Home हेट ट्रेकर विद्या सुब्रह्मण्यम ने पत्रकारिता को प्रधानमंत्री मोदी के विरोध का शस्त्र बनाया

विद्या सुब्रह्मण्यम ने पत्रकारिता को प्रधानमंत्री मोदी के विरोध का शस्त्र बनाया

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देश के सवा सौ करोड़ लोगों के जीवन स्तर को सम्मानजनक स्थिति तक लाने में, पत्रकारिता का भी योगदान चाहिए। पत्रकार, सरकार की आलोचना और प्रोत्साहन से विकास के कार्य को सही दिशा में बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। दुर्भाग्य की बात है कि आज की पत्रकारिता देश के 125 करोड़ लोगों की बुनियादी जरुरतों को पूरा करने में अक्षम है। आज कई पत्रकारों ने आलोचना और प्रोत्साहन के युगधर्म को त्याग कर, प्रधानमंत्री मोदी के विरोध को ही अपना धर्म बना लिया है।

इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया और द हिन्दू में कई दशकों तक पत्रकारिता करने वाली विद्या सुब्रह्मण्यम की पत्रकारिता की धारा पूरी तरह से प्रधानमंत्री मोदी के विरोध की हो चुकी है। ऐसी पत्रकारिता करने के लिए विद्या को तथ्यों और आंकड़ों को तोड़ मरोड़ कर पेश करने में जरा भी शर्म नहीं आती है। आइए, आपको बताते हैं कि कैसे विद्या सुब्रह्मण्यम ने पत्रकारिता को प्रधानमंत्री मोदी के विरोध का हथियार बना लिया है।-

पत्रकारिता बना विरोध का शस्त्र-1 प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर लोकसभा में हो रही चर्चा का जवाब देते हुए बताया कि कैसे पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने, आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री टी अंजाइया को एयरपोर्ट पर इतनी फटकार लगाई की वे रो दिए और तेलगू सम्मान की बात को लेकर एन टी रामाराव ने तेलगू देशम पार्टी बनाकर, कांग्रेस का अंत कर दिया। प्रधानमंत्री मोदी की इस इतिहास की जानकारी का मजाक उड़ाते हुए विद्या सुब्रह्मण्यम ने 7 फरवरी को एक अमर्यादित Tweet किया, जबकि प्रधानमंत्री मोदी ने जो भी बातें कही थीं, वे शत प्रतिशत सही हैं-

पत्रकारिता बना विरोध का शस्त्र-2- विद्या सुब्रह्मण्यम, प्रधानमंत्री मोदी का विरोध करने के लिए हर उस समाचार में मुद्दा तलाश लेती हैं, जिसे कोई परिपक्व पत्रकार खबर नहीं बल्कि एक अतार्किक फूहड़ता मानता है। जब प्रधानमंत्री मोदी, काम काज के आधार पर अपने कैबिनेट मंत्रियों के मंत्रालयों में बदलाव करते हैं, तो पत्रकारिता में अपने बाल सफेद कर चुकीं, विद्या सुब्रह्मण्यम एक बेतुका सा Tweet करती हैं-

पत्रकारिता बना विरोध का शस्त्र-3 विद्या सुब्रह्मण्यम ने 18 जनवरी को Tweet करके उस आधार संख्या की योजना का विरोध किया, जिससे देश के करोड़ों गरीबों के खाते में सीधे सब्सिडी का पैसा दिया जा रहा है और कई सरकारी योजनाओं और सुविधाओं का लाभ मिल रहा है। विद्या ने,  प्रधानमंत्री मोदी की इस सबसे जन उपयोगी योजना के बारे मे क्या लिखा, पढ़िए-

पत्रकारिता बना विरोध का शस्त्र-4 12 जनवरी को विद्या ने  Tweet करके यह स्पष्ट कर दिया कि किसी भी समाचार को मुद्दा बनाने के लिए भ्रामक आंकड़ों और तथ्यों का बखूबी सहारा लेती हैं। सर्वोच्च न्यायलय के न्यायधीशों ने जिन मुद्दों को लेकर प्रेस वार्ता की, वे मुद्दे पत्रकार विद्या सुब्रह्मण्यम के लिए महत्वहीन हो गए। विद्या के लिए वे मुद्दे महत्वपूर्ण हो गए, जिनसे प्रधानमंत्री मोदी के विरोध को हवा दी जा सकती है। