भारत की प्राचीन और महान सभ्यता केवल पुस्तकों में दर्ज कथाओं तक सीमित नहीं है; वह धरती की परतों में भी सांस लेती है। जब पुरातत्वविद जमीन की गहराइयों में उतरते हैं, तो वे केवल ईंट-पत्थर नहीं खोजते, बल्कि इतिहास की धड़कन को सुनते हैं। हाल के वर्षों में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और राज्य स्तरीय पुरातत्व विभागों द्वारा की गई खुदाइयों ने यह संकेत दिया है कि भारतीय सांस्कृतिक परंपराएं अत्यंत प्राचीन और सतत रही हैं। यह निरंतरता ही सनातन संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की खुदाई में राजस्थान से लेकर मध्यप्रदेश तक कई ऐसे प्रमाण मिले हैं, जिनसे साबित होता है कि हमारी हिंदू संस्कृति कितनी सदियों पुरानी है। एएसआई को भोजशाला मस्जिद में हिंदू प्रतीक चिन्ह मिले हैं, जिनसे संकेत मिलता है कि हिंदू धार्मिक स्थल को तोड़कर मस्जिद का निर्माण हुआ है। मामला कोर्ट में विचाराधीन है। दूसरी ओर राजस्थान के खेतड़ी (झुंझुनूं) में पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग को काफी पुरानी आबादी के अवशेष मिले हैं। ये खुदाई त्योंदा गांव में रीढ़ का टीला नामक जगह पर की जा रही है। इससे पता चलता है कि हिंदू संस्कृति एक हजार साल से पुरानी है। इससे पहले पिछले साल डीग में हुई खुदाई में भी विलुप्त हुई सरस्वती नदी होने के संकेत मिले थे।
भोजशाला: 2100 पन्नों की रिपोर्ट में 500 से अधिक तस्वीरें
मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर एएसआई की विस्तृत रिपोर्ट ने महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं। एएसआई ने 2100 पन्नों की रिपोर्ट को 500 से अधिक तस्वीरों और वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर तैयार किया है। रिपोर्ट में उल्लेख है कि भोजशाला का निर्माण 12वीं शताब्दी में हुआ, जबकि परिसर में स्थित मस्जिद का निर्माण 1265 ईस्वी के आसपास का बताया गया है। इस अंतर को यूं समझ सकते हैं कि 1265 ईस्वी एक विशिष्ट वर्ष है जो 13वीं शताब्दी (1201-1300) का हिस्सा है, जबकि 12वीं शताब्दी 1101-1200 ईस्वी के बीच की अवधि है। यानि 1265 से लगभग 65 से 165 साल पहले की अवधि है। 1265 ईस्वी में सुल्तान बलबन का शासन था, जबकि 12वीं सदी में दिल्ली सल्तनत से पहले राजपूत राजाओं का शासन था। यह तथ्य ऐतिहासिक क्रम को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इससे यह भी साफ संकेत मिलता था कि पहले भोजशाला बनी और उसके बाद मस्जिद का निर्माण हुआ।
मंदिर स्थापत्य के संकेत, विज्ञान-तकनीक से इतिहास की पड़ताल
एएसआई के सर्वेक्षण में स्तंभों पर कमल आकृतियां, देवी-देवताओं की मूर्तियां, संस्कृत शिलालेख और मंदिर शैली की वास्तुकला के संकेत पाए गए। इन प्रतीकों को सनातन परंपरा से जोड़ा जाता है। वास्तुशिल्पीय विश्लेषण यह दर्शाता है कि संरचना में प्रयुक्त शैली उस कालखंड के मंदिर निर्माण की परंपराओं से मेल खाती है। हालांकि यह विषय न्यायालय में विचाराधीन है, लेकिन पुरातात्विक दृष्टि से यह अध्ययन सांस्कृतिक इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है। एएसआई ने ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर भूमिगत संरचनाओं का परीक्षण किया। खुदाई के दौरान दीवारों की संरचना, स्तंभों और शिलालेखों का गहन अध्ययन किया गया। यह दर्शाता है कि इतिहास की खोज अब केवल अनुमान पर आधारित नहीं, बल्कि वैज्ञानिक पद्धति पर टिकी है। सनातन संस्कृति की प्राचीनता को समझने के लिए यह पद्धति निर्णायक सिद्ध हो रही है।
