्रदेश के पश्चिमी कामेंग जिले में 80 किलोमीटर से अधिक के क्षेत्र में फैली इस परियोजना से अरुणाचल प्रदेश एक विद्युत सरप्लस राज्य बन जाएगा जिससे ग्रिड स्थिरता और एकीकरण के मामले में राष्ट्रीय ग्रिड को भी लाभ मिलेगा। यह परियोजना हरित ऊर्जा को अपनाने में अधिक हरित ऊर्जा अपनाने के लिए देश की प्रतिबद्धता को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देगी।

पीएम मोदी के निर्देश पर बुनियादी ढांचे पर जोर

विकास और बुनियादी ढांचे के मामले में पूर्वोत्तर अब देश के बाकी हिस्सों से अब और पीछे नहीं है क्योंकि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने पिछले 8 सालों में इस क्षेत्र के विकास पर विशेष ध्यान दिया है। दिलचस्प बात यह है कि भारत के सभी पूर्वोत्तर राज्यों में बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार है।

पीएम मोदी ने 50 से अधिक बार किया पूर्वोत्तर राज्यों का दौरा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 50 से अधिक बार उत्तर पूर्व भारत का दौरा किया। मोदी सरकार का मानना है कि परिवहन और संचार को बढ़ाकर ही इस क्षेत्र में परिवर्तन संभव है और इस संबंध में ठोस कदम उठाए गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2014 में सत्ता संभालने के बाद अब तक पूर्व उत्तर भारत का 50 से ज्यादा बार दौरा कर लिया है। पीएम नरेंद्र मोदी देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने लगातार इतनी बार पूर्व उत्तर भारत का दौरा किया है। इसमें प्रशासनिक कार्यक्रम के साथ साथ राजनीतिक रैलियां भी शामिल हैं।

पीएम मोदी ने मंत्रियों को दी ये जिम्मेदारी

पीएम नरेंद्र मोदी ने कई केंद्रीय मंत्रियों को यह जिम्मेदारी दी कि उन्हें महीने में कम से कम दो बार पूर्वोत्तर भारत का दौरा करना पड़ेगा और वहां की समस्याओं का समाधान भी करना होगा। ऐसे में पूर्वोत्तर राज्यों से जो भी फाइल दिल्ली जाती है उसका काम समय के अंदर पूरा कर लिया जाता है। एक कारण ये भी है कि पूर्वोत्तर का भविष्य अब उज्ज्वल दिखाई दे रहा है। इसके अलावा पीएम मोदी ने केंद्रीय मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों को पूर्वोत्तर क्षेत्र का दौरा करने और विभिन्न कल्याणकारी कार्यक्रमों में तेजी लाने का निर्देश दिया है।

पीएम मोदी के नेतृत्व में पूर्वोत्तर क्षेत्र लग रहे विकास पंख और कृषि निर्यात के मामले हब बनने ओर अग्रसर है…

पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास को लगे पंख, कृषि निर्यात हब बनेगा

पूर्वोत्तर क्षेत्र भौगोलिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह चीन तथा भूटान, म्यांमार, नेपाल और बांग्लादेश के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमाएं साझा करता है जो इसे पडो़सी देशों एवं साथ में विदेशी गंतव्य स्थानों को कृषि ऊपज के निर्यात के लिए संभावित हब बनाता है। मोदी सरकार के प्रयासों के बाद देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र से कृषि उत्पादों के निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। पूर्वोत्‍तर क्षेत्र ने पिछले छह वर्ष के दौरान कृषि उत्‍पादों के निर्यात में 85 प्रतिशत की बढोत्‍तरी दर्ज की है। पूर्वोत्तर क्षेत्र से कृषि उत्पाद निर्यात वित्त वर्ष 2016-17 के 2.52 मिलियन डॉलर से बढ़ कर, वित्त वर्ष 2021-22 के दौरान 17.2 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया है।

