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ओवैसी-कबीर की जोड़ी ने खोली TMC की पोल, ममता ने मुस्लिमों का भला ना करके सिर्फ ‘वोटिंग मशीन’ बनाया

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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के रण में एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की एंट्री ने मुस्लिम वोटों के बंटने की नई जमीन तैयार कर दी है। मुर्शिदाबाद में हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के साथ हाथ मिलाकर असदुद्दीन ओवैसी ने टीएमसी, कांग्रेस और लेफ्ट पर करारा हमला बोला है। ओवैसी ने साफ शब्दों में कहा कि अब तक बंगाल के मुसलमानों का इस्तेमाल केवल सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने के लिए ‘वोटिंग मशीन’ की तरह किया गया है, लेकिन अब बदलाव का वक्त आ गया है। ओवैसी और हुमायूं कबीर के बयानों ने TMC में बवाल मचा दिया है। दोनों नेताओं ने इमोशनल विक्टिम कार्ड खेल रही ममता बनर्जी की पोल खोलकर रख दी। ओवैसी ने एक गहरी सच्चाई बयां करते हुए कहा, “यह हकीकत है कि जिस समुदाय के पास अपना नेतृत्व होता है, वही तरक्की और विकास देख पाता है। पिछले डेढ़ दशक में बंगाल में मुसलमानों की आबादी बढ़कर करीब 30 फीसदी हो चुकी है, लेकिन सरकारी नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी मात्र 7 फीसदी क्यों है? वह इसलिए है क्योंकि टीएमसी मुसलमानों का इस्तेमाल केवल सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने के लिए ‘वोट बैंक’ के रूप में करती रही है। अब मुसलमान जाग गया है और मुसलमानों को ममता बनर्जी नहीं, बल्कि अपना मुस्लिम नेता चाहिए।”

ममता दीदी के ईद पर दुआ मांगने से मुस्लिम बच्चों का पेट नहीं भरेगा
असदुद्दीन ओवैसी और हुमायूं कबीर के गठबंधन ने टीएमसी के मुस्लिम वोटों में सेंध लगाने का बड़ा प्लेटफार्म खड़ा कर दिया है। मुस्लिमों को भी लगने लगा है कि इतने सालों में उन्हें टीएमसी से छल के अलावा कुछ नहीं मिला है। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए ओवेसी ने कहा, बंगाल में आपका कल्याण इसलिए नहीं हो रहा है, क्योंकि आपका अपना कोई बोलने वाला नहीं है। हुमायूं कबीर को अपना ‘बड़ा भाई’ बताते हुए कहा कि यह गठबंधन केवल चुनाव के लिए नहीं, बल्कि बंगाल में एक स्वतंत्र मुस्लिम नेतृत्व खड़ा करने के लिए है। ओवैसी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर निशाना साधते हुए कहा, “ममता दीदी ईद के मौके पर रेड रोड जाकर दुआ तो मांगती हैं, लेकिन क्या दुआ मांगने से बच्चों के पेट में खाना आ जाएगा? क्या इससे शिक्षा मिल जाएगी?” उन्होंने आरोप लगाया कि टीएमसी ने मुसलमानों के वोट तो लिए, लेकिन जमीन पर उनके लिए कुछ नहीं किया।बंगाल में लेफ्ट और कांग्रेस ने दशकों राज किया, पर हालात नहीं सुधरे
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने 5 लाख ओबीसी सर्टिफिकेट रद्द होने के मुद्दे पर भी उन्होंने ममता सरकार को घेरा और इसे अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय बताया। वहीं, कांग्रेस और लेफ्ट को लपेटते हुए ओवैसी ने कहा कि इन पार्टियों ने दशकों तक बंगाल पर राज किया, लेकिन मुसलमानों की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, ‘कांग्रेस और लेफ्ट खुद को धर्मनिरपेक्षता का अलंबरदार बताते हैं, लेकिन जब मुसलमानों के हक की बात आती है, तो ये पार्टियां मौन हो जाती हैं। ये वही लोग हैं जो भाजपा का डर दिखाकर आपको डराते हैं ताकि आप हमेशा इनके गुलाम बने रहें।’ ओवैसी ने कहा कि मुस्लिम समाज अब ‘रजिया गुंडों में फंस गई’ वाली स्थिति में नहीं रहेगा। मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिले, जो पारंपरिक रूप से कांग्रेस और अब टीएमसी के गढ़ रहे हैं। यहीं पर ओवैसी और हुमायूं कबीर की जोड़ी ने ममता बनर्जी की चिंताएं बढ़ा दी हैं। ओवैसी ने दावा किया कि उनके गठबंधन की जीत ही यह सुनिश्चित करेगी कि विधानसभा में मुसलमानों की आवाज मजबूती से गूंजे। उन्होंने मतदाताओं से अपील की कि वे इस बार ‘वोटिंग मशीन’ बनने के बजाय ‘किंगमेकर’ बनें।मुस्लिम वोटों का बदलता समीकरण ममता के सामने सबसे बड़ी चुनौती
