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पश्चिम बंगाल में एक मार्च से शुरू होगी परिवर्तन की आंधी, 300 रैलियों के साथ BJP ने तय किया इतनी सीटों का टारगेट

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पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव अब केवल सत्ता की लड़ाई नहीं रह गए हैं, बल्कि यह शासन मॉडल बनाम कुशासन के बीच निर्णायक मुकाबले का रूप ले चुके हैं। बिहार के बाद अब बंगाल में भी भारतीय जनता पार्टी ने बड़े पैमाने पर चुनावी तैयारी शुरू कर दी है। 170 प्लस सीटों का लक्ष्य, 300 से अधिक रैलियां और 1 मार्च से प्रस्तावित “परिवर्तन यात्रा” ये सब संकेत साफ बताते हैं कि पार्टी इस बार केवल चुनाव नहीं लड़ रही, बल्कि राज्य की जनता-जनार्दन के कल्याण, विकास और सुशासन के लिए सत्ता परिवर्तन का पूरा रोडमैप लेकर मैदान में उतरी है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस अपने बिछाए चक्रव्यूह में खुद ही फंसती जा रही है। मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदुओं के विरोध की राजनीति ममता बनर्जी की सियासत पर इस बार भारी पड़ने वाली है। दरअसल, बंगाल आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक तरफ भाजपा विकास, सुशासन और राष्ट्रीय एकीकरण की बात कर रही है, दूसरी ओर ममता सरकार बचाव की मुद्रा में है। बाबरी यात्रा से लेकर परिवर्तन यात्रा तक हर घटना इस चुनाव को और तीखा बनाने जा रही है। जनता के सामने अब स्पष्ट विकल्प है: पुरानी राजनीति या नई दिशा। आने वाले महीने तय करेंगे कि बंगाल की जनता जनार्दन किस तरह परिवर्तन से नई दिशा दय करने वाली है।पश्चिम बंगाल में भाजपा का 170 प्लस सीट जीतने का मिशन
पश्चिम बंगाल में भाजपा अपने मिशन 170 प्लस के लिए मजबूत सीटों पर ज्यादा जोर लगाएगी। इनमें पिछली बार जीती 77 सीटे ए श्रेणी की हैं। इसके अलावा विभिन्न सामाजिक समीकरणों से उसके लिए अनुकूल स्थिति बनाने वाली 50 सीटें बी और पचास सीटें सी श्रेणी की हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा व तृणमूल कांग्रेस में साढ़े छह फीसदी से ज्यादा का वोट अंतर था। भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि ममता सरकार के कुशासन और इंटी इंकम्बेंसी के चलते इस बार ऐसा नहीं होगा। चूंकि राज्य में लगभग सीधा मुकाबला है इसलिए जो भी जनादेश होगा स्पष्ट होगा। पिछली बार तृणमूल कांग्रेस ने 44.91 फीसद मत पाकर 211 सीटें जीती थी, जबकि भाजपा ने 38.15 फीसद वोट हासिल कर 77 सीटें जीती थी। साढ़े छह फीसदी वोट के इस अंतर ने सीटों को लेकर बड़ा अंतर पैदा कर दिया था। आम तौर पर बदलाव की स्थिति में दो से तीन फीसद वोटों का अंतर आता है, भाजपा को सफलता के लिए तृणमूल के लगभग साढ़े तीन फीसद वोट अपनी तरफ लाने होंगे। इसके लिए पार्टी ने सभी सीटों के लिए अलग-अलग रणनीति पर काम शुरू कर दिया है।पीएम मोदी का विकास फैक्टर बनाम ममता का विनाश मॉडल
इस चुनाव का सबसे बड़ा ध्रुव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता और केंद्र सरकार की हर वर्ग के लिए जनकल्याणकारी नीतियां हैं। उज्ज्वला से लेकर पीएम आवास, आयुष्मान से लेकर रोजगार मेले, डिजिटल इंडिया से लेकर स्टार्टअप इंडिया और इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर मैन्युफेक्चिंग तक बीते एक दशक से ज्यादा समय में जिस तरह सबका साथ-सबका विकास के मंत्र से योजनाएं जमीन पर उतरी हैं, उसने आम मतदाता के मन में भरोसे की एक मजबूत लकीर खींची है। इसके उलट, ममता बनर्जी का शासन मॉडल लगातार सवालों के घेरे में रहा है। चाहे वह कानून-व्यवस्था हो, निवेश का माहौल हो या फिर युवाओं के लिए रोजगार। महिलाओं के खिलाफ अत्याचार हो या फिर तृणमूल कांग्रेस का भ्रष्टाचार। यह सब भारतीय जनता पार्टी के लिए अगले चुनाव में फायदेमंद होने वाला है।

