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NDA छोड़कर नीतीश के लालू के साथ जाते ही पिछड़ने लगा बिहार

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‘बिहार में बहार है, फिर से नीतीशे कुमार है’… ये नारा बीते चुनाव में और फिर चुनाव नतीजों के बाद खूब चमका था। जनता ने समर्थन देकर नीतीश कुमार को फिर एक बार मुख्यमंत्री बना दिया। दावा बिहार को विकास की राह पर आगे बढ़ाने का था। लेकिन बीते तीन साल में ऐसा क्या हुआ जो बिहार विकास में पिछड़ गया? एक वक्त सबसे तेज गति से विकास कर रहे बिहार को किसकी नजर लग गयी? बिहार में फिर एक बार घोटालों की बहार क्यों है? आखिर क्यों कानून व्यवस्था पर सवाल है? क्यों निवेश नदारद है? क्या और क्यों की लंबी फेहरिस्त है। पर जवाबदेही किसकी है? जिम्मेदारी किसकी है?

सिर्फ बयानों में सुशासन
जाहिर है नीतीश कुमार ने जिस अंदाज में लोगों से वादा किया था, क्या वे उसपर खरे उतर पा रहे हैं? बिहार में सुशासन क्या नेताओं के बयानों में ही सिर्फ दिखेगा, धरातल पर नहीं? शहाबुद्दीन जैसे माफिया डॉन को प्रश्रय देने वाले नेताओं के साथ सत्ता का भागीदार बनकर कैसे सुशासन की दलील दे सकते हैं? जाहिर है बिहार में अपराधियों और गुंडों की बहार है, जनता तो लाचार है। बिहार की सत्ता और शासन-व्यवस्था पर नीतीश कुमार की पकड़ ढीली हो चुकी है। ऐसे में दूसरे नेताओं को नैतिकता की नसीहत देने वाले नीतीश कुमार को इसी आधार पर इस्तीफा नहीं दे देना चाहिए?

नीतीश से टूटी जनता की उम्मीद!
दरअसल ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं कि जब 2005 में लालू प्रसाद एंड फैमिली का जंगलराज बिहार में खत्म हुआ तो बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एक उम्मीद दिखी। एनडीए का हिस्सा रहे जेडीयू-बीजेपी की सरकार ने बिहार में सर्वसमावेशी योजनाओं का खांका खींचा और काफी हद तक धरातल पर उतारने में सफल भी रहे। 2005-2012 तक विकास दर की औसत रफ्तार 9 से ज्यादा रही। लेकिन नीतीश कुमार की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं ने बिहार को फिर एक बार पीछे धकेल दिया है। नीतीश कुमार उसी ‘जंगलराज के नायक’ की गोद में जा बैठे जिससे बिहार को मुक्ति दिलाने की कसम खा रखी थी। जाहिर है इसका उल्टा असर पड़ा और विकास के हर पैमाने पर बिहार पिछड़ता चला गया।

क्राइम के आगे कराह रही कानून-व्यवस्था
सीवान जेल में बंद बाहुबली मोहम्मद शहाबुद्दीन और राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद के बीच हुई बातचीत का टेप एक निजी टीवी पर दिखाया गया। इसमें साफ है कि लालू प्रसाद से बाहुबली शहाबुद्दीन एसपी को हटाने के लिए कहते हैं और लालू प्रसाद हामी भरते हुए सुनाई देते है। जाहिर है इस टेप ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जंगलराज का दौर बिहार में आ गया है।

शहाबुद्दीन को लालू ने जेल से बाहर निकलवाया
महागठबंधन की सरकार बनते ही लालू प्रसाद ने किस तरह से कानून-व्यवस्था ध्वस्त करना शुरू किया इसकी बानगी शहाबुद्दीन की रिहाई के रूप में देखने को मिली थी। 10 सितम्बर, 2016 को 11 साल के बाद अपराधी और लालू के बाहुबली राजद के पूर्व सांसद मो. शहाबुद्दीन जेल से बाहर आ गये और नीतीश कुमार कुछ नहीं कर सके। मीडिया और जनता के जबरदस्त विरोध के सामने नीतीश को लालू के मित्र की जमानत का सर्वोच्च न्यायलय में विरोध करना पड़ा। इसी का नतीजा रहा कि शहाबुद्दीन अब दिल्ली के तिहाड़ जेल में हैं।

अपराध की राजधानी बनी पटना
2016 के आंकड़ों के अनुसार पटना राज्य की राजधानी ही नहीं है अपराध की भी राजधानी है। पटना अपराध के हर जुर्म के मामलों में राज्य में अव्वल स्थान पर है। पूरे राज्य में 1.89 लाख आपराधिक मामले दर्ज हुए हैं। पूरे बिहार में 1008 बलात्कार के मामले में 75 ममाले पटना के हैं। इसी तरह राज्य में 2, 581 हत्याएं हुईं जिनमें से पटना में 261, सारण में 137 मुजफ्फरपुर में 134 और गया में 133 है।

आइए नजर डालते हैं कुछ प्रमुख घटनाओं पर:-

  • 13 दिसम्बर 2015  – मुजफ्फरपुर में चावल वयापारी की हत्या
  • 26 दिसम्बर 2015  – दो हाईवे बनाने वाले इंजीनियरों की हत्या
  • 5 फरवरी 2016     – लोजपा के नेता बृजनाथ सिंह की हत्या
  • 11 फरवरी 2016   – भाजपा नेता केदार सिंह की छपरा में हत्या
  • 12 फरवरी 2016   – बिहार भाजपा के उपाध्याक्ष विशेश्वर ओझा की आरा में हत्या
  • 28 दिसम्बर 2016  – वैशाली में रिलांयस के इंजिनियर की हत्या
  • 3 अक्टूबर 2016    – गया के कोठी पुलिस थाने के इंचार्ज की हत्या

