Home नरेंद्र मोदी विशेष शर्मनाक: जीएसटी पर विपक्ष ने आखिर कर ही दी राजनीति !

शर्मनाक: जीएसटी पर विपक्ष ने आखिर कर ही दी राजनीति !

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जीएसटी पर विपक्ष की ज्यादातर पार्टियों ने अचानक गिरगिट की तरह रंग बदलना शुरू कर दिया है। रंग बदलने की शुरुआत पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने की, जिसके बाद लेफ्ट पार्टियों ने औरफिर कांग्रेस ने खुद को जीएसटी लॉन्च पर संसद में होने वाले समारोह से अलग कर लिया। यानी जीएसटी पर अब तक जिम्मेदारीपूर्वक व्यवहार करने वाली विपक्षी पार्टियां अचानक अपने नये रुख के साथ तब सामने आ गईं, जब इसे लॉन्च किया जाना है। जिस तरह से विपक्ष के बायकॉट की तस्वीर सामने आई है उससे यही लगता है कि विपक्ष को मोदी सरकार की ऐतिहासिक सफलता नहीं पच पा रही है।

जीएसटी पर संसद में ऐतिहासिक कार्यक्रम

केंद्र की मौजूदा सरकार 30 जून की मध्यरात्रि को जीएसटी लागू करने को लेकर संसद में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित कर रही है। बहुत कुछ उसी तर्ज पर जैसे 14-15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि में देश की आजादी को लेकर विशेष सत्र बैठा था। जीएसटी आजादी के बाद देश में सबसे बड़ा कर सुधार है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अमलीजामा पहनने को तैयार है। ब्रिटिश राज से मुक्ति के 70 साल बाद देश को मिल रही इस आर्थिक आजादी के खास मौके को देखते हुए विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया है। जीएसटी को लेकर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संबोधन होगा।

जीएसटी लागू होने के वक्त कांग्रेस ने कर दी राजनीति

जीएसटी पर होने वाले विशेष कार्यक्रम में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को बतौर विशेष अतिथि आमंत्रित किया गया, लेकिन कांग्रेस ने इस कार्यक्रम से खुद को अलग रखने का फैसला लिया है। कांग्रेस का कहना है कि मोदी सरकार जीएसटी लागू करने में जल्दबाजी कर रही है और सभी पहलुओं का ध्यान नहीं रखा गया है। साफ है कांग्रेस के रुख में अचानक आये इस परिवर्तन के पीछे मोदी सरकार की उपलब्धियों से ईर्ष्या सबसे असली वजह है। उसे ये बर्दाश्त नहीं हो पा रहा कि जो वो अपने 60 साल के शासन में नहीं कर पाई उसे मोदी सरकार ने तीन साल में पूरा कर दिखाया।  

ममता बनर्जी ने बनाया बहाना

इससे पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने जीएसटी लागू करने में जल्दबाजी का आरोप लगाकर खुद को इस मौके से अलग कर लिया था।  ममता का कहना है कि जीएसटी लागू करने के लिए जरूरी आधारभूत ढांचा अब तक तैयार नहीं किया जा सका है इसलिए इसे अधिसूचित करने के लिए कम से कम छह महीने का समय और चाहिए। लेकिन वो ये भूल गईं कि किस तरह से जीएसटी काउंसिल ने टैक्स स्लैब को तय करने और इसे आम लोगों के अनुकूल रखने में पसीना बहाया है। जीएसटी पर संसद के विशेष कार्यक्रम के बायकॉट करने को लेकर वो कोई ठोस दलील नहीं दे पा रहीं, इससे साफ है कि उनके बहिष्कार का राजनीति से ज्यादा और कोई मतलब नहीं।

    

बहिष्कार की राजनीति में लेफ्ट भी

सीपीएम नेता सीताराम येचुरी का कहना है कि सरकार को जीएसटी को लेकर इतनी जल्दी क्यों है। वो जीएसटी पर कुछ व्यापारियों की हड़ताल का हवाला देते हैं, लेकिन येचुरी ये क्यों नहीं समझ पा रहे कि जब सुधार की पूरी रूपरेखा तय की जा चुकी है, तो फिर उसे टाले जाने का औचित्य क्या है? किसी भी बड़े फैसले को लोगू करने को लेकर सवालों का होना स्वाभाविक है, लेकिन जब तक उस पर अमल नहीं हो, वास्तविक जमीन पर उसका सही-सही आकलन भी नहीं किया जा सकता।

