पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों एक बार फिर उबाल पर है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का रुख और टीएमसी नेताओं को सड़क पर उतारना, दरअसल उस राजनीति का परिचित दृश्य है, जिसमें जांच को “राजनीतिक प्रतिशोध” बताकर असली सवालों से ध्यान भटकाने की कोशिश की जाती है। मनी लॉन्ड्रिंग, अवैध तस्करी और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में जब एजेंसियां सवाल पूछती हैं, तो जवाब देने के बजाय नेता आंदोलन का रास्ता अपनाने लग जाते हैं। बिहार में राजद और दिल्ली में आप नेताओं के ऐसे कई उदाहरण हैं। अब इसी लकीर पर टीएमसी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी चल निकली हैं। ईडी बनाम दीदी की यह लड़ाई दरअसल एजेंसी बनाम नेता की नहीं, बल्कि जवाबदेही बनाम दबाव की राजनीति की है। लोकतंत्र में जांच एजेंसियों पर सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन जांच से भागा नहीं जा सकता। पश्चिम बंगाल की जनता अब यह समझने लगी है कि सच्ची ताकत नारों, सड़कों पर शोर-शराबे में नहीं, बल्कि भाजपा के सुशासन में होती है। यदि टीएमसी सरकार इन सवालों का ठोस जवाब नहीं देती, तो आने वाले विधानसभा चुनावों में जनादेश अपना फैसला सुनाने से बिल्कुल नहीं हिचकेगा।
तृणमूल सरकार में चोरी और सीना जोरी की कहावत चरितार्थ
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी सरकार दरअसल, चोरी और सीना जोरी की कहावत ही चरितार्थ कर रही हैं। मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध तस्करी के आरोपों से बचने के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल से दिल्ली तक टीएमसी नेताओं को सड़क पर उतारा है, लेकिन इस दबाव के बावजूद जनता के सामने उनकी कलई खुल गई है, जिसका खामियाजा उन्हें आने वाले विधानसभा चुनाव में जरूर उठाना पड़ेगा। जनता-जनार्दन भ्रष्टाचारी नेताओं को अब किसी सूरत में बर्दाश्त नहीं करने वाली है। बिहार में पिछले साल ही में हुए चुनाव इसका ताजा उदाहरण है, जिसमें भाजपा-एनडीए को प्रचंड जीत मिली थी। पीएम मोदी ने कहा था कि गंगा बिहार से होकर बंगाल तक जाती है। इसी तर्ज पर ममता सरकार की काली करतूतों के चलते बिहार के बाद जनता-जनार्दन भाजपा को बंगाल में भी जीत का आशीर्वाद दे सकती है।
ईडी की कार्रवाई और ‘पीड़ित राजनीति’ का नया अध्याय
ईडी की जांच जिन मामलों से जुड़ी है, वे केवल कागजी आरोप नहीं, बल्कि वर्षों से चले आ रहे उस तंत्र की ओर इशारा करते हैं, जिसमें सत्ता, पैसे और प्रभाव का कथित गठजोड़ दिखाई देता है। टीएमसी नेतृत्व का यह कहना कि सब कुछ राजनीतिक साजिश है, तब खोखला लगता है जब बार-बार अलग-अलग मामलों में पार्टी से जुड़े नाम सामने आते हैं। यदि सरकार और पार्टी नेतृत्व स्वयं को निर्दोष मानते हैं, तो जांच का सामना करना चाहिए, न कि सड़कों पर दबाव की राजनीति कर लोकतांत्रिक संस्थाओं को डराने की कोशिश। पश्चिम बंगाल से लेकर दिल्ली तक टीएमसी नेताओं का प्रदर्शन यह दिखाता है कि पार्टी जांच एजेंसियों से ‘पीड़ित राजनीति’ के नैरेटिव से लड़ाई जीतना चाहती है। मगर सवाल यह है कि क्या प्रदर्शन से सच्चाई को छुपा सकता है? क्या नारे लगाने से दस्तावेज और सुबूत गायब हो जाएंगे ? लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन जब विरोध का उद्देश्य केवल जांच से बचना हो, तो जनता उसे समझने में देर नहीं लगाती। पश्चिम बंगाल की प्रबुद्ध और जागरूक जनता भावनात्मक अपील से नहीं, तथ्यों और जवाबदेही से संतुष्ट होती है।
आरोपों से भागना यानी जनता-जनार्दन को गुमराह करना
