Home विपक्ष विशेष चुनाव आयोग से सुप्रीम कोर्ट तक घिरती जा रही हैं ममता बनर्जी

चुनाव आयोग से सुप्रीम कोर्ट तक घिरती जा रही हैं ममता बनर्जी

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी का सियासी ड्रामा उन्हें भारी पड़ सकता है। देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी सीबीआई को अपना काम न करने देने के मामले में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है। कोर्ट ने आज ही कहा है कि अगर कोलकाता पुलिस कमिश्नर द्वारा सारदा चिटफंड मामले में सबूत मिटाने का सीबीआई का आरोप सही निकला, तो कमिश्नर राजीव कुमार को पछताना पड़ेगा। लेकिन, अगर ऐसा होता है तो इसका सबसे बड़ा असर ममता बनर्जी की राजनीति पर पड़ेगा। बहरहाल, कोर्ट के रुख के लिए कल तक का इंतजार करना होगा।      

चुनाव आयोग में ममता की शिकायत

इस बीच, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हेलिकॉप्टर को उतरने की अनुमति नहीं देने का मामला सोमवार को चुनाव आयोग तक जा पहुंचा है। जहां भाजपा प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग के समक्ष ममता सरकार की शिकायत की है। भाजपा नेताओं ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर अलोकतांत्रिक तरीके से काम करने का आरोप लगाया है। प्रतिनिधिमंडल में निर्मला सीतारमण, मुख्तार अब्बास नकवी, एस एस अहलूवालिया, कैलाश विजयवर्गीय शामिल थे। चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराने के बाद नकवी ने कहा, ‘पश्चिम बंगाल सरकार लगातार भाजपा नेताओं की रैलियों में अड़चन पैदा कर रही है। हमने चुनाव आयोग से ऐसे अधिकारियों को हटाने की मांग की है, जो लोकतंत्र के खिलाफ काम कर रहे हैं। ऐसे अधिकारियों को चिह्नित कर हटाया जाए। जिससे पश्चिम बंगाल में चुनाव के लिए स्वतंत्र और भय-मुक्त माहौल बने।’ गौरतलब है कि रविवार को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पश्चिम बंगाल के बालुरघाट में एक रैली थी, लेकिन ममता सरकार ने योगी को इसमें शामिल होने की इजाजत नहीं दी। यहां तक कि राज्य सरकार ने उनका हेलिकॉप्टर तक लैंड नहीं होने दिया। इससे पहले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के हेलिकॉप्टर को भी उतरने की इजाजत नहीं मिली थी।  योगी का हेलिकॉप्टर उतरने की इजाजत नहीं देने पर भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भी राज्य सरकार को घेरा। उन्होंने इस कदम को अलोकतांत्रिक और फासीवादी बताया। प्रसाद ने कहा कि यह ममता बनर्जी और तृणमूल के अलोकतांत्रिक रिकॉर्ड का अफसोसजनक और निंदनीय सच है। 

ममता का फासीवादी रवैया

दरअसल, ये दोनों मामले स्वतंत्र भारत के इतिहास में अभूतपूर्व हैं। दोनों मामलों में संवैधानिक परंपराओं की धज्जियां उड़ाई गई हैं। किसी राजनीतिक दल के अध्यक्ष को सिर्फ इसलिए अपने राज्य में नहीं आने देना क्योंकि उसकी विचारधारा अलग है, बेहद शर्मनाक है। देश के सियासी दलों में आपसी विरोध की लंबी परंपरा रही है, लेकिन आज तक इस तरह की घटनाएं नहीं हुईं जब जानबूझकर किसी नेता को रैली करने से लगातार रोका जाता रहा हो। ठीक इसी तरह, सीबीआई को काम करने से रोकना, सीबीआई टीम को पुलिस हिरासत में ले लेना एक तरह से कानून-व्यवस्था को बंधक बनाना है। इतना ही नहीं, उलटे, सीबीआई की कार्यवाही को रोककर केंद्र के खिलाफ धरना पर बैठना तो और भी दुर्भाग्यपूर्ण कदम है। उससे भी ज्यादा चिंताजनक यह है के एन-केन-प्रकारेण पीएम मोदी को सत्ता से बेदखल करने में जुटे कथित महागठबंधन के नेता ममता के इस रवैये का समर्थन कर रहे हैं। 

अब सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग दोनों की टिप्पणियों और कार्रवाइयों का इंतजार है। फिलहाल तो यही लग रहा है कि ममता बनर्जी अपने ही बुने जाल में फंसती नजर आ रही हैं।      

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