कहते हैं अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति शतरंज के खेल जैसी होती है, जहां शोर कम और चालें गहरी होती हैं। हाल ही में अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए टैरिफ में 50 प्रतिशत से सीधे 18 प्रतिशत की कटौती करना महज एक व्यापारिक समझौता नहीं है। यह जीत है भारत की उस ‘साइलेंट और शार्प’ कूटनीति की, जिसने अमेरिका के ‘मैक्सिमम प्रेशर’ (Maximum Pressure) के सिद्धांत को फेल कर दिया।

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत पिछले साल सितंबर में हुई थी। तियानजिन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच एक त्रिपक्षीय बैठक हुई। तीनों नेताओं की मुस्कुराती हुई तस्वीर जैसे ही ग्लोबल मीडिया में वायरल हुई, वाशिंगटन में हड़कंप मच गया। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जो पहले से ही भारत द्वारा रूसी तेल खरीदे जाने से नाराज़ थे, उन्होंने इसे ‘खुली चुनौती’ माना। ट्रंप ने भारत को ‘High Tariff Dead Economy’ करार देते हुए 50 प्रतिशत तक के भारी-भरकम टैरिफ थोप दिए। अमेरिका का इरादा साफ था आर्थिक दबाव के जरिए भारत को रूस और चीन के पाले से खींचना। अमेरिका को लगा कि आर्थिक चोट से भारत घुटने टेक देगा।

रिश्तों में आई कड़वाहट को खत्म करने के लिए पीएम मोदी ने अपने सबसे भरोसेमंद रणनीतिकार, एनएसए अजीत डोभाल को वाशिंगटन भेजा। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ हुई एक हाई-प्रोफाइल मीटिंग में डोभाल ने वो बात कही जिसकी अमेरिका को उम्मीद नहीं थी। भारत का ‘नया चेहरा’ पेश करते हुए डोभाल ने साफ लहजे में कहा कि ‘भारत ट्रंप या उनके सहयोगियों के किसी भी दबाव में नहीं आएगा। अगर जरूरत पड़ी, तो हम ट्रंप का पूरा कार्यकाल (2029 तक) इंतजार कर लेंगे, लेकिन समझौता अपनी शर्तों पर ही करेंगे। भारत ने अतीत में भी अमेरिका की दुश्मनी और कड़े प्रतिबंध झेले हैं, पर हम तब भी नहीं झुके थे और अब भी नहीं झुकेंगे।’
Scoop on Doval & Rubio Meeting:
– Months ahead of the India-US trade deal, NSA Ajit Doval met Marco Rubio.
– ‘India won’t be bullied- Doval told US.’
– ‘Warned against US pressure tactics.’
– ‘India sought an end to US criticism.’@Rishabhmpratap shares more details. pic.twitter.com/ggkCoFOlB0
— TIMES NOW (@TimesNow) February 5, 2026
अमेरिका के लिए यह संदेश चुभने वाला था। वाशिंगटन आमतौर पर उन देशों से निपटता है जो आर्थिक दबाव में तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं। लेकिन भारत ने ‘धैर्य’ को हथियार बनाया। डोभाल ने रुबियो को एक और सलाह दी- अगर रिश्तों को पटरी पर लाना है, तो भारत की सार्वजनिक आलोचना बंद करनी होगी। कूटनीति बंद कमरों में होती है, कैमरों के सामने अपमान भारत बर्दाश्त नहीं करेगा।

भारत के इस सख्त रुख का असर जादुई रहा। डोभाल-रुबियो मीटिंग के कुछ ही दिनों बाद, 16 सितंबर को ट्रंप का रुख अचानक बदल गया। उन्होंने पीएम मोदी को उनके 75वें जन्मदिन पर फोन किया। यह फोन सिर्फ बधाई के लिए नहीं था, बल्कि रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलने की शुरुआत थी। ट्रंप ने मोदी के काम की जमकर प्रशंसा की। उस एक कॉल के बाद साल के अंत तक दोनों नेताओं ने 4 बार लंबी चर्चा की, जिसने टैरिफ कटौती के समझौते का रास्ता साफ किया।

दुनिया के सबसे कठिन ‘नेगोशिएटर’ माने जाने वाले डोनाल्ड ट्रंप के पीछे हटने की तीन बड़ी वजहें रहीं:
1. भारत की ‘नो-कॉम्प्रोमाइज’ नीति:
भारत ने साफ कर दिया कि वह आर्थिक नुकसान सह लेगा लेकिन अपनी विदेश नीति की स्वतंत्रता से समझौता नहीं करेगा। अमेरिका के लिए भारत जैसा बड़ा बाजार 4 साल तक खो देना भारी घाटे का सौदा था। लंबे इंतजार का नुकसान अमेरिकी कंपनियों को होगा।
2. चीन का फैक्टर:
इंडो-पैसिफिक रीजन में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए अमेरिका को भारत मजबूत सैन्य और रणनीतिक साझेदार चाहिए। भारत को नाराज करने का मतलब था पूरे एशिया में चीन को खुली छूट देना।
3. आर्थिक अनिवार्यता:
डिफेंस, सेमीकंडक्टर और क्रिटिकल टेक्नोलॉजी की सप्लाई चेन में भारत अब एक अनिवार्य कड़ी है। अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत के बिना सर्वाइव करना मुश्किल है।

इस पूरे मामले में प्रधानमंत्री मोदी की भूमिका काफी उल्लेखनीय रही। उन्होंने न तो सार्वजनिक मंचों से अमेरिका पर हमला बोला, न सोशल मीडिया के जरिए दबाव बनाने की कोशिश की। उन्होंने संस्थागत कूटनीति को काम करने दिया और अपनी टीम को पूरी छूट दे दी। यह संकेत देता है कि भारत अब प्रतिक्रियात्मक नीति से आगे बढ़ चुका है। आज की भारतीय कूटनीति शोर नहीं मचाती, लेकिन अपने हितों को लेकर स्पष्ट रेखाएं खींचती है।

इस पूरी जीत के पीछे एक सोची-समझी टीम वर्क थी। जहां प्रधानमंत्री मोदी ने शीर्ष स्तर पर व्यक्तिगच केमिस्ट्री और कूटनीति का संतुलन बनाए रखा। वहीं अजीत डोभाल ने ‘बदली हुई भाषा’ में अमेरिका को उसकी सीमा बताई। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वैश्विक मंचों पर भारत के पक्ष को मजबूती से रखा और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने व्यापारिक बारीकियों पर सख्त मोलभाव कर देश के हितों की रक्षा की।

टैरिफ को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करना केवल आर्थिक रियायत नहीं है, बल्कि यह इस बात की स्वीकारोक्ति है कि आज का भारत ‘बुली’ नहीं किया जा सकता। भारत ने साबित कर दिया कि वह अब सिर्फ प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं रहा, बल्कि वह बातचीत की शर्तें (Terms of Engagement) तय करने वाला ‘ग्लोबल पावर’ है।










