Home विचार ‘अटेंशन सीकिंग डिसॉर्डर’ के शिकार ‘युवराज’ की टीआरपी राजनीति

‘अटेंशन सीकिंग डिसॉर्डर’ के शिकार ‘युवराज’ की टीआरपी राजनीति

राहुल गांधी की 'डर्टी पॉलिटिक्स' को खंगालती रिपोर्ट

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भारतीय राजनीति में 2010-11 के बाद का दौर याद कीजिए तो एक तरफ अन्ना आंदोलन का जोर था तो दूसरी तरफ ‘युवराज’ के हर एक्शन की चर्चा। टेलीविजन मीडिया हो या प्रिंट मीडिया सब एक तरफ से इस ‘युवराज’ से सवाल पूछने और छापने के लिए तैयार रहता था। उस दौर में तो कुछ मीडिया भी अपने हेडलाइन में उन्हें भावी पीएम तक करार देने लगा। लेकिन वक्त बीता… दौर बीता… लाख की बंद मुट्ठी खुली तो खाक की दिखने लगी। जी हां, कांग्रेस के युवराज, पार्टी के भविष्य और भारत का भावी प्रधानमंत्री… राहुल गांधी को भारतीय राजनीति का ट्रेजडी कहा जाने लगा।

कुछ दिनों के लिए सक्रिय रहना और फिर विपासना या फिर न्यू ईयर की छुट्टी पर चले जाना ये राहुल की राजनीति का स्टाइल रहा है। दरअसल उनकी कार्यशैली ऐसी रही कि उन्हें एक वक्त के बाद ‘पार्ट टाइम’ पॉलिटिक्स करने वाला नेता करार दिया जाने लगा। लेकिन राहुल गांधी ‘अटेंशन सीकिंग डिसॉर्डर’ के शिकार बने रहे। दरअसल नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही राहुल को मीडिया ने तवज्जो ही देना बंद कर दिया। ऐसे में राहुल गांधी कुछ न कुछ ऐसे कार्य अब भी करते रहते हैं जिससे कि मीडिया का अटेंशन उनपर बना रहे। 

सत्ता के लिए टीआरपी बटोरने की राजनीति
दरअसल राहुल गांधी की इस छवि के पीछे उनकी हरकतें ही जिम्मेदार रही हैं। राजनीति की कसौटी पर कसें तो राहुल के इरादों में सत्तालोलुप राजनीति की छाप हर बार दिखी है। दागी जनप्रतिनिधि विधेयक को सरेआम फाड़ने का ड्रामा तो आप सबको याद होगा। किस तरह मनमोहन कैबिनेट को शर्मसार होना पड़ा और भारत की पूरी राजनीतिक व्यवस्था का अपमान किया गया। तीन-चार दिनों तक राहुल गांधी मीडिया की सुर्खियों में तो रहे लेकिन उनकी हरकतों ने उन्हें एक अगंभीर राजनेता की छवि गढ़ दी। 

महाराष्ट्र में कलावती के यहां विजिट करना हो या भट्टा परसौल का भ्रमण, नोटबंदी का विरोध हो या अभी मंदसौर में मातम मनाने का नाटक… इन सब घटनाओं में राहुल गांधी ने अपनी ऐसी ही छवि बनाई है लोग उन्हें टीआरपी की राजनीति करने वाले नेता कहने लगे हैं। 

टीआरपी के लिए अरविंद केजरीवाल का अनुसरण
कांग्रेस का वोट के लिए टीआरपी का यह खेल बहुत पुराना है, जिसके आजकल राहुल गांधी वारिस बने हुए हैं। टीआरपी की इस राजनीति में राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल का अनुसरण करने का प्रयास करते रहते हैं। देश में जहां कहीं भी दंगा, आंदोलन या मौतें होती हैं, वहां पहुंचकर मोदी सरकार पर आरोप लगाने से बाज नहीं आते। राहुल आरोप लगाते समय भूल जाते हैं कि समस्याएं उनके अपने परिवार और पार्टी की ही देन है।

मंदसौर तो पहुंचे, लेकिन मुलतई भूल गए राहुल
मध्यप्रदेश के मंदसौर में पांच किसानों की पुलिस फायरिंग में मौत होने पर वह 8 जून को मंदसौर पहुंच गए। यहां पहुंचकर टीवी चैनलों के ‘गन माइक’ पर मोदी सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि प्रधानमंत्री किसानों का कर्ज माफ नहीं करते, बोनस नहीं देते, किसानों को बढ़ा हुआ समर्थन मूल्य नहीं देते, मोदी सरकार किसान विरोधी है।

लेकिन यह कहते समय वह भूल गये कि 12 जनवरी 1998 को मध्यप्रदेश के बैतूल के मुलतई में कांग्रेस की दिग्विजय सिंह सरकार ने धरने पर बैठे हजारों किसानों पर पुलिस से फायरिंग करवा दी थी। इस फायरिंग में 24 किसान मारे गए थे। किसानों की सिर्फ मांग इतनी थी कि मौसम से खराब हुई फसल के लिए सरकार मुआवजा दे, लेकिन किसानों को गोलियों से मौत मिली।