पश्चिम बंगाल की राजनीति लंबे समय से मुस्लिम मतदाताओं के इर्द-गिर्द घूमती रही है। राज्य में मुस्लिम आबादी लगभग 30 प्रतिशत मानी जाती है और करीब 120 से अधिक विधानसभा सीटों पर उनका प्रभाव निर्णायक माना जाता है। पिछले डेढ़ दशक में ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस ने इसी सामाजिक समीकरण के आधार पर अपनी सबसे मजबूत राजनीतिक जमीन तैयार की। भाजपा के खिलाफ “धर्मनिरपेक्ष ढाल” और अल्पसंख्यकों की संरक्षक की छवि बनाकर ममता बनर्जी ने लगातार चुनावी लाभ उठाया। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले पहली बार यह सवाल गंभीरता से उठने लगा है कि क्या मुस्लिम मतदाताओं की भलाई के लिए टीएमसी सरकार ने क्या किया है? इसलिए इस बार मुस्लिम मतदाता विकल्प तलाशने में जुट गए हैं। यदि ऐसा हुआ, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान तृणमूल कांग्रेस को ही उठाना पड़ सकता है।ओवैसी और हुमायूं कबीर बन रहे मुस्लिमों के लिए नए विकल्प
हाल के महीनों में AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी और बंगाल के नेता हुमायूं कबीर की सक्रियता ने तृणमूल कांग्रेस की चिंता बढ़ा दी है। दोनों नेता यह तर्क दे रहे हैं कि बंगाल में मुसलमानों का इस्तेमाल केवल “वोट बैंक” के रूप में हुआ है। उनका कहना है कि चुनाव के समय मुस्लिम समाज से समर्थन लिया जाता है, लेकिन सत्ता में आने के बाद उनके सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक विकास पर अपेक्षित काम नहीं होता। यही कारण है कि वे “स्वतंत्र मुस्लिम नेतृत्व” की जरूरत का मुद्दा उठा रहे हैं। ओवैसी लंबे समय से यह दावा करते रहे हैं कि मुस्लिम समाज को केवल प्रतीकात्मक राजनीति नहीं, बल्कि राजनीतिक भागीदारी और नेतृत्व चाहिए। हुमायूं कबीर भी इसी तर्क को बंगाल के संदर्भ में आगे बढ़ा रहे हैं। यदि यह संदेश सीमावर्ती जिलों और मुस्लिम बहुल इलाकों में असर डालता है, तो तृणमूल कांग्रेस के लिए यह नई चुनौती बन सकती है।इस बार मुस्लिम बहुल इलाकों में वोटों के विभाजन लगभग तय
तृणमूल कांग्रेस की चुनावी सफलता का बड़ा आधार मुस्लिम वोट रहा है। 2011 में वाम मोर्चे को सत्ता से हटाने के बाद से ममता बनर्जी ने लगातार मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत की। 2019 के लोकसभा चुनाव और 2021 के विधानसभा चुनाव में भी यही देखा गया कि जिन सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक थे, वहां तृणमूल कांग्रेस को बड़ा फायदा मिला। मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर और दक्षिण 24 परगना, बीरभूम, दिनाजपुर और नदिया जैसे जिलों में मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण ने टीएमसी को मजबूत बढ़त दिलाई। लेकिन अब यदि इन्हीं इलाकों में वोटों का विभाजन तय होता नजर आने लगा है। मुस्लिम मतदाताओं के बदले हुए समीकरण विधानसभा चुनाव की पूरा गणित बदल सकते हैं। दरअसल, मुस्लिम राजनीति में इस समय सबसे बड़ा सवाल प्रतिनिधित्व का है। आलोचकों का कहना है कि बंगाल में मुस्लिम आबादी बड़ी होने के बावजूद उन्हें सरकारी नौकरियों, प्रशासनिक पदों और राजनीतिक नेतृत्व में पर्याप्त हिस्सेदारी नहीं मिली है। विभिन्न रिपोर्टों में यह बात सामने आती रही है कि सरकारी सेवाओं में मुस्लिम प्रतिनिधित्व उनकी आबादी के अनुपात से काफी कम है।कांग्रेस और वाम दल भी टीएमसी के मुस्लिम वोट बैंक में करेंगे सेंधमारी