हर सेक्टर में फेलियर के ठप्पे से जनता में बढ़ रहा असंतोष
इतना ही नहीं, पश्चिम बंगाल में उद्योगों का पलायन, शिक्षक भर्ती से जुड़े विवाद, स्वास्थ्य ढांचे की बदहाली और पंचायत स्तर तक फैला भ्रष्टाचार आदि मुद्दे अब केवल विपक्षी आरोप नहीं रह गए हैं, बल्कि आम नागरिक की रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बन चुके हैं। भाजपा इन्हीं सवालों को लेकर घर-घर पहुंचने की तैयारी में है। पार्टी का दावा है कि ममता सरकार के दस सालों में बंगाल विकास की दौड़ में बहुत पीछे छूट गया, जबकि पड़ोसी राज्य तेज गति से आगे बढ़ रहे हैं। मोदी सरकार के टकराने की चाहत में ममता बनर्जी से सबसे ज्यादा नुकसान बंगाल की जनता-जनार्दन का ही किया है। यही वजह है कि तृणमूल सरकार के खिलाफ अब हर वर्ग में असंतोष है।

तुष्टिकरण की राजनीति और बाबरी यात्रा का सियासी असर
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टिकरण नीति किसी से छिपी नहीं है। यहां तक कि वो इसके लिए सनातन और हिंदू विरोध तक उतर आती हैं। अब उन्हीं की पार्टी में विधायक रहे हुमायूं कबीर की बाबरी यात्रा ने आग में घी की काम किया है। बाबरी मस्जिद विवाद के बाद राज्य की राजनीति में तुष्टिकरण का मुद्दा एक बार फिर केंद्र में आ गया है। भाजपा का कहना है कि यह साफ-साफ ममता सरकार की “वोट बैंक आधारित राजनीति” का जीवंत उदाहरण है। पार्टी का तर्क है कि धार्मिक ध्रुवीकरण की इस राजनीति ने सामाजिक ताने-बाने को कमजोर किया है और पश्चिम बंगाल के विकास को पीछे धकेला है। यही कारण है कि भाजपा अब “संतुलित विकास बनाम चयनित तुष्टिकरण” की बहस को धार दे रही है।परिवर्तन यात्रा: सिर्फ रैली नहीं, माइक्रो-मैनेजमेंट मॉडल
भारतीय जनता पार्टी ने बिहार से बाद पश्चिम बंगाल में प्रचंड जीत हासिल करने के लिए अपने अभियान की रणनीति अभी से बनाना शुरू कर दिया है। यही वजह है कि होली से पहले एक मार्च से शुरू होने वाली ऐतिहासिक परिवर्तन यात्रा को भाजपा केवल रैलियों की श्रृंखला नहीं, बल्कि एक व्यापक जनसंवाद अभियान के तौर पर देख रही है। इस परिवर्तन यात्रा को गांवों, कस्बों और शहरी इलाकों में एक साथ पहुंचाने की रणनीति बनाई गई है। ताकि हर आयु और हर वर्ग के लोगों के बीच राज्य सरकार के परिवर्तन का बिगुल पूरे जोर-शोर से बज सके। इस यात्रा में बीजेपी के कई स्टार प्रचारकों की मौजूदगी और बूथ स्तर तक संगठनात्मक सक्रियता यह सब संकेत देते हैं कि पार्टी अपने माइक्रो-मैनेजमेंट मॉडल के साथ चुनाव लड़ने जा रही है।तृणमूल कांग्रेस में अंदरूनी खींचतान से रक्षात्मक मुद्रा में आई ममता 
भाजपा की आक्रामक तैयारी के बीच तृणमूल कांग्रेस रक्षात्मक मोड में दिखाई दे रही है। नेताओं के बयान बदल रहे हैं, रणनीति बार-बार संशोधित हो रही है और संगठन के भीतर असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब कोई सत्ताधारी दल विकास के बजाय सफाई देने लगे, तो यह उसके लिए खतरे की घंटी होती है। इस बार चुनावी मैदान में तीसरे विकल्प की गुंजाइश लगभग खत्म होती दिख रही है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस एक ओर हार की तैयारी कर रही है तो मुकाबले से वाम दल भी काफी दूर हैं। इसलिए चुनावी घमासान साफ तौर पर भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच सिमट गया है। एक ओर “डबल इंजन सरकार” का वादा है, दूसरी ओर “बंगाल का कुशासन मॉडल” है। मतदाता अब भावनात्मक अपील से आगे बढ़कर ठोस प्रदर्शन की तुलना कर रहा है।युवा शक्ति, महिला शक्ति और शहरी मतदाता हैं निर्णायक वर्ग
भाजपा की रणनीति में युवा रोजगार, महिलाओं की सुरक्षा और शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रमुख मुद्दे हैं। स्टार्टअप संस्कृति, स्किल डेवलपमेंट और केंद्रीय योजनाओं का लाभ—इन सबको उदाहरण बनाकर पार्टी नए मतदाताओं से जुड़ने की कोशिश कर रही है। वहीं, ममता सरकार पर आरोप है कि उसने इन वर्गों की आकांक्षाओं को गंभीरता से नहीं लिया। बंगाल का चुनाव केवल राज्य की सत्ता तय नहीं करेगा, बल्कि यह राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी प्रभावित करेगा। अगर भाजपा यहां मजबूत प्रदर्शन करती है, तो पूर्वी भारत में उसका आधार और गहरा होगा। यही कारण है कि यह चुनाव दोनों दलों के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गया है।

