पश्चिम बंगाल में जिस बजट से ममता बनर्जी चुनावी बिगुल फूंकना चाहती थी, वही उनकी सरकार की कमजोरी साबित हो गया है। लोकलुभावन घोषणाओं की उम्मीद में बैठी ना सिर्फ जनता को कुछ नहीं मिला, बल्कि तृणमूल कांग्रेस नेताओं के भीतर भी हताशा फैल गई है। उनको भी उम्मीद थी कि इस सरकार का आखिरी बजट सत्ता का उत्सव बन सकता है, लेकिन यह तो संकट का दस्तावेज ही बन गया। कर्ज में डूबी राज्य सरकार में ना रेवड़ियां बंटी और ना ही किसी को राहत मिली। बल्कि आर्थिक बदहाली और प्रशासनिक विफलता खुलकर उजागर हो गई। आज बंगाल में तस्वीर साफ है कि ममता की तुष्टिकरण की राजनीति के बावजूद विधानसभा चुनाव में मुस्लिम मतों का बंटवारा तय हो चुका है। प्रदेश की आर्थिक बदहाली, प्रशासनिक अराजकता और राजनीतिक अहंकार ने ममता सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग, कर्मचारी और अब बजट हर मोर्चे पर तृणमूल सरकार बैकफुट पर है। वहीं भाजपा सबसे मजबूत विकल्प के रूप में उभरकर सामने आ रही है। उसने लोगों के मन में विश्वास जगाया है कि वह डबल इंजन के साथ राज्य का तेज रफ्तार से चौतरफा विकास करेगी। यदि यही हाल रहा तो आने वाले विधानसभा चुनाव ममता बनर्जी के लिए सत्ता बचाने की लड़ाई नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व की परीक्षा बन जाएंगे।
राज्य की खराब माली हालत ने मुख्यमंत्री Mamta के हाथ बांधे
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले ममता बनर्जी का आखिरी बजट तृणमूल कांग्रेस के लिए किसी झटके से कम नहीं रहा। जिस बजट से लोकलुभावन घोषणाओं और योजनाओं की बौछार की उम्मीद थी, वहीं जनता को निराशा हाथ लगी। राज्य की खराब माली हालत ने मुख्यमंत्री के हाथ बांध दिए। ना तो नई बड़ी योजनाएं आईं, ना ही राहत की कोई ठोस घोषणा। यह वही ममता हैं, जिनकी राजनीति मुफ्त योजनाओं और भावनात्मक अपीलों पर टिकी रही है। लेकिन इस बार ना “रेवड़ियां” बंटीं, न वोटरों को लुभाने वाला कोई बड़ा ऐलान हुआ। इससे साफ संकेत मिला कि तृणमूल सरकार अंदर से आर्थिक रूप से चरमरा चुकी है।
चुनाव से पहले अपने ही बजट में खुद उलझ गईं ममता
बजट पेश करते ही ममता बनर्जी खुद सवालों के घेरे में आ गईं। विपक्ष ही नहीं, तृणमूल के भीतर भी असंतोष उभरने लगा। पार्टी नेताओं को उम्मीद थी कि चुनावी साल में सरकार जनता की झोली भर देगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दरअसल राज्य सरकार चाहकर भी करोड़ों लोगों को लुभाने की स्थिति में नहीं है। कर्ज के बोझ तले दबी बंगाल सरकार अब लोकलुभावन राजनीति का खर्च उठाने में असमर्थ दिख रही है। बजट से ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट ने ममता सरकार को बड़ा झटका दिया। अदालत ने आदेश दिया कि राज्य के करीब 20 लाख कर्मचारियों को होली से पहले 25 प्रतिशत बकाया महंगाई भत्ता दिया जाए। 2008 से 2019 तक का बकाया डीए जारी करने को कहा गया, जिसकी राशि लगभग 10,400 करोड़ रुपये बैठती है। हैरानी की बात यह है कि इतने बड़े आदेश के बावजूद बजट में डीए का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं किया गया। इससे सरकार की नीयत और प्राथमिकताएं दोनों सवालों के घेरे में आ गई हैं।
बंगाल में लंबे समय से वोटर लिस्ट के साथ खेल साबित हुआ
ममता सरकार की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होतीं। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर साफ कहा कि बंगाल में कानून व्यवस्था चरमरा चुकी है। पुलिस एफआईआर दर्ज नहीं कर रही, अधिकारी डराए जा रहे हैं, धमकाए जा रहे हैं। हालात इतने बिगड़े कि राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को केंद्र से जेड प्लस सुरक्षा देनी पड़ी। इसके बाद आयोग ने कार्रवाई तेज की और करीब लाखों मतदाताओं को नोटिस भेजा है। इनमें हजारों मतदाता ऐसे हैं, जिनके नाम अंतिम मतदाता सूची से हटाने योग्य पाए गए। यह सीधा संकेत है कि बंगाल में लंबे समय से वोटर लिस्ट के साथ खेल होता रहा है।
मदरसों पर पैसों की बारिश से लोकतंत्र पर करारी चोट