मुस्लिम वोटों के बंटवारे की संभावना केवल ओवैसी और कबीर तक सीमित नहीं है। कांग्रेस और वाम दल भी इस बार कुछ हिस्सों में अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश कर रहे हैं। खासकर मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे जिलों में कांग्रेस की पारंपरिक पकड़ रही है। अधीर रंजन चौधरी जैसे नेताओं के दौर में कांग्रेस इन इलाकों में मजबूत रही थी। हालांकि पिछले कुछ चुनावों में टीएमसी ने यहां कांग्रेस की जमीन कमजोर की, लेकिन अब कांग्रेस फिर से मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी प्रासंगिकता साबित करने की कोशिश कर रही है। वाम दल भी यह तर्क दे रहे हैं कि टीएमसी ने केवल भय की राजनीति के आधार पर मुस्लिम वोट हासिल किए हैं। वामपंथी दल रोजगार, शिक्षा और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को सामने रखकर अल्पसंख्यक मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की कोशिश कर सकते हैं। यदि कांग्रेस, वाम दल और ओवैसी-कबीर अलग-अलग हिस्सों में थोड़े-थोड़े मुस्लिम वोट भी हासिल कर लेते हैं, तो इसका सीधा फायदा भाजपा को होने वाला है।मुस्लिमों की बदली सोच से ममता के लिए यह सबसे मुश्किल चुनाव
ममता बनर्जी की राजनीति का बड़ा आधार यह रहा है कि उन्होंने खुद को भाजपा की खिलाफत करने वाले नेता के रूप में स्थापित किया। मुस्लिम मतदाता भी लंबे समय तक यही मानते रहे कि भाजपा को रोकने के लिए टीएमसी ही प्रभावी विकल्प है। लेकिन अब पहली बार ऐसा लगता है कि मुस्लिम समाज के भीतर भी यह सवाल उठ रहा है कि क्या केवल भाजपा को रोकना ही पर्याप्त है, या फिर उन्हें अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी पर भी ध्यान देना चाहिए। इसके लिए टीएमसी से ज्यादा जरूरी है कि उनके समुदाय का नेता उनका प्रतिनिधित्व करे। यह सकारात्मक सोच मजबूत होती है, तो ममता बनर्जी के लिए यह सबसे कठिन चुनाव साबित हो सकता है। क्योंकि भाजपा का वोट बैंक पहले से काफी हद तक स्थिर माना जाता है, जबकि टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत उसके अल्पसंख्यक समर्थक रहे हैं। ऐसे में यदि मुस्लिम वोटों में 5 से 10 प्रतिशत का भी बंटवारा होता है, तो कई सीटों पर इसका सीधा असर दिख सकता है। मुस्लिम वोटों के बंटवारे का सबसे ज्यादा असर सीमावर्ती जिलों में दिखाई देगा। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, बीरभूम, नदिया और उत्तर 24 परगना जैसे इलाकों में मुस्लिम आबादी बड़ी संख्या में है। यहां कई सीटें ऐसी हैं जहां जीत-हार का अंतर बहुत कम रहता है। यदि मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा टीएमसी के अलावा अन्य दलों में बंटता है, तो भाजपा को लाभ मिल सकता है।ममता ने मुस्लिमों की जमीन पर मंदिर बनवाकर विश्वासघात किया- कबीर
एक ओर ओवैसी ने मुसलमानों को ‘वोटिंग मशीन’ बनाए जाने पर तीखा प्रहार कर रहे हैं, दूसरी ओर हुमांयू कबीर बाबरी मस्जिद के नाम पर मुस्लिमों को भावनात्मक रूप से अपने साथ जोड़ रहे हैं। कबीर ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले अपनी ऐसी छवि बना ली ही है, जिसमें उन्होंने बाबरी मस्जिद को वरीयता देते हुए टीएमसी से सीधी लड़ाई ली है। बाबरी मस्जिद के मुद्दे पर टीएमसी का साथ ना आने भी मुसलमानों को भावनात्मक रूप से काफी खल रहा है। हुमायूं कबीर ने भी ओवैसी का समर्थन करते हुए कहा कि ममता बनर्जी ने मुसलमानों की जमीन पर मंदिर बनवाकर और उनकी अनदेखी कर विश्वासघात किया है। ओवैसी और हुमायूं कबीर ने गठबंधन का घोषणापत्र भी जारी किया। बता दें के दोनों का गठबंधन बंगाल की 180 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ेंगे और उनका लक्ष्य केवल सीटें जीतना नहीं, बल्कि सत्ता की चाबी अपने हाथ में रखना है। दोनों के इन तीखे तेवरों ने यह साफ कर दिया है कि 23 और 29 अप्रैल को होने वाले मतदान में मुस्लिम वोट बैंक का बिखराव टीएमसी के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित होने वाला है।इधर मुस्लिम वोट बैंक छिन रहा, उधर SIR में लापरवाही से SC नाराज
