देश की राजधानी की शैक्षणिक संस्था जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) एक बार फिर सुर्खियों में है। दिलचस्प बात यह है कि जेएनयू के सुर्खियों में आने कारण ना कोई अकादमिक उपलब्धि है, ना शोध का नया प्रतिमान। वही पुरानी लेफ्ट लिबरल सोच, वही जानबूझकर देशविरोधी कृत्य, वही उग्र नारेबाजी, वही टुकड़े-टुकड़े गैंग और वही राजनीतिक ध्रुवीकरण। यानी पुरानी बोतल में नई शराब परोसकर एक बार फिर माहौल बिगाड़ने की कोशिश हुई। यह सुनियोजित साजिश भी दिल्ली दंगों के मास्टरमाइंड शरजील इमाम और उमर खालिद के पैरवी के लिए है। यह वाकई घोर निंदनीय है कि इनकी जमानत याचिकाओं पर न्यायिक प्रक्रिया के तहत आए फैसलों के बाद जेएनयू छात्रसंघ से जुड़े कुछ पदाधिकारियों द्वारा प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री शाह के खिलाफ नारे (मोदी-शाह तेरी कब्र खुदेगी) लगाए गए। हालांकि इस परिसर में इनके लिए यह नया या पहली बार नहीं है। लेकिन इन घोर आपत्तिजनक और भड़काऊ नारों ने एक बार फिर यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या देश के विश्वविद्यालयों में वैचारिक असहमति अब संवैधानिक मर्यादाओं को लांघ चुकी है?

शरजील और उमर को लेकर जेएनयू से फिर लगे नारे
दिल्ली में 2020 के दंगों के आरोपियों उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका सुप्रीम कोर्ट से खारिज हो गई। क्योंकि उनके खिलाफ जांच एजेंसी के पास कई पुख्ता सुबूत थे, जिनके आधार पर कोर्ट ने उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया। दिल्ली के दंगे और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बीच जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का वामी गैंग कूद पड़ा। दंगाइयों की जमानत खारिज होने के बाद विश्वविद्यालय कैंपस में तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया देखने को मिली। दरअसल, सोमवार देर रात जेएनयू के साबरमती हॉस्टल के सामने वामपंथी छात्र संगठनों से जुड़े छात्रों और छात्रसंघ पदाधिकारियों ने न केवल इन दोनों आरोपियों के समर्थन में नारे लगाए, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के खिलाफ भी भड़काऊ व आपत्तिजनक नारेबाजी की। शिक्षा के केंद्र में जहां मर्यादित आचरण की शिक्षा दी जाती है, वहीं सुनियोजित भड़काऊ नारे शैक्षणिक गरिमा और नैतिकता को तार-तार करते नजर आए।

जेएनयू में वर्षों से वामपंथी-लिबरल राजनीति को मिला प्रश्रय
घटना के बाद जेएनयू प्रशासन ने इसे सिर्फ छात्र–राजनीति का सामान्य विरोध ना मानते हुए कानून व्यवस्था और संस्थान की प्रतिष्ठा से जुड़ा मामला माना है। इसलिए प्रशासन की शिकायत पर वसंतकुंज (उत्तर) थाने में संबंधित छात्रों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू की गई है। इसके अलावा विश्वविद्यालय प्रबंधन दोषी पाए जाने वाले छात्रों पर निलंबन, निष्कासन या परिसर में स्थायी प्रतिबंध जैसी कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने पर विचार कर रहा है। यह इस व्यापक विमर्श को जन्म देता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में व्यक्त राजनीतिक असहमति कहां तक स्वीकार्य है। और कब वह भड़काऊ व अराजक नारों में बदलकर शैक्षणिक संस्थानों के लोकतांत्रिक चरित्र तथा संवैधानिक सीमाओं को लांघने लगती है दरअसल, जेएनयू में ऐसी कोई पहली घटना नहीं है। जेएनयू वर्षों से वामपंथी-लिबरल राजनीति को प्रश्रय देता रहा है। लेकिन हालिया घटनाक्रम ने यह बहस और तीखी कर दी है कि क्या कुछ छात्र संगठन और उनके वैचारिक संरक्षक लोकतंत्र की आड़ में ऐसी भाषा और प्रतीकों का प्रयोग कर रहे हैं, जो देश की एकता, संस्थाओं और संवैधानिक व्यवस्था को चुनौती देने का प्रयास करती है।

