Home इतिहास के झरोखे में नरेन्द्र मोदी फर्क साफ है – एक ओर PM Modi का भव्य-दिव्य सोमनाथ स्वाभिमान...

फर्क साफ है – एक ओर PM Modi का भव्य-दिव्य सोमनाथ स्वाभिमान पर्व, दूसरी ओर JL Nehru ने लगाए आस्था में इतने अड़ंगे

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विजनरी सोच और सनातन संस्कृति के प्रति अटूट जुड़ाव ने सोमनाथ ज्योतिर्लिंग पर हुए पहले हमले के एक हजार साल को सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में बदल दिया। दुनियाभर ने इस मंदिर के माध्यम से जाना कि आस्था यदि चेतना बन जाए, तो वह इतिहास की दिशा बदल सकती है। आज का सोमनाथ मंदिर बताता है कि अब नया भारत है, लेकिन इसमें वही सनातन आत्मा समाहित है। सोमनाथ ज्योतिर्लिंग में विशाल समुद्र की लहरें, ओंकार मंत्र के अनुस्वर और असीम-अटूट आस्था, तीनों मिलकर यह संदेश देते हैं कि भारत की आत्मा जागृत है। अहिल्याबाई होल्कर की श्रद्धा, सरदार पटेल का स्वाभिमान और प्रधानमंत्री मोदी का दूरदर्शी नेतृत्व यह तीनों सोमनाथ को अतीत, वर्तमान और भविष्य का सेतु बना देते हैं। दूसरी ओर भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के चलते स्वतंत्र भारत की सत्ता ही सोमनाथ की आस्था से असहज हो गई थी। ऐतिहासिक प्रमाण हैं कि नेहरू ने भारत की सनातनी परंपरा को हमेशा-हमेशा के लिए खत्म करने के लिए बहुत प्रयास किए। नेहरू को भय था कि सोमनाथ अगर खड़ा हो गया तो हिंदू जाग जाएगा। और भय सही भी था। तब नेहरू ने एक दर्जन से ज्यादा पत्र लिखकर देश के प्रमुख लोगों को सोमनाथ के कार्यक्रम में ना जाने का अनुरोध किया था। यह अलग बात है कि पीएम रहते हुए भी उनकी एक ना चली थी।सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के पौराणिक और ऐतिहासिक संदर्भ
पहले बात सोमनाथ के ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भ की करते हैं। सोमनाथ का निर्माण उस कालखंड में हुआ, जब भारत केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि दर्शन, अध्यात्म और ज्ञान की वैश्विक धुरी था। यह मंदिर भारतीय सभ्यता की उस आत्मा का प्रतीक था, जिसमें सृष्टि, संरक्षण और संहार, तीनों का संतुलन समाहित था। सोमनाथ को भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना गया है। पुराणों विशेषकर स्कंद पुराण, शिव पुराण और भागवत पुराण में इसका उल्लेख मिलता है। ऐसी मान्यता है कि सबसे पहले चंद्रदेव यानि कि सोमदेव ने भगवान शिव की आराधना कर यहां स्वर्ण मंदिर बनवाया था। बाद में भगवान श्रीकृष्णने चंदन और अंततः राजा भोज ने पत्थर का भव्य मंदिर बनवाया। राजा भीमदेव प्रथम (सोलंकी वंश) ने पुनर्निर्माण कराया। इतिहासकार यह भी बताते हैं कि सोमनाथ का पहला ऐतिहासिक मंदिर ईसा की 5वीं–6वीं शताब्दी के बीच बना। गुजरात के मैत्रक वंश के शासकों द्वारा इसका निर्माण कराया गया। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी इसका जिक्र एक अत्यंत समृद्ध मंदिर के रूप में किया है। शिव का यह ओंकार रूप भारत की उस संस्कृति का उद्घोष करता है, जो सहिष्णु है, लेकिन कमजोर नहीं। जो शांत है, लेकिन निष्क्रिय नहीं।
पहली बार एक हजार साल पहले हमला, फिर बार-बार टूटा मंदिर
