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संसद में पीएम मोदी पर हमले का प्लान? क्या राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस बन गई है ‘अर्बन नक्सलियों’ का नया ठिकाना?

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देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस आज अपनी विचारधारा को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में है। राजनीति में विरोध लाजमी है, लेकिन क्या विरोध के नाम पर देश को अस्थिर करना सही है? दरअसल में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने सदन में जो खुलासा किया है वह चौंकाने वाला है। बुधवार,4 जनवरी को पीएम मोदी का भाषण टाले जाने के पीछे की वजह बताते हुए बिरला ने कहा कि उन्हें जानकारी मिली थी कि कांग्रेस सांसद प्रधानमंत्री के साथ ‘मिसहैप’ (कोई अप्रिय घटना) करने की फिराक में थे। स्पीकर ने खुद अपनी आंखों से सांसदों को पीएम की कुर्सी की तरफ हिंसक तरीके से बढ़ते देखा, जिसके बाद उन्होंने सुरक्षा के लिहाज से पीएम को सदन में न आने की सलाह दी।

इस नैरेटिव के पीछे की हकीकत यहां देखें:

क्या कांग्रेस का एजेंडा अब विदेशों से तय हो रहा है? क्या राहुल के इशारे पर प्रधानमंत्री को शारीरिक नुकसान पहुंचाने की साजिश रची जा रही है?

इस खुलासे के बाद सोशल मीडिया से लेकर सत्ता के गलियारों तक एक ही चर्चा है कि क्या राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस अब ‘अर्बन नक्सलियों’ का नया अड्डा बन चुकी है? राहुल गांधी के हालिया बयानों और कांग्रेस की नई रणनीतियों ने जनता के मन में यह खौफ पैदा कर दिया है कि क्या सत्ता की लालच में देश को गृहयुद्ध की तरफ धकेला जा रहा है?

देखिए यह प्रमाण:

इस ट्वीट में साफ दिख रहा है कि कैसे कांग्रेस का नैरेटिव देश विरोधी ताकतों से मेल खा रहा है। प्रधानमंत्री को सदन में बोलने से रोकना लोकतंत्र नहीं, अराजकता है।

संस्थानों पर हमला: नक्सलियों जैसी रणनीति?
अर्बन नक्सल का पहला काम होता है देश की संवैधानिक संस्थाओं पर से जनता का भरोसा उठाना। राहुल गांधी आज वही कर रहे हैं। कभी चुनाव आयोग, कभी सुप्रीम कोर्ट, तो कभी भारतीय सेना पर सवाल उठाकर वह सिस्टम को पंगु बनाना चाहते हैं। यह वही अराजकता की थ्योरी है, जो नक्सली जंगलों में इस्तेमाल करते हैं और अर्बन नक्सल शहरों में। जानकारों का कहना है कि जब एक राष्ट्रीय नेता विदेशी धरती पर जाकर भारत की छवि खराब करता है, तो वह सीधे तौर पर उसी नक्सली विचारधारा को बढ़ावा देता है।

सोशल मीडिया पर लोग क्या कह रहे हैं, देखिए:

राहुल गांधी की ‘बांटो और राज करो’ वाली नीति का असली चेहरा यहां बेनकाब हो रहा है। महिला सांसदों को ढाल बनाकर पीएम पर हमला करने की कोशिश? क्या कांग्रेस अब प्रोफेशनल नक्सलियों की तरह ट्रेनिंग ले रही है?

विदेशी फंडिंग और बाहरी मदद का शक
डिजिटल मीडिया पर यह बहस छिड़ी है कि राहुल गांधी के सुर अचानक विदेशों में जाकर क्यों बदल जाते हैं? क्या भारत की अर्थव्यवस्था को चोट पहुँचाने के लिए किसी ‘इंटरनेशनल टूलकिट’ का इस्तेमाल हो रहा है? अडानी-हिंडनबर्ग जैसे मुद्दों पर देश में आग लगाने की कोशिश करना, इसी बड़ी साजिश का हिस्सा लगता है।

‘मोहब्बत की दुकान’ या ‘नफरत का सामान’?
जनता अब जागरूक हो चुकी है। राहुल गांधी जिसे ‘मोहब्बत की दुकान’ कहते हैं, आलोचक उसे ‘अर्बन नक्सलवाद का शोरूम’ बता रहे हैं। जाति के नाम पर समाज को तोड़ना और माओवादी भाषा का इस्तेमाल करना सीधे तौर पर देश की अखंडता के लिए खतरा है। यह लड़ाई अब सिर्फ दो पार्टियों की नहीं, बल्कि भारत की एकता बनाम ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग की है।

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