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India-EU Deal: वैश्विक मंच पर जोरदार दस्तक और विकसित भारत की ओर बढ़ते कदमों का निर्णायक मोड़ बनेगी

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भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच व्यापक व्यापार एवं निवेश समझौते (FTA) को लेकर दो दशकों से चल रही बातचीत आखिरकार निर्णायक मोड़ पर पहुंची है। 27 देशों वाले ईयू ब्लॉक के साथ यह डील न केवल भारत की बाहरी व्यापार रणनीति का एक बड़ा अध्याय साबित होगी, बल्कि 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में एक मजबूत आर्थिक आधार भी तैयार करेगी। लंबे समय तक अटके रहने के बाद अब पीएम नरेन्द्र मोदी के चलते यह समझौता आगे बढ़ा है। यह संकेत देता है कि भारत और यूरोप के जिन हितों पर वैश्विक भू-राजनीति का गहरा प्रभाव रहा है, आज एक निर्णायक बिंदु पर आकर मिल रहे हैं। मदर ऑफ ऑल डील्स कही जाने वाली यह डील केवल व्यापार का विस्तार नहीं, बल्कि वैश्विक संतुलन, आर्थिक सुरक्षा, सप्लाई चेन स्थिरता और हरित अर्थव्यवस्था के संदर्भ में एक नई साझेदारी है। इसके साथ ही यह अमेरिकी राष्ट्रपति की उस दबंगई को भी सीधा और करारा जवाब है, जो मनमाने टैरिफ से बहाने दुनिया का दरोगा बनने पर उतारू है।पीएम मोदी की पहल से दो दशक से फाइलों में दबा समझौता बाहर निकला
दो दशक से अधिक समय तक फाइलों में दबा पड़ा भारत–यूरोपीय संघ (EU) व्यापार समझौता पीएम मोदी की कुशल रणनीति के बाद अब अंततः एक नई ऊर्जा के साथ सामने आया है। यह केवल एक कूटनीतिक दस्तावेज नहीं, बल्कि उस बदलते भारत की पहचान है जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के केंद्र में अपनी जगह सुनिश्चित करने के लिए आत्मविश्वास, क्षमता और दूरदृष्टि के साथ आगे बढ़ रहा है। दुनिया की राजनीति और व्यापार के समीकरण इस कदर बदल चुके हैं कि भारत और यूरोप, जो लंबे समय से एक-दूसरे के बड़े साझेदार तो थे, लेकिन साथ-साथ कदमताल नहीं मिला पा रहे थे। अब इस साझा डील से नए रास्ता खोजने के लिए प्रेरित हुए हैं। यह डील इसलिए भी ऐतिहासिक है, क्योंकि इसके पीछे बीस वर्षों की कूटनीति, अनेक दौर की बातचीत, हिचकिचाहट, असहमति और अंततः समझदारी की दिशा में उठाया गए कदम शामिल हैं। जब 2007 में यह वार्ता शुरू हुई थी, तब भारत आज की तरह वैश्विक अर्थव्यवस्था का ध्रुवीय केंद्र नहीं था। ना ही तब वैश्विक मंच पर भारत को ताकत बनाने की सोच रखने वाली सरकार थी। लेकिन समय के साथ परिस्थितियां और सरकार बदली। यह बदलाव इतने व्यापक रहे कि भारत और ईयू दोनों को महसूस हुआ कि अब एक साझेदारी जरूरी है।भारत का वस्तु और सेवा निर्यात लगभग 750 बिलियन डॉलर
दरअसल, अमेरिकी दबाब के बीच यूरोप, चीन पर अपनी निर्भरता को कम करना चाहता है और भारत उस जगह को भरने के लिए तैयार खड़ा है। यूरोप को भरोसेमंद, राजनीतिक रूप से स्थिर, योग्य मानव संसाधन वाला और तेजी से विकसित होता बाजार चाहिए। दूसरी ओर भारत को तकनीक, निवेश और एक ऐसा उपभोक्ता बाजार चाहिए, जो उसके उत्पादों को उचित पहचान दे सके। इन परस्पर जरूरतों ने दोनों को करीब आने के लिए प्रेरित किया है। आज भारत का वस्तु और सेवा निर्यात मिलकर लगभग 750 बिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है। सरकार का लक्ष्य अगले दशक में इसे दोगुना करने का है। यह लक्ष्य तभी संभव है जब भारत ऐसे बड़े बाजारों से जुड़े, जिनके उपभोक्ता उच्च गुणवत्ता और विविधता को समझते हैं। यूरोपीय संघ इसी श्रेणी में आता है। यह दुनिया का सबसे बड़ा एकीकृत बाजार है। वर्तमान में भारत–ईयू व्यापार 170 बिलियन डॉलर के आसपास है, लेकिन यह उस संभावनाओं का केवल एक छोटा हिस्सा है, जो दोनों के बीच मौजूद हैं।