दिल्ली दंगों के आरोपियों के लिए सड़कों की राजनीति
इस वास्तविकता यह है कि शरजील इमाम और उमर खालिद जैसे नाम केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि देशविरोधी विचारधाराओं के प्रतीक हैं। इनसे जुड़े मामलों पर अदालतों में सुनवाई चल रही है और जमानत पर फैसला न्यायपालिका का विशेषाधिकार है। लेकिन अदालत के निर्णय को स्वीकार करने के बजाय उसे “राजनीतिक प्रतिशोध” बताकर सड़कों पर नारेबाज़ी करना, वह भी देश के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के खिलाफ आपत्तिजनक शब्दों के साथ, तो सवाल उठना लाजिमी है कि असहमति की सीमा कहां खत्म होती है और अराजकता कहां शुरू होती है। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार पवित्र है, लेकिन वही लोकतंत्र यह भी अपेक्षा करता है कि विरोध अनुशासित, संवैधानिक भाषा और मर्यादा में हो। जब छात्रसंघ पदाधिकारी जो स्वयं को लोकतांत्रिक मूल्यों का वाहक बताते हैं, सार्वजनिक मंचों पर भड़काऊ नारे लगाते हैं, तो यह न केवल संस्थान की गरिमा पर प्रश्नचिह्न लगाता है, बल्कि उस वैचारिक परिपक्वता पर भी, जिसकी अपेक्षा एक केंद्रीय विश्वविद्यालय से की जाती है।

‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ ने जेएनयू की छवि नैगेटिव बनाई
बता दें कि “टुकड़े-टुकड़े गैंग” भी इसी विश्वविद्यालय से निकली खतरनाक सोच का जीवंत प्रमाण है। “टुकड़े-टुकड़े गैंग” यह शब्द कोई सरकारी पदवी नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है। आलोचकों का साफ कहना है कि यह उन प्रवृत्तियों का प्रतीक है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में देशविरोधी भावनाओं को और भड़काने का काम करती हैं। जेएनयू के संदर्भ में यह बहस इसलिए भी नई नहीं है, क्योंकि इससे पहले भी विश्वविद्यालय में ऐसे कार्यक्रम, पोस्टर और नारे सामने आ चुके हैं, जिन पर देश की अखंडता, सेना, न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अपमानजनक रुख अपनाने के आरोप लगे हैं। हर बार यही तर्क दिया गया कि यह “अकादमिक स्वतंत्रता” है। लेकिन सवाल यह है कि क्या अकादमिक स्वतंत्रता का अर्थ संवैधानिक सीमाओं को लांघना है?

लेफ्ट-लिबरल छात्र राजनीति: असहमति या अराजकता?
वामपंथी-लिबरल छात्र राजनीति अक्सर चयनात्मक नैतिकता अपनाती है। जहां एक तरफ राज्य की हर कार्रवाई पर सवाल उठाया जाता है, वहीं हिंसा, दंगे या अराजकता से जुड़े मामलों में आरोपित चेहरों को “विचार बंदी” बताकर महिमामंडित किया जाता है। दिल्ली दंगों के संदर्भ में भी यही तस्वीर सामने आई है। जांच एजेंसियों की कार्रवाई को “राजनीतिक बदला” कहा गया, जबकि हिंसा में मारे गए लोगों, जले घरों और उजड़े कारोबारियों पर कोई संवेदनशीलता नहीं दिखाई गई। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि कुछ समूहों के लिए मानवाधिकार और लोकतंत्र केवल नारे हैं, असल में वह देश, नैतिकता और संविधान विरोधी व्यवहार को ही अमल में लाते हैं।

‘जंगलराज’ वालों के समर्थक राहुल गांधी ने भी मिलाए सुर
इस पूरे मामले में कांग्रेस नेता और सांसद राहुल गांधी की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। राहुल गांधी ने भी जेएनयू छात्र संघ के सुरों से सुर मिला लिए हैं। बिहार में वर्षों तक “जंगलराज” के आरोपों से घिरे राजनीतिक दलों के साथ मंच साझा करने वाले राहुल गांधी अब प्रधानमंत्री और गृह मंत्री पर “जंगलराज” का आरोप लगाते दिखाई देते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह राजनीतिक सुविधा का उदाहरण है। कांग्रेस के लिए यह बहुत मामूली बात है कि सत्ता में रहते हुए या सत्ता के समीकरणों के अनुसार सिद्धांत बदल जाते हैं। इसलिए सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कांग्रेस को लोकतंत्र और कानून-व्यवस्था केवल विपक्ष में रहने पर ही याद आते हैं? दरअसल, जेएनयू पिछले एक दशक में बार-बार ऐसे विवादों का केंद्र रहा, जहां अकादमिक बहस की सीमा लांघकर राष्ट्र, शासन और संवैधानिक संस्थाओं पर सीधे प्रहार किए गए। लेफ्ट-लिबरल छात्र राजनीति ने कैंपस को वैचारिक मोर्चे में बदल दिया। कांग्रेस और इंडी गठबंधन हर बार इनके पक्ष में खड़ा नजर आया।
मोदी-शाह ने देश में जंगलराज लागू कर रखा है pic.twitter.com/B739qeBP7A
— Congress (@INCIndia) January 7, 2026
नैरेटिव निर्माण की प्रयोगशाला बनता विश्वविद्यालय परिसर
जेएनयू पर लगा यह आरोप कि यहां संगठित ढंग से सरकार-विरोधी नैरेटिव गढ़े जाते हैं, कई बार सही साबित हो चुका है। कभी किसान आंदोलन, कभी सीएए, कभी सेना की कार्रवाई, तो कभी न्यायिक फैसले, हर राष्ट्रीय मुद्दे पर जेएनयू के लेफ्ट लिबरल गैंग की एक तयशुदा वैचारिक लाइन दिखाई देती है। इसलिए यह साफ दिखाई देता है कि सोमवार को स्वतःस्फूर्त छात्र आंदोलन नहीं, बल्कि सुनियोजित वैचारिक अभियान चलाया गया, जिसका उद्देश्य जनमत को प्रभावित करना है। यह भी एक तथ्य है कि जेएनयू से निकले कई पूर्व छात्र आज मीडिया, राजनीति और अकादमिक जगत में प्रभावशाली पदों पर हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय के भीतर चल रही वैचारिक राजनीति का असर केवल परिसर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि राष्ट्रीय विमर्श तक पहुंचता है। यह भी गौर करने योग्य है कि वही छात्र संगठन जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देते हैं, अक्सर परिसर में वैकल्पिक विचारों को जगह देने के आरोपों से घिरे रहते हैं। कई बार राष्ट्रवादी विचार रखने वाले छात्रों के साथ दुर्व्यवहार और बहिष्कार के आरोप भी सामने आए हैं।