मंदिर के हिस्सों में बनाई मस्जिद, सनानत धर्म से जुड़े प्रतीक मिले
भोजशाला विवाद को लेकर रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पुराने मंदिर के हिस्सों का इस्तेमाल करके मस्जिद बनाई गई है। भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता है। यह परिसर एएसआई द्वारा संरक्षित है। सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, भोजशाला परिसर में सिक्कों, सनातन धर्म से जुड़े प्रतीक चिन्हों और देवी-देवताओं की मूर्तियों का विवरण दिया गया है। मंदिर शैली की वास्तुकला के संकेत मिले हैं। कई स्तंभों पर नक्काशी, कमल आकृतियां और शिल्प अवशेष पाए गए। संस्कृत भाषा के शिलालेख भी दर्ज किए गए हैं। यह 12वीं से 16वीं शताब्दी के बीच के बताए जा रहे हैं
राजस्थान के खेतड़ी में भगवान विष्णु, गणेश के मूर्तियों के अवशेष
दूसरी ओर राजस्थान के झुंझुनूं जिले की खेतड़ी तहसील में त्योंदा गांव स्थित ‘रीढ़ का टीला’ भी इतिहास के पन्ने खोल रहा है। यहां जनवरी से जारी खुदाई में लगभग एक हजार वर्ष पुराने अवशेष सामने आए हैं। सतह से ढाई से छह मीटर नीचे मंदिर संरचना, स्तंभों के आधार और भगवान विष्णु, गणेश तथा अन्य मूर्तियों के अवशेष मिले हैं। यह संकेत देता है कि यहां कभी एक समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र रहा होगा। विशेष उल्लेखनीय तथ्य यह है कि कई मूर्तियां ऐसे मिलीं जैसे उन्हें सुरक्षित दबाकर रखा गया हो। पत्थरों को जोड़ने के लिए लोहे की कीलों का प्रयोग उस काल के स्थापत्य कौशल को दर्शाता है। मिट्टी के बर्तन कुछ हाथ से बने, कुछ चाक पर स्थानीय जीवन शैली और सांस्कृतिक विविधता का प्रमाण देते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि यह स्थल केवल धार्मिक केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र भी रहा होगा।
एक हजार वर्ष पुराना प्राचीन ‘पाटन’ दोहान नदी के किनारे बसा
पुरातत्व अधिकारियों के अनुसार, यह प्राचीन नगर दोहान नदी के किनारे बसा था और संभवतः ‘पाटन’ नाम से जाना जाता था। भारतीय सभ्यता में नदियों के किनारे नगर बसाने की परंपरा अत्यंत प्राचीन रही है। नदी केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जीवनरेखा भी होती थी। इससे सनातन परंपरा की वह विशेषता उजागर होती है जिसमें प्रकृति और संस्कृति का अद्भुत समन्वय दिखता है। खेतड़ी क्षेत्र में ही 80 के दशक में ताम्रयुगीन सुनारी सभ्यता के अवशेष मिले थे, जो लगभग तीन हजार वर्ष पुराने माने जाते हैं। रीढ़ के टीले से मिले अवशेष मध्यकालीन प्रतीत होते हैं, परंतु आगे की खुदाई संभवतः उन्हें और प्राचीन कालखंडों से जोड़ सकती है। यह निरंतरता दर्शाती है कि इस भूभाग में सांस्कृतिक जीवन हजारों वर्षों से गतिमान रहा है।
डीग की खुदाई में ऋग्वेद में वर्णित सरस्वती नदी का संकेत