आइए, तुष्टिकरण की राजनीति करने वाली हिंदू विरोधी ममता बनर्जी की तानाशाही पर डालते हैं एक नजर….

सबूत नंबर-21
राम नाम मास्क बांटने पर बीजेपी नेता गिरफ्तार
पश्चिम बंगाल के हुगली में जय श्रीराम मास्क बांटना ममता बनर्जी की पुलिस को रास नहीं आया। पुलिस मास्क बांटने वाले बीजेपी नेताओं को पकड़कर ले गई। हुगली के सेरामपुर में बीजेपी नेता अमनिश अय्यर लोगों को ‘जय श्रीराम’ लिखा मास्क बांट रहे थे। इसी दौरान पुलिस वहां पहुंची और बीजेपी नेता को गिरफ्तार करके ले गई। इस दौरान वहां मौजूद लोगों ने विरोध जताते हुए जमकर जय श्रीराम के नारे लगाए। बीजेपी ने मास्क बांटने पर पार्टी नेता को गिरफ्तार करने को पूर्ण तानाशाही करार दिया है।

सबूत नंबर-20
भगवा टीशर्ट पहनने और जय श्रीराम बोलने से रोका
इसके पहले 7 फरवरी, 2021 को भगवा टीशर्ट पहनने और जय श्रीराम बोलने वालों को धमकाया गया। कोलकाता के इको पार्क में पुलिस के एक अधिकारी ने लोगों से साफ कहा कि आप लोग यहां जय श्री राम का नारा नहीं लगा सकते हैं।

सबूत नंबर-19
पार्टी नेता ने जय श्रीराम बोलने वालों को धमकाया
हाल ही में उनकी पार्टी के एक नेता ने जय श्रीराम बोलने वालों को धमकाया। सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के एक नेता ने लोगों को धमकाते हुए कहा कि अगर बंगाल में रहना चाहते हो तो यहां ‘जय श्री राम’ के नारे नहीं लगा सकते। वीडियो में किसी सभा को संबोधित करते हुए टीएमसी नेता ने बंगाली में कहा कि राज्य में जय श्री राम बोलने की अनुमति नहीं है। यहां इन सब चीजों की अनुमति नहीं दी जाएगी। जो लोग इसका जाप करना चाहते हैं वे मोदी के राज्य गुजरात में जाकर ये कर सकते हैं।