कृषि उत्‍पादों के निर्यात में 85 प्रतिशत की बढ़ोतरी

पूर्वोत्‍तर क्षेत्र ने पिछले छह वर्ष के दौरान कृषि उत्‍पादों के निर्यात में 85 प्रतिशत की बढोत्‍तरी दर्ज की है। वाणिज्‍य और उद्योग मंत्रालय ने बताया कि यह निर्यात वर्ष 2016-17 में 25 लाख 20 हजार डॉलर था जो कि वर्ष 2021-22 में बढ़कर एक करोड़ 70 लाख डॉलर पहुंच गया। यहां से बंगलादेश, भूटान, मध्‍य-पूर्व देशों, ब्रिटेन और यूरोप में कृषि उत्‍पादों का सर्वाधिक निर्यात किया गया। असम, नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, अरूणाचल प्रदेश, सिक्किम और मेघालय जैसे पूर्वोत्‍तर राज्‍यों में कृषि उत्‍पादों के निर्यात में उल्‍लेखनीय वृद्धि दर्ज हुई है।

कृषि निर्यात से जुड़े 136 क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित

पूर्वोत्तर क्षेत्र के राज्यों में उगाए जाने वाले बागवानी उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए, सरकार ने अब एक मजबूत रणनीति तैयार की है। कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) ने पिछले तीन वर्ष में पूर्वोत्‍तर क्षेत्र में निर्यात के बारे में जागरूकता से जुड़े 136 क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित किए हैं। सबसे अधिक 62 क्षमता निर्माण कार्यक्रमों का आयोजन पूर्वोत्तर क्षेत्र में वित्त वर्ष 2019-20 के दौरान किया गया जबकि वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान 21 और वित्त वर्ष 2021-22 के दौरान 53 ऐसे क्षमता निर्माण कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। क्षमता निर्माण पहलों के अतिरिक्त, एपीडा ने पिछले तीन वर्षों के दौरान पूर्वोत्तर क्षेत्र में 22 अंतरराष्ट्रीय क्रेता विक्रेता बैठकों तथा व्यापार मेलों के आयोजन को भी सुगम बनाया।

आयातकों को पूर्वोत्तर क्षेत्र का दौरा कराया

संभावित मार्केट लिंकेज प्रदान करने के लिए एपीडा ने किसानों द्वारा अनुपालन की जाने वाली गुणात्मक खेती पद्धतियों के बारे में प्राथमिक जानकारी प्रदान करने के लिए आयातकों के दौरों का आयोजन किया। ये आयातक मुख्य रूप से मध्य पूर्व, सुदूर पूर्वी देशों तथा यूरोपीय राष्ट्रों और ऑस्ट्रेलिया आदि देशों के थे। एपीडा ने असम तथा पूर्वोत्तर क्षेत्र के पड़ोसी राज्यों के जैविक कृषि उत्पादों की प्रचुर निर्यात क्षमता का दोहन करने के लिए 24 जून, 2022 को गुवाहाटी में प्राकृतिक, जैविक तथा भौगोलिक संकेतकों ( जीआई ) की निर्यात क्षमता पर सम्मेलन का आयोजन भी किया।

पूर्वोत्तर के उत्पादक देश के अन्य निर्यातकों से जुड़ेंगे

एपीडा का लक्ष्य निर्यातकों के लिए सीधे उत्पादक समूहों तथा प्रोसेसरों से उत्पादों को प्राप्त करने के लिए असम में एक प्लेटफॉर्म का सृजन करना है। यह प्लेटफॉर्म असम के उत्पादकों तथा प्रोसेसरों तथा देश के अन्य हिस्सों से निर्यातकों को लिंक करेगा जो असम सहित पूर्वोत्तर क्षेत्र के राज्यों में निर्यात पॉकेट के आधार को विस्तारित करेगा और राज्य के लोगों के बीच रोजगार के अवसरों में वृद्धि करेगा। एपीडा ने जोरहाट स्थित असम कृषि विश्वविद्यालय के साथ एक एमओयू पर हस्ताक्षर किया है जिससे कि फसल-पूर्व तथा फसल-उपरांत प्रबंधन पर विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों एवं अन्य अनुसंधान कार्यकलापों का आयोजन किया जा सके।