विरोधी कर रहे अपना ही नुकसान               

विपक्ष जान ले कि ये तो पब्लिक है सब जानती है। मोदी सरकार ने किस तरह से विपक्षी दलों को साथ लेते हुए जीएसटी को एक हकीकत बनाया ये उसके सामने है। विपक्षी दल एक बड़े इतिहास का हिस्सा बनने से चूक रहे। उनके इस कृत्य के लिए देश की जनता उन्हें कभी माफ नहीं करेगी।

जीएसटी पर सबको साथ लेकर चली मोदी सरकार

2014 में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसके लिए नए प्रारूप में एक संविधान संशोधन विधेयक पेश किया। अगले साल लोकसभा ने इसे पारित कर दिया। राज्यसभा में कांग्रेस ने इसे यह कहते हुए रोक दिया कि उसके सुझावों को भी इस विधेयक में शामिल किया जाना चाहिए। 2016-17 के दौरान केंद्र ने विभिन्न राज्यों को जीएसटी के लिए मना लिया। देखते ही देखते मोदी सरकार की कोशिशों से इसके प्रारूप और टैक्स दर भी लगभग सहमति तैयार हो गई। राज्यों ने भी संबंधित विधेयक को हरी झंडी दिखा दी।

पीएम मोदी जता चुके हैं सभी राजनीतिक दलों का आभार

विपक्षी खेमे से एक आवाज ये भी आ रही है कि जीएसटी का पूरा श्रेय मोदी सरकार लेना चाह रही है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद जीएसटी के लिए सभी राजनीतिक दलों का आभार जता चुके हैं। उन्होंने कहा कि जिस तरीके से जीएसटी पास कराने के लिए सभी दल एक साथ सामने आए उससे भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता एक बार फिर साबित हुई। प्रधानमंत्री मोदी ये भी कह चुके हैं कि ना उनको ना उनकी सरकार को बल्कि जीएसटी का क्रेडिट सभी देशवासियों को जाता है।

शर्मनाक है विपक्ष की ये राजनीति

दरअसल, विपक्ष जिस तरह की हवा बना रहा है, उससे यही महसूस हो रहा है कि इस ऐतिहासिक अवसर में भी वो राजनीति का रंग घोलने की फिराक में है। देश भर में एकसमान कर प्रणाली लागू करने के लिए जुटने वाली संसद से गैरहाजिर रहकर विपक्षी दल अगर अपनी एकता को प्रदर्शित करने की कोशिश में लगे हैं तो ये हर तरह से शर्मनाक है। हालांकि विपक्ष के लिए एकता दिखाने की ये कोशिश भी एक छलावा से ज्यादा कुछ नहीं, क्योंकि हर बड़े मौकों पर इस कथित एकता का असली रंग भी देश देखता रहा है।

विपक्ष के पास अब भी मौका है

संसद के सेंट्रल हॉल में आयोजित होने जा रहे जीएसटी से जुड़े समारोह के लिए संसदीय कार्यमंत्री अनंत कुमार की तरफ से भेजे गए निमंत्रण पत्र में कहा गया है: ‘’राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की गरिमामय उपस्थिति में भारत के प्रधानमंत्री की ओर से जीएसटी के लॉन्च के अवसर पर उपस्थिति प्रार्थनीय है।’’ एक बड़े ऐतिहासिक अवसर से जुड़े इस निमंत्रण को ठुकराकर असल में विपक्ष एक ऐतिहासिक भूल करने जा रहा है। जीएसटी पास कराने में जिस तरह से तमाम पार्टियों ने राजनीति से ऊपर उठकर अपनी-अपनी भूमिका निभाई थी, इसे लागू किये जाने के वक्त भी उनसे यही उम्मीद की जा रही है। राजनीति के मौके बहुत मिलेंगे लेकिन एक मिसाल पेश करने से चूकने वाला पल फिर कभी लौटकर नहीं आएगा। क्या विपक्षी दल अपनी आखें खोलेंगे?     

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