भट्टा परसौल भ्रमण के बाद किसानों को भूल गए
ग्रेटर नोएडा के भट्टा परसौल में जमीन अधिग्रहण के मामले को लेकर किसानों में रोष था और राज्य की मायावती सरकार के खिलाफ आंदोलन जोरों पर था। ऐसे में 6 मई 2011 को पुलिस की जबरदस्त कार्रवाई में चार किसान मारे गए। इन्हीं परिस्थितियों में राहुल गांधी रात के अंधेरे में 10 मई 2011 को भट्टा परसौल पहुंचने वाले थे, लेकिन उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, हालांकि बाद में रिहा भी कर दिया गया। मीडिया से बात करते हुए मायावती सरकार को किसान विरोधी करार दिया।

बाद में 24 फरवरी 2012 को भट्टा परसौल में चुनाव से पूर्व एक रैली में कहा कि सपा, बसपा और भाजपा ने प्रदेश के विकास को छीन लिया है, आप मुझे पांच साल दिजिए मैं प्रदेश को बदल दूंगा, और तब तक प्रदेश नहीं छोडूंगा जब तक यह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो जाता।

किसान विरोधियों से लड़ाई भी, मोहब्बत भी
2012 में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को करारी हार मिली और सपा की सरकार बन गई। उसके बाद राहुल गांधी को न किसान याद रहे, न भट्टा परसौल याद रहा। हालत यह हो गई कि 2017 के विधान सभा चुनाव में कांग्रेस का पूरी तरह सफाया हो गया। क्योंकि राहुल गांधी ने उसी पार्टी से राजनीतिक गठजोड़ कर लिया, जिसे कभी वह किसान और प्रदेश के विकास का विरोधी बताया करते थे।

राजनीतिक टीआरपी के लिए सहरानपुर गए
सहरानपुर में हुए दंगों का हाल जानने के लिए 27 मई 2017 को प्रभावित गांवों में पहुंच गए। स्थानीय लोगों से बातचीत करने के बाद, मीडिया के सामने, सीधे प्रधानमंत्री मोदी पर आरोपों की झड़ी लगा दी, ताकि प्रधानमंत्री के प्रबल विरोधी के रुप में उनकी पहचान बन सके। लेकिन अब सामने आ रहा है कि सहारनपुर में हिंसा की साजिश के पीछे भी कांग्रेस की कुत्सित राजनीति ही रही है। बसपा-कांग्रेस गठजोड़ ने यूपी की योगी सरकार को बदनाम करने के लिए कैसी साजिश रची थी, वक्त आने पर इसपर से पर्दा भी उठेगा ही।  

नोटबंदी पर भी टीआरपी की राजनीति में राहुल
राहुल गांधी ने नोटबंदी का विरोध के लिए क्या-क्या नहीं किया। हंगामा किया, साजिश रची, लाइन में भी खड़े रहे और खूब टीआरपी भी बटोरी। लेकिन नतीजा क्या हुआ सब जानते हैं। पांच में से चार राज्यों में हुए चुनाव में करारी शिकस्त। बहरहाल नोटबैन के विरोध का खामियाजा तो राहुल गांधी भुगत चुके हैं। लेकिन ये बात सच साबित हुई कि नोटबंदी के दौरान जिस तरह की नकारात्मक राजनीति कर सुर्खियां बटोरी उससे उनकी छवि और खराब हो गई । जाहिर है भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की ठान चुके पीएम मोदी के मुकाबले लोगों को राहुल गांधी ‘बेईमान’ लगे और एक के बाद एक चुनावों में हार मिली।

कलावती को भी भूल गए राहुल
जरा याद कीजिए उनके 2008 के उस दौरे को, जब राहुल ने महाराष्ट्र के विदर्भ की कलावती के घर पहुंचे थे। गरीब कलावती के जख्म पर मरहम लगाने की उनकी कोशिश पर खूब बहस हुई थी। उस वक्त उन्हें टीआरपी भी खूब मिली थी। लेकिन मिल रही सुर्खियों को राहुल संभाल नहीं पाए। शायद जनता की नब्ज टटोलने में वो फेल हो गए।

दरअसल राहुल गांधी अपने आपको प्रधानमंत्री मोदी के प्रबल विरोधी के रुप में स्थापित करने के लिए जिस टीआरपी की राजनीति के दलदल में उतर चुके हैं, वहां शायद उनको पता नहीं है कि जब जब वह अपना मुंह, मोदी के विरोध में खोलते हैं, जनता हमेशा उनको खोखला और सतही पाती है। संदेश साफ है कि भारत की जनता टीआरपी पॉलिटिक्स नहीं जमीनी राजनीति को पसंद करती है। 

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