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ममता की ‘बाहरी बनाम बंगाली’ की सियासत भबानीपुर में TMC के खिलाफ ही भारी पड़ेगी, गुजराती-मारवाड़ी भी नाराज

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पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में ‘बाहरी’ का मुद्दा बनाने वाली मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने ही जाल में फंस गई हैं। विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा के खिलाफ यह गलत नैरेटिव गढ़ा गया कि बंगाल की अस्मिता पर बाहरी ताकतें हमला कर रही हैं। दरअसल, राजनीति का सबसे बड़ा सच यही है कि जो मुद्दा एक समय हथियार बनता है, वही समय बदलने पर बोझ भी बन सकता है। ममता ने जिस भबानीपुर को सबसे सेफ मानकर वहां से चुनाव लड़ने का ऐलान किया, वहां बाहरी का मुद्दा उनके खिलाफ जाने वाला है। भवानीपुर को मिनी इंडिया कहा जाता है और यहां यहां बंगाली भद्रलोक और मुस्लिमों के अलावा मारवाड़ी व्यापारी, गुजराती परिवार, पंजाबी, सिख, जैन समुदाय भी बड़ी संख्या में रहते हैं। गैर बंगाली हिंदू समुदाय के करीब 36 प्रतिशत मतदाता हैं, जो टीएमसी की नजर में ‘बाहरी’ हो गए हैं। चुनाव में ये टीएमसी को मजा चखा सकते हैं। इसके अलावा एसआईआर में भबानीपुर विधानसभा क्षेत्र में 51 हजार से अधिक फर्जी मतदाताओं के नाम काटे गए हैं, जिनमें से करीब 25 फीसदी मुस्लिम हैं। यह नुकसान भी टीएमसी प्रत्याशी ममता को होगा। ममता के मुकाबले बीजेपी के सबसे कद्दावर उम्मीदवार सुवेंदु अधिकारी चुनाव मैदान में है। वह एक बार पहले नंदीग्राम में ममता बनर्जी को हरा चुके हैं। ऐसे में यह विधानसभा चुनाव चौतरफा घिरीं ममता बनर्जी के लिए अब तक का सबसे मुश्किल चुनाव बन गया है।जिस मुद्दे से सत्ता मिली, वही अब संकट बनता दिख रहा है
पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘बाहरी बनाम बंगाली’ का मुद्दा लंबे समय तक तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए सबसे प्रभावी राजनीतिक हथियार रहा है। लेकिन सियासी लड़ाई में कभी-कभी आपके हथियार ही बूमरैंग बनकर आपको की जख्मी कर देते हैं। आज भबानीपुर विधानसभा क्षेत्र में ममता बनर्जी के सामने ठीक वैसी ही चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है। भबानीपुर को ममता बनर्जी का सबसे सुरक्षित क्षेत्र माना जाता रहा है। यही कारण है कि उन्होंने एक बार फिर इसी सीट को अपने राजनीतिक भविष्य के लिए चुना है। लेकिन इस बार परिस्थितियां बहुत बदल गई हैं। जिस भबानीपुर को कभी तृणमूल का अभेद्य किला माना जाता था, वहीं अब कई ऐसे सामाजिक, राजनीतिक और चुनावी समीकरण बनते दिख रहे हैं जो ममता बनर्जी के लिए मुश्किलें बढ़ा सकते हैं।भबानीपुर के मतदाताओं के जातिगत आंकड़े ममता के खिलाफ