 

 

अब भारतीय उत्पाद यूरोपीय शेल्फों पर अधिक नजर आएंगे
यूरोप भारत के अधिकांश औद्योगिक उत्पादों पर ऊंचे टैरिफ लगाता है। टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग, कैमिकल्स, फूड प्रोसेसिंग से लेकर लेदर तक। यदि ये शुल्क कम होते हैं, तो भारतीय उत्पाद यूरोपीय शेल्फों पर पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाएंगे। निर्यात में तेजी और भारत के श्रम-प्रधान क्षेत्रों में रोजगार की वृद्धि—दोनों एक साथ संभव होंगे। करीब 50 से 70 बिलियन डॉलर का अतिरिक्त वार्षिक निर्यात भारत के विनिर्माण क्षेत्र को वह रफ्तार दे सकता है, जिसकी उसे वैश्विक उत्पादन केंद्र बनने के लिए आवश्यकता है। भारत को इस साझेदारी से दूसरा बड़ा लाभ मिलेगा- ज्यादा और बेहतर विदेशी निवेश का। यूरोप लंबे समय से भारत में निवेश करता रहा है, लेकिन यह निवेश जितना बड़ा हो सकता था, उतना अब तक नहीं हुआ। निवेश संरक्षण समझौते (IPA) पर सहमति बनने से यूरोपीय कंपनियों को भारत में एक स्थिर, सुरक्षित और भरोसेमंद माहौल मिलेगा। बदले में भारत को अत्याधुनिक तकनीक, हरित ऊर्जा में सहयोग और उच्च-स्तरीय उत्पादन की क्षमता प्राप्त होगी।

मदर ऑफ ऑल डील्स 2047 तक विकसित राष्ट्र की जमीन बनाएगी
इस मदर ऑफ ऑल डील्स से अगले पांच वर्षों में यूरोप से आने वाले निवेश में 20–30 प्रतिशत तक वृद्धि की संभावना व्यक्त की जा रही है। हरित उत्पादन की दिशा में बढ़ते कदम भारत को विश्व बाजार में “ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग” का केंद्र बना सकते हैं। विकसित भारत बनने की दिशा में यह परिवर्तन अनिवार्य है। यह शीशे की तरह साफ है कि यह बड़ा समझौता केवल व्यापार का विस्तार नहीं करेगा, बल्कि भारत को भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करेगा। यह उस भारत की कहानी का हिस्सा है जो 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने की राह पर है। प्रधानमंत्री मोदी ने जिस भारत का सपना साकार करने की बात कही है। एक ऐसा भारत जो ना केवल आर्थिक रूप से समृद्ध हो, बल्कि तकनीकी रूप से अग्रणी और हरित ऊर्जा में आत्मनिर्भर हो, यह डील उस दिशा में एक बड़ा कदम है।भारत की दर्शक की नहीं, निर्माता और निर्णायक दोनों की भूमिका
इस अत्यंत महत्वपूर्ण समझौते के माध्यम से भारत को न सिर्फ़ बाजार मिलेगा, बल्कि पहचान, भरोसा और वैश्विक नेतृत्व का वह अवसर मिलेगा जो किसी भी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए दुर्लभ होता है। यूरोप जैसे विकसित और परिपक्व आर्थिक ब्लॉक से जुड़ना भारत को विश्व व्यापार के केंद्र में स्थापित करेगा। यह उस नए वैश्विक क्रम का संकेत है जिसमें भारत सिर्फ़ दर्शक नहीं, बल्कि निर्माता और निर्णायक दोनों की भूमिका निभा रहा है। दुनिया आज नए भू-राजनीतिक तनावों और आर्थिक अस्थिरताओं से घिरी हुई है। ऐसे समय में भारत–ईयू समझौता स्थिरता, सहयोग और साझेदारी का एक नया अध्याय खोलता है। यह समझौता भारत की उस चुपचाप बढ़ती ताक़त का प्रमाण है जिसे अब दुनिया अनदेखा नहीं कर सकती। यह बताता है कि भारत केवल वैश्विक बाजार का हिस्सा नहीं, बल्कि उसकी दिशा तय करने वाला देश बन रहा है। यह एक ऐसा अवसर है, जो भारत की विशाल क्षमता को वैश्विक मंच पर नए आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करेगा और विकसित भारत 2047 के संकल्प को हकीकत में बदलने की दिशा में एक निर्णायक कदम साबित होगा।