देश की राजनीति में बीते वर्षों में एक स्पष्ट बदलाव दिखा है। भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे नेताओं के प्रति जनता का धैर्य अब टूट रहा है। भ्रष्टाचार में डूबे नेता आरोपों से भागकर जनता को भले कितना ही गुमराह करने के प्रयास कर लें, लेकिन यह पब्लिक है, जो सब जानती है। बिहार में हालिया चुनाव परिणामों ने यह संकेत दिया कि विकास, सुशासन और साफ छवि को मतदाता प्राथमिकता दे रहे हैं। यह संदेश केवल बिहार तक सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल की जनता भी यह देख रही है कि सत्ता में रहते हुए कौन जवाबदेह है और कौन हर सवाल को साजिश बताकर टाल देता है। आने वाले विधानसभा चुनाव पश्चिम बंगाल के लिए केवल सत्ता परिवर्तन का सवाल नहीं होंगे, बल्कि राजनीतिक संस्कृति की दिशा तय करने का अवसर होंगे। जनता यह तय करेगी कि क्या वह आरोपों, आंदोलनों और टकराव की राजनीति को स्वीकार करेगी या पारदर्शिता, विकास और जवाबदेही को चुनेगी। इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ता ने खुद को जनता से ऊपर समझा, तब-तब जनता ने लोकतांत्रिक तरीके से उसे जवाब दिया है।
गंगा का प्रतीक और सुशासन बनाम सड़कों की राजनीति
प्रधानमंत्री मोदी का बिहार की जीत के बाद का यह कथन कि “गंगा बिहार से होकर बंगाल तक जाती है” केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि राजनीतिक संकेत भी है। जैसे बिहार में जनता ने भ्रष्टाचार और अराजकता की बरसों-बरस तक राजनीति करने वालों के जंगलराज को नकारा, वैसे ही बंगाल में भी बदलाव की बयार चलने की बात कही जा रही है। टीएमसी सरकार पर लगे आरोप, कानून-व्यवस्था को लेकर उठते सवाल और निवेश व उद्योग के मोर्चे पर पिछड़ता राज्य—ये सभी मुद्दे आने वाले विधानसभा चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। दरअसल, किसी भी सीएम से जनता की अपेक्षा होती है कि वह शासन, विकास और कानून के पालन की मिसाल पेश करे। लेकिन जब सत्ता का केंद्र खुद को हर जांच से ऊपर समझने लगे, तो लोकतांत्रिक संतुलन बिगड़ता है। सड़क पर उतरकर संस्थाओं पर दबाव बनाना सुशासन नहीं, बल्कि असहजता का संकेत है। यदि टीएमसी सरकार के पास अपने बचाव में ठोस तथ्य हैं, तो उन्हें अदालत और जांच एजेंसियों के सामने रखना चाहिए, न कि भीड़ जुटाकर सहानुभूति बटोरने की कोशिश करनी चाहिए।
दरअसल, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीति और तृणमूल सरकार एक बार फिर भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध कोयला तस्करी के भंवर में बुरी तरह से फंस गई है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा कोलकाता में पॉलिटिकल कंसलटेंट फर्म I-PAC के कार्यालय और उसके डायरेक्टर प्रतीक जैन के आवास पर छापेमारी की गई। ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी के आईटी सेल के प्रतीक जैन हेड भी हैं। न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, छापेमारी की यह कार्रवाई अवैध कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग, जाली दस्तावेज आदि के मामले में की जा रही है। इसने ममता बनर्जी सरकार की इमेज पर एक और गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। बता दें कि ममता सरकार इससे पहले भी शिक्षक भर्ती घोटाला, राशन घोटाला, पशु तस्करी, कोयला तस्करी, महिलाओं के शोषण, रेप केस और बढ़ते अपराधों के गंभीर आरोपों में फंस चुकी है। इस बार सीधे ममता बनर्जी की पार्टी और राजनीतिक कंसलटेंसी से जुड़ा मनी लॉन्ड्रिंग का गंभीर मामला सामने आया है।
पारदर्शिता की जगह अहंकार और जवाबदेही की जगह टकराव