इससे पहले राजस्थान के डीग जिले के बहज गांव में एएसआई द्वारा की गई खुदाई में सूखी नदी के चैनल और बहुस्तरीय सभ्यताओं के प्रमाण मिले हैं। इतिहासकार इसे ऋग्वेद में वर्णित सरस्वती नदी के प्रवाह तंत्र से जोड़कर देखते हैं। 23 मीटर नीचे मिली सांस्कृतिक परतें, सड़कों और नालियों की सुव्यवस्थित व्यवस्था, मिट्टी के बर्तन और सिक्के उस समय की उन्नत सामाजिक संरचना को दर्शाते हैं। यह दर्शाता है कि भारतीय सभ्यता केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं थी, बल्कि सुव्यवस्थित नगरीय जीवन का भी परिचायक थी।
सूखी हुई नदी का चैनल और 5 सभ्यताओं के अवशेष मिले
डीग के बहज गांव में ASI की खुदाई साइट पर टीम को हजारों साल पुराने शहर के अवशेष मिले। इसके अलावा यहां सबसे निचले स्तर पर सूखी हुई नदी का चैनल और 5 सभ्यताओं के अवशेष मिले हैं। जिन्हें सरस्वती नदी से जोड़कर देखा जा रहा है। सड़कें, नालियां सहित अन्य शहरी अरेंजमेंट के सबूत भी यहां हैं। जो उस समय की मजबूत व्यवस्था को दिखाता है। इसके अलाव इस साइट पर 23 मीटर नीचे खुदाई के दौरान जो सांस्कृतिक जमाव (परत) मिला वह एक सूखी नदी का प्रवाह तंत्र है। इसे इतिहासकार ऋग्वेद में उल्लेखित सरस्वती नदी के चैनल से जोड़कर देख रहे हैं। इसके ऊपर की लेयर में प्राचीनतम गैरिक सभ्यता के अवशेष मिले हैं। इसके बाद चित्रित धूसर संस्कृति के अवशेष में कई तरह के टैरेकोटा (मिट्टी) के बर्तन, प्रिंडेट बर्तन, मूर्तियां और तांबे-चांदी के सिक्के मिले हैं।
सनातन संस्कृति यानि अनादि और अनंत शक्ति की निरंतरता
इन सभी खोजों का साझा सूत्र निरंतरता है। चाहे मंदिर स्थापत्य हो, शिलालेख हों, मूर्तियां हों या नगर नियोजन, सदियों से एक सांस्कृतिक धारा प्रवाहित होती दिखती है। सनातन शब्द का अर्थ ही है, जो अनादि और अनंत है। पुरातात्विक प्रमाण इस सांस्कृतिक निरंतरता को ठोस आधार प्रदान करते हैं। सनातन संस्कृति की महत्ता को समझने के लिए अब तथ्यपरकत खोज हो रही है। भारत की सनातन संस्कृति केवल इतिहास का विषय नहीं, बल्कि वर्तमान की जीवंत धरोहर है। राजस्थान से मध्य प्रदेश तक फैले पुरातात्विक प्रमाण यह संकेत देते हैं कि यह परंपरा सदियों से विकसित होती रही है। मंदिर स्थापत्य, नदी किनारे बसे नगर, शिलालेख और मूर्तियां, ये सब उस सांस्कृतिक यात्रा के साक्षी हैं जो आज भी जारी है। इन खोजों का महत्व केवल अतीत तक सीमित नहीं है। वे हमें यह स्मरण कराते हैं कि हमारी सांस्कृतिक जड़ें कितनी गहरी हैं। जब नई पीढ़ी इन साक्ष्यों को देखती है, तो उसे अपनी पहचान पर गर्व का अनुभव होता है। इतिहास की हर खुदाई हमें यही बताती है कि यह सभ्यता क्षणिक नहीं, बल्कि कालजयी है। सनातन संस्कृति की यही सबसे बड़ी शक्ति है कि वह समय के प्रवाह में भी अपनी पहचान बनाए रखती है, और हर युग में नए प्रमाणों के साथ स्वयं को पुनः स्थापित करती है।
पहले जिनको विवादास्पद कह दबाया, वे अब खुलकर विमर्श में आए
दरअसल, भारत की सभ्यता केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि स्मृति की निरंतर धारा है। इस स्मृति में मंदिर हैं, तीर्थ हैं, शिलालेख हैं और वे कथाएं हैं, जिनमें आस्था, दर्शन और संस्कृति एक साथ बहती रही है। लेकिन इस सांस्कृतिक निरंतरता को इतिहास के कुछ दौरों में योजनाबद्ध रूप से तोड़ा गया। सनातन परंपरा के अनेक धार्मिक स्थलों पर हमले हुए, संरचनाएं ध्वस्त की गईं और पूजा स्थलों के ऊपर नई धार्मिक इमारतें खड़ी कर दी गईं। यह केवल स्थापत्य परिवर्तन नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक वर्चस्व का प्रयास था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनने के बाद हिंदू समाज के भीतर एक नया आत्मबोध उभरा। दशकों तक जिन विषयों को “विवादास्पद” कहकर दबाया गया, वे अब खुलकर विमर्श के केंद्र में आ गए हैं। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण इस परिवर्तन का प्रतीक बन गया। 22 जनवरी को प्राण-प्रतिष्ठा के दो वर्ष पूरे होना केवल एक धार्मिक अवसर नहीं, बल्कि यह संकेत है कि भारत अब अपनी सांस्कृतिक स्मृति से मुंह नहीं मोड़ेगा।
सनातन स्थलों की पुनर्स्मृति: इतिहास, न्याय और आस्था की वापसी
महाराणा प्रताप सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजवर्धन सिंह परमार की ओर से अजमेर दरगाह में शिव मंदिर होने का दावा किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के वकील डॉ.एपी सिंह के जरिए कोर्ट में याचिका लगाई गई। इसे सोमवार को सुनवाई करते हुए स्वीकार कर लिया। वकील डॉ एपी सिंह के अनुसार न्यायालय ने राजवर्धन सिंह परमार द्वारा 2022 में राष्ट्रपति को लगाई गई याचिका का जिक्र करते हुए परमार को प्रथम याचिका माना है। न्यायालय ने सभी पक्षकारों को नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई 21 फरवरी रखी है। महाराणा प्रताप सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजवर्धन सिंह परमार के मुताबिक न्यायालय ने हमारे द्वारा 2022 में राष्ट्रपति को लगाई गई याचिका का जिक्र करते हुए हमें मुख्य पक्षकार माना है। राजस्थान में महाराणा प्रताप सेना की ओर से यात्रा की गई थी। जिसमें लाखों लोगों के हस्ताक्षर से याचिका लगाने का अवसर मिला था। हमें पूर्ण विश्वास है कि अजमेर दरगाह के नीचे वर्षों से भगवान शिव का मंदिर बंद है, वह बहुत जल्द खुलेगा। वहां पूजा होगी और पुष्कर से जल भी लाकर चढ़ाया जाएगा। परमार ने कहा कि हमने याचिका में वहां के नक्शे, रेकी और शिवलिंग के चित्र सहित अन्य सबूत पेश किए हैं। इसके अलावा भी अगर न्यायालय कोई सबूत मांगेगा तो उन्हें पूरा करने का काम महाराणा प्रताप करेगी।
इतिहास की सत्यता और आस्था के अधिकार की पुनर्स्थापना
राम मंदिर के बाद यह स्पष्ट हो गया कि सनातन स्थलों की पुनर्प्राप्ति का मार्ग सड़क नहीं, बल्कि संविधान और अदालतें हैं। यही कारण है कि आज भोजशाला और अजमेर जैसे स्थल न्यायिक विमर्श के केंद्र में हैं। यह संघर्ष किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि इतिहास की सत्यता और आस्था के अधिकार की पुनर्स्थापना के लिए है। मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला को ऐतिहासिक रूप से परमार शासक राजा भोज से जोड़ा जाता है। यह स्थल विद्या की देवी मां सरस्वती को समर्पित माना जाता रहा है। यहां प्राप्त शिलालेख, स्थापत्य शैली और ऐतिहासिक संदर्भ इसे एक शिक्षण एवं साधना केंद्र के रूप में स्थापित करते हैं। बाद के कालखंड में यहाँ कमाल मौला मस्जिद का अस्तित्व सामने आता है, जिससे यह स्थल विवाद का केंद्र बन गया। वर्षों तक प्रशासनिक आदेशों के तहत पूजा और नमाज के लिए अलग-अलग दिन निर्धारित किए जाते रहे। हालिया न्यायिक हस्तक्षेप के बाद पूजा के अधिकार को लेकर हिंदू पक्ष को महत्वपूर्ण राहत मिली है। न्यायालय ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि आस्था और इतिहास की जांच तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए, न कि राजनीतिक दबाव में। मध्य प्रदेश सरकार का सहयोग और विधिक प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका इस दिशा में निर्णायक मानी जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका स्वीकार किया जाना अपने आप में महत्वपूर्ण