सबूत नंबर-18
मुर्शिदाबाद में काली मां की मूर्ति जला डाला
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मुस्लिम तुष्टिकरण और वोटबैंक को लेकर इतनी अंधी हो चुकी है कि राज्य में हिन्दू विरोधी हरकतों पर कुछ भी एक्शन नहीं लेती हैं। कभी मंदिर में पूजा करने पर पिटाई की जाती है तो कभी हिन्दुओं के घर और मंदिर जला दिए जाते हैं। कभी रामनवमी और दुर्गापूजा पर तो कभी सरस्वती पूजा पर रोक लगा दी जाती है। इससे राज्य को मुसलमानों का हौसला बुलंद है और जब भी मौका मिलता है हिंदुओं को प्रताड़ित करते रहते हैं। हाल ही में 1 सितंबर, 2020 को मुर्शिदाबाद के एक मंदिर में काली मां की मूर्ति जला दिया गया। बीजेपी सांसद अर्जुन सिंह ने एक ट्वीट कर आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद इलाके के एक मंदिर पर हमला कर मां काली की मूर्ति जला दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि दीदी की राजनीति का जिहादी स्वरूप अब हिंदू धर्म और संस्कृति को नष्ट करने पर तुला हुआ है।


सबूत नंबर-17
मंदिर में पूजा करने पर पुलिस ने की पिटाई
ममता राज में तो हिन्दुओं को मंदिरों में भी पूजा करने की आजादी नहीं है। 5 अगस्त, 2020 को जब पूरे विश्व के हिन्दू अयोध्या में राममंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन को लेकर उत्साहित थे। वहीं पश्चिम बंगाल की पुलिस लॉकडाउन के बहाने हिन्दुओं पर जुल्म ढा रही थी। मंदिर में पूजा कर रहे लोगों पर पुलिस ने लाठियां बरसाईं और सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया। 

खड़गपुर में स्थानीय लोग राम मंदिर शिलान्यास के उत्सव में मंदिर में पूजा कर रहे थे। लेकिन ममता की पुलिस को यह बर्दाश्त नहीं हुआ। इससे सार्वजनिक व्यावस्था और लॉकडाउन का उल्लंघन नहीं हो रहा था। फिर भी शांतिपूर्वक पूजा कर रहे लोगों को पुलिस ने घसिटकर मंदिर से बाहर निकाला। लोग पुलिस से पूजा करने का आग्रह करते रहे, लेकिन पुलिस ने उन्हें पूजा करने की अनुमति नहीं दी।

बीजेपी कार्यकर्ता ने नारायणपुर इलाके में ‘यज्ञ’ आयोजित करने का प्रयास किया लेकिन ममता के गुंडों ने उन्हें रोक दिया। हिन्दुओं और ममता के गुंडों के बीच झड़प हो गई। जिसके बाद पुलिस ने लोगों को तितर-बितर करने के लिए बल प्रयोग किया। जिसमें कई लोगों को चोटें आईं। उधर खड़गपुर में श्री राम मंदिर के लिए पूजा का आयोजन किया गया था। लेकिन ममता बनर्जी की पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया, महिलाओं को भी नहीं छोड़ा।

सबूत नंबर-16
तेलिनीपाड़ा में जला दिए गए हिन्दुओं के घर और मंदिर
राज्य के हुगली जिले के चंदर नगर के तेलिनीपाड़ा में मई, 2020 के महीने में कई दिनों तक हिंदुओं के खिलाफ खुलकर हिंसा हुई। हिंदुओं के घर जलाए गए। जिले के तेलिनीपाड़ा के तांतीपारा, महात्मा गांधी स्कूल के पास शगुनबागान और फैज स्कूल के पास जमकर हिंसा, आगजनी और लूटपाट की गई। प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। मालदा के शीतला माता मंदिर में भी तोड़फोड़ और आगजनी की गई।