पीएम ने की थी चर्चा, अब असम लेमन पहुंच रही लंदन

पूर्वोत्तर क्षेत्र के जीआई उत्पादों जैसे कि भुत जोलोकिया, असम लेमन आदि ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ध्यान आकृष्ट किया था जिन्होंने अपने मन की बात कार्यक्रम के दौरान इसका उल्लेख किया। असम लेमन का अब नियमित रूप से लंदन तथा मध्य पूर्व देशों को निर्यात होता है और अभी तक 50 एमटी से अधिक असम लेमन का निर्यात किया जा चुका है। लीची तथा कद्दू की भी कई खेपें एपीडा द्वारा असम से विभिन्न देशों में निर्यात की जा चुकी हैं।

अंतर्राष्ट्रीय सीमा से जुड़े होने के कारण निर्यात की प्रचुर संभावना

एपीडा के अध्यक्ष डॉ. एम अंगमुथु ने कहा कि असम तथा पूर्वोत्तर क्षेत्र के अन्य राज्यों की लगभग सभी कृषि संबंधी तथा बागवानी फसलों को उगाने के लिए एक अनुकूल जलवायु स्थिति तथा मृदा प्रकार है। चूंकि पूर्वोत्तर क्षेत्र की लगभग सभी सीमाएं भूटान, बांग्ला देश, म्यांमार तथा चीन जैसे देशों के साथ मिली हुई हैं, इस क्षेत्र से निर्यात में वृद्धि होने की संभावनाएं हैं।

खाद्य प्रसंस्करण में कौशल विकास पर जोर

एपीडा ने क्षेत्र से 80 उभरते उद्यमियों तथा निर्यातकों का क्षमता निर्माण, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) और किसान उत्पादक कंपनियों (एफपीसी) तथा राज्य सरकारों के अधिकारियों, खाद्य प्रसंस्करण में कौशल विकास तथा प्रशिक्षण, बागवानी संबंधी ऊपज पर मूल्य संवर्धन आदि जैसी कई अन्य परियोजनाएं भी आरंभ की हैं। कोविड-19 अवधि के दौरान एपीडा ने अनानास, अदरक, नींबू, संतरा आदि की सोर्सिंग के संबंध में निर्यातकों तथा पूर्वोत्तर क्षेत्र के एफपीओ/एफपीसी के साथ विभिन्न देशों में स्थित भारतीय दूतावासों के सहयोग से वर्चुअल क्रेता विक्रेता बैठक के माध्यम से अपनी निर्यात योजनाओं को बढ़ावा देना जारी रखा। एपीडा ने महामारी के दौरान वर्चुअल व्यापार मेलों का भी आयोजन किया तथा अन्य देशों में निर्यात को सुगम बनाया। एपीडा ने असम कृषि विभाग के अधिकारियों के क्षमता निर्माण को सुगम बनाने की भी योजना बनाई है और चुने हुए अधिकारियों को बैचों में कर्नाटक, महाराष्ट्र तथा गुजरात भेजा जाएगा।

उत्पादों की ब्रांडिंग के लिए दी जा रही सहायता

एपीडा ने कीवी वाईन, प्रसंस्कृत खाद्य, जोहा चावल पुलाव, काले चावल की खीर आदि का नमूना जैसे पूर्वोत्तर क्षेत्र के उत्पादों की ब्रांडिंग तथा संवर्धन के लिए भी सहायता प्रदान करता है। क्षमता निर्माण के लिए एपीडा ने निर्माताओं, निर्यातकों तथा उद्यमियों के लिए कौशल विकास कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जिससे कि मूल्य संवर्धन तथा निर्यात के लिए स्थानीय ऊपज का उपयोग किया जा सके। मैसूर स्थित केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान (सीएफटीआरआई) और भारतीय खाद्य प्रसंस्करण प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईएफपीटी) के सहयोग से पूर्वोत्तर क्षेत्र के विभिन्न राज्यों में प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है।