इतिहासकारों के अनुसार जनवरी 1026 में महमूद गजनवी के पहले हमले के साथ ही 11वीं से 16वीं सदी के बीच सोमनाथ मंदिर पर कई बार हमले हुए। 1299 में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति, फिर 1375 में मुजफ्फर शाह और बाद में 1665 में औरंगजेब के आदेश पर मंदिर को फिर ध्वस्त किया गया। हर बार क्रूर शासकों के कातिलाना आदेशों ने सिर्फ पत्थरों को ही तोड़ा, लेकिन हर बार भारतवासियों ने उसी स्थान पर पूजा की लौ को जीवित रखा। गुलामी के काल में जब भारत राजनीतिक रूप से बिखरा हुआ था, तब 1783 में मालवा की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण की पहल की। भारत को आजादी मिली, लेकिन सांस्कृतिक आत्मविश्वास अभी भी औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त नहीं था। ऐसे समय में 1948–49 में सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण को राष्ट्रीय स्वाभिमान से जोड़ दिया। उन्होंने स्पष्ट कथन था- “सोमनाथ का पुनर्निर्माण भारत की आत्मा के पुनर्निर्माण के समान है।” 11 मई 1951 यह वही अनुपम, अद्वितीय और अविस्मरणीय दिन था, जबकि भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के करकमलों से सोमनाथ मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा हुई।नेहरू का विरोध, सरदार पटेल का निर्णय और जनसहयोग मॉडल
सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण स्वतंत्र भारत का पहला बड़ा सांस्कृतिक–राजनीतिक विवाद था। यह विवाद इस पर था कि नव स्वतंत्र भारत का राज्य अपनी सभ्यतागत विरासत के साथ सार्वजनिक रूप से कैसे व्यवहार करे। इस विवाद के केंद्र में थे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, जिनके पत्र, निर्देश और प्रतिक्रियाओं के माध्यम से सोमनाथ मंदिर की राह में कई रोड़े अटकाने की कोशिश की थी। उनकी यह करतूतें आज भी सरकारी अभिलेखों में सुरक्षित हैं। दरअसल, नवंबर 1947 में जूनागढ़ के भारत में विलय के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने स्पष्ट कहा कि सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण होगा। यह निर्णय सरकारी धन से नहीं, बल्कि सार्वजनिक दान और ट्रस्ट के माध्यम से किया गया। के.एम. मुंशी को सोमनाथ ट्रस्ट का दायित्व सौंपा गया।जब सोमनाथ मंदिर को लेकर ‘राजकीय प्रतीक’ मुद्दा बना
तुष्टिकरण के पोषक जवाहर लाल नेहरू को यह सब अच्छा नहीं लगा। विवाद तब गहराया जब यह स्पष्ट हुआ कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण केवल एक धार्मिक गतिविधि नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है। नेहरू को आशंका थी कि इससे भारत की कथित धर्मनिरपेक्ष छवि—विशेषकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रभावित होगी। यह आशंका उनके निजी पत्रों में बार-बार दिखाई देती है। दिसंबर 1950 और जनवरी 1951 में जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को कई पत्र लिखे। इन पत्रों में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि राष्ट्रपति का सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन में जाना “अवांछनीय” संदेश देगा और यह धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा से मेल नहीं खाता।