सबूत नंबर-15
पुस्तक मेले में हनुमान चालीसा के वितरण पर लगाया प्रतिबंध
पश्चिम बंगाल में ममता की पुलिस ने कोलकाता में 44वें अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले में विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं द्वारा बांटी जा रही हनुमान चालीसा की पुस्तकों पर रोक लगा दी। पुलिस ने बताया कि हनुमान चालीसा के वितरण से शहर में कानून व्यवस्था की समस्या पैदा हो सकती है और पुस्तक मेले में आने वाले लोग भावनाओं में बह सकते हैं।

विहिप के अधिकारियों ने पुलिस के इस कार्रवाई का विरोध किया। साथ ही पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि जब मेले में कुरान और बाइबिल की पुस्तकें बांटी जा सकती हैं तो हनुमान चालीसा की क्यों नहीं? बढ़ते विरोध को देखते हुए कोलकाता पुलिस बैकफुट पर आ गई और हनुमान चालीसा के वितरण से रोक को हटा लिया। विहिप ने कहा कि हनुमान चालीसा धार्मिक पुस्तक है और इसमें किसी भी तरह की आपत्तिपूर्ण सामग्री नहीं है। लेकिन ममता राज में हिंदुओं की धार्मिक पुस्तक का विरोध किया जा रहा है।

सबूत नंबर-14
ममता बनर्जी ने स्कूली बच्चों को धर्म के नाम पर बांटा
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इन दिनों गंभीर हताशा और निराशा में हैं। लोकसभा चुनाव में मुंह की खाने के बाद उन्हें विधानसभा चुनाव में भी भयानक हार पहले से ही दिखाई देने लगी है। यही वजह है कि ममता बनर्जी अपना वोट बैंक बचाने के लिए जोरशोर से मुस्लिम तुष्टिकरण में जुट गई हैं।

ममता बनर्जी ने राजनीतिक निर्लज्जता की सभी सीमाओं को पार करते हुए स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को भी मजहब के नाम पर बांट दिया। ममता बनर्जी की सरकार ने राज्य के स्‍कूलों को निर्देश दिया कि वे मुस्लिम स्‍टूडेंट्स के लिए अलग से मिड-डे मील हॉल रिजर्व करें। यह आदेश राज्‍य के उन सरकारी स्‍कूलों पर लागू होगा जहां पर 70 प्रतिशत या उससे ज्‍यादा मुस्लिम छात्र हैं। राज्‍य अल्‍पसंख्‍यक और मदरसा शिक्षा विभाग की ओर उन सभी सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्‍त स्‍कूलों का नाम मांगा, जहां पर 70 प्रतिशत से ज्‍यादा मुस्लिम बच्‍चे पढ़ते हैं। इन सरकारी स्‍कूलों में अल्‍पसंख्‍यक बच्‍चों के लिए अलग से मिड-डे मील डायनिंग हॉल बनाया जाएगा।

सबूत नंबर-13
ममता बनर्जी ने ‘जय श्रीराम’ बोलने वालों को दी धमकी
मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करने वाली ममता बनर्जी को जय श्रीराम का उद्घोष अब गाली की तरह लगने लगा है। राज्य के 24 परगना जिले में ममता बनर्जी का काफिला गुजर रहा था तभी रास्ते में भीड़ में खड़े लोगों ने जय श्रीराम का उदघोष कर दिया। जय श्रीराम सुनते ही ममता बनर्जी को गुस्सा आ गया और गाड़ी से उतरकर उन्होंने लोगों को धमकाना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं ममता बनर्जी ने जय श्रीराम कहने वालों को गिरफ्तार करने की धमकी भी दी और उन्हें दूसरे प्रदेश का बता दिया। यह कोई पहली बार नहीं है, इससे पहले चुनाव के दौरान भी ममता बनर्जी ने इसी तरह जय श्रीराम कहने वालों को जेल में डालने की धमकी दी थी। 

