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हंसा रिसर्च ग्रुप ने बॉम्बे हाईकोर्ट में दाखिल की याचिका, मुंबई पुलिस पर लगाया रिपब्लिक टीवी के खिलाफ बयान देने के लिए दबाव बनाने का आरोप

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महाराष्ट्र की उद्धव सरकार रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्नब गोस्वामी को फर्जी मामलों में फंसाकर परेशान करने के लिए तमाम हथकंडे अपना रही है। इसके तहत पुलिस और सरकारी मशीनरी का खुलकर दुरुपयोग किया जा रहा है। हंसा रिसर्च ग्रुप ने बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर मुंबई पुलिस पर रिपब्लिक टीवी  के खिलाफ बयान देने के लिए दबाव बनाने का आरोप लगाया।  

हंसा रिसर्च ग्रुप ने अपनी याचिका में कहा है कि मुंबई पुलिस उनके कर्मचारियों को फर्जी बयान जारी करने के लिए दबाव बना रही है। साथ ही रिपब्लिक टीवी द्वारा जारी एक डॉक्यूमेंट को फर्जी करार देने के लिए कह रही है। कंपनी ने इस मामले की जांच मुंबई पुलिस के बजाय केंद्रीय जांच ब्यूरो(सीबीआई) को सौंपने की मांग की है।

याचिका में कहा गया है कि यह एक अनोखी स्थिति है, जहां किसी अपराध में पहले मुखबिर को जाँच एजेंसी द्वारा परेशान किया जा रहा है और एक आरोपित की तरह बर्ताव किया जा रहा। यह पूरी तरह से कानून और कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के खिलाफ है। यह एक व्यक्ति के मौलिक अधिकारों के खिलाफ है और इसमें हाईकोर्ट द्वारा तत्काल हस्तक्षेप किया जाना चाहिए।

हंसा द्वारा दायर याचिका में मुंबई के पुलिस आयुक्त परम बीर सिंह, सहायक पुलिस निरीक्षक सचिन वाज़े और एसीपी शशांक संभल को नामित किया गया है। यह भी कहा गया है कि उनके अधिकारियों से बिना लिखित सूचना के पूछताछ की जा रही है और उन्हें दस्तावेज तैयार करने का समय भी नहीं दिया गया है। हंसा रिसर्च के कर्मचारियों को 12 अक्टूबर के बाद से बार-बार अपराध शाखा के कार्यालय में बुलाया गया और फिर घंटों इंतजार करवाया गया है।

कंपनी का कहना है कि उसके कर्मचारियों को मुंबई पुलिस द्वारा परेशान किया गया, क्योंकि उन्होंने रिपब्लिक टीवी के खिलाफ गलत बयान देने से इनकार कर दिया था। हंसा रिसर्च ने यह भी बताया है कि यह टीआरपी हेरफेर मामले में वे शिकायतकर्ता थे और अब उन्हें ही पुलिस द्वारा परेशान किया जा रहा है।

गौरतलब है कि याचिका हंसा समूह के निदेशक नरसिम्हन के स्वामी, सीईओ प्रवीण ओमप्रकाश और नितिन काशीनाथ देवकर की तरफ से दायर किया गया है। हंसा रिसर्च ग्रुप ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) के बार-ओ-मीटर का संचालन करता है। इसी ग्रुप ने टीआरपी घोटले में अपने एक कर्मचारी विशाल भंडारी के खिलाफ मामला दायर किया था, जिसने 2 घंटे प्रतिदिन इंडिया टुडे चैनल देखने के लिए BARC पैनल हाउसों को पैसे देने की बात कबूल की थी। यह पैसे उसे चैनल द्वारा भुगतान किया गया था।

 

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