प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार के मोर्चे पर बेहद उत्साहजनक आंकड़े सामने आए हैं। केंद्र सरकार द्वारा जारी ताजा आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) की रिपोर्ट बताती है कि देश में न केवल बेरोजगारी कम हुई है, बल्कि श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी ने भी नई ऊंचाइयों को छुआ है।

अक्टूबर-दिसंबर 2025 की तिमाही के आंकड़ों के अनुसार, 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के व्यक्तियों के लिए श्रम बल सहभागिता दर (LFPR) बढ़कर 55.8 प्रतिशत हो गई है। पिछली तिमाही में यह आंकड़ा 55.1 प्रतिशत था। यह वृद्धि दर्शाती है कि देश के युवा और कामकाजी आबादी अब पहले से कहीं अधिक सक्रियता के साथ मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जुड़ रहे हैं।

महिला श्रम बल में रिकॉर्ड उछाल
इस रिपोर्ट की सबसे बड़ी हाइलाइट महिलाओं की भागीदारी रही है। प्रधानमंत्री मोदी के ‘महिला नेतृत्व वाले विकास’ के विजन का असर जमीन पर दिखने लगा है। महिला श्रम बल सहभागिता दर में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जो अब 34.9 प्रतिशत तक पहुंच गई है। महज एक तिमाही पहले यह 33.7 प्रतिशत पर थी।

ग्रामीण क्षेत्रों में तो महिलाओं ने कमाल कर दिया है। गांवों में महिलाओं की भागीदारी 37.5 प्रतिशत से बढ़कर सीधे 39.4 प्रतिशत हो गई है। यह आंकड़े साफ करते हैं कि सरकारी योजनाओं और कौशल विकास कार्यक्रमों के जरिए महिलाएं अब घर की चारदीवारी से निकलकर आर्थिक मजबूती की ओर बढ़ रही हैं।

बेरोजगारी के आंकड़ों में आई बड़ी गिरावट
विपक्ष के दावों के विपरीत, सरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में बेरोजगारी दर (UR) नीचे गिरी है। ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी दर 4.4 प्रतिशत से घटकर 4.0 प्रतिशत पर आ गई है। वहीं, शहरी क्षेत्रों में भी यह 6.9 प्रतिशत से कम होकर 6.7 प्रतिशत रह गई है।

खास बात यह है कि शहरी पुरुषों की बेरोजगारी दर में भी अच्छी गिरावट देखी गई है। यह 6.2 प्रतिशत से घटकर अब 5.9 प्रतिशत रह गई है। रोजगार के इन आंकड़ों से साफ है कि सरकार की नीतियां हर वर्ग तक काम पहुंचाने में सफल साबित हो रही हैं।

स्वरोजगार और स्टार्टअप इंडिया का दिख रहा असर
मोदी सरकार की ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘स्टार्टअप इंडिया’ जैसी योजनाओं ने लोगों को नौकरी मांगने वाले के बजाय नौकरी देने वाला बनाया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार (Self-Employment) में जुटे लोगों की हिस्सेदारी बढ़कर 63.2 प्रतिशत हो गई है।

शहरी इलाकों में भी यही ट्रेंड देखने को मिल रहा है, जहां स्वरोजगार करने वाले लोगों की संख्या 39.3 प्रतिशत से बढ़कर 39.7 प्रतिशत हो गई है। लोग अब अपनी छोटी इकाइयां और व्यवसाय शुरू करने में ज्यादा रुचि ले रहे हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बना कृषि क्षेत्र
भारत की आत्मा गांवों में बसती है और कृषि आज भी ग्रामीण रोजगार का सबसे बड़ा जरिया है। अक्टूबर-दिसंबर 2025 के दौरान ग्रामीण कार्यबल का 58.5 प्रतिशत हिस्सा कृषि क्षेत्र से जुड़ा रहा। पिछली तिमाही में यह 57.7 प्रतिशत था। इसके साथ ही, शहरों में सर्विस सेक्टर का दबदबा बरकरार है, जहां लगभग 61.9 प्रतिशत लोग कार्यरत हैं।

करोड़ों लोगों को मिला नया काम
अगर आंकड़ों को संख्या के लिहाज से देखें, तो यह बदलाव और भी बड़ा नजर आता है। जुलाई-सितंबर 2025 में देश में करीब 56.2 करोड़ लोग काम कर रहे थे। लेकिन साल के आखिरी तीन महीनों (अक्टूबर-दिसंबर) में यह संख्या बढ़कर 57.4 करोड़ हो गई है। यानी करीब 1.2 करोड़ नए लोग कार्यबल का हिस्सा बने हैं।

इन 57.4 करोड़ कामकाजी लोगों में 40.2 करोड़ पुरुष और 17.2 करोड़ महिलाएं शामिल हैं। महिलाओं की संख्या में आई यह बढ़ोतरी इस बात का प्रमाण है कि विकास की इस दौड़ में अब महिलाएं पीछे नहीं हैं।

पारदर्शिता के लिए बदली गई सर्वेक्षण पद्धति
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने आंकड़ों की सटीकता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए जनवरी 2025 से सर्वेक्षण की पद्धति में बड़ा बदलाव किया है। अब ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के अनुमान हर महीने और हर तिमाही जारी किए जा रहे हैं, ताकि सरकार वास्तविक समय में श्रम बाजार की नब्ज को समझ सके और जरूरी कदम उठा सके।