दूसरी ओर राजस्थान के अजमेर स्थित दरगाह शरीफ को लेकर भी ऐतिहासिक विमर्श नया नहीं है। हिंदू संगठनों और याचिकाकर्ताओं का दावा है कि यह स्थल मूलतः एक प्राचीन शिव मंदिर था। स्थापत्य संकेत, प्राचीन ग्रंथों के उल्लेख और स्थानीय परंपराएँ इस दावे का आधार प्रस्तुत करती हैं। लंबे समय तक इस विषय पर सार्वजनिक चर्चा को दबाया गया, लेकिन अब मामला न्यायिक दायरे में प्रवेश कर चुका है। अजमेर दरगाह से जुड़े शिव मंदिर के दावे पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका स्वीकार किया जाना अपने आप में महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ यह है कि देश की सर्वोच्च अदालत अब तथ्यों, साक्ष्यों और ऐतिहासिक दस्तावेज़ों की सुनवाई के लिए तैयार है। यह सनातन समाज के लिए उम्मीद का संकेत है कि उसकी आस्था को अब “अस्वीकार्य” नहीं कहा जा सकता।
अब आस्था बनाम राजनीति नहीं, आस्था और न्याय साथ-साथ
राजस्थान और मध्य प्रदेश की भाजपा सरकारों ने इन मामलों में स्पष्ट किया है कि वे किसी भी समुदाय के अधिकारों का हनन नहीं चाहतीं, लेकिन ऐतिहासिक सत्य और न्यायिक प्रक्रिया में बाधा भी नहीं बनेंगी। यह संतुलन ही संवैधानिक शासन की पहचान है। तुष्टिकरण की राजनीति से अलग हटकर कानून के दायरे में निर्णय लेने का यह दृष्टिकोण भविष्य की राजनीति को दिशा देता है। इन दोनों मामलों को केवल धार्मिक चश्मे से देखना भूल होगी। यह संघर्ष उस मानसिकता के खिलाफ है, जिसने दशकों तक हिंदू समाज को अपनी ही विरासत पर प्रश्नचिह्न लगाने के लिए मजबूर किया। यह किसी मस्जिद या दरगाह को गिराने की मांग नहीं, बल्कि यह जानने की मांग है कि इतिहास क्या कहता है और आस्था का अधिकार किसे मिलना चाहिए? किसने और कब हिंदू स्थलों को ध्वस्त करने धृष्ट कार्य किया?
यह अपने इतिहास, आस्था और अपनी पहचान की ओर लौटने की यात्रा
यदि न्यायालयों में ऐतिहासिक साक्ष्य यह सिद्ध करते हैं कि भोजशाला और अजमेर जैसे स्थल मूलतः सनातन परंपरा से जुड़े रहे हैं, तो पूजा का अधिकार मिलना न केवल स्वाभाविक होगा, बल्कि संवैधानिक भी। भारत का संविधान आस्था को नकारता नहीं, बल्कि सभी को समान धार्मिक स्वतंत्रता देता है। राम मंदिर ने यह दिखा दिया कि धैर्य, संविधान और सत्य के साथ लड़ी गई लड़ाई अंततः परिणाम देती है। भोजशाला और अजमेर समेत देश के कई अन्य हिंदू धार्मिक स्थल उसी यात्रा के अगले पड़ाव हैं। यह यात्रा किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने इतिहास, अपनी आस्था और अपनी पहचान की ओर लौटने की है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बदला हुआ भारत अब अपने अतीत से डरता नहीं, बल्कि उसे समझकर भविष्य की नींव रख रहा है।
