Home झूठ का पर्दाफाश कांग्रेस का ‘खटाखट’ वसूली मॉडल EXPOSED: पहले मुफ्त का झांसा, अब जनता...

कांग्रेस का ‘खटाखट’ वसूली मॉडल EXPOSED: पहले मुफ्त का झांसा, अब जनता की जेब पर डाका?

SHARE

चुनाव के समय मंचों से गूंजता वो ‘खटाखट-खटाखट’ का नारा आपको याद है? राहुल गांधी से लेकर कांग्रेस के तमाम दिग्गजों ने वादा किया था कि सरकार बनते ही महिलाओं और युवाओं के खातों में ‘खटाखट’ पैसे आएंगे। लेकिन चुनाव बीतते ही तस्वीर 180 डिग्री बदल गई है। अब पैसे जनता के खाते में आ नहीं रहे, बल्कि टैक्स, सेस और कमीशन के नाम पर जनता की जेब से ‘खटाखट’ काटे जा रहे हैं। राहुल गांधी के उन चुनावी वादों का बोझ अब आम आदमी की कमर तोड़ रहा है। हिमाचल की वादियों से लेकर कर्नाटक के गलियारों तक, कांग्रेस सरकारों का यह पैटर्न बेनकाब हो चुका है: पहले लोकलुभावन वादों से वोट बटोरना, और फिर सत्ता मिलते ही ‘वसूली अभियान’ चलाना!

कांग्रेस ने हिमाचल प्रदेश में गारंटियों की ऐसी झड़ी लगाई थी कि लगा था राज्य में विकास की नदियां बहेंगी। लेकिन हुआ क्या? 1 अप्रैल 2026 से एंट्री परमिट की दरों में ऐसी खटाखट बढ़ोतरी की गई कि पर्यटकों के साथ-साथ स्थानीय लोगों के भी होश उड़ गए। अब पर्यटकों को अपनी गाड़ियों के लिए 170 रुपये तक का मोटा शुल्क देना होगा। स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि इस फैसले से हिमाचल के पर्यटन उद्योग की कमर टूट जाएगी। हैरानी की बात यह है कि जो सरकार चुनाव से पहले रेवड़ियां बांट रही थी, वो अब ‘खजाना खाली है’ का राग अलाप रही है। विपक्ष का सवाल सीधा है- क्या चुनावी रैलियों में गारंटियां बांटते वक्त खजाने का आकलन करना भूल गए थे, या जनता को ठगने की यह सोची-समझी रणनीति थी?

हिमाचल में तो सिर्फ टैक्स बढ़ा है, लेकिन कर्नाटक में तो भ्रष्टाचार का ‘रेट कार्ड’ ही सार्वजनिक हो गया है। राज्य के मंत्री सतीश जारकीहोली के एक शर्मनाक बयान ने पूरी सियासत में आग लगा दी है। उन्होंने सरेआम स्वीकार किया कि ‘सरकारी कामों में कमीशन पहले भी था, अब भी है और आगे भी रहेगा।’ जब मंत्री खुद भ्रष्टाचार को सिस्टम का हिस्सा मान लें, तो समझ लीजिए कि विकास की फाइलें बिना सेवा-शुल्क के नहीं हिलेंगी। कर्नाटक के ठेकेदार अब हजारों करोड़ के बकाया भुगतान के लिए सड़कों पर हैं। आरोप है कि बिना 40 प्रतिशत कमीशन दिए सरकारी बिल पास ही नहीं होते।

विपक्ष अब इसे राहुल गांधी का असली डेवलपमेंट मॉडल बता रहा है, जहां राज्य के विकास के लिए पैसे नहीं हैं, लेकिन गारंटी के नाम पर वसूली और कमीशन का खेल जोरों पर है। पेट्रोल, डीजल और बिजली के बढ़ते दाम इस खटाखट मॉडल की कड़वी सच्चाई हैं।

कांग्रेस इसे राजस्व जुटाना कह सकती है, लेकिन जनता इसे चुनावी ठगी मान रही है। ऐसे में आज बहस सिर्फ टैक्स या कमीशन की नहीं, बल्कि उस भरोसे की है जो चुनावी विज्ञापनों में बेचा गया था। जब जेब से पेट्रोल, बिजली और एंट्री टैक्स के नाम पर पैसे कट रहे हैं, तब आम आदमी को समझ आ रहा है कि राजनीति में मुफ्त का खाना सबसे महंगा पड़ता है।

Leave a Reply