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दिल्ली की बदली राजनीतिक हवा, खिलेगा कमल, केजरीवाल की राह मुश्किल

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दिल्ली का मौजूदा सियासी गणित साल 2015 से बिल्कुल ही अलग है। पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी के बेहतर प्रदर्शन और मोदी सरकार के अहम फैसलों ने दिल्ली की राजनीतिक हवा के रुख को बदल दिया है। सियासी गलियारों में अटकलें लगाई जा रही थीं कि दिल्ली विधानसभा का चुनाव मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के लिए आसान होगा। लेकिन मौजूदा राजनीतिक हालात ने इन अटकलों पर विराम लगा दिया है। पहले अरविंद केजरीवाल ने सड़क पर धरना देकर लोगों को परेशान किया और अब शाहीन बाग के लोगों के धरने और अराजकता से दिल्ली की जनता काफी परेशान है। वह अब बदलाव चाहती है।

अवैध कालोनी के मुद्दे पर भाजपा का ‘मास्टर स्ट्रोक’

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र की भाजपा सरकार ने दिल्ली में अवैध कालोनी के मुद्दे पर ‘दिल्ली आवास अधिकार योजना’ के तहत बहुत बड़ा फैसला लिया। पीएम मोदी ने इस योजना के तहत दिल्ली वासियों को अपने घर का सपना पूरा करने का वादा निभाया। इस योजना के तहत दिल्ली के 40 लाख लोगों को फायदा पहुंचेगा। भाजपा ये लगातार आरोप लगाती रही है कि इस बड़े कदम के बीच में अरविंद केजरीवाल आते रहे हैं। निश्चित तौर पर भाजपा का ये दांव चुनाव में अलग तरीके की भूमिका अदा करेगा।

स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता

रणनीति के तहत भाजपा दिल्ली में स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता से उठा रही है। पार्टी की एक उच्च स्तरीय मीटिंग में सभी नेताओं को इससे जुड़े निर्देश दिये भी गए हैं। प्रमुख मुद्दों की पहचान कर प्रदेश के विशेष नेताओं को उन मुद्दों पर काम करने की जिम्मेदारी भी सौंप दी गई है। दिल्ली में पीने का पानी साफ नहीं है। लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। दिल्ली में प्रदूषण की समस्या है। पांच साल में सरकार ने इन दोनों मुद्दों पर कोई काम नहीं किया। यूनिफ़ाइड ट्रांसपोर्ट सिस्टम भी एक मुद्दा है। 

राष्ट्रीय मुद्दों की भूमिका

राष्ट्रीय राजधानी होने के कारण दिल्ली में स्थानीय मुद्दों के साथ राष्ट्रीय मुद्दे भी निर्णायक भूमिका निभाएंगे। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में दूसरी बार केंद्र में बनी सरकार लगातार देश के प्रमुख और जटिल मुद्दों का समाधान करके जताया है, वह इस बार देश को उसकी मूल समस्या से मुक्ति दिलाने के संकल्प के साथ काम कर रही है। इसका दिल्ली के साथ पूरे देश में सकारात्मक संदेश गया है। मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने और नागरिकता संशोधन कानून बनाने का महत्वपूर्ण फैसला लिया। हाल ही में राम मंदिर पर ऐतिहासिक फैसला आया। जिसके बाद काफी हद तक भाजपा को इसका फायदा मिलने की उम्मीद है। भाजपा सावरकर और अन्य मुद्दों को लेकर काफी मजबूत राजनीति करती रही है। इधर कांग्रेस की सावरकर विरोधी नीति का भी लाभ मिलने की बात कही जा रही है।

प्रधानमंत्री मोदी का चेहरा

दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा मुख्यमंत्री का उम्मीदवार न उतार कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे को ही आगे करके चुनाव लड़ रही है। भाजपा अरविंद केजरीवाल बनाम जनता के नारे को लेकर जनता के बीच जा रही है। दिल्ली बीजेपी के प्रभारी प्रकाश जावडेकर ने कहा कि हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चुनाव जीतेंगे। यह चुनाव केजरीवाल बनाम आम जनता के बीच का है। देश में प्रधानमंत्री मोदी लोकप्रियता के मामले में शीर्ष पर हैं। प्रधानमंत्री के बाद दूसरे नंबर का राजनीतिक चेहरा कतार में बहुत दूर है। 

मोदी सरकार के फैसलों से बेबस विपक्ष

दरअसल विपक्ष आज बेबस है क्योंकि उसके हाथों से चीज़ें फिसलती जा रही हैं। जिस तेजी और सरलता से मौजूदा मोदी सरकार इस देश के सालों पुराने उलझे हुए मुद्दे, जिन पर बात करना भी विवादों को आमंत्रित करता था, सुलझाती जा रही है, विपक्ष खुद को मुद्दाविहीन पा रहा है। और तो और वर्तमान सरकार की कूटनीति के चलते संसद में विपक्ष की राजनीति भी नहीं चल पा रही जिससे वो खुद को अस्तित्व विहीन भी पा रहा है शायद इसलिए अब वो अपनी राजनीति को सड़कों पर लेकर आया है।