एक और पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक में सैंधमारी से ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर जिस तरह की अव्यवस्था, अनुचित राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रशासनिक शिथिलता लगातार सामने आ रही है, उसने ममता सरकार की नीयत और क्षमता दोनों पर बेहद गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मुस्लिम मतदाताओं को खुश करने के लिए ममता बनर्जी किस हद तक जा सकती हैं, यह इसी से साफ हो जाता है कि रामनवमी से पहले भगवान राम की मूर्ति का सिर काटकर ले जाने वाले जिहादियों पर भी वह अब तक मौन है और ना ही इस मामले में कोई गिरफ्तारी सामने आई है। दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने एक दिन पहले ही  मालदा जिले में SIR से जुड़े 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर को बंधक बनाए जाने की घटना पर सख्त नाराजगी जताते हुए सरकार को कड़ी डांट फटकार लगाई है। सर्वोच्च अदालत ने साफ कहा है कि यह घटना सोची-समझी और भड़काऊ लगती है। इसका मकसद न्यायिक अधिकारियों का मनोबल गिराना और चुनावी प्रक्रिया को बाधित करना है।बंगाल में कोर्ट से लेकर संवैधानिक संस्थाओं के निर्देशों की अवमानना
दरअसल, हार की हताशा में पश्चिम बंगाल में स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि अदालत को “कानून-व्यवस्था का पूर्ण पतन” जैसी कठोर टिप्पणी करनी पड़ी। यह केवल SIR का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल बन गया है कि क्या पश्चिम बंगाल सरकार संवैधानिक संस्थाओं के आदेशों का पालन करने के लिए तैयार भी है या नहीं। नाम कटने, फर्जी आपत्तियों, तकनीकी गड़बड़ियों, न्यायिक अधिकारियों को घेरने और प्रशासनिक अराजकता जैसी घटनाएं यह साबित करती हैं कि राज्य सरकार संवैधानिक संस्थाओं की चेतावनियों को गंभीरता से लेने को तैयार नहीं है। जब संवैधानिक संस्थाओं के निर्देशों की लगातार अनदेखी होती है, तब यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत बन जाता है। ममता बनर्जी और उनकी सरकार हर बार राजनीतिक साजिश और विक्टिम कार्ड का सहारा लेकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करती दिखती हैं, जबकि सच्चाई यह है कि संवैधानिक संस्थाओं की अवमानना धीरे-धीरे उनकी सरकार की कार्यशैली का स्थायी हिस्सा बनती जा रही है।सात न्यायिक अधिकारियों का कई घंटे तक घेराव और नारेबाजी
सर्वोच्च अदालत में सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा कि पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था ढह गई है। बेंच ने राज्य के गृह सचिव, डीजीपी और अन्य अधिकारियों से उनकी निष्क्रियता पर जवाब मांगा। दरअसल, 7 न्यायिक अधिकारी बुधवार को मालदा के बीडीओ ऑफिस पहुंचे थे। इनमें तीन महिलाएं थीं। तभी वोटर लिस्ट में कथित रूप से नाम कटने के विरोध में हजारों लोगों ने ऑफिस को घेर लिया। प्रदर्शनकारियों ने ऑफिस का घेराव कर लिया। सभी 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर को बाहर निकलने नहीं दिया। प्रदर्शनकारी नारेबाजी और विरोध प्रदर्शन करते रहे। कई घंटों तक चले हंगामे के बाद प्रदर्शनकारी जब नहीं हटे तो पुलिस की मदद लेनी पड़ी। पुलिस सुरक्षा में अधिकारियों को बाहर ले जाया गया। इस दौरान भी रास्ते में बैरेकेडिंग कर उन्हें रोकने की कोशिश की गई।

कोर्ट रूम LIVE-सीजेआई सूर्यकांत ने ममता सरकार को जमकर लगाई फटकार 
दरअसल सुप्रीम कोर्ट में SIR के खिलाफ लगाई गई याचिका पर सुनवाई हो रही थी। इस मामले में याचिकाकर्ताओं और राज्य की ओर से पेश वकील- वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, श्याम दीवान, गोपाल शंकरनारायणन, मेनका गुरुस्वामी। भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू भारत निर्वाचन आयोग की तरफ से थे।
CJI: क्या आपने देखा है कि क्या हुआ है?