 

ऐसे मिली भारत–ईयू व्यापार समझौता को मिली रफ्तार
1. विकसित भारत बनने की भारतीय महत्त्वाकांक्षा – प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए निर्यात बढ़ाना, विदेशी निवेश आकर्षित करना, उच्च-प्रौद्योगिकी निर्माण को बढ़ावा देना अनिवार्य है। ईयू समझौता भारत को इन तीनों क्षेत्रों में तेजी से आगे ले जा सकता है।
2. यूरोप का चीन से मोहभंग – यूरोप लंबे समय से चीन पर औद्योगिक आपूर्ति के लिए निर्भर रहा है, लेकिन महामारी के दौरान सप्लाई चेन टूटने, मानवाधिकार चिंताओं, चीनी निवेश की आक्रामक नीतियों के चलते उसका मोहभंग हो गया है। ऐसे में यूरोप को वैकल्पिक बाजारों की तलाश भारत स्वाभाविक पसंद बन गया। पीएम मोदी की नीतियों से जिसकी आर्थिक वृद्धि दर 7 प्रतिशत से ऊपर है।
3. ट्रंप और अमेरिका फ़र्स्ट का उभार – दुनिया में संरक्षणवादी रुख बढ़ा है। अमेरिका, चीन संबंधों में तनातनी और वैश्विक सप्लाई चेन के विघटन ने भारत और यूरोप दोनों को विश्वसनीय साझेदार ढूंढ़ने पर मजबूर किया। WTO का स्तब्ध होना भी क्षेत्रीय समझौतों की जरूरत बढ़ा रहा है।

व्यापार विस्तार और ‘मेड इन इंडिया’ को यूरोप में बढ़ावा
भारत का लगभग 90% निर्यात—जैसे टेक्सटाइल, केमिकल्स, इंजीनियरिंग गुड्स—पर यूरोप भारी टैरिफ लगाता है। एक अनुमान के अनुसार, इस समझौते के बाद भारत के औद्योगिक निर्यात में 50–70 बिलियन डॉलर की वार्षिक वृद्धि संभव है। भारत की बड़ी अपेक्षा है कि टेक्सटाइल्स पर 8–12% शुल्क, लेदर और इंजीनियरिंग उत्पादों पर 6–10% शुल्क, एग्रो-प्रोसेस्ड फूड पर 15–30% शुल्क कम होंगे। इससे भारतीय उत्पाद यूरोपीय बाज़ार में अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाएंगे। भारत को सबसे बड़ा तुरंत फायदा यह होने वाला है कि यूरोप दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता आयातक क्षेत्र है (GDP लगभग 17 ट्रिलियन डॉलर)। ऐसे में भारत के उद्योगों और MSME से लेकर बड़े निर्यातकों तक को एक विशाल बाजार मिलेगा। यूरोप आज भारत को सिर्फ एक निवेश गंतव्य नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता में साझेदार के रूप में देख रहा है। यह भारत की नई शक्ति का संकेत है, जिसमें आर्थिक क्षमता, राजनीतिक स्थिरता और वैश्विक जिम्मेदारी तीनों समाहित हैं।

सुरक्षित और स्थिर निवेश माहौल ने भारत में बढ़ाया भरोसा
ईयू भारत में सबसे बड़ा निवेशक है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में FDI का लगभग 18% हिस्सा अकेले यूरोप से आता है। निवेश संरक्षण समझौते (IPA) से भारत को कई फायदे होने वाले हैं।
1. सुरक्षित और स्थिर निवेश माहौल – इससे टेक्नोलॉजी और हाई-एंड मैन्युफैक्चरिंग (EV, ग्रीन टेक, फार्मा) को लाभ मिलेगा।
2. यूरोपीय कंपनियों का भरोसा बढ़ेगा – अनुमान है कि अगले 5 वर्षों में FDI में 20–30% वृद्धि हो सकती है।
3. हरित उत्पादन के लिए संयुक्त निवेश – बैटरी टेक्नोलॉजी, सोलर पैनल, हाइड्रोजन ऊर्जा में सहयोग बढ़ेगा। यह भारत को भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करेगा।