सीएए के विरोध के नाम पर हिंसा 

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) दिल्ली के लिये भी महत्वपूर्ण मुद्दा है। इसको लेकर दिल्ली में कई जगहों पर हिंसा हुई। ‘आप’ और कांग्रेस इसका विरोध कर रही हैं। जब नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में दिल्ली जल रह थी और जामिया में हिंसक भीड़ बसों में आग लगा रही थी, तब केजरीवाल सरकार के डिप्टी सीएम आग भड़काने में लगे थे। यहां तक उन्होंने घटना की सच्चाई जाने बिना ट्वीट कर पुलिस पर ही बस को जलाने का गंभीर आरोप लगा दिया। इसके अलावा जलती बस का एक वीडियो वायरल करने से हिंसा अन्य इलाकों और विश्वविद्यालयों में भी फैल गई। बाद में दिल्ली पुलिस ने एक अन्य वीडियो जारी किया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया था कि पुलिस ने बस को आग नहीं लगाई गई थी। सिसोदिया ने हिंसा को रोकने की अपील करने के बजाय पुलिस को कसूरवार ठहरा दिया और हिंसा करने वाले के साथ खड़े नजर आए। 

शाहीन बाग की धरना से बढ़ी परेशानी

अपनी राजनीति चमकाने के लिए अभी तक विपक्ष आम आदमी और छात्रों का सहारा लेता था लेकिन अब वो महिलाओं को मोहरा बना रहा है। अब शाहीन बाग के धरने के पीछे की राजनीति खुलकर सामने आ गई है। यह धरना बिल्कुल प्रायोजित है। इसका समर्थन करने वाला हर शख्स और हर दल सवालों के घेरे में है। संविधान बचाने के नाम पर उस कानून का हिंसक विरोध किया जा रहा है, जिसे संविधान संशोधन द्वारा खुद संसद ने ही बहुमत से पारित किया है। जो लोग महीने भर तक रास्ता रोकना अपना संवैधानिक अधिकार मानते हैं, उन्हें उन लोगों के संवैधानिक अधिकारों की चिंता नहीं है, जो लोग उनके इस धरने से परेशान हो रहे हैं। प्रदर्शनकारी सड़क पर इस प्रकार से धरने पर बैठे हैं कि लोगों के लिए वहाँ से पैदल निकलना भी दूभर है। लोग अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेज पा रहे, स्थानीय लोगों का व्यापार ठप्प हो गया है,आधे घंटे की दूरी तीन चार घंटों में तय हो रही है जिससे नौकरी पेशा लोगों का अपने कार्यस्थल तक पहुंचने में असाधारण समय बर्बाद हो रहा है। ऑफिस देर से पहुंचने पर कई लोगों की नौकरी जा चुकी है। मरीज समय पर अस्पताल नहीं पहुंच रहे हैं।   

मुस्लिम वोटों के लिए कंपीटिशन

मोदी सरकार की नीतियों ने वोटबैंक की राजनीति पर जबरदस्त प्रहार किया है और जो थोड़ा बहुत मुस्लिमों का वोटबैंक बचा भी है तो उसमें कंपीटिशन बहुत हो गया है क्योंकि भाजपा को छोड़ लगभग समूचा विपक्ष ही उसे साधने में लगा है। दिल्ली में मुसलमान यह देख रहे हैं कि सीएए पर उसकी लड़ाई कौन लड़ रहा है? कांग्रेस लगातार उसके मुद्दों को उठा रही है और केंद्र के सामने डटकर खड़ी है, सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने लगातार उसकी आवाज बुलंद की है, कांग्रेस नेता शशि थरूर वहां जाकर प्रदर्शनकारियों के साथ खड़े हैं, दिल्ली कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा वहां जाकर उनसे अपनी सहानुभूति व्यक्त कर चुके हैं। कांग्रेस को उम्मीद है कि लोकसभा चुनाव की तरह विधानसभा चुनाव में भी वह अपना वोट बैंक वापस लाने में कामयाब रहेगी और बेहतर प्रदर्शन करेगी। वहीं अरविंद केजरीवाल इस मामले पर पूरी तरह चुप्पी साधे हुए हैं, उन्होंने इसका कड़ा विरोध दर्ज कराना तो दूर जामिया या शाहीन बाग तक जा भी नहीं सके हैं। ऐसे में अगर लोकसभा चुनाव की तरह मुसलमान वोटर कांग्रेस को चुनता है, तो मुस्लिम वोटों का बंटवारा हो सकता है। इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिलेगा।