नागालैंड की राजा मिर्च, त्रिपुरा का कटहल पहुंचा विदेश

एपीडा की पहल से त्रिपुरा के कटहल को पहली बार एक स्थानीय निर्यातक के माध्यम से लंदन तथा नागालैंड के राजा मिर्च को लंदन में निर्यात किया गया। इसके अतिरिक्त, असम के स्थानीय फल लेटेकु (बर्मा का अंगूर) को दुबई में निर्यात किया गया तथा असम के पान के पत्तों को नियमित रूप से लंदन में निर्यात किया जा रहा है। एपीडा ने टिकाऊ खाद्य मूल्य श्रृंखला विकास के माध्यम से पूर्वोत्तर क्षेत्र के कृषि तथा प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए मेघालय में री भोई तथा असम में डिब्रुगढ़ में पूर्वोत्तर क्षेत्र के प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों के निर्यात के लिए खाद्य गुणवत्ता तथा सुरक्षा प्रबंधन पर एक कार्यशाला के आयोजन में भी सहायता प्रदान की।

पोर्क प्रसंस्करण सुविधा केंद्र स्थापित

पोर्क तथा पोर्क उत्पादों की निर्यात क्षमता का दोहन करने के लिए, एपीडा ने नजीरा में एक आधुनिक पोर्क प्रसंस्करण सुविधा केंद्र स्थापित करने में असम सरकार की सहायता की जिसमें प्रति दिन 400 पशुओं की स्लौटिरिंग की क्षमता है। यह यूनिट तैयार हो चुकी है और इसका शीघ्र ही कमीशन होना निर्धारित है।

सिक्किम से जैविक पोर्क के निर्यात को बढ़ावा

एपीडा ने राज्य पशुपालन विभाग के सहयोग से भारत के जैविक राज्य सिक्किम से जैविक पोर्क के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए एक प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया। एपीडा ने गुवाहाटी के पास रानी में स्थित सूअरों पर एनआरसी की सहायता से ताजे और प्रसंस्कृत पोर्क के निर्यात के लिए दिशानिर्देश भी विकसित किए हैं। पूर्वोत्तर क्षेत्र में सिक्किम जैविक प्रमाणन एजेंसी रखने वाला पहला राज्य है जिसे एपीडा की सहायता से 2016 में स्थापित किया गया था।

 

दिल्ली में हुआ पूर्वोत्तर व्यापार शिखर सम्मेलन

मोदी सरकार ने पूर्वोत्तर क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देने के लिये वर्ष 2017 में दिल्ली में 12वां पूर्वोत्तर व्यापार शिखर सम्मेलन का आयोजन किया था। इसका उद्देश्य पूर्वोत्तर में सार्वजनिक तथा निजी भागीदारी से संरचना, संपर्कता, कौशल विकास, वित्तीय समावेशी आयोजन, पर्यटन, सत्कार एवं खाद्य प्रसंस्करण सम्बंधी सेवा क्षेत्र के विकास पर ध्यान देना है। पूर्वोत्तर के अनेक क्षेत्र दुर्गम हैं, जहां तुरंत पहुंचना सुलभ नहीं है, ऐसे क्षेत्रों के लिये केन्द्र सरकार ने पहली एयर डिस्पेंसरी शुरू की है, जिसके तहत हैलीकॉप्टर के माध्यम से चिकित्सा सेवा पहुंचाई जाती है।