आज पश्चिम बंगाल देश के सामने एक ऐसा उदाहरण बन रहा है, जो कि सत्ता के लंबे शासन में पारदर्शिता की जगह अहंकार और जवाबदेही की जगह टकराव से चल रहा है। प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई किसी व्यक्ति या दल के खिलाफ नहीं होती, बल्कि उन तथ्यों के आधार पर है, जो जांच में सामने आए हैं। ऐसे में यदि ममता बनर्जी सच में अपने आपको बेदाग मानती हैं, तो उन्हें जांच से डरने की नहीं, सहयोग करने की जरूरत है। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा अपराध जांच नहीं, सच से भागना होता है। इस समय ममता बनर्जी वही कर रही हैं। इससे साफ है कि उनके मन में किसी काले कारनामे का पर्दाफाश होने का डर समाया हुआ है।

ममता के राज में सत्ता, पैसे और सिस्टम का गठजोड़?
सबसे अहम तथ्य यह है कि प्रतीक जैन न केवल I-PAC के डायरेक्टर हैं, बल्कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) के आईटी सेल के प्रमुख भी बताए जाते हैं। यानी यह मामला केवल एक कंसलटेंसी फर्म तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि सत्ता के डिजिटल, रणनीतिक और चुनावी इको सिस्टम तंत्र तक पहुंचता दिखाई देता है। ममता बनर्जी अक्सर केंद्र सरकार पर “राजनीतिक बदले” का आरोप लगाती रही हैं, लेकिन सवाल यह है कि अगर सब कुछ पारदर्शी है तो ईडी बार-बार टीएमसी के इतने करीबी नेताओं, मंत्रियों और अफसरों तक क्यों पहुंच रही है? क्या यह महज संयोग है या फिर सत्ता के भीतर पनपते उस सिस्टम का संकेत है, जहां राजनीति, पैसा और प्रशासन एक-दूसरे में घुलते जा रहे हैं?

अवैध कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में छापेमारी
छापेमारी के बाद ED ने मीडिया से कहा कि छापेमारी अवैध कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में की गई है। ED ने कहा कि कोलकाता में I-PAC कार्यालय पर छापे पूरी तरह सबूतों के आधार पर किए जा रहे हैं। यह किसी राजनीतिक दल या चुनाव से जुड़ा मामला नहीं है। यह कार्रवाई अवैध कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े केस में हो रही है। फिलहाल 10 ठिकानों पर तलाशी जारी है। 6 पश्चिम बंगाल और 4 दिल्ली में बताए जाते हैं। एजेंसी ने बताया कि जांच में कैश जनरेशन, हवाला ट्रांसफर से जुड़े परिसर शामिल हैं। किसी भी पार्टी कार्यालय की तलाशी नहीं ली गई। अधिकारियों के मुताबिक कुछ संवैधानिक पदों पर बैठे लोग दो ठिकानों पर पहुंचे, अवैध दखल दिया और दस्तावेज छीन लिए।
कारनामों की पोल खुलने से ममता की धड़कने बढ़ीं
दरअसल, सीएम ममता बनर्जी को जैसे ही आई-पैक में छापे की जानकारी मिली, वे प्रतीक जैन के घर पर पहुंच गईं। उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि क्या ईडी का काम पार्टी की हार्ड डिस्क और उम्मीदवारों की सूची जब्त करना है? सीएम ने कहा कि मेरी पार्टी के सभी दस्तावेज उठा ले जाया जा रहा है। पश्चिम बंगाल में SIR के बाद अब इस तरह की कार्रवाई की जा रही है। दरअसल, पश्चिम बंगाल में ज्यों-ज्यों विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है, त्यों-त्यों मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। हिंदुओं की खिलाफत, मुस्लिम तुष्टिकरण, एंटी इंकम्बेंसी फैक्टर, स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और अब ईडी के छापे ने ममता बनर्जी की धड़कने बढ़ा दी हैं। बांग्लादेशी घुसपैठियों के दम पर जिस तरह तृणमूल कांग्रेस जीतती रही है, उस पर एसआईआर ने सेंध लगा दी है। इस रिवीजन में राज्य के 58 लाख से ज्यादा ‘फर्जी’ वोटर के नाम मतदाता सूची से हटा दिए हैं।
🚨 IPAC Raided: West Bengal CM Mamata Banerjee arrives at the I-PAC office in Salt Lake.