मध्यप्रदेश के धार में भोजशाला की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भोजशाला मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित एक प्राचीन स्थल है, जिसे परमार शासक राजा भोज (11वीं शताब्दी) से जुड़ा है। ऐतिहासिक अभिलेखों और शिलालेखों के आधार पर यह साबित होता है कि यह एक प्राचीन शैक्षिक-धार्मिक केंद्र रहा है, जहां पर विद्यादायिना मां सरस्वती की उपासना और अध्ययन परंपरा रही है। भोजशाला स्थल पर संस्कृत शिलालेख, स्थापत्य अवशेष और विद्या-परंपरा से जुड़े संकेतों का प्रमाणित उल्लेख मिलता है। दरअसल, भोजशाला पर विवाद इसी परिसर में कमाल मौला मस्जिद के अस्तित्व के बाद सामने आया। हिंदुओं के कई अन्य धार्मिक स्थलों की तरह यहां भी तोड़ो और कब्जा करो की नीति अपनाई गई। इससे यह साफ हो गया कि यह स्थल मूलतः मां सरस्वती का मंदिर/विद्या-केंद्र था, जिस पर बाद में मस्जिद बनी। इसी दावे-प्रतिदावे के कारण पूजा और नमाज दोनों को लेकर विवाद खड़ा हुआ।
कांग्रेस सरकारों के समय इस विवाद को और हवा मिली
कांग्रेस सरकारों के समय इस विवाद को और हवा मिली। क्योंकि लंबे समय तक प्रशासन ने इस हिंदू स्थल पर भी दिन-विशेष की व्यवस्था लागू कर दी। कुछ दिनों में हिंदू पूजा और कुछ में तुष्टिकरण के लिए मुस्लिम नमाज की अनुमति प्रदान कर दी गई। यह व्यवस्था अस्थायी थी, पर मूल प्रश्न कि स्थल की ऐतिहासिक पहचान तो अनसुलझा रहा। इसके लिए मामला न्यायालयों तक पहुंचा। हाल के वर्षों में अदालतों ने पुरातात्त्विक सर्वेक्षण और साक्ष्यों के आधार पर तथ्य-जांच पर जोर दिया है। कुछ अवसरों पर विशेष तिथियों/समयों में पूजा की अनुमति संबंधी आदेश भी सामने आए हैं। अंतिम निर्णय अभी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है। अब सुप्रीम कोर्ट ने बसंत पंचमी के दिन धार में भोजशाला में सूर्योदय से सूर्यास्त तक हिंदुओं को प्रार्थना करने की अनुमति दी है। सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हम दोनों पक्षों से अपील करते हैं कि वे आपसी सम्मान और सहयोग बरकरार रखें। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य और जिला प्रशासन को कानून व्यवस्था बनाए रखने की हिदायत दी।
अजमेर में मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
अजमेर स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के बारे में भी कहा जाता है कि इस स्थल पर पहले प्राचीन शिव मंदिर था। दावा करने वाले पक्ष स्थापत्य संकेतों, ऐतिहासिक उल्लेखों और स्थानीय परंपराओं के पुख्ता प्रमाण देते हैं। उनका कहना है कि स्थल की मूल धार्मिक पहचान की जांच होनी चाहिए। दूसरी ओर, दरगाह से जुड़े पक्ष दरगाह की ऐतिहासिक-धार्मिक निरंतरता पर जोर देते हैं। यह मामला भी अदालतों के समक्ष है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका स्वीकार किए जाने का अर्थ यह है कि शीर्ष अदालत ने तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर सुनवाई के लिए दरवाजा खोल दिया है। आगे की प्रक्रिया में दस्तावेज, ऐतिहासिक प्रमाण और विधिक तर्कों की जांच होगी। भोजशाला हो या अजमेर की दरगार दोनों विवादों में मूल प्रश्न स्थल की ऐतिहासिक पहचान और पूजा/आस्था के अधिकार से जुड़ा है। दोनों ही मामलों में अंतिम फैसला अदालतों को करना है। भोजशाला में प्रशासनिक स्तर पर लंबे समय से दिन-विशेष की व्यवस्था रही, वहीं अजमेर में विवाद अपेक्षाकृत न्यायिक सुनवाई के शुरुआती चरणों में है।









