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मोदी विरोध में देशहित के विरोध पर उतर आया है मीडिया!

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ऐसी शक्तियां लगातार सक्रिय हैं जो देश से लेकर विदेश तक में देश के बारे में दुष्प्रचार कर रही हैं। पाकिस्तान के पैसों से पल-बढ़ रहा बब्बर खालसा हो या देश के कुछ तथाकथित सेक्यूलर पत्रकार या फिर देश के भीतर के विभाजनकारी तत्व हों, सभी मोदी विरोध में देशहित के विरोध में उतर आए हैं।

अगर इनके बारे में जानने की कोशिश करेंगे तो आपको कमोबेश वही चेहरे देखने को मिलेंगे जो बीते 17 वर्षों से मोदी विरोध का झंडा बुलंद किए हुए हैं। किसी राज्य में घटित कोई छोटी सी घटना को भी पीएम मोदी के नाम से साजिशन जोड़ दिया जा रहा है और देश को बदनाम करने की हर कोशिश की जा रही है।

देश-विदेश में दुष्प्रचार का चल रहा कैंपेन
बब्बर खालसा के लोगों ने पीएम मोदी का विरोध अमेरिका में भी किया था और अब ब्रिटेन में भी कर रहे हैं। हाल में ही बब्बर खालसा से जुड़े आतंकी गोपाल सिंह चावला को ग्लोबल आतंकी हाफिज सईद के साथ की तस्वीरें सामने आई हैं। हालांकि देश की मीडिया में इस तथ्य को तो दिखाया जा रहा है कि विरोध हो रहा है, लेकिन कौन कर रहा है यह नहीं बताया जा रहा है।

एससी/एसटी एक्ट पर झूठी खबर
20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि एससी/एसटी एक्ट में जांच के बाद ही गिरफ्तारी होगी। जाहिर है यह संविधान की मूल अवधारणा के अनुरूप निर्णय है, परन्तु कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इसे एससी/एसटी एक्ट को ‘भंग’ करना कह दिया। इसके बाद तो कई पत्रकारों ने जिस तरीके से तथ्यों को छिपाते हुए रिपोर्टिंग की उससे देश में अशांति का वातावरण बन गया था। जाहिर है मीडिया ने सलेक्टिव रिपोर्टिंग की और देश को सच नहीं बताया।

कैश क्रंच को जान बूझकर बनाया मुद्दा
हर वर्ष अप्रैल और मई के महीने में शुभ लग्न का समय होता है और कैश की डिमांड बढ़ जाती है। लेकिन इस बार जिस तरह से कैश क्रंच का हल्ला मचाया गया वह मीडिया की अपरिपक्वता ही तो दिखाता है। दरअसल मोदी विरोध में देश में मीडिया का एक धड़ा खबरें बनाता है और उस सच को छिपा लेता है जो उसे दिखाना चाहिए। मीडिया ने यह नहीं दिखाया कि इस हालात की जानकारी सरकार को पहले से है और इसका हल भी निकाल लिया गया है। यह भी नहीं बताया कि सिर्फ बिहार, यूपी और एमपी जैसे हिंदी भाषी राज्यों में ही ये समस्या थी।

डोकलाम विवाद पर झूठी खबरें
डोकलाम विवाद को लेकर कई बार बिना तथ्य के और भ्रामक खबरें देश में फैलाई गई हैं। हर बार यह बताने की कोशिश की गई है कि चीन ने डोकलाम पर अपना कब्जा बरकरार रखा है। हालांकि तथ्य यह है कि चीन के सैनिक डोकलाम से अभी भी 200 मीटर दूर हैं और उतनी ही दूरी पर भारतीय सैनिक भी हैं। डोकलाम से जब चीन को वापस खदेड़ दिया गया है तो देश की मीडिया इस सच को क्यों नहीं बताती है?

घटनाओं को दिया जा रहा धार्मिक रंग
जम्मू-कश्मीर के कठुआ में एक 8 साल की नाबालिग बच्ची की हत्या कर दी गई है। घटना विभत्स है, लेकिन इसे मीडिया और बॉलीवुड के एक धड़े ने धार्मिक रंग दे दिया। घटना की जांच चल रही है, आरोपी खुद को बेकसूर बताते हुए सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं और खुद का नार्को टेस्ट करवाने की मांग भी कर रहे हैं। लेकिन मीडिया का एक धड़ा आरोपियों को दोषी भी साबित कर चुका है। इतना ही नहीं पूरे हिंदू समुदाय को बलात्कारी और हिंदू धर्म को नीचा दिखाने का एक कुत्सित प्रयास किया जा रहा है।

हिदुओं पर जुल्म की खबरें छिपाती है मीडिया
मीडिया का दोहरा रवैया तब सामने आ जाता है जब सासाराम, मुंबई और सूरत जैसी घटनाओं को नहीं दिखाया जाता, जबकि घटना का चरित्र एक ही है और सभी नाबालिग भी हैं। फर्क सिर्फ यह है कि इन तीनों जगहों पर पीड़ित हिंदू समुदाय से है और बलात्कार का आरोपी मुस्लिम समुदाय का। लेकिन मीडिया के इस धड़े को इसमें मसाला नहीं दिखता है, इसलिए उसे उठा भी नहीं रहा है। जाहिर है कि हम सभी के लिए यह समझना आवश्यक है कि मोदी विरोध का मतलब देशहित का विरोध तो नहीं हो गया है?

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