रोजगार के लिए औद्योगिक विकास योजना

पीएम मोदी ने इस क्षेत्र में युवाओं के लिये रोजगार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पूर्वोत्तर औद्योगिक विकास योजना 2017 में शुरू की। इस योजना के तहत पूर्वोत्तर राज्यों में 3,000 करोड़ रुपये की लागत से सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम कद के उद्योगों को प्रोत्साहन दिया गया। इसी प्रकार मोदी सरकार ने पूर्वोत्तर पर्वतीय क्षेत्र विकास के लिये 90 करोड़ रुपये खर्च करने की घोषणा की थी। इस योजना से विशेषकर मणिपुर, त्रिपुरा और असम के पर्वतीय क्षेत्रों को लाभ मिला।

पीएम-डिवाइन के तहत पूर्वोत्तर के विकास पर 6,600 करोड़ रुपये खर्च होंगे

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अक्टूबर 2022 में एक नई योजना, पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए प्रधानमंत्री की विकास पहल (पीएम-डिवाइन) को वर्ष 2022-23 से 2025-26 तक 15वें वित्त आयोग के शेष चार वर्षों के लिए मंजूरी दे दी है। 100 प्रतिशत केन्द्रीय वित्त पोषण के साथ पीएम-डिवाइन नाम की नई योजना केन्द्रीय क्षेत्र की एक योजना है और इसे पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास मंत्रालय (डोनर) द्वारा लागू किया जाएगा। पीएम-डिवाइन योजना में 2022-23 से 2025-26 (15वें वित्त आयोग की अवधि के शेष वर्षों) तक चार साल की अवधि में 6,600 करोड़ रुपये का परिव्यय होगा। पीएम-डिवाइन परियोजनाओं को वर्ष 2025-26 तक पूरा करने का प्रयास किया जाएगा ताकि इस वर्ष के बाद कोई प्रतिबद्ध देनदारी न हो। इसका तात्पर्य मुख्य रूप से 2022-23 और 2023-24 में योजना के तहत प्रतिबंधों के लिए अधिकतम प्रयास करना है, जबकि 2024-25 और 2025-26 के दौरान खर्च जारी रहेगा, मुख्य ध्यान पीएम-डिवाइन परियोजनाओं को पूरा करने पर दिया जाएगा। पीएम-डिवाइन योजना बुनियादी ढांचे के निर्माण, उद्योगों, सामाजिक विकास परियोजनाओं को सहयोग देगी और युवाओं व महिलाओं के लिए आजीविका सृजित करेगी, जिससे रोजगार के अवसर उत्पन्न होंगे।

चीन से बढ़ते तनाव के बीच पूर्वोत्तर पर विशेष ध्यान

दरअसल चीन के बढ़ते आक्रामक रूख के बीच भारत के पूर्वोत्तर राज्यों पर केंद्र सरकार पर्याप्त ध्यान दे रही है। नीति आयोग के उपाध्यक्ष सुमन बेरी ने न्यूयार्क में एक सवाल के जवाब में कहा कि शेष भारत से पूर्वोत्तर को एकीकृत करने में कितना वक्त लगेगा, यह भौतिक दूरी और बुनियादी ढांचे से जुड़ा मसला है लेकिन तेजी से बुनियादी ढांचे का विकास किया जा रहा है। भारत बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में बिम्सटेक की दिशा में भी ध्यान दे रही है। यह भी एकीकरण की दृष्टि से बड़ा इलाका है इसलिए आने वाले दिनों में पूर्वोत्तर पहले की तुलना में बहुत अलग होगा। उल्लेखनीय है कि भारत की लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक चीन के साथ 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा है। पैंगोंग झील क्षेत्र में 5 मई, 2020 को हिंसक झड़प के बाद भारतीय और चीनी सेनाओं के बीच सीमा को लेकर तनाव पैदा हुआ है। इसके बाद 15 जून, 2020 को गलवान घाटी में झड़पों के बाद सेनाओं का जमावड़ा और बढ़ गया।

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