आइए, पिछले कुछ वर्षों में जेएनयू से जुड़ी विवादित लेफ्ट लिबरल गैंग की करतूतों और देशविरोधी घटनाओं पर एक नजर डालते हैं…
- अक्टूबर 2025 – विवादित ग्रैफिटी और पोस्टर विवाद : छात्रसंघ चुनाव से ठीक पहले जेएनयू परिसर की दीवारों पर विवादित धार्मिक-राजनीतिक ग्रैफिटी और पोस्टर दिखाई दिए। कुछ लोगों ने इसे जानबूझकर सांप्रदायिक और वैचारिक तनाव फैलाने की कोशिश बताया। मामला बढ़ने पर प्रशासन को हस्तक्षेप कर पोस्टर हटवाने पड़े। इस घटना ने यह बहस तेज कर दी कि चुनावी राजनीति के दौरान कैंपस को वैचारिक प्रयोगशाला क्यों बनाया जाता है?
- नवंबर 2025 – फेसियल रिकग्निशन सिस्टम पर टकराव : नवंबर 2025 में जेएनयू प्रशासन द्वारा सेंट्रल लाइब्रेरी में फेसियल रिकग्निशन एक्सेस सिस्टम लगाए जाने पर छात्रसंघ ने तीखा विरोध किया। प्रदर्शनकारियों ने इसे “निगरानी” की मानसिकता करार दिया तो दूसरी ओर प्रशासन ने इसे सुरक्षा और संसाधनों की रक्षा के लिए जरूरी बताया था।
- जुलाई 2025 – निर्वाचित मुख्यमंत्री के दौरे का उग्र विरोध : महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फणनवीस के जेएनयू दौरे के दौरान इन्हीं छात्र संगठनों ने काले कपड़े पहनकर, नारेबाजी और प्रदर्शन के जरिए विरोध किया। हालात इतने बिगड़े कि पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। राजनीतिक जानकारों ने इसे लोकतांत्रिक पदों और संवैधानिक मर्यादाओं के प्रति असहिष्णुता बताया। इस घटना ने जेएनयू की उस छवि को मजबूत किया, जहां सत्ता में बैठे किसी भी व्यक्ति का संगठित विरोध लगभग परंपरा बन चुका है।

- 2023 – भारत-विरोधी स्लोगन और दीवार लेखन : इस पूरे साल के दौरान कई बार जेएनयू परिसर की दीवारों पर लेफ्ट लिबरल गैंग द्वारा भारत-विरोधी या विभाजनकारी स्लोगन लिखे जाने की घटनाएं सामने आईं। एबीवीपी और अन्य संगठनों ने इसे सुनियोजित वैचारिक साजिश बताया। प्रशासन ने स्लोगन हटवाए और जांच के आदेश दिए।
- जनवरी 2020 – जेएनयू हिंसा और उसके बाद का उग्र विरोध : जेएनयू परिसर में 5 जनवरी 2020 को हुई हिंसा ने पूरे देश को झकझोर दिया। छात्रों और शिक्षकों पर हमले हुए और कैंपस लंबे समय तक तनाव में रहा। इसके बाद केंद्र सरकार और गृहमंत्री के खिलाफ लगातार विरोध प्रदर्शन और नारेबाजी हुई। कई जानकारों ने इसे दिल्ली दंगों से पहले बने उग्र राजनीतिक माहौल से जोड़कर देखा।
- फरवरी 2016 – अफजल गुरु कार्यक्रम और देशद्रोह विवाद : आतंकवादी अफजल गुरु की फांसी की बरसी पर आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान तो लेफ्ट लिबरल गैंग ने विरोध की इंतेहा कर दी। इस कार्यक्रम में भारत-विरोधी नारे लगाए। इस घटना के बाद देशद्रोह के आरोप लगे और जेएनयू पहली बार राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया। “टुकड़े-टुकड़े गैंग” जैसे शब्द इसी दौर में चर्चा में आए। यह घटना जेएनयू के वैचारिक चरित्र को लेकर स्थायी बहस की शुरुआत बनी।