कपिल सिब्बल: मुझे एक रिपोर्ट (मालदा वाली) मिली है… मैंने इसे पढ़ा है।
मेनका गुरुस्वामी: ये एक गैरराजनीतिक विरोध प्रदर्शन था।
CJI: हम इसे राजनीतिक नहीं बनाना चाहते।
तुषार मेहता: यह पूरी तरह से अस्वीकार्य है!
CJI: रात 11 बजे तक आपका कलेक्टर वहां मौजूद नहीं था। मुझे रात में मौखिक रूप से आदेश देने पड़े। खाना और पानी तक नहीं लेने दिया गया।
जस्टिस बागची: जिन व्यक्तियों को अब कानून-व्यवस्था सौंपी गई है, उन्हें ज्यादा सतर्क रहना होगा। कृपया पूछताछ करें… राज्य के ऐसे नेता हैं जिन्हें एक स्वर में बोलना चाहिए… हम यहां विशेष अधिकारियों की सुरक्षा के लिए हैं।
गोपाल एस: हम सुरक्षा बढ़ाएंगे।
तुषार मेहता: न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा के लिए अब राज्य पर भरोसा करना बुद्धिमानी नहीं होगी।
जस्टिस बागची: हम इसे चुनाव आयोग पर छोड़ते हैं।
गोपाल एस: रिपोर्ट कहती है कि पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने अब सुरक्षा सुनिश्चित कर ली है। रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीणों ने कहा है कि वे विरोध जारी रखेंगे।
पश्चिम बंगाल के एडवोकेट जनरल: हम सभी जानते हैं कि न्यायिक अधिकारियों की रक्षा की जानी चाहिए। चुनाव आयोग को विरोधी के रूप में कार्य नहीं करना चाहिए।
CJI: मिस्टर एडवोकेट जनरल, अब आप हमें मजबूर कर रहे हैं। दुर्भाग्य से, आपके राज्य में आप में से हर कोई राजनीतिक भाषा बोलता है। यह सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात है। हमने कभी इतना ध्रुवीकृत राज्य नहीं देखा। यहां तक कि अदालती आदेशों के पालन में भी राजनीति झलकती है। क्या आपको लगता है कि हमें नहीं पता कि उपद्रवी कौन हैं? कम से कम मैं रात 2 बजे तक सब कुछ मॉनिटर कर रहा था!