सबूत नंबर-12
ममता बनर्जी का जय श्रीराम बोलने से इंकार, बताया गाली
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में कहा कि वे किसी हाल में जय श्रीराम नहीं बोलेंगी। ममता का कहना है कि जय श्रीराम बीजेपी का नारा है लेकिन पीएम नरेन्द्र मोदी लोगों को यह बोलने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। सच्चाई यह है कि देश में जय श्रीराम बोलने की सदियों पुरानी परंपरा है। इसके एक दिन पहले ही बंगाल में एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें तृणमूल कार्यकर्ता जय श्रीराम का नारा लगा रही भीड़ को खदेड़ रहे हैं। पूरे राज्य में हिंदुओं को इसी तरह प्रताड़ित किया जा रहा है। ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के इस रवैये से बंगाल के लोगों में जबरदस्त गुस्सा है। राज्य में जगह-जगह पर इसका विरोध हो रहा है और इसका असर वोटिंग पर भी पड़ना तय है। दरअसल, राज्य में अपनी पार्टी की खिसकती जमीन से ममता परेशान हो गई हैं। इससे घबराई ममता अब राज्य में धार्मिक आधार पर वोटों को बांटने की कोशिश कर रही हैं। हिंदुओं के खिलाफ बयानबाजी कर मुसलमान वोटर्स को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही हैं।

सबूत नंबर-11
मुस्लिम प्रेम और हिंदू विरोध में देवताओं को बांटने पर तुली ममता बनर्जी
हिंदुओं के धार्मिक रीति-रिवाज, पूजा-पद्धति और पर्व-त्योहार पर लगाम लगाने के बाद ममता बनर्जी हिंदू देवी-देवताओं को बांटने में भी लग गई। हिंदुओं को बांटने के लिए ममता बनर्जी ने कहा कि हम दुर्गा की पूजा करते हैं, राम की पूजा क्यों करें? झरगाम की एक सभा में ममता ने कहा कि, ‘बीजेपी राम मंदिर बनाने की बात करती है, वे राम की नहीं रावण की पूजा करती है। लेकिन हमारे पास हमारी अपनी देवी दुर्गा है। हम मां काली और गणपति की पूजा करते हैं। हम राम की पूजा नहीं करते।’

सनातन संस्कृति में शस्त्रों का विशेष महत्त्व है। अलग-अलग पर्व त्योहारों पर धार्मिक यात्राओं में तलवार, गदा लेकर चलने की परंपरा रही है, लेकिन ममता बनर्जी ने धार्मिक यात्राओं और शस्त्र को भी साम्प्रदायिक और सेक्युलर करार दिया। गौरतलब है कि जब यही शस्त्र प्रदर्शन मोहर्रम के जुलूस में निकलते हैं तो सेक्युलर होते हैं, लेकिन रामनवमी में निकलते ही साम्प्रदायिक हो जाते हैं।

सबूत नंबर-10
राम के नाम से नफरत कई बार हो चुकी है जाहिर
ममता बनर्जी कई बार हिंदू धर्म और भगवान राम के प्रति अपनी असहिष्णुता जाहिर करती रही हैं। हालांकि कई बार कोर्ट ने उनकी इस कुत्सित कोशिश को सफल नहीं होने दिया। वर्ष 2017 में जब लेक टाउन रामनवमी पूजा समिति’ ने 22 मार्च को रामनवमी पूजा की अनुमति के लिए आवेदन दिया तो राज्य सरकार के दबाव में नगरपालिका ने पूजा की अनुमति नहीं दी थी। इसके बाद जब समिति ने कानून का दरवाजा खटखटाया तो कलकत्ता हाईकोर्ट ने पूजा शुरू करने की अनुमति देने का आदेश दिया।


सबूत नंबर-9
बंगाल सरकार ने पाठ्यक्रम में रामधनु को कर दिया रंगधनु 
भगवान राम के प्रति ममता बनर्जी की घृणा का अंदाजा इस बात से भी जाहिर हो गई, जब तीसरी क्लास में पढ़ाई जाने वाली किताब ‘अमादेर पोरिबेस’ (हमारा परिवेश) ‘रामधनु’ (इंद्रधनुष) का नाम बदल कर ‘रंगधनु’ कर दिया गया। साथ ही ब्लू का मतलब आसमानी रंग बताया गया है। दरअसल साहित्यकार राजशेखर बसु ने सबसे पहले ‘रामधनु’ का प्रयोग किया था, लेकिन मुस्लिमों को खुश करने के लिए किताब में इसका नाम ‘रामधनु’ से बदलकर ‘रंगधनु’ कर दिया गया।