Visuals show files being REMOVED from the I-PAC office and transferred to the CM’s car. pic.twitter.com/vV5rzlEqom
— Megh Updates 🚨™ (@MeghUpdates) January 8, 2026
खाली हाथ आईं ममता हरी की ग्रीन फाइल सुर्खियों में आई
ममता खाली हाथ आईं थीं, लेकिन घर से बाहर निकलीं तो हाथ में ग्रीन फाइल थी। छापेमारी के दौरान प्रतीक जैन अपने घर पर ही मौजूद थे। यह कार्रवाई सुबह से जारी थी, लेकिन करीब 11:30 बजे के बाद मामला बढ़ा। सबसे पहले कोलकाता पुलिस कमिश्नर प्रतीक जैन के आवास पर पहुंचे। कुछ समय बाद सीएम ममता बनर्जी खुद लाउडन स्ट्रीट स्थित प्रतीक जैन के घर पहुंचीं। ममता वहां कुछ देर रुकीं। जब बाहर निकलीं, तो उनके हाथ में एक हरी फाइल दिखाई दी। इसके बाद वे I-PAC के ऑफिस भी गईं।
OMG, for the first time in history😱😳
ED officials conducted a raid at the I-PAC office.
But CM Mamata Didi reached there to defend him.
Why this frustration? What is she trying to hide? pic.twitter.com/6ZmZOIEbMu
— Lala (@lala_the_don) January 8, 2026
जांच में बाधा डाली, सीएम के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो
भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने कहा कि ममता बनर्जी ने केंद्रीय एजेंसियों के काम में दखल देने का काम किया है। ईडी सबूतों के आधार पर अपना काम कर रही है। बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी ने कहा, ‘छापेमारी के बारे में ED पूरी डिटेल्स दे सकती है। लेकिन यह सच है कि ममता बनर्जी केंद्रीय एजेंसियों के काम में दखल दिया। ममता ने आज जो किया, वह जांच में बाधा डालना था। मुख्यमंत्री के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। IPAC ऑफिस में वोटर लिस्ट क्यों मिली। क्या IPAC कोई पार्टी ऑफिस है।’
प्रशांत किशोर के हटने के बाद I-PAC की कमान प्रतीक ने संभाली
- I-PAC (Indian Political Action Committee) एक पॉलिटिकल कंसलटेंट फर्म है। इसके डायरेक्टर प्रतीक जैन है।
- यह राजनीतिक दलों को चुनावी रणनीति, डेटा-आधारित कैंपेन, मीडिया प्लानिंग और वोटर आउटरीच में मदद करती है।
- I-PAC पहले Citizens for Accountable Governance (CAG) थी। इसकी शुरुआत 2013 में प्रशांत किशोर ने प्रतीक के साथ की थी। बाद में इसका नाम I-PAC रखा गया।
- प्रशांत किशोर के हटने के बाद I-PAC की कमान प्रतीक के पास आ गई।
- प्रशांत ने बाद में बिहार में ‘जन सुराज’ पार्टी बनाई।
- I-PAC तृणमूल कांग्रेस (TMC) के साथ 2021 से जुड़ी है।