‘अगर विरोध अराजनीतिक था, तो राजनीतिक नेता क्या कर रहे थे? क्या यह उनका कर्तव्य नहीं था कि वे मौके पर पहुंचें और देखें कि क्या हो रहा है? कि कोई कानून-व्यवस्था को अपने हाथ में लेने की कोशिश कर रहा है? 5 बजे इन लोगों ने अधिकारियों को घेर लिया। रात 11 बजे तक आपका कलेक्टर वहां नहीं था।’

 

मालदा घटना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने दिए सात आदेश

  • CBI या NIA जैसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए। एजेंसी सीधे कोर्ट को रिपोर्ट देगी।
  • चीफ सेक्रेटरी, DGP, DM, SSP को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।
  • सभी जिम्मेदार अधिकारियों को 6 अप्रैल को कोर्ट में पेश होने का आदेश।
  • चुनाव आयोग (ECI) को कहा कि केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात करें।
  • जहां-जहां जज काम कर रहे हैं, वहां सुरक्षा बढ़ाएं।
  • जिस गेस्ट हाउस में जज रुके हैं, उनकी सुरक्षा बढ़ाई जाए।
  • जहां SIR का काम चल रहा है, वहां एक बार में सिर्फ 5 लोगों को ही जाने की अनुमति होगी।

7 अधिकारी, 9 घंटे रहे बंधक, 6 पॉइंट में जानिए सारा मामला

  • 1. सुबह 10 बजे; प्रदर्शनकारी छोटे ग्रुप में जुड़ते गए, विरोध प्रदर्शन किया। एक अप्रैल को सुबह 10 बजे प्रदर्शनकारी छोटे ग्रुप में इकठ्ठा होते गए। फिर वे BDO ऑफिस के करीब गए, यहां प्रदर्शन करने लगे।
    2. दोपहर 2 बजे; न्यायिक अधिकारी मालदा के BDO ऑफिस पहुंचे। दोपहर 2 बजे के करीब 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर मालदा के माताबारी स्थित BDO ऑफिस पहुंचे। ये सभी अधिकारी SIR प्रोसेस से जुड़ा काम देख रहे थे।
    3. शाम 6 बजे; वोटर लिस्ट में नाम कटने को लेकर हजारों प्रदर्शनकारी बाहर जमा। इलेक्शन ऑब्जर्वर के ऑफिस पहुंचने की सूचना मिलते ही हजारों स्थानीय लोग बाहर जमा हो गए। उन्होंने SIR में नाम कटने के विरोध में प्रदर्शन किया।
    4. शाम 7 बजे; प्रदर्शनकारियों की ऑफिस के अंदर जाने की मांग। प्रदर्शनकारियों ने ऑफिस का घेराव कर लिया। सभी 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर को बाहर निकलने नहीं दिया। प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि वे अधिकारियों के सामने अपनी बात रखना चाहते हैं। जिससे इनकार कर दिया गया।
    5. रात 11 बजे; पुलिस सुरक्षा में अधिकारी निकाले गए, गाड़ी रोकने की कोशिश। कई घंटों तक चले हंगामे के बाद प्रदर्शनकारी जब नहीं हटे तो पुलिस की मदद लेनी पड़ी। पुलिस सुरक्षा में अधिकारियों को बाहर ले जाया गया। इस दौरान भी रास्ते में बैरेकेडिंग कर उन्हें रोकने की कोशिश की गई।
    6. रात 12 बजे; न्यायिक अधिकारी की गाड़ियों में तोड़फोड़ की गई, ईंट से हमला। जिस गाड़ी से न्यायिक अधिकारियों को बाहर निकाला गया। उस गाड़ी पर प्रदर्शनकारियों ने ईंट से हमला किया। गाड़ी के शीशे तोड़ दिए गए।

अब 4 पॉइंट में मालदा में वोटर लिस्ट में जुड़ा पूरा विवाद

  • 1. यह मामला क्या है? दस्तावेजों में गड़बड़ियां, काफी समय से अनुपस्थिति और तकनीकी त्रुटियों के चलते SIR के बाद मालदा सहित राज्य के कई सीमावर्ती जिलों में हजारों लोगों के नाम सूची से हटा दिए गए हैं। तभी से स्थानीय लोग प्रदर्शन कर रहे हैं।
    2. यह कितने गांवों से जुड़ा है? मालदा जिले में 100 से ज्यादा गांवों की मतदाता सूची इस संशोधन से प्रभावित हुई है।
    3. SIR में हर गांव से कितने लोगों के नाम काटे गए? यह आंकड़ा प्रशासन ने जारी नहीं किया है, लेकिन विभिन्न सूत्रों और ग्राम पंचायतों से मिली जानकारी के अनुसार शिलालमपुर कालियाचक-2 से 427 लोगों के नाम हटाए गए। कुछ अन्य गांवों में 50 से 200 तक मतदाताओं के नाम हटाए जाने की खबर है। हालांकि जिन नामों को हटाया गया है, उनकी समीक्षा जारी है।
    4. नाम क्यों काटे गए?