सबूत नंबर-8
हिंदुओं के हर पर्व के साथ भेदभाव करती हैं ममता बनर्जी
ऐसा नहीं है कि ये पहली बार हुआ कि ममता बनर्जी ने हिंदुओं के साथ भेदभाव किया। कई ऐसे मौके आए हैं जब उन्होंने अपना मुस्लिम प्रेम जाहिर किया है और हिंदुओं के साथ भेदभाव किया है। सितंबर, 2017 में कलकत्ता हाईकोर्ट की इस टिप्पणी से ममता बनर्जी का हिंदुओं से नफरत जाहिर होता है। कोर्ट ने तब कहा था,  ”आप दो समुदायों के बीच दरार पैदा क्यों कर रहे हैं। दुर्गा पूजन और मुहर्रम को लेकर राज्य में कभी ऐसी स्थिति नहीं बनी है। उन्‍हें साथ रहने दीजिए।”


सबूत नंबर-7
दशहरे पर शस्त्र जुलूस निकालने की नहीं दी थी अनुमति
हिंदू धर्म में दशहरे पर शस्त्र पूजा की परंपरा रही है। लेकिन मुस्लिम प्रेम में ममता बनर्जी हिंदुओं की धार्मिक आजादी छीनने की हर कोशिश करती रही हैं। सितंबर, 2017 में ममता सरकार ने आदेश दिया कि दशहरा के दिन पश्चिम बंगाल में किसी को भी हथियार के साथ जुलूस निकालने की इजाजत नहीं दी जाएगी। पुलिस प्रशासन को इस पर सख्त निगरानी रखने का निर्देश दिया गया। हालांकि कोर्ट के दखल के बाद ममता बनर्जी की इस कोशिश पर भी पानी फिर गया।

सबूत नंबर-6
कई गांवों में दुर्गा पूजा पर ममता बनर्जी ने लगा रखी है रोक
10 अक्टूबर, 2016 को कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश से ये बात साबित होती है ममता बनर्जी ने हिंदुओं को अपने ही देश में बेगाने करने के लिए ठान रखी है। बीरभूम जिले का कांगलापहाड़ी गांव ममता बनर्जी के दमन का भुक्तभोगी है। गांव में 300 घर हिंदुओं के हैं और 25 परिवार मुसलमानों के हैं, लेकिन इस गांव में चार साल से दुर्गा पूजा पर पाबंदी है। मुसलमान परिवारों ने जिला प्रशासन से लिखित में शिकायत की कि गांव में दुर्गा पूजा होने से उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचती है, क्योंकि दुर्गा पूजा में बुतपरस्ती होती है। शिकायत मिलते ही जिला प्रशासन ने दुर्गा पूजा पर बैन लगा दिया, जो अब तक कायम है।

सबूत नंबर-5
छठ पूजा मनाने पर लगा दी रोक
ममता राज में साल 2017 में राज्य के सिलीगुड़ी में महानंदा नदी में छठ पूजा मनाने पर रोक लगा दी गई। जनसत्ता अखबार की खबर के अनुसार दार्जिलिंग की डीएम ने एनजीटी के आदेश का हवाला देकर महानंदा नदी में छठ पूजा मनाने पर बैन कर दिया। दार्जिलिंग की जिलाधिकारी ने नदी में छठ के लिए अस्थायी घाट बनवाने से भी इनकार कर दिया और कहा कि जो कोई भी यहां छट मनाते देखा गया उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। एनजीटी ने एक अजीबोगरीब तर्क दिया कि छठ के कारण नदी में प्रदूषण हो रहा है। जबकि छठ में ऐसा कुछ भी नहीं होता जिससे नदी प्रदूषित हो। भगवान सूर्य को अर्घ्य के रूप में नदी का ही पानी अर्पित किया जाता है उसमें थोड़े से फूल और पत्ते और चावल के दाने होते हैं। ये सब प्राकृतिक चीजे हैं जिन्हें नदी में पलने वाली मछलियां और दूसरे जीव खाते हैं। ये सारी चीजें सूप में रखकर चढ़ाई जाती हैं, यानी पॉलीथिन फेंके जाने की भी आशंका नहीं होती।

