Home विपक्ष विशेष ‘विनाश की राजनीति’ की बुनियाद डाल रहा विपक्ष !

‘विनाश की राजनीति’ की बुनियाद डाल रहा विपक्ष !

समाज की एकता को चोट पहुंचाती विपक्ष की राजनीति

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यूपी चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को बंपर जीत क्या मिली विपक्ष बौखला गया है। जातिवादी-सांप्रदायिक राजनीति को आम लोगों की एकजुटता ने आईना क्या दिखाया विपक्ष के पैरों तले की जमीन खिसक गई। राहुल गांधी सदमें में चले गए तो लालू प्रसाद यादव बौखला गए। अरविंद केजरीवाल और नीतीश की बोलती बंद हो गई। मायावती, मुलायम और ममता अब तक पीएम मोदी की लोकप्रियता को पचा नहीं पाए हैं। लेकिन सबसे खास ये कि मोदी की लोकप्रियता से घबराकर विपक्ष विनाश की राजनीति की बुनियाद तैयार करने साजिश रचने लगा है। बहुसंख्यक समाज में विभेद की कुत्सित राजनीति को फिर से हवा दी जा रही है। ‘फूट डालो-राज करो’ की नीति को एक बार फिर राजनीति का आधार बनाया जा रहा है। इस साजिश को अंजाम तक पहुंचाने के लिए विभिन्न प्रदेशों में अलग-अलग चेहरों का सहारा लिया जा रहा है।

फूट डालो-राज करो की राजनीति कर रही कांग्रेस
गुजरात में बीते दो दशक से कांग्रेस की दाल नहीं गल रही है। चालीस साल तक राज करने वाली कांग्रेस की गत ये है कि वो स्थानीय चुनाव तक जीतने में भी सफल नहीं हो रही है। ऐसे में ‘फूट डालो और राज करो’ की राजनीति को कांग्रेस ने फिर से अपनी जीत का आधार बनाने की ठानी है। कांग्रेस की राजनीति के कारण ही गुजरात में मजबूत पाटीदार समुदाय को कमजोर करते हुए आरक्षण जैसी मांग के आसरे कुत्सित राजनीति की आग में धकेल दिया गया है, जबकि हार्दिक पटेल कांग्रेस की हाथ का खिलौना बन गए हैं।

कांग्रेस के इशारे पर हार्दिक ने करवाया ‘मुंडन’
कभी कांग्रेस का विरोध करने वाले हार्दिक पटेल अब भाजपा विरोध के नाम पर कांग्रेस से हाथ मिलाने जा रहे हैं। दरअसल हार्दिक पटेल ने जब आरक्षण आंदोलन शुरू किया था तो उन्होंने कांग्रेस और भाजपा से समान दूरी रखने की बात कही थी। लेकिन बीते गुरुवार को हार्दिक पटेल ने साफ कहा कि भाजपा को हराने के लिए वो कांग्रेस के साथ जाएंगे। हार्दिक की इस बात से गुजरात का पाटीदार समाज भी ठगा हुआ महसूस कर रहा है। इसके साथ ही हार्दिक पटेल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गुजरात यात्रा के विरोध में अपना मुंडन करवा लिया है। उस नरेंद्र मोदी के विरोध में जिन्होंने न सिर्फ गुजराती अस्मिता को नई पहचान दी बल्कि गुजरात के गौरव को दुनिया में स्थापित किया। जाहिर है कांग्रेस के इशारे पर हार्दिक द्वारा की गई ये हरकत गुजरात के पाटीदार समुदाय को भी स्वीकार नहीं होगा।

कांग्रेस-AAPके इशारे पर काम कर रहे हैं जिग्नेश
11 जुलाई, 2016 को चार दलित युवकों की गुजरात के ऊना में पिटाई कर दी। इस घटना के बाद 34 गिरफ्तारियां हुईं और न्यायिक प्रक्रियाएं भी शुरू कर दी गईं। लेकिन कांग्रेस की ‘फूट डालो-राज करो’ की राजनीति को एक नई जमीन मिल गई। एक चेहरा भी सामने लाया गया जिग्नेश मेवानी का। पेशे से वकील जिग्नेश मेवानी का जन्म संभ्रांत घर में हुआ है। इनके पिता अहमदाबाद म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन में क्लर्क थे। लेकिन आम आदमी पार्टी और कांग्रेस की मिलीभगत से उन्हें दलितों का चेहरा प्रोजेक्ट किया जाने लगा। हालांकि उनकी पोल तभी खुल गई जब ऊना में जिन दलितों की पिटाई हुई थी उन परिवारों ने ही जिग्नेश मेवानी पर उनकी अनदेखी करने का आरोप लगा दिया। जिग्नेश पर राजनीति करने का आरोप लगा दिया। दरअसल गुजरात सरकार ने उन परिवारों को तत्काल राहत मुहैया करवाई थी, लेकिन जिग्नेश मेवानी की राजनीति के कारण उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। ऐसे में दलित परिवारों ने ही जिग्नेश मेवानी की मंशा पर सवाल उठा दिए।