    • दस्तावेजों में गड़बड़ी: SIR की सुनवाई के दौरान जमा किए गए दस्तावेजों को कई मामलों में ‘अप्रमाणित’ या ‘अपर्याप्त’ माना गया।
    • लंबे समय से अनुपस्थिति: कुछ मामलों में यह कहा गया कि संबंधित व्यक्ति उस पते पर स्थायी रूप से नहीं रहते (विशेषकर प्रवासी मजदूर)।
    • तकनीकी व प्रक्रियागत त्रुटियां: डिजिटल डाटाबेस अपडेट के दौरान एक ही व्यक्ति का नाम दो बार होना या जन्मतिथि में गलती जैसी वजहों से भी नाम हटे।

सीजेआई भड़के और कहा कि फिजूल की आपत्तियां ना उठाएं
इससे पपहले पश्चिम बंगाल एसआईआर मामले में बुधवार को भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। पश्चिम बंगाल में SIR यानी विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण कार्य प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में TMC सांसद कल्याण बनर्जी ने ऐसी दलील दी, जिस पर सीजेआई सूर्यकांत भड़क गए। टीएमस सांसद कल्याण बनर्जी की दलीलों पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि फिजूल की आपत्तियां न उठाएं यह सिर्फ ओरिएंटेशन है। दरअसल, टीएमसी सांसद ने अपीलीय ट्रिब्यूनल के गठन पर सवाल उठाया था। पश्चिम बंगाल में एसआईआर मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल और TMC सांसद कल्याण बनर्जी ने दलीलें रखीं। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि अब तक करीब 47 लाख आपत्तियों का निपटारा किया जा चुका है। कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी कि हर दिन लगभग 2 लाख आपत्तियों पर कार्रवाई की जा रही है। कोलकाता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने अपने पत्र में CJI को बताया कि सात अप्रैल तक सभी आपत्तियों का निपटारा कर दिया जाएगा। वहीं, चुनाव आयोग (ECI) ने कोर्ट को बताया कि इस मामले में 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल गठित किए गए हैं।

ममता ने ‘खेला होबे’ से किया इशारा, राज्य में डर का राज – भाजपा
राज्य के अंदर की बिगड़ी स्थिति को संभाल पाने में विफल रहने पर टीएमसी मालदा की घटना की जिम्मेदारी गृह मंत्री अमित शाह पर डालने की बेशर्मी भी कर रही है। टीएमसी के मुताबिक शाह लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने में बार-बार विफल रहे। इससे कानून-व्यवस्था कमजोर हुई। दूसरी ओर भाजपा ने कहा कि तृणमूल सरकार ने बंगाल में डर का राज कायम कर रखा है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने ‘एक्स’ पर लिखा-‘मालदा के कालियाचक में हिंसक भीड़ ने 7 न्यायिक अधिकारियों को बंधक बना लिया। राष्ट्रीय राजमार्ग जाम कर दिए गए। आवाजाही ठप हो गई और सत्ता की जगह डर का राज छा गया। ममता बनर्जी ने एक दिन पहले कहा था- खेला होबे। क्या उनका इशारा इसी ओर था?’ बता दें कि पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत 28 फरवरी को फाइनल वोटर लिस्ट जारी हुई थी। इसमें 7.04 करोड़ वोटर के नाम थे। लगभग 60 लाख नाम न्यायिक जांच के दायरे में रखे गए। इन्हें वोटर लिस्ट में रखने या हटाने पर फैसले के लिए 705 न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त किया गया था।

पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े प्रमुख घटनाक्रम की टाइमलाइन
• 2 अप्रैल 2026: Supreme Court of India ने मालदा में सात न्यायिक अधिकारियों को कई घंटों तक बंधक बनाए जाने की घटना पर स्वतः संज्ञान लिया। अदालत ने इसे “कानून-व्यवस्था का पूर्ण पतन” बताया और राज्य के मुख्य सचिव, DGP, मालदा DM और SP को नोटिस जारी किया।
• 1 अप्रैल 2026: मालदा के कालियाचक में SIR मामलों की सुनवाई कर रहे सात न्यायिक अधिकारियों, जिनमें तीन महिला अधिकारी भी थीं, को दोपहर से रात तक BDO कार्यालय में घेरकर रखा गया। पुलिस और CAPF की मदद से देर रात अधिकारियों को निकाला गया।