ताजा रिपोर्टों में सामने आया कि बंगाल में एक व्यक्ति के नाम पर सैकड़ों वोट दर्ज हैं। चुनाव आयोग अब हर स्तर पर सख्ती कर रहा है ताकि मतदान प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी न हो। यह जैसे को तैसा वाली कार्रवाई तृणमूल के लिए बड़ा झटका है, क्योंकि जिस चुनावी गणित पर पार्टी भरोसा करती रही, वही अब बिखरता नजर आ रहा है। बजट के आंकड़े और भी चौंकाने वाले हैं। मदरसों और अल्पसंख्यक योजनाओं के लिए करीब 5,700 करोड़ रुपये, जबकि उद्योग के लिए मात्र 1,400 करोड़ और सूचना प्रौद्योगिकी के लिए करीब 200 करोड़। विज्ञान और शोध के लिए सिर्फ 82 करोड़। सवाल उठता है कि क्या बंगाल का भविष्य धार्मिक संस्थानों में है या आधुनिक उद्योग और तकनीक में? जिस राज्य ने कभी देश को वैज्ञानिक, उद्योगपति और विचारक दिए, वहां आज रिसर्च से ज्यादा मदरसों पर खर्च हो रहा है। इससे शीशे की तरह साफ है कि ममता बनर्जी विकास नहीं, वोट बैंक की राजनीति कर रही हैं।
केंद्र बनाम राज्य: तुलना में ममता सरकार बेनकाब
ममता सरकार ने अपनी तुष्टिकरण की राजनीति को चमकाने के लिए बाजार से करोड़ों रुपये का भारी-भरकम कर्ज लिया है। उसके पास मदरसों को देने के लिए तो करोड़ों रुपये हैं, लेकिन वो अपने कर्मचारियों को डीए देने की घोषणा नहीं कर पाई है। बल्कि कर्मचारियों को डीए ना देना पड़े, इसके लिए बार-बार कोर्ट के दरवाजे खटखटा रही हैं। अब सुप्रीम कोर्ट का फैसला ममता सरकार के खिलाफ आ गया है। इसके अलावा यह भी तथ्य है कि पश्चिम बंगाल में युवाओं और महिलाओं के नाम पर कथित रूप से जो योजनाएं चलाई जा रही हैं, वे असल में राज्य पर कर्ज का पहाड़ खड़ा कर रही हैं। यह भविष्य की पीढ़ियों पर बोझ डालने जैसा है। दिलचस्प तथ्य यह भी है कि केंद्र सरकार ने पूरे देश के अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के लिए लगभग 3,400 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं, जबकि अकेले बंगाल में मदरसों के लिए इससे कहीं ज्यादा राशि रखी गई है। यह असंतुलन साफ दिखाता है कि ममता सरकार की प्राथमिकता क्या है? मां, माटी और मानुस तो सिर्फ दिखावे भर का नारा है।
जनता का भाजपा पर बढ़ता भरोसा और तृणमूल की गिरती जमीन
इन तमाम घटनाओं का सीधा फायदा भाजपा को मिल रहा है। कर्मचारी डीए मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, चुनाव आयोग की कार्रवाई और बजट की विफलता ने तृणमूल की साख को गहरा नुकसान पहुंचाया है। भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी पहले ही सरकार को घेर रहे हैं और अब जनता के बीच यह संदेश जा रहा है कि ममता सरकार ना आर्थिक रूप से सक्षम है, ना प्रशासनिक रूप से भरोसेमंद। भाजपा सरकार के आने के बाद ही राज्य में “कानून व्यवस्था, पारदर्शिता और विकास” की त्रिवेणी बह सकती है। बंगाल की जनता देख रही है कि एक तरफ कर्मचारी अपने हक के लिए अदालतों के चक्कर काट रहे हैं, दूसरी तरफ सरकार वोट बैंक की राजनीति में करोड़ों लुटा रही है। यही वजह है कि तृणमूल के सपने चूर-चूर होते नजर आ रहे हैं। चुनाव से पहले यह आखिरी बजट पार्टी के लिए वरदान बनने की बजाय अभिशाप साबित हुआ है।
ममता सरकार की कार्यप्रणाली में लापरवाही ज्यादा
ममता बनर्जी की तृणमूल सरकार की कार्यप्रणाली पर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की लगातार प्रतिक्रिया यह दर्शाती है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद को सर्वोच्च अदालत से भी ऊपर समझ रही हैं। तृणमूल सरकार को अदालतें बार-बार यह याद दिला चुकी हैं कि संवैधानिक ढांचा किसी भी सरकार के राजनीतिक हितों से ऊपर है। चाहे वह शिक्षक भर्ती का मामला हो या कर्मचारियों के भत्तों का मामला हो। न्यायपालिका का यह दखल यह संकेत देता है कि कानूनी प्रक्रिया और शासन के बीच संतुलन को बनाए रखना कितना जरूरी है। यह संतुलन तब होता है जब निर्णय निष्पक्ष, पारदर्शी और संवैधानिक निर्देशों के अनुरूप हों।
ममता को कर्मचारियों और उनके परिवार की जरा भी चिंता नहीं