भबानीपुर को अक्सर “मिनी इंडिया” भी कहा जाता है, क्योंकि यहां बंगाली भद्रलोक और मुस्लिमों के अलावा मारवाड़ी व्यापारी, गुजराती परिवार, पंजाबी, सिख, जैन समुदाय भी बड़ी संख्या में रहते हैं। इस विधानसभा क्षेत्र का सामाजिक और जातिगत आधार काफी मिश्रित माना जाता है। यह सीट बंगाली, गैर-बंगाली, व्यापारी और अल्पसंख्यक समुदायों का मिश्रण है। एक आंकलन के मुताबिक इस विधानसभा क्षेत्र में बंगाली हिंदू सर्वाधिक लगभग 40 प्रतिशत हैं। इसके बाद गैर बंगाली हिंदू समुदाय के 36 प्रतिशत मतदाता हैं। इनमें मारवाड़ी, बिहारी, गुजराती, पंजाबी, जैन और सिख समुदाय शामिल हैं। मुस्लिम लगभग 24 प्रतिशत हैं। गैर-बंगाली हिंदू समुदाय की बात करें तो कायस्थ करीब 10%, गुजराती 9%, मारवाड़ी 6%, सिख, जैन और अन्य समुदायों के 11 प्रतिशत वोट माने जाते हैं।भबानीपुर विधानसभा: बंगाल नहीं, मिनी इंडिया की तस्वीर
भबानीपुर विधानसभा क्षेत्र की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सामाजिक विविधता है। भबानीपुर केवल एक बंगाली बहुल सीट नहीं है। इसे लंबे समय से ‘मिनी इंडिया’ कहा जाता है, क्योंकि यहां बंगाली समाज के साथ-साथ मारवाड़ी, गुजराती, पंजाबी, सिख, जैन और दूसरे गैर-बंगाली समुदायों की भी बड़ी मौजूदगी है। ऐसे में यदि तृणमूल कांग्रेस ‘बाहरी’ की राजनीति को दोबारा हवा देती है, तो इसका प्रतिकूल असर उन्हीं मतदाताओं पर पड़ सकता है जो वर्षों से इस क्षेत्र की सामाजिक और आर्थिक संरचना का हिस्सा रहे हैं। यह क्षेत्र केवल बंगाली मतदाताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां विभिन्न राज्यों और समुदायों के लोग दशकों से रह रहे हैं। मारवाड़ी व्यापारी वर्ग, गुजराती परिवार, पंजाबी और सिख समुदाय, जैन समाज और उत्तर भारतीय मतदाता बड़ी संख्या में यहां रहते हैं। यहां गैर-बंगाली हिंदू मतदाताओं की संख्या लगभग 36 प्रतिशत बताई जाती है। यह वह वर्ग है जिसने हमेशा विकास, सुरक्षा, कारोबार और स्थिरता के आधार पर मतदान किया है। भारतीय जनता पार्टी इन्हीं वादों के साथ चुनाव मैदान में है, जिसका उसे फायदा मिल सकता है।

‘बाहरी बनाम बंगाली’ की राजनीति का उल्टा पड़ेगा असर
राजनीति में शब्दों का असर बहुत गहरा होता है। लेकिन यदि तृणमूल कांग्रेस बार-बार ‘बाहरी’ का मुद्दा उठाती है, तो स्वाभाविक रूप से यह वर्ग अपने आपको निशाने पर महसूस कर सकता है। यदि किसी क्षेत्र के एक बड़े हिस्से को लगातार यह महसूस कराया जाए कि उनकी पहचान संदिग्ध है या उन्हें ‘बाहरी’ माना जा रहा है, तो इसका राजनीतिक प्रतिघात होना तय है। भबानीपुर में यही स्थिति बनती दिखाई दे रही है। ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस ने कई चुनावों में भाजपा को ‘बाहरी पार्टी’ बताकर बंगाली अस्मिता की राजनीति को हवा दी। यह रणनीति कुछ हद तक सफल भी रही। लेकिन अब वही रणनीति भबानीपुर में उनके खिलाफ जाती दिख रही है। यही वह बिंदु है जहां भाजपा राजनीतिक बढ़त लेने की कोशिश कर सकती है। भाजपा पहले से ही खुद को उन वर्गों की पार्टी के रूप में प्रस्तुत करती रही है जो पहचान की राजनीति से परेशान हैं। ऐसे में भबानीपुर में गैर-बंगाली मतदाता भाजपा की ओर अधिक झुक सकते हैं। मतदाता सूची में 51 हजार फर्जी नाम कटे, 25 प्रतिशत मुस्लिम