राजनीतिक महत्वाकांक्षा पाले बैठे हैं जिग्नेश मेवानी
गुजराती मैगजीन और एक गुजराती अखबार के लिए लगभग चार वर्ष तक काम कर चुके जिग्नेश ने ‘लड़त समिति’ का गठन किया था। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच का गठन किया है। फिर आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता बन गए। लेकिन आम आदमी पार्टी में राजनीतिक महत्वाकांक्षा की टकराहट की वजह से उन्होंने पार्टी छोड़ दी। अब वे गुजरात से बढ़कर राजस्थान में भी अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने की नीति पर चल रहे हैं। जाहिर है सामाजिक आंदोलन के नाम पर जब जिग्नेश की राजनीतिक महत्वाकांक्षा उजागर हुई तो उनकी पोल खुल गई है। वामपंथी संगठनों की गोद में खेलने वाले जिग्नेश की राजनीति लोगों के समझ में आने लगी है। 

ऊना कांड में आया था कांग्रेस नेता का नाम
ऊना कांड बिहार चुनाव से ठीक पहले करवाया गया था। इसका मकसद था कि देश भर के दलितों में ये संदेश जाए कि बीजेपी के राज्यों में दलितों पर अत्याचार हो रहे हैं। लेकिन जांच में सामने आया कि समधियाल गांव का सरपंच प्रफुल कोराट ऊना के कांग्रेसी विधायक और कुछ दूसरे कांग्रेसी नेताओं के साथ संपर्क में था। अब तक की जांच में यह साफ हो चुका है कि सरपंच ने ही फोन करके बाहर से हमलावरों को बुलाया था। जो वीडियो वायरल हुआ था वो भी प्रफुल्ल कारोट के फोन से ही बना था। इस साजिश का बदला समधियाल के दलितों ने प्रफुल्ल कोराट को पंचायत चुनाव में हराकर ले लिया। 

अहमद पटेल की साजिश थी ऊना दलित कांड!
ऊना कांड की सीआइडी जांच अभी चल रही है। लेकिन सूत्रों से जो जानकारी मिली है इसमें कांग्रेस की खतरनाक साजिश की ओर इशारा करती है। कहा जा रहा है कि कांग्रेस के बड़े नेता अहमद पटेल के इशारे पर कांग्रेस के वंश भाई भीम ने ये सारी साजिश रची थी। बहरहाल सच्चाई क्या है ये तो सामने आना बाकी है लेकिन ये तो साफ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दलित विरोधी साबित करने के लिए बुनी गई एक बड़ी राजनीतिक साजिश थी ऊना कांड।

दलितों को बरगला रही है चंद्रशेखर की भीम आर्मी
21 मई, 2017 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर दलित समुदाय के लोग यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार का विरोध करने के लिए इकट्ठा हुए। इनका आरोप है कि दलितों पर सवर्ण जुल्म ढा रहे हैं। दरअसल सहारनपुर गांव में मामूली बात पर दो गुटों में टकराव हुआ, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई थी। इस घटना की प्रतिक्रिया में हिंसा भी हुई लेकिन प्रशासन ने समय रहते काबू पा लिया। पचास से ज्यादा लोगों पर केस दर्ज किया गया। लेकिन भाकपा माले की छात्र इकाई आइसा की शह पर भीम आर्मी के लोगों ने इसे राजनीतिक रंग दे दिया। जाहिर है ये बहुसंख्यक समुदाय को बांटने की ये राजनीति किसी बड़ी साजिश का हिस्सा है।

मोदी को मात देने के लिए ‘फूट डालो-राज करो’
दरअसल यूपी में बीजेपी की बंपर जीत ने सारे राजनीतिक समीकरणों को धता बता दिया था। मायावती से धोखा खाए दलित समुदाय ने भाजपा का साथ दिया। आलम ये रहा कि इस बार के विधानसभा चुनाव में 85 प्रतिशत रिजर्व सीटों पर भी बीएसपी को 24 प्रतिशत ही मत मिले। भाजपा को इस चुनाव में सभी जातियों का वोट मिला जिसमें दलितों का भी बहुत बड़ा योगदान है। जाहिर है यही बात विरोधी दलों को भा नहीं रही है।

सबका साथ-सबका विकास की जीत
पीएम मोदी की सबका साथ-सबका विकास नीति ने अमीर-गरीब की खाई को पाटने का काम किया है। सत्ता-समाज में हाशिये पर रहे समाज को सरकार के जरिये साथ जोड़ने का उनका प्रयास जमीन पर भी दिख रहा है। बीते चुनावों से साफ होता जा रहा है कि पीएम मोदी की लोकप्रियता जिस तरह से बढ़ रही है वह विपक्ष की बैचेनी का कारण है। जाहिर है विपक्ष एक बार फिर जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति के जरिये सामाजिक एकता को छिन्न-भिन्न करने में लगा है। ये ठीक वैसे ही किया जा रहा है जैसे बिहार चुनाव के वक्त असहिष्णुता का मुद्दा उछाला गया था। आरक्षण के बारे में लोगों के बीच भ्रम फैलाया गया था। लेकिन देश के लोगों को पीएम मोदी की नीतियों और बातों पर भरोसा है।

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