नेहरू ने केंद्रीय मंत्रियों और अधिकारियों को दिए ऐसे निर्देश
तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अपने पत्रों में लिखा कि भारत जैसे नव-स्वतंत्र, बहुधार्मिक देश में सरकार या संवैधानिक पदों को धार्मिक आयोजनों से दूरी बनाए रखनी चाहिए। नेहरू यहीं नहीं रुके। उन्होंने मौखिक और लिखित रूप से यह सुनिश्चित किया कि केंद्र सरकार का कोई मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी या आधिकारिक प्रतिनिधि सोमनाथ के उद्घाटन समारोह में भाग न ले। यह तथ्य कई संस्मरणों और सरकारी अभिलेखों में दर्ज है। यह कदम प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण था। इसके साथ ही यह स्पष्ट संकेत था कि केंद्र सरकार इस आयोजन से स्वयं को अलग रखना चाहती है।

राष्ट्रपति बनाम प्रधानमंत्री: संवैधानिक नहीं, वैचारिक संघर्ष
डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू की आपत्तियों को अस्वीकार करते हुए 11 मई 1951 को सोमनाथ जाकर ज्योतिर्लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की। उन्होंने बाद में स्पष्ट किया कि वे किसी धर्म के प्रतिनिधि के रूप में नहीं, बल्कि एक भारतीय नागरिक के रूप में वहां गए थे। यह स्वतंत्र भारत का दुर्लभ क्षण था, जब सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर बैठे दो व्यक्तियों के बीच भारत की सांस्कृतिक आत्मा को लेकर खुला वैचारिक मतभेद सामने आया। दस्तावेज़ों से स्पष्ट है कि नेहरू की कई बिंदुओं पर मंदिर को लेकर आपत्ति थी। हिंदू होते हुए भी उनको राज्य और धर्म के सार्वजनिक मिश्रण से आपत्ति थी। तुष्टिकरण के चलते वे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारत की सेक्युलर छवि बनाना चाहते थे। इसके अलावा उनको यह भय कि बहुसंख्यक धार्मिक प्रतीकों को सरकारी समर्थन मिलने से अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना पैदा होगी।नेहरू को चर्चों और इस्लामिक आयोजनों में भाग लेने से परहेज नहीं
दरअसल, पंडित नेहरू दिखावे के ही हिंदू थे। सोमनाथ मंदिर के पुनरोद्धार कार्यक्रम के विरोध ने उनकी इस छवि को सरेआम कर दिया। यहां से आलोचना का बिंदु जन्म लेता है। क्या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यह था कि भारत की प्राचीन सभ्यतागत विरासत से सत्ता औपचारिक दूरी बना ले? यह भी एक तथ्य है कि नेहरू विदेशी धार्मिक स्थलों, चर्चों और इस्लामिक देशों के आयोजनों में भाग लेने से परहेज नहीं करते थे। ऐसे में सोमनाथ को लेकर उनकी असहजता स्वाभाविक प्रश्न खड़े करती है। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि नेहरू की आपत्तियों के बावजूद सोमनाथ मंदिर बना, उद्घाटित हुआ और पुनः प्रतिष्ठित हुआ। लेकिन यह भी उतना ही तथ्यात्मक है कि उन्होंने इसे राष्ट्रीय उत्सव या राजकीय गौरव का स्वरूप लेने से रोकने का पूरा प्रयास किया।भारत ने बरसों भुगता नेहरू की संकीर्ण सोच का खामियाजा
तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू के इस संकीर्ण सोच का खामियाजा बाद के वर्षों में भी देश ने भुगता। दरअसल, सोमनाथ प्रकरण ने यह मिसाल कायम की कि स्वतंत्र भारत की सत्ता अपनी बहुसंख्यक सांस्कृतिक स्मृतियों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने में संकोच करेगी। यह संकोच दशकों तक दिखा, जहाँ विरासत को निजी आस्था तक सीमित रखने की प्रवृत्ति बनी रही। इसलिए जवाहरलाल नेहरू के ऐसे प्रयासों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। उनके पत्र, निर्देश और रुख यह बताते हैं कि सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं था—वह स्वतंत्र भारत की आत्मा को लेकर पहला बड़ा वैचारिक इम्तिहान था।सोमनाथ और नेहरू: दस्तावेज बताते हैं असहजता की पूरी कथा
सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण स्वतंत्र भारत की सांस्कृतिक यात्रा का पहला बड़ा पड़ाव था। पर यह पड़ाव केवल ईंट-पत्थर का नहीं था; यह उस वैचारिक असहजता का भी प्रतीक बना, जो सत्ता और सभ्यता के बीच उभर रही थी। जवाहरलाल नेहरू द्वारा 1950-51 में लिखे गए कम से कम 17 पत्र—जिनका उल्लेख आज अभिलेखों और सोशल मीडिया दोनों में उपलब्ध है। यह बताते हैं कि उनका विरोध निर्माण से अधिक राजकीय-सार्वजनिक जुड़ाव को लेकर था। इन पत्रों का क्रम और भाषा, दोनों, उस असहजता की तीव्रता दिखाते हैं।

आइए, अब जानते हैं कि आजादी के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने सोमनाथ के खिलाफ क्या-क्या कदम उठाए…