• 31 मार्च 2026: Supreme Court of India ने कहा कि लगभग 60 लाख दावे और आपत्तियां SIR प्रक्रिया में आई हैं, जिनमें से 47.3 लाख मामलों का निपटारा हो चुका है। अदालत ने बाकी मामलों को 7 अप्रैल तक पूरा करने का निर्देश देने के साथ ही कहा की फालतू की आपत्तियां ना लगाएं।
• 30 मार्च 2026: TMC ने मांग की कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनके लिए कारण सार्वजनिक किए जाएं और अपील की प्रक्रिया को जिला स्तर से नीचे BDO स्तर तक ले जाया जाए।
• 28 मार्च 2026: Election Commission of India ने SIR मामलों के खिलाफ अपील सुनने के लिए 24 जिलों में अपीलीय ट्रिब्यूनल गठित किए। बाद में Supreme Court of India ने इन ट्रिब्यूनलों को ताजा दस्तावेज स्वीकार करने की अनुमति भी दी।
• मार्च 2026 के दूसरे और तीसरे सप्ताह: Murshidabad, Malda, Nadia और सीमावर्ती जिलों में कथित रूप से मतदाता सूची से नाम कटने के खिलाफ लगातार विरोध प्रदर्शन, सड़क जाम, धरना और राजनीतिक टकराव बढ़े।• 10 मार्च 2026: Supreme Court of India ने SIR में लगे न्यायिक अधिकारियों की निष्पक्षता पर सवाल उठाने वालों को फटकार लगाई और कहा कि सरकार को न्यायिक अधिकारियों की ईमानदारी पर संदेह करना उचित नहीं है।
• मार्च 2026 की शुरुआत: टीएमसी के लोगों ने आरोप लगाया कि मतदाताओं के नाम भी सूची से हटाए जा रहे हैं। Murshidabad, Malda और सीमावर्ती जिलों में सबसे ज्यादा दावे और आपत्तियां दर्ज हुईं।
• 27 फरवरी 2026: Supreme Court of India ने TMC की उस आपत्ति को खारिज कर दिया जिसमें न्यायिक अधिकारियों को दिए जा रहे ECI के प्रशिक्षण मॉड्यूल पर सवाल उठाए गए थे। अदालत ने कहा कि न्यायिक अधिकारी किसी दबाव में नहीं आएंगे।
• 26 फरवरी 2026: Election Commission of India ने SIR प्रक्रिया को पूरा करने के लिए 530 न्यायिक अधिकारियों की तैनाती की। इन्हें विभिन्न जिलों में दावे, आपत्तियां और मतदाता सूची की जांच की जिम्मेदारी दी गई।
• 22 फरवरी 2026: SIR में “logical discrepancy” वाले मामलों की संख्या को लेकर नया विवाद सामने आया। यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि कितने मामलों को न्यायिक अधिकारियों के पास भेजा जाएगा।
• 20 फरवरी 2026: Supreme Court of India ने Calcutta High Court को सेवा में कार्यरत और सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों को SIR कार्य में लगाने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार और Election Commission of India के बीच “trust deficit” है।
• 17 फरवरी 2026: Election Commission of India ने राज्य सरकार को SIR में हुई कथित गड़बड़ियों पर कार्रवाई और FIR दर्ज करने के निर्देशों के पालन के लिए अंतिम समयसीमा दी। • 16 फरवरी 2026: Election Commission of India ने SIR प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही, कर्तव्य में चूक और अधिकारों के दुरुपयोग के आरोप में सात अधिकारियों को निलंबित कर दिया।
• 10 फरवरी 2026: Election Commission of India ने घोषणा की कि SIR से जुड़े दावे और आपत्तियों की सुनवाई 21 फरवरी तक पूरी होगी और अंतिम मतदाता सूची 28 फरवरी को प्रकाशित की जाएगी।
• 3 फरवरी 2026: Mamata Banerjee ने Supreme Court of India और चुनाव आयोग के सामने आरोप लगाया कि SIR प्रक्रिया विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल की जा रही है। हालांकि इसको लेकर वह कोई ठोस तथ्य नहीं दे पाईं।
• 12 जनवरी 2026: Mamata Banerjee ने Election Commission of India को अपना पांचवां पत्र भेजा और आरोप लगाया कि AI आधारित डिजिटाइजेशन और सॉफ्टवेयर त्रुटियों की वजह से मतदाताओं के नाम गलत तरीके से चिह्नित किए जा रहे हैं।
• जनवरी 2026 के पहले सप्ताह: पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के तहत बड़े पैमाने पर मतदाता सत्यापन, नाम जोड़ने, हटाने और दस्तावेज जांच का काम बड़े पैमाने पर शुरू हुआ। सीमावर्ती जिलों, विशेषकर Murshidabad, Malda और Nadia में शुरुआत से ही सबसे ज्यादा विवाद सामने आए।

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