पश्चिम बंगाल में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे यहां पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए राजनीतिक जमीन खिसकती दिखाई दे रही है। एक के बाद एक घटनाएं अब केवल आरोप नहीं रहीं, बल्कि कानूनी और संस्थागत शिकंजे का रूप लेती जा रही हैं। बीएलओ आत्महत्या मामले में टीएमसी कार्यकर्ता की गिरफ्तारी, एसआईआर सत्यापन पर भाजपा की मांग को चुनाव आयोग की स्वीकृति, 50 लाख से ज्यादा फर्जी वोटर के नाम कटना और बाबरी मस्जिद विवाद के उभरने के बाद अब प्रवर्तन निदेशालय द्वारा सीधे मुख्यमंत्री से जुड़े 17 गंभीर अपराध तय किया जाना—ये सारी घटनाएं मिलकर पश्चिम बंगाल की तृणमूल सरकार के लिए एक अभूतपूर्व संकट रच रही हैं। दिलचस्प तथ्य यह है कि ममता बनर्जी को कुछ झटके तो उनकी खुद की पार्टी से मिल रहे हैं, जिनका कुछ भी जवाव उन्हें और उनके नेताओं को नहीं सूझ रहा है।

सत्ता, संस्था और संवैधानिक जवाबदेही ममता बनर्जी के आमने-सामने खड़ी
बीएलओ आत्महत्या से नैतिकता पर सवाल, SIR फैसले से राजनीतिक रणनीति की हार और ईडी के 17 अपराधों से कानूनी संकट—ये तीनों झटके अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही कहानी के अध्याय हैं। यह कहानी है उस सत्ता की, जो वर्षों से हर सवाल को साज़िश बताकर टालती रही, लेकिन अब सवाल सीधे कानून, संस्थाओं और अदालतों के सामने खड़े हैं। यह सिर्फ राजनीतिक बयानबाज़ी का दौर नहीं है। यह वह मोड़ है, जहां सत्ता, संस्था और संवैधानिक जवाबदेही आमने-सामने खड़ी दिखती हैं। ईडी कोई साधारण जांच एजेंसी नहीं है, और जब वह दस्तावेज़ छीने जाने जैसे मामले में सीधे 17 अपराध चिन्हित करती है, तो यह संकेत साफ है कि लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक तय है।
पहला झटका: बीएलओ आत्महत्या और तृणमूल की नैतिक विश्वसनीयता का पतन
मुर्शिदाबाद में तैनात बीएलओ हमी मूल इस्लाम की आत्महत्या ने ममता बनर्जी सरकार के उस पूरे नैरेटिव को जड़ से हिला दिया है, जिसे वह महीनों से चुनाव आयोग के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश कर रही थीं। ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस लगातार यह आरोप लगाती रहीं कि पश्चिम बंगाल में बीएलओ मानसिक दबाव में हैं, उनसे असहनीय काम लिया जा रहा है और यह सब चुनाव आयोग की “साज़िश” का हिस्सा है। लेकिन इस आत्महत्या मामले में जब परतें खुलीं, तो कहानी बिल्कुल उलट निकली। मृतक की पत्नी की शिकायत और पुलिस जांच में सामने आया कि आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप किसी अधिकारी या चुनाव आयोग पर नहीं, बल्कि टीएमसी कार्यकर्ता बुलेट खान पर है। आरोप है कि पैसों के लेन-देन को लेकर लगातार धमकी, डर और मानसिक प्रताड़ना दी जा रही थी। यानी जिस पार्टी ने बीएलओ को लेकर संवेदना की राजनीति की, उसी पार्टी का एक कार्यकर्ता उस बीएलओ को मौत की ओर धकेलने के आरोप में गिरफ्तार है। यह घटना ममता सरकार के लिए केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है, बल्कि नैतिक संकट है। सवाल यह उठता है कि क्या बीएलओ पर दबाव की राजनीति असल में चुनाव आयोग के कारण नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ दल के स्थानीय नेटवर्क और दबंगई की देन है? इस गिरफ्तारी ने तृणमूल की कथित ‘पीड़ित राजनीति’ को कठघरे में खड़ा कर दिया है और यह दिखा दिया है कि सत्ता के नीचे चल रही सच्चाई बयानबाजीसे कहीं अधिक भयावह है।

दूसरा झटका: SIR पर भाजपा की मांग की स्वीकृति और ममता की राजनीतिक पराजय
दूसरा झटका उतना ही गहरा है, जितना पहले की अनदेखी की जाती रही। पश्चिम बंगाल में SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) को लेकर ममता बनर्जी लगातार यह आरोप लगाती रहीं कि यह गरीबों, प्रवासी मज़दूरों और अल्पसंख्यकों का वोट छीनने की साज़िश है। विशेषकर चाय बागान और सिनकोना बागान क्षेत्रों में काम करने वाले हज़ारों श्रमिकों को लेकर डर का माहौल बनाया गया। लेकिन चुनाव आयोग ने भाजपा की उस व्यावहारिक मांग को स्वीकार कर लिया, जिसमें कहा गया था कि इन श्रमिकों की नौकरी और रोज़गार के आधिकारिक रिकॉर्ड को पहचान दस्तावेज के रूप में मान्यता दी जाए। आयोग ने सात जिलों में विशेष छूट देते हुए यही फैसला किया। यह निर्णय ममता सरकार की उस पूरी राजनीति पर करारा तमाचा है, जो हर प्रशासनिक प्रक्रिया को “लोकतंत्र पर हमला” बताकर सड़क पर उतर आती थी। यह सिर्फ एक तकनीकी फैसला नहीं है, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संकेत है—कि चुनाव आयोग अब ममता सरकार के दबाव, धमकी और हंगामे से प्रभावित नहीं हो रहा। यह ममता बनर्जी की उस रणनीति की हार है, जिसमें हर संवैधानिक संस्था को कठघरे में खड़ा कर खुद को पीड़ित दिखाया जाता रहा है। इस फैसले ने यह साफ कर दिया कि समस्या पहचान की नहीं थी, समस्या राजनीति की थी।
तीसरा झटका: राज्य में 50 लाख फर्जी वोटर कटे, जिनमें घुसपैठिए शामिल
पश्चिम बंगाल में चल रहे मतादाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया में करीब 50 लाख संदिग्ध नामों ने ममता बनर्जी सरकार पर सवालिया निसान खड़े कर दिए हैं। अब तक मिले 50 लाख हटाने योग्य नामों में से 23 लाख से ज्यादा लोगों के नाम ‘मृत मतदाता’ श्रेणी में आते हैं, जिनके मतदाता पहचान पत्र जारी हैं। इसके बाद दूसरे स्थान पर ‘स्थानांतरित’ मतदाता हैं, जिनकी संख्या 18 लाख से अधिक है। इसके अलावा 7 लाख से ज्यादा मतदाता ‘लापता’ हैं। जबकि शेष नाम ‘दोहराव’ या अन्य कारणों से ‘फर्जी’ पाए गए हैं। दूसरी ओर टीएमसी से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने शनिवार (6 दिसंबर) को मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की नींव रखकर ममता बनर्जी के लिए नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है। ऐसे हालात में तृणमूल कांग्रेस की राजनीति इस समय एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर है, जहां हर कदम ममता बनर्जी के लिए खतरे की घंटी बनता जा रहा है। कभी खुद को अल्पसंख्यक वोट बैंक की निर्विवाद चैंपियन बताने वाली ममता आज उसी वोट बैंक के भीतर उठी बगावत की आग में घिर गई हैं। इस बीच हुमायूं कबीर ने दावा किया है कि जिस वोट बैंक के दम पर ममता इतने सालों से पश्चिम बंगाल में राज कर रही हैं, वह उससे बेहद नाराज है। इसलिए अगले साल के विधानसभा चुनाव में ममता किसी भी सूरत में मुख्यमंत्री नहीं बन पाएंगी।
चौथा झटका: सीएम ममता बनर्जी ‘बाबरी मस्जिद’ के राजनीतिक चक्रव्यूह में फंसी
पश्चिम बंगाल की राजनीति में ऐसा विस्फोटक मोड़ आया है, जिसमें सत्ता पर काबिज तृणमूल कांग्रेस के भीतर उठा तूफान उसे ही हिलाता दिखाई दे रहा है। मुर्शिदाबाद में टीएमसी विधायक हुमायूं कबीर द्वारा शुरू की गई बाबरी मस्जिद निर्माण की मुहिम ममता बनर्जी के लिए अनचाहा तूफान बन गई है। कबीर पश्चिम बंगाल में बाबरी नाम से मस्जिद बनाने का दावा कर रहे हैं। हुमायूं ने अपने दावे के मुताबिक जिस दिन अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराई गई थी, उसी तारीख पर यानी 6 दिसंबर 2025 को मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में वे बाबरी मस्जिद का शिलान्यास कर दिया। सीएम ममता बनर्जी की दिक्कत यह है कि वह कबीर को ना रोक सकती हैं और ना ही उनका समर्थन कर सकती हैं। रोकेंगी तो मुस्लिम समुदाय के भीतर नाराजगी की आग भड़केगी, और समर्थन करेंगी तो यह और साफ हो जाएगा कि ममता की राजनीति सिर्फ एकतरफा तुष्टिकरण पर टिकी है। यह ऐसी दुविधा है जिसने उन्हें एक ऐसे राजनीतिक चक्रव्यूह में घेर लिया है, जिसमें किसी भी दिशा में कदम उठाने पर नुकसान ही नुकसान है। दरअसल, हुमायूं कबीर जिस तरह बाबरी मुद्दे को बंगाल की राजनीति में उठा रहे हैं, वह साफ संकेत देता है कि वह सिर्फ एक विधायक की बिंदु है, जो ममता बनर्जी को सबसे अधिक अस्थिर कर रहा है। बंगाल का मुस्लिम वोट लंबे