  • 1 अगस्त 1951 — मुख्यमंत्रियों को पत्र
    मुख्य बिंदु: विदेशों में भारत की सेकुलर साख को नुकसान। नेहरू का आकलन था कि सोमनाथ से जुड़े सरकारी संकेतों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गलत संदेश दिया। यह पत्र बताता है कि उद्घाटन के बाद भी वे प्रभावों से चिंतित रहे।
  • 13 जून 1951 — उपराष्ट्रपति डॉ. एस. राधाकृष्णन को
    मुख्य बिंदु: सोमनाथ ज्योतिर्लिंग में सरदार वल्लभ भाई पटेल द्वारा कराए गए समारोह को अनावश्यक बताया; मंत्रियों को रोकने की कोशिश। यहां पर नेहरू का आग्रह स्पष्ट है कि सोमनाथ मंदिर से राजकीय पदों की दूरी रहे।
  • 9 मई 1951 — विदेश मंत्रालय के सचिव एस. दत्त को
    मुख्य बिंदु: “All this association is most unfortunate.” तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने मंदिर से सरकारी जुड़ाव को दुर्भाग्यपूर्ण ठहराया गया।
  • 2 मई 1951 — मुख्यमंत्रियों को परिपत्र
    मुख्य बिंदु: “Governments should refrain from associating… which affects the secular character.” अपने पत्र में नेहरू ने राज्यों को भी दूरी मंदिर से दूरी बनाकर रखने की सलाह दी। यह केंद्रीय असहजता का प्रसार था।
  • 28 अप्रैल 1951 — सूचना एवं प्रसारण मंत्री आर.आर. दिवाकर को
    मुख्य बिंदु: “Our radio broadcast should rather tone down the description.” मीडिया कवरेज कम/नरम रखने का निर्देश।
  • 24 अप्रैल 1951 — मृदुला साराभाई को
    मुख्य बिंदु: “The Somnath issue was giving him much trouble.” निजी स्तर पर बेचैनी का स्वीकार।
  • 24 अप्रैल 1951 — जाम साहब दिग्विजयसिंहजी (नवानगर) को
    मुख्य बिंदु: “I am troubled by this revivalism… it will have bad consequences.” ‘Revivalism’ शब्द का प्रयोग—वैचारिक असहजता का संकेत।
  • 22 अप्रैल 1951 — राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को
    मुख्य बिंदु: “This is assuming a certain political importance.” जवाहर लाल ने कहा कि सोमनाथ समारोह राजनीतिक अर्थ देने वाला होगा।
  • 22 अप्रैल 1951 — के.एम. मुंशी को
    मुख्य बिंदु: “I am distressed at the impression abroad that… is more or less a Government affair.” विदेशों में ‘सरकारी आयोजन’ की छवि से चिंता।
  • 22 अप्रैल 1951 — जाम साहब दिग्विजयसिंहजी को
    मुख्य बिंदु: “Pakistan is taking great advantage… to prove we are not a secular State.” पाकिस्तान द्वारा प्रचार की आशंका
  • 21 अप्रैल 1951 — सौराष्ट्र के मुख्यमंत्री यू.एन. ढेबर को
    मुख्य बिंदु: “I doubt if it is a proper use of public funds.” भारत के पहले सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के पुनरोद्धार जैसे पावन-पुनीत काम में भी सार्वजनिक धन के उपयोग पर आपत्ति दर्ज की।
  • 21 अप्रैल 1951 — पाक के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को
    मुख्य बिंदु: “The story… is completely false.” गजनी से द्वार लाने की कहानी का खंडन—कूटनीतिक संदेश।
  • 17 अप्रैल 1951 — के.एम. पणिक्कर (चीन में राजदूत) को
    मुख्य बिंदु: “I had tried to tone down the effects.” मुख्य बिंदु: तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय प्रभाव कम करने का प्रयास करेंगे।
  • 17 अप्रैल 1951 — गृह मंत्री सी. राजगोपालाचारी को
    मुख्य बिंदु: “I am very much troubled about this.” मुख्य बिंदु: जवाहर लाल नेहरू ने अपने पत्र में आंतरिक चिंता की पुनरावृत्ति होने के संकेत दिए।

 

  • 17 अप्रैल 1951 — विदेश सचिव/महासचिव (विदेश मंत्रालय) को
    मुख्य बिंदु: “Not to pay the slightest attention to these appeals.” दूतावासों को अपील करते हुए सोमनाथ मंदिर कार्यक्रम की अनदेखी करने के निर्देश दिए।
  • 19 मार्च 1951 — पाकिस्तान में भारतीय उच्चायुक्त खूब चंद को
    मुख्य बिंदु: “No publicity under any circumstances.” तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने चेताया कि हमें सोमनाथ के किसी भी प्रकार के प्रचार से परहेज करना चाहिए।
  • 13 मार्च 1951 — राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को
    मुख्य बिंदु: “If you feel that it will not be right to refuse, I would not like to press.” तत्कालीन पीएम का सोमनाथ मंदिर को लेकर विरोध निरंतर जारी।
  • 11 मार्च 1951 — गृह मंत्री सी. राजगोपालाचारी को
    मुख्य बिंदु: “I still think that it would be better for him not to go there.” सोमनाथ मंदिर के कार्यक्रम से तत्कालीन राष्ट्रपति को दूर रखने की सलाह दी।
  • 2 मार्च 1951 — राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को
    मुख्य बिंदु: “I do not like the idea of your associating yourself with a spectacular opening… it has implications.” उद्घाटन में राष्ट्रपति की भागीदारी का स्पष्ट विरोध किया।
  • 20 जुलाई 1950 — के.एम. मुंशी को
    मुख्य बिंदु: पुनर्निर्माण की प्राथमिकता पर संदेह; देश की आर्थिक कठिनाइयों का हवाला। यह पत्र बताता है कि आपत्तियां समय के साथ तीव्र होती गईं।

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