सबूत नंबर-4
ममता बनर्जी ने सरस्वती पूजा पर भी लगाया प्रतिबंध
एक तरफ बंगाल के पुस्तकालयों में नबी दिवस और ईद मनाना अनिवार्य किया गया तो एक सरकारी स्कूल में कई दशकों से चली आ रही सरस्वती पूजा ही बैन कर दी गई। ये मामला हावड़ा के एक सरकारी स्कूल का है, जहां पिछले 65 साल से सरस्वती पूजा मनायी जा रही थी, लेकिन मुसलमानों को खुश करने के लिए ममता सरकार ने इसी साल फरवरी में रोक लगा दी। जब स्कूल के छात्रों ने सरस्वती पूजा मनाने को लेकर प्रदर्शन किया, तो मासूम बच्चों पर डंडे बरसाए गए। इसमें कई बच्चे घायल हो गए।

सबूत नंबर-3
हनुमान जयंती पर निर्दोषों को किया गिरफ्तार, लाठी चार्ज 
11 अप्रैल, 2017 को पश्चिम बंगाल में बीरभूम जिले के सिवड़ी में हनुमान जयंती के जुलूस पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया। मुस्लिम तुष्टिकरण के कारण ममता सरकार से हिन्दू जागरण मंच को हनुमान जयंती पर जुलूस निकालने की अनुमति नहीं दी। हिंदू जागरण मंच के कार्यकर्ताओं का कहना था कि हम इस आयोजन की अनुमति को लेकर बार-बार पुलिस के पास गए, लेकिन पुलिस ने मना कर दिया। धार्मिक आस्था के कारण निकाले गए जुलूस पर पुलिस ने बर्बता से लाठीचार्ज किया। इसमें कई लोग घायल हो गए। जुलूस में शामिल होने पर पुलिस ने 12 हिन्दुओं को गिरफ्तार कर लिया। उन पर आर्म्स एक्ट समेत कई गैर जमानती धाराएं लगा दीं।

सबूत नंबर-2
ममता राज के 8000 गांवों में एक भी हिंदू नहीं
पश्चिम बंगाल में हिन्दुओं का उत्पीड़न जारी है। दरअसल ममता राज में हिंदुओं पर अत्याचार और उनके धार्मिक क्रियाकलापों पर रोक के पीछे तुष्टिकरण की नीति है। लेकिन इस नीति के कारण राज्य में अलार्मिंग परिस्थिति उत्पन्न हो गई है। प. बंगाल के 38,000 गांवों में 8000 गांव अब इस स्थिति में हैं कि वहां एक भी हिन्दू नहीं रहता, या यूं कहना चाहिए कि उन्हें वहां से भगा दिया गया है। बंगाल के तीन जिले जहां पर मुस्लिमों की जनसंख्या बहुमत में हैं, वे जिले हैं मुर्शिदाबाद जहां 47 लाख मुस्लिम और 23 लाख हिन्दू, मालदा 20 लाख मुस्लिम और 19 लाख हिन्दू, और उत्तरी दिनाजपुर 15 लाख मुस्लिम और 14 लाख हिन्दू। दरअसल बंगलादेश से आए घुसपैठिए प. बंगाल के सीमावर्ती जिलों के मुसलमानों से हाथ मिलाकर गांवों से हिन्दुओं को भगा रहे हैं और हिन्दू डर के मारे अपना घर-बार छोड़कर शहरों में आकर बस रहे हैं।

सबूत नंबर-1
ममता राज में घटती जा रही हिंदुओं की संख्या
पश्चिम बंगाल में 1951 की जनसंख्या के हिसाब से 2011 में हिंदुओं की जनसंख्या में भारी कमी आयी है। 2011 की जनगणना ने खतरनाक जनसंख्यिकीय तथ्यों को उजागर किया है। जब अखिल स्तर पर भारत की हिन्दू आबादी 0.7 प्रतिशत कम हुई है तो वहीं सिर्फ बंगाल में ही हिन्दुओं की आबादी में 1.94 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है, जो कि बहुत ज्यादा है। राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों की आबादी में 0.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जबकि सिर्फ बंगाल में मुसलमानों की आबादी 1.77 फीसदी की दर से बढ़ी है, जो राष्ट्रीय स्तर से भी कहीं ज्यादा दर से बढ़ी है।

 

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