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जनता का विश्वास खो चुकी कांग्रेस का सदस्यता अभियान फेल

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साल 2019 के लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद कांग्रेस पार्टी की मुश्किलें खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं। पार्टी के हालात इतने खराब हैं कि एक तरफ जहां पार्टी में विरोध की खबरें आती रहती हैं, वहीं दूसरी तरफ अब कोई पार्टी से जुड़ना भी नहीं चाहता है। कांग्रेस के साथ ऐसा ही कुछ इन दिनों गोवा में हुआ है, जहां पार्टी का सदस्यता अभियान बुरी तरह फेल हो गया है।

2 लाख था लक्ष्य, सिर्फ 2600 लोगों ने ली सदस्यता

गोवा में कांग्रेस ने 15 जनवरी तक 2 लाख लोगों को सदस्य बनाने का लक्ष्य रखा था, जिसमें केवल 2600 लोगों ने ही पार्टी की सदस्यता ली। ये सब ऐसे समय में हो रहा है जब नागरिकता संशोधन कानून (CAA) मुद्दे पर चार नेताओं ने पार्टी छोड़ दी थी।

बढ़ाकर पेश किए सदस्यता के आंकड़े

कांग्रेस पार्टी गोवा में अपने सदस्यता अभियान को एक एप के जरिए चला रही है, ये शक्ति एप का अपग्रेडेड वर्जन है। इसके तहत वोटर कार्ड के साथ ही अन्य जानकारियां भी मांगी गईं हैं। शक्ति एप को कांग्रेस के डाटा एनालिटिक्स हेड प्रवीण चकवर्ती ने 2019 के आम चुनावों से पहले बनाया था और कांग्रेस समर्थकों और पार्टी को मिलने वाली सीटों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया था। कांग्रस ने सदस्यता के आंकड़े 6 से 7 हजार बताए हैं जो संख्या असल में 2600 के करीब है।

नागरिकता कानून पर पार्टी के नेताओं ने की बगावत

कांग्रेस पार्टी के चार नेताओं ने हाल में इससे पहले सीएए के मुद्दे पर कांग्रेस का विरोध करते हुए पार्टी छोड़ दी थी, जिनमें से तीन ने भाजपा की सदस्यता ले ली थी। इन नेताओं द्वारा कांग्रेस पार्टी पर नागरिकता कानून को लेकर जनता को भ्रमित करने का आरोप लगाया था। पिछले साल जुलाई महीने में कांग्रेस को तब जबरदस्त झटका लगा था जब पार्टी के 15 विधायकों में से 10 ने भाजपा ज्वाइन कर ली थी।

आइए नजर डालते हैं कैसे कांग्रेस पार्टी का जनाधार सिकुड़ता चला गया –  

कांग्रेस का सिकुड़ता जनाधार

कांग्रेस पार्टी का डाउनफॉल तो साल 1989 में ही शुरू हो गया था। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति के कारण 1984 में भले ही राजीव गांधी को 404 सीटें मिल गई हो, लेकिन 1989 आते-आते कांग्रेस पार्टी की हालत खराब हो गई थी। जिस कांग्रेस को 1984 में 404 सीटें मिली थी वही कांग्रेस 2014 और 2019 के आम चुनाव के बाद लोकसभा में नेता विपक्ष बनने लायक पार्टी भी नहीं बची। 2014 में जहां महज 44 सीटें मिली थीं वहीं 2019 में 52 सीटों पर संतोष करना पड़ा। आज पार्टी की हालत ये हो गई है कि पुराने नेता भी किनारा करने लगे हैं।

साल दर साल फिसड्डी होती कांग्रेस

1984 में 404 सीटें पाने वाली कांग्रेस को 1989 में सिर्फ 197 सीटें ले पाईं। इसके बाद साल 1991 के आम चुनाव में कांग्रेस के वोट बैंक थोड़े बढ़े जरूर लेकिन अगले आम चुनाव में ही कांग्रेस फिर बुरी तरह लड़खड़ा गई। 1996 में हुए आम चुनावों में कांग्रेस को 140 सीटों से संतोष करना पड़ा। 

1996 में मिली शिकस्त के बाद कांग्रेस सत्ता में तो आई लेकिन वोट बैंक और सीटों के मामले में वह मजबूत कभी नहीं हो पाई। 1998 के चुनाव में कांग्रेस को 141 सीटें मिलीं जो पिछले चुनाव की तुलना में महज एक सीट ज्यादा थी।

जनता ने कांग्रेस को नकारा

बाद के सालों में जनता का कांग्रेस से विश्वास उठता चला गया, जिसका परिणाम 1999 के चुनावों में देखने को मिला। कांग्रेस को इस चुनाव में वोट त्रासदी का सामना करना पड़ा। पार्टी को पहली बार सिर्फ 114 सीटें ही पाईं। इसके बाद तो कांग्रेस कभी पूर्ण बहुमत वाली सरकार बना नहीं पाई। 2004 और 2009 में सत्ता में आई जरूर लेकिन कई पार्टियों की बैसाखी पर टिकी रही। 2004 में 145 सीटें मिलीं तो 2009 में कांग्रेस 206 सीटें जीतने में सफल रही।

2004 से 2014 तक लगातार 10 सालों तक गठबंधन की सरकार चलाने के बाद कांग्रेस को 16वीं लोकसभा चुनाव में भाजपा खासकर नरेंद्र मोदी के हाथ वो करारी शिकस्त खानी पड़ी, कि अब तो उसकी अस्मिता पर सवाल उठने लगा है। इसके बाद जहां भाजपा का विस्तार होते-होते करीब 20 राज्यों सरकारें बन गईं वहीं कांग्रेस सिर्फ 5 राज्यों तक सिमट कर रह गई है।

1 COMMENT

  1. Congress has done anti India policies.alongwith Muslim appeasement policies therefore the steps which Modi govt.has taken in the favour of Country,Congress could not take due to above mentioned policies.This is the reason of Congress fall out due to selfishness as defeat from election for fearness loosing Muslim vote bank.Congress kept falling down as yet and will again fall down as still following such a way.

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