घोटाले पर घोटाले
मिट्टी घोटाला, जमीन घोटाला, संपत्ति घोटाला, मॉल घोटाला, आवास घोटाला, सुरा घोटाला- तमाम ऐसे नये घोटाले सामने आ रहे हैं जिनमें कुछ में लालू एंड फैमिली का प्रत्यक्ष हाथ है और कुछ में अप्रत्यक्ष। लेकिन नीतीश कुमार की सरकार बनने के बाद इन घोटालों को लेकर किसी तरह की कार्रवाई नहीं होने पर सवाल उठ रहे हैं। क्या कुर्सी के मोह में नीतीश अपनी छवि की भी परवाह नहीं कर रहे हैं। 

रुक गई विकास की गति
अपने चुनावी वादे के मुताबिक नीतीश ने बिहार में शराबबंदी की घोषणा तो कर दी, लेकिन राज्य की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं कर पा रहे हैं। स्थिति यह है कि स्कूल, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में काम करने वालों को कुछ महीनों से वेतन ही नहीं दे पा रहे हैं। निवेश नाम की चीज नहीं है, धन की कमी से औद्योगिक नीति से कई कर रियायतों के प्रवाधान को खत्म कर दिया गया है जिससे औद्योगिक विकास में रुकावट आ गई है।

कई योजनाओं की धीमी गति
राजधानी पटना में नीतीश कुमार द्वारा घोषित कई परियोजनाएं बहुत ही धीमी गति से चल रही हैं। जिन्हें 2016 में पूरा हो जाना चाहिए वे अभी तक पूरी नहीं हो सकी हैं। ये परियोजनाएं हैं—पटना मेट्रो रेल, पटना सालिड वेस्ट प्रबंधन परियोजना, स्टेशन रोड फ्लाईओवर व गंगा ड्राइव-वे।

विकास दर में पिछड़ा बिहार
बिहार की विकास दर 2015-16 में इस साल भारी गिरावट आई है, वित्तीय वर्ष में यह घटकर 7.14 फीसदी रह गयी है। गौरतलब है कि 2014-15 में बिहार का विकास दर 13.02 फीसदी था। इसका मतलब हुआ है कि एक साल में विकास दर में 5.88 फीसदी की गिरावट आई है। यह गिरावट स्थिर दर और वर्तमान दर दोनों पर हुआ है।

प्रवासी बिहारियों को नीतीश पर भरोसा नहीं
बिहार सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद प्रवासी बिहारियों का भरोसा भी नीतीश सरकार में नहीं लौट रहा है। जबकि 22 मार्च को बिहार दिवस के मौके पर हर साल नीतीश कुमार प्रवासियों से पूंजी निवेश की अपील करते हैं। प्रवासी बिहारी सम्मेलन भी आयोजित कर चुके हैं नीतीश कुमार, लेकिन जब से लालू प्रसाद सत्ता में भागीदार बने हैं तब से बिहार में अराजक माहौल है ऐसे में जो प्रवासी पहले आए भी थे वो भी वापसी की राह पर हैं।
उड़ान योजना का लाभ नहीं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘उड़ान’ योजना की शुरुआत देश में तो कर दी, लेकिन बिहार के लोगों को इसका लाभ अभी शायद ही मिल पाए। ढाई हजार रुपए में 500 किमी की हवाई यात्रा वाली क्षेत्रीय संपर्क योजना उड़ान के तहत पहले चरण की बोली प्रक्रिया में हवाई सेवा देने वाली किसी कंपनी ने बिहार के लिए बोली नहीं लगाई। इस समय देश में 406 हवाई अड्डे हवाई पट्टियां हैं, जहां से कोई शिड्यूल उड़ान नहीं भरी जाती। इनमें से 16 बिहार में हैं। जबकि पूर्णिया, भागलपुर और मुजफ्फरपुर जैसे इलाकों में इस योजना के लिए बिहार सरकार कोशिश करती तो शायद कुछ नतीजा निकलता भी।

स्वच्छता में पिछड़ा बिहार
स्वच्छता के मामले में भी बिहार बहुत ही पिछड़ा हुआ है। 2017 के स्वच्छता सर्वेक्षण में बिहार के किसी भी शहर का कोई स्थान नहीं है। बिहार के 27 शहरों का सर्वेक्षण किया गया, जिसमें 19 शहरों की रैंकिंग 300 से नीचे है, जबकि 15 शहर नीचे से 100 शहरों की सूची में हैं। इससे अंदाज लगा सकते है कि पर्यटन के लिहाज से महत्वपूर्ण राज्य में सफाई की जब ऐसी स्थिति होगी तो पर्यटकों को आर्कषित कर धन कमाने की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती है।

 
स्मार्ट सिटी अभियान में बिहार पीछे
देश के सौ स्मार्ट सिटी परियोजना में बिहार का एक शहर भागलपुर ही शामिल किया गया है। इस होड़ में पटना, गया, बिहारशरीफ, भागलपुर, मुजफ्फरपुर और दरभंगा शामिल थे। जाहिर है बिहार का एकमात्र शहर का चुना जाना राज्य के लिए झटका है।

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