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वोट के लिए देश को चोट, अवैध पशु बाजार जारी रखने पर अड़ीं ममता

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मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केन्द्र सरकार द्वारा  23 मई 2017 को लाये गये‘पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण(पशुधन बाजार विनियमन) नियम, 2017’ को   पश्चिम बंगाल में लागू करने से साफ मना कर दिया है क्योंकि यह उनके मुस्लिम वोट बैंक के हितों को नुकसान पहुंचा रहा है। मुख्यमंत्री की इस हठधर्मिता से भारत बांगलादेश की सीमा पर तैनात सीमा सुरक्षा बल के लिए पशुओं की तस्करी को रोकने  में कई दिक्कतें आ रही हैं। यह पहली बार नहीं है जब ममता बनर्जी ‘धर्मनिरपेक्षता’ की दुहाई देकर मुस्लिम तुष्टिकरण कर रही हैं।

क्या है मामला

पश्चिम बंगाल और बांगलादेश की सीमा से सटे जिलों -उत्तरी 24 परगना, मुर्शीदाबाद और मालदा—में पशुओं को बेचने और खरीदने वाले पांच गैरकानूनी पशु हाट मौजूद हैं। उत्तरी 24 परगना के कटीहाट एवं पंचपोटा के हाट , मुर्शिदाबाद के  कृषनपुर व दुलियां के हाट और मालदा का पाकुआ हाट, अंतरराष्ट्रीय सीमा से आठ किलोमीटर की दूरी के अंदर ही मौजूद हैं, जो देश के कानून और स्वयं राज्य सरकार के 2003 के शासनादेश के खिलाफ हैं। ये आठ किलोमीटर का क्षेत्र सीमा सुरक्षा बल की निगरानी क्षेत्र में आता है लेकिन सभी पशु हाट राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

अब जब ममता बनर्जी कानून और नियमों को ताक पर रखते हुए, इन पशु हाटों को हटाने को नहीं तैयार हैं, दूसरी तरफ,  केन्द्र सरकार के 23 मई के आदेश को इन हाटों में लागू करवाना बीएसएफ की जिम्मेदारी है जिससे पशुओं की खरीद बिक्री- गोकशी के उद्देश्य से न की जा सके।

भारत-बागंलादेश के इस क्षेत्र में धुमावदार सीमा और आबादी के अधिक घनत्व से पशुओं की तस्करी के लिए यह आरामगाह है। इस क्षेत्र में मुस्लिम आबादी बहुत अधिक है।

अवैध पशु बाजार पर रोक से इनकार क्यों?

केन्द्र सरकार के नये पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण(पशुधन बाजार विनियमन) नियम, 2017’ को लागू करने पर पशु व्यापार का गैरकानूनी धंधा बंद हो जाएगा, और ममता बनर्जी अपने मुस्लिम वोट बैंक को नाराज नही करना चाहती हैं। इसी वोट बैंक की गैरकानूनी मांगों को पूरा करके , सत्ता पर अपनी पकड़ पिछले दो विधानसभा चुनावों से मजबूत कर सकीं हैं और 2011 से जब से सत्ता में आयी है तब से मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने के लिए कोई मौका नहीं चूकती हैं, इसके अनेकों उदाहरण हैं—

अल्पसंख्यकों की मसीहा

सत्ता में आने के बाद से ममता बनर्जी ने कांग्रेस और लेफ्ट के पुराने खेल को मजबूती के साथ जारी रखा और हर मौके पर अपने को समुदाय का हिस्सा बनाने की कोशिश की। धार्मिक अवसरों पर बुर्के के अंदाज में सर को ढंककर पहुंचना हो या मुस्लिम रैलियो में  मंच से ‘अल्लाह हो अकबर’ का नारा बुलंद करना हो।

 

मदरसों और मौलवियों को धन देना

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने सरकार का खजाना मुस्लिम समुदाय के लिए खोल दिया। मदरसों के  मुज्जजिन के लिए मासिक भत्ता देना शुरू  किया,  लेकिन सरकार के इस फैसले को कोर्ट ने असंवैधानिक करार दे दिया। कोर्ट के फैसले से नाखुश ममता बनर्जी ने एक दूसरा रास्ता निकाला। अब इमामों और मुअज्जिनों का भत्ता वक्फ बोर्ड के माध्यम से दिया जा रहा है। साथ ही 10000 मदरसों को आर्थिक सहायता देना  भी शुरु कर दिया। मुस्लिम समुदाय के उन छात्रों के लिए, जिन्हें 50 प्रतिशत सेकम अंक मिले हैं, एक विशेष छात्रवृत्ति योजना भी लागू कर दी, जबकि छात्रवृत्ति उन्हें ही मिलनी चाहिए जिन्हें 50 प्रतिशत से अधिक अंक मिले हों।

दुर्गापूजा से अधिक प्रिय मुहर्रम

पिछले साल अकटूबर में मुहर्रम और दुर्गापूजा एक ही दिन थे,ऐसे मौके पर दुर्गा प्रतिमा के विसर्जन को विजयादशमी के दिन रोककर दो दिन बाद करने का फरमान जारी कर दिया, जिससे उस दिन मुहर्रम के अवसर पर ताजिया का विसर्जन हो सके। लेकिन उच्च न्यायलय ने मुख्यमंत्री के इस आदेश में रोक लगाते हुए उन्हें धर्म के साथ राजनीति न करने की सख्त सलाह भी दी थी।मुख्यमंत्री ममता बनर्जी राज्य के लगभग 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी को जिसमें एक बड़ा हिस्सा बांग्लादेशी मुसलमानों का भी है उन्हें हर स्थिति में संतुष्ट रखना अपना उद्देश्य समझती हैं, इसलिए केन्द्र की मोदी सरकार द्वारा उठाये गये नोटबंदी से लेकर पशु बाजार के नियम का विरोध करना अपना राजनीतिक धर्म मानती हैं।

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