लोकसभा चुनाव में 65 विधानसभा सीटों पर आगे थी बीजेपी

पिछले लोकसभा चुनाव में दिल्ली में भाजपा को कुल 56.58 प्रतिशत वोट मिले थे, उसके वोटिंग परसेंटेज में 10.18 प्रतिशत का उछाल आया था, इस चुनाव में कांग्रेस कुल 22.46 प्रतिशत वोटों के साथ दूसरे स्थान पर तो 18 प्रतिशत वोटों के साथ आम आदमी पार्टी तीसरे स्थान पर रही थी। अगर सीट के अनुसार बात करें, तो दिल्ली की सातों सीटों पर भाजपा आधे से अधिक वोट पाने में कामयाब रही थी। अगर विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से तुलना करें, तो भाजपा दिल्ली की 65 सीटों पर आगे रही थी, तो कांग्रेस ने पांच सीटों पर बढ़त हासिल की थी, आम आदमी पार्टी किसी भी विधानसभा क्षेत्र में बढ़त बनाने में नाकाम रही थी, बूथों के लिहाज से भी भाजपा दिल्ली के बारह हजार से ज्यादा बूथों पर नंबर एक रही थी।

कांग्रेस के वोट प्रतिशत में वृद्धि से AAP को नुकसान

लोकसभा चुनाव 2019 में दिल्ली में जिस तरह से वोटिंग हुई उसमें 5 सीटों पर कांग्रेस दूसरे नंबर पर रही तो वहीं 2 सीटों पर आम आदमी पार्टी दूसरे नंबर पर बनी रही। इससे पहले 2014 में दिल्ली की सातों लोकसभा सीटों पर आम आदमी पार्टी दूसरे नंबर पर रही थी। ऐसे में लोकसभा चुनाव के आंकड़े देखें तो आपको पता चलेगा कि दिल्ली में कांग्रेस के वोट प्रतिशत में वृद्धि हुई है जिसका सीधा-सीधा नुकसान आम आदमी पार्टी को ही होगा।

मुश्किल में केजरीवाल

नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र में 1 लाख 44 हजार के लगभग मतदाता हैं, जो 175 मतदान केंद्रों पर वोटिंग करेंगे। इस इलाके में देश की संसद है, राष्ट्रपति भवन है, सांसदों, मंत्रियों के सरकारी आवास हैं। बड़े से लेकर छोटे सरकारी अधिकारियों का घर है, तो जाहिर सी बात है कि सरकारी कर्मचारी जीत-हार में बड़ी भूमिका निभाते हैं। केजरीवाल ने जिस तरह का व्यवहार अपने एक आईएएस अधिकारी के साथ किया था, उसके बाद से तमाम सरकारी अधिकारी और कर्मचारी उनसे नाराज चल रहे हैं। ऐसे में केजरीवाल को कर्मचारियों की नाराजगी का खामियाज भुगतना पड़ सकता है।

पूर्वांचली वोटर्स पर बीजेपी की नजर

इस बार दिल्ली भाजपा का नेतृत्व मनोज तिवारी के कंधे पर है। मनोज तिवारी का चेहरा पूर्वांचली वोटर्स को साधने में काफी हद तक कारगर साबित हो सकता है। पूर्वांचली वोटरों का प्रभाव सीधे-सीधे 25 सीटों पर है। यहां एक बात और गौर करने वाली है कि बिहार में भाजपा के सहयोगी दल JD(U) और LJP के दिल्ली के रण में साथ आने से कुछ पूर्वांचली मतदाताओं के छिटकने का डर भी समाप्त हो गया है।

हरियाणा में जजपा-भाजपा गठबंधन का असर

भाजपा सूत्रों के अनुसार, हरियाणा के बड़े जाट नेताओं को विशेष जिम्मेदारी देने का पार्टी ने फैसला किया है। ओ. पी. धनखड़ और कैप्टन अभिमन्यु को जाट बहुल इलाकों में जन संपर्क करने को कहा गया है। हरियाणा के उपमुख्यमंत्री और जजपा नेता दुष्यंत चौटाला से भी भाजपा ने दिल्ली में प्रचार करने की अपील की है। दिल्ली के रण में जाट चेहरे के रूप में भाजपा दुष्यंत को आगे कर सकती है, जिससे दिल्ली चुनाव की तस्वीर बदल सकती है। दिल्ली की 12 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर जाट बहुलता में हैं। ये सभी सीटें आउटर दिल्ली की हैं। इन सीटों पर जजपा किसी भी राजनीतिक दल का गणित बिगाड़ सकती है।

पहले से कमजोर हुई केजरीवाल की टीम  

दिल्ली में जब केजरी’युग’ की शुरुआत हुई थी, तो उनके साथ कई दिग्गजों का ‘जखीरा’ मौजूद था। लेकिन एक-एक करके प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव और कुमार विश्वास जैसे कई पुराने साथी केजरीवाल से रूठते चले गए। कईयों को उन्होंने खुद पार्टी से बाहर खदेड़ दिया। जो उनके लिए इस चुनाव में काफी हानिकारक साबित होने वाला है। दरअसल दिल्ली के विवादास्पद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपनी सुविधा की राजनीति करने के लिए जाने जाते हैं। केजरीवाल ने समय-समय पर कई संगठनों और व्यक्तियों का सीढ़ियों की तरह इस्तेमाल किया और आगे बढ़ते गए। जिस किसी ने भी उनकी सोच या कार्यशैली का विरोध किया, केजरीवाल ने उनका साथ छोड़ दिया। कई लोग जो केजरीवाल के साथ घुटन महसूस करते थे उन्होंने पार्टी खुद ही छोड़ दी। 

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