समय तक टीएमसी की सत्ता का ईंधन रहा है। पर आज वही वोट-बैंक भीतर से बिखरने को तैयार खड़ा है। कबीर का अभियान मुस्लिम समुदाय के बीच एक नया संदेश दे रहा है कि टीएमसी चाहे कितनी भी बड़ी पार्टी क्यों न हो, लेकिन उनकी आवाज कहने के लिए एक “नया चेहरा” अब मैदान में उतर चुका है। हालांकि बाबरी मस्जित के जवाब में भाजपा और हिंदूवादी संगठनों ने मुर्शिदाबाद में ही अयोध्या की तर्ज पर दो अलग-अलग राम मंदिर बनाने का दावा किया है। उनका ये भी कहना है कि कोई भी अपनी जमीन पर मस्जिद बना सकता है, लेकिन बाबर के नाम पर इस देश में मस्जिद नहीं बनेगी। अगर बनी तो उसका हश्र भी अयोध्या जैसा ही होगा।
पांचवां झटका: ईडी के 17 अपराध और सत्ता की ढाल का टूटना
पांचवां और सबसे बड़ा झटका न सिर्फ सबसे बड़ा है, बल्कि सबसे खतरनाक भी। अब मामला उस मोड़ पर पहुंच गया है, जहां मुख्यमंत्री का पद भी सुरक्षा कवच नहीं रह जाता। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा दस्तावेज छीने जाने के मामले में सीधे 17 गंभीर अपराधों का उल्लेख करना साधारण कानूनी प्रक्रिया नहीं है। यह संकेत है कि जांच एजेंसी के पास केवल संदेह नहीं, बल्कि ठोस आधार और सबूत मौजूद हैं। इन अपराधों में धनशोधन, साजिश, सबूतों से छेड़छाड़, सरकारी दस्तावेज़ों की चोरी और जांच में बाधा जैसे आरोप शामिल हैं। यदि इनमें से किसी भी अपराध में दोष सिद्ध होता है, तो सजा कुछ वर्षों की नहीं, बल्कि दशकों तक खिंच सकती है। यही कारण है कि यह मामला अब केवल राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहा—यह सीधे सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंचने वाला है। ममता बनर्जी अब उस स्थिति में नहीं हैं, जहां वह हर जांच को “राजनीतिक बदले” का नाम देकर आगे बढ़ सकें। ईडी की कार्यप्रणाली, उसका कानूनी अधिकार और अब तय किए गए अपराध यह दिखाते हैं कि मामला बेहद गंभीर है। यह झटका तृणमूल सरकार की पूरी सत्ता-संरचना को हिलाने की क्षमता रखता है।
ईडी द्वारा तय किए गए 17 अपराध और संभावित सजा
- धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) की धारा 3 व 4 – 7 से 10 साल की सजा
- सरकारी दस्तावेज़ों की चोरी – 3 से 7 साल
- जांच एजेंसी के काम में बाधा – 2 से 5 साल
- सबूतों से छेड़छाड़ – 3 से 7 साल
- षड्यंत्र (IPC 120B) – मूल अपराध के बराबर सजा
- आपराधिक विश्वासघात – 5 से 10 साल
- सरकारी संपत्ति को नुकसान – 3 से 5 साल
- अवैध रूप से दस्तावेज़ रखने का अपराध – 2 से 5 साल
- लोक सेवक के रूप में पद का दुरुपयोग – 5 से 7 साल
- झूठी जानकारी देना – 2 से 4 साल
- आर्थिक अपराध में संलिप्तता – 7 से 10 साल
- जांच में सहयोग न करना – 1 से 3 साल
- साक्ष्यों को नष्ट करने का प्रयास – 3 से 7 साल
- आधिकारिक रिकॉर्ड में हेराफेरी – 5 से 10 साल
- कानूनी प्रक्रिया को प्रभावित करना – 2 से 5 साल
- संस्थागत अवमानना की श्रेणी का अपराध – 1 से 3 साल
- एकाधिक अपराधों का संयुक्त प्रभाव – सजा जोड़कर दी जा सकती है।
बंगाल की राजनीति और 2026 चुनाव में ममता बनर्जी पर नैगेटिव असर
राजनीतिक विश्लेषकों मानना है कि ममता बनर्जी के खिलाफ जा रही इन घटनाओं का असर केवल अदालतों तक सीमित नहीं रहेगा। बंगाल की राजनीति में यह पहला अवसर है जब ममता बनर्जी को “पीड़ित” नहीं, बल्कि “जवाबदेह” की भूमिका में देखा जा रहा है। विपक्ष को अब मुद्दे नहीं गढ़ने पड़ रहे—मुद्दे खुद सामने आ रहे हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई तेज होती है और ईडी के आरोपों कि टिकना तय है तो 2026 का विधानसभा चुनाव ममता बनर्जी के लिए विकास बनाम विपक्ष नहीं, बल्कि सत्ता बनाम साख का चुनाव बन जाएगा। और यही सबसे बड़ा खतरा है—जब सवाल नारे पर नहीं, नैतिकता और कानून पर आ जाए। ममता बनर्जी की सरकार पहले ही भ्रष्टाचार और महिला अपराधों में अप्रत्याशित वृद्धि से जूझ रही है, ऐसे में इस तरह के झटके उसके वोट बैंक को और कमजोर बनाएंगे।