भबानीपुर में मतदाता सूची के पुनरीक्षण और फर्जी नामों को हटाने की प्रक्रिया भी इस चुनाव का बड़ा मुद्दा बन सकती है। इस विधानसभा क्षेत्र में 51 हजार से अधिक नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। इनमें लगभग 25 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता बताए जा रहे हैं। एसआईआर की प्रक्रिया के बाद अंतिम मतदाता सूची में 25 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। SIR प्रक्रिया से पहले, भवानीपुर में 2,06,295 वोटर थे। पहले चरण में 44,787 नाम ‘अनुपस्थित’, ‘स्थानांतरित’, ‘मृत’, ‘डुप्लीकेट’ या ‘अनमैप्ड’ जैसी श्रेणियों के तहत हटा दिए गए। दूसरे चरण में बाकि नाम हटाए गए और कुछ नए वोटर भी जोड़े गए। ममता बनर्जी की राजनीति लंबे समय से अल्पसंख्यक मतदाताओं के समर्थन पर काफी हद तक निर्भर रही है। ऐसे में मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव तृणमूल के लिए चिंता का कारण बन सकता है। हालांकि विपक्ष और सत्तापक्ष दोनों ही इस मुद्दे को अपने-अपने तरीके से पेश करेंगे, लेकिन इतना तय है कि मतदाता सूची का यह पुनर्गठन चुनावी गणित को प्रभावित करेगा।भाजपा का बड़ा चेहरा सुवेंदु ही ममता के सामने सबसे बड़ी चुनौती
इस चुनाव की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ममता बनर्जी के सामने भाजपा की ओर से कोई साधारण उम्मीदवार नहीं, बल्कि सुवेंदु अधिकारी जैसा सबसे बड़ा चेहरा मौजूद है। सुवेंदु अधिकारी वही नेता हैं जिन्होंने नंदीग्राम में ममता बनर्जी को हराकर बंगाल की राजनीति में बड़ा संदेश दिया था। सुवेंदु अधिकारी की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे केवल भाजपा के नेता नहीं हैं, बल्कि कभी तृणमूल कांग्रेस के भीतर ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में गिने जाते थे। वे तृणमूल की संगठनात्मक ताकत, उसकी रणनीति और उसकी कमजोरियों को बहुत करीब से जानते हैं। नंदीग्राम की जीत ने सुवेंदु अधिकारी को भाजपा के भीतर और पश्चिम बंगाल में एक बड़े जननेता के रूप में स्थापित किया है। वे भबानीपुर में भी ममता बनर्जी को कड़ी चुनौती देने में सफल रहे तो यह केवल एक सीट की लड़ाई नहीं रहेगी, बल्कि बंगाल की राजनीति में शक्ति संतुलन बदलने वाला संकेत बन सकती है।ममता के लिए सबसे कठिन चुनाव भविष्य की दिशा तय करेगा
पिछले डेढ़ दशक से पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सत्ता में बनी हुई हैं, लेकिन, इस बार परिस्थितियां अलग हैं। एंटी इंकम्बेंसी फेक्टर के अलावा मुस्लिम वोटों का बंटवारा भी होने जा रहा है। ‘बाहरी’ का मुद्दा, गैर-बंगाली मतदाताओं की नाराजगी, मतदाता सूची में बदलाव, अल्पसंख्यक वोट बैंक में संभावित असर और सामने सुवेंदु अधिकारी जैसा मजबूत प्रतिद्वंद्वी, इन सभी कारकों ने ममता के लिए चुनाव को बेहद कठिन बना दिया है। ममता बनर्जी अब केवल विपक्ष से नहीं लड़ रही हैं, बल्कि उन्हें अपने पुराने राजनीतिक नैरेटिव की सीमाओं से भी जूझना पड़ रहा है। भबानीपुर का चुनाव केवल एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं है। यह बंगाल की राजनीति की दिशा तय करने वाला चुनाव बनता जा रहा है। यहां यह साफ होगा कि पहचान की राजनीति, बाहरी-बनाम-स्थानीय का नैरेटिव और पुराने चुनावी हथियार अब भी उतने ही प्रभावी हैं या जनता नए सवाल पूछने लगी है। ममता बनर्जी के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा का प्रश्न है। वहीं भाजपा के लिए यह बहुत बड़ा अवसर है कि वह बंगाल की राजनीति में अपनी पकड़ को और सशक्त बनाकर सत्ता पर काबिज हो।

 

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