पश्चिम बंगाल सरकार की आलोचना का मूल भाव यही है कि उसे अपने राज्य के कर्मचारियों और उनके परिवारों की लेशमात्र भी चिंता नहीं है। अधिकारी, कर्मचारी और उनके परिवार लंबे समय से लंबित डीए के भुगतान का इंतजार कर रहे थे। उनके बार-बार आवेदनों पर भी ममता सरकार के कान में जूं तक नहीं रेंगी। तब जाकर अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ा। यह केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि यह संकेत है कि शासन में निर्णय लेने की प्रक्रिया में प्राथमिकता गलत दिशा में है। राजनीति व्यक्तिगत रणनीतियों की बजाय जनहित की आवश्यकता के लिए होनी चाहिए, लेकिन ममता राज में उल्टा ही हो रहा है। जब कार्यपालिका अपने दायित्वों का पालन नहीं करती, तब न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ा तो यह लोकतंत्र की विफलता नहीं, बल्कि उसकी मजबूती है। पश्चिम बंगाल में जिस तरह से कई सरकारी फैसलों को अदालतों से झटका मिला है, वह यह दर्शाता है कि शासन-प्रणाली में संवैधानिक मर्यादा की गंभीर कमी है।
लोकतांत्रिक जवाबदेही और बीते फैसलों का एक पैटर्न
पिछले कुछ वर्षों में अदालतों ने कई बार राज्य सरकार के निर्णयों पर आपत्ति जताई है। शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं के कारण नियुक्तियों को अवैध घोषित करना, कर्मचारियों के बकाया भत्तों को तुरंत प्रभाव से वितरण का आदेश देना, और कई अन्य मामलों में सरकारी तर्कों को अस्वीकार कर देना। यह सिर्फ अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि एक पैटर्न बनाती हैं—एक ऐसा खतरनाक पैटर्न जिसमें शासन की प्राथमिकताएं संवैधानिक निर्देशों और नागरिक अपेक्षाओं से कट रही हैं। लोकतंत्र में सरकार को जवाबदेह होना चाहिए। न सिर्फ जनता के प्रति, बल्कि कानून के प्रति भी। जब न्यायपालिका बार-बार किसी सरकार के निर्णयों को चुनौती देती है, तो यह संकेत है कि निर्णयों के पीछे की प्रक्रिया और उसके तर्क पर्याप्त नहीं रहे। यह सिर्फ अदालतों का मामला नहीं है। यह शासन की संगठनात्मक क्षमता, नीति-निर्माण की गुणवत्ता और नागरिक अपेक्षाओं की पूर्ति का मामला भी है।

राजनीति से ऊपर न्यायपालिका, एक आदेश से ही बड़ा संदेश
भाजपा नेता शुभेंदु चौधरी की पहल को जब कर्मचारी खुशखबरी के रूप में देखते हैं, तो वह सिर्फ विरोध-राजनीति नहीं है, बल्कि यह एक लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया है। न्यायपालिका यदि फटकार लगाती है और सरकार को आदेश देती है, तो यह संकेत है कि शासन के निर्णयों में जनता का भरोसा क्षीण हो रहा है। राजनीति में विरोध-प्रतिक्रियाएं स्वाभाविक हैं, पर जब न्यायपालिका तक मामला पहुंचता है, तो यह शासन की जवाबदेही की परीक्षा बन जाता है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश केवल एक वित्तीय भुगतान का निर्देश नहीं है। यह संदेश है कि किसी भी सरकार को अपने संवैधानिक दायित्वों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। कर्मचारियों की आशाएं, उनके परिवारों की अपेक्षाएं और उनकी रोजमर्रा की जि़ंदगी से जुड़ी जरूरी आवश्यकताए केवल राजनैतिक घोषणाओं तक सीमित नहीं रह सकतीं। यह आदेश इस बात का प्रमाण है कि जब शासन पीछे हटता है, तो न्यायपालिका कैसे आगे आती है।
20 लाख कर्मचारियों को 25 प्रतिशत डीए देने के आदेश
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार को बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा फैसला दिया है, जो ममता सरकार के खिलाफ और बंगाल के लोगों के हक में है। पश्चिम बंगाल के करीब 20 लाख लोगों को मिली सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। डीए से जुड़े केस में सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व फैसले को बरकरार रखा है। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार के कर्मचारियों को बकाया महंगाई भत्ता (डीए) का भुगतान करना होगा। आदेश के मुताबिक, राज्य सरकार को होली के आसपास तक बकाया डीए का 25 प्रतिशत भुगतान करना होगा और शेष 75 प्रतिशत डीए को भी जल्द ही किस्तों में देना होगा। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल ने अपने फैसले में कहा कि महंगाई भत्ता (डीए) परिवर्तनशील है। डीए का भुगतान एआईसीपीआई के अनुसार होना चाहिए। कर्मचारियों की डीए की मांग कानूनी रूप से वैध है। इसलिए, डीए में देरी नहीं होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि डीए का भुगतान अविलंब करके लाखों परिवारों को राहत दी जानी चाहिए।