यूरोपीय मानकों के अनुरूप उत्पादन क्षमता बढ़ेगी
ईयू दुनिया के सबसे कड़े पर्यावरण मानक लागू करता है। CBAM (Carbon Border Adjustment Mechanism) भारत के लिए चुनौती भी है और अवसर भी। चुनौती इसलिए कि स्टील, सीमेंट, एल्यूमीनियम जैसे उद्योगों को कार्बन उत्सर्जन घटाने होंगे। उत्पादन लागत कुछ समय के लिए बढ़ सकती है। लेकिन बड़ा अवसर इसलिए कि है कि भारत के उद्योग जब वैश्विक मानकों के अनुरूप ढलेंगे, तो वे पूरी दुनिया में सबसे प्रतिस्पर्धी बन जाएंगे। लंबी अवधि में यह मेड इन इंडिया को एक “ग्रीन ब्रांड” में बदल देगा। भारत की सबसे बड़ी ताकत आईटी इंजीनियर, डॉक्टर, प्रोफेशनल सेवा प्रदाता की यूरोप में सबसे बड़ी कमी है। इस डील में भारत ने वीजा प्रोसेसिंग, स्किल्ड वर्कर्स की गतिशीलता, पारस्परिक योग्यता मान्यता पर ईयू से ढील मांगी है। यह शामिल होता है, तो भारत को प्रतिवर्ष अरबों डॉलर की सेवा-निर्यात आय होगी।

‘विकसित भारत’ के लक्ष्य में इस डील का अहम योगदान होगा
मोदी सरकार के ‘विकसित भारत 2047’ लक्ष्य में इस डील का अहम योगदान रहेगा। प्रधानमंत्री मोदी ने 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प रखा है। इस संकल्प के तीन आधार स्तंभ हैं—समृद्ध अर्थव्यवस्था, आधुनिक अवसंरचना और उद्योग और वैश्विक नेतृत्व। EU–India डील इन तीनों को अत्यंत गतिशील बना सकती है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता निर्यात बढ़ाने, निवेश आकर्षित करने, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने से भारत की GDP में 1 से 1.5% अतिरिक्त वृद्धि कर सकता है। विकसित राष्ट्र बनने के लिए भारत को अगले 20 वर्षों तक 6–7% की स्थिर वृद्धि चाहिए। EU समझौता इस लक्ष्य को अधिक यथार्थवादी बनाता है। इसके अलावा इससे भारत में रोजगार सृजन में बड़ा उछाल आएगा। निर्यात बढ़ने और यूरोपीय निवेश आने से टेक्सटाइल, ऑटो पार्ट्स, फार्मा, इलेक्ट्रॉनिक्स, ग्रीन एनर्जी, आईटी जैसे क्षेत्रों में लाखों नए रोजगार बनेंगे। यही वह क्षेत्र हैं जो भारत के मध्यम वर्ग और युवाओं के लिए बड़ी संभावनाएं पैदा करते हैं।

भारत सप्लाई चेन का नया केंद्र, हमारे टैलेंट की डिमांड बढ़ेगी
यूरोप चीन पर निर्भरता घटाना चाहता है। भारत राजनीतिक रूप से स्थिर, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और युवा कार्यबल वाला देश एक विश्वसनीय विकल्प बन रहा है। EU–India डील से यूरोप अपने उत्पादन तंत्र को भारत में स्थानांतरित कर सकता है। यह “Make in India for the World” की दिशा में एक निर्णायक कदम है। इससे भारत ना सिर्फ सप्लाई चेन का नया हब बनेगा, बल्कि भारतीय टैलेंट की भी मांग बढ़ेगी। भारत की भू-राजनीतिक स्थिति और मजबूत होगी। इस समझौते से भारत को तीन वैश्विक लाभ भी हैं। पहला, चीन के विकल्प के रूप में भारत की भूमिका मजबूत होगी। अमेरिका-यूरोप के बीच भारत का पुल जैसा महत्व बढ़ेगा। एशिया में रणनीतिक संतुलन बनाने में भारत की भूमिका निर्णायक बन जाएगी। वास्तविकता में देखें तो यह समझौता केवल व्यापार नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी का विस्तार है। यह विकसित भारत की दिशा में बुनियादी परिवर्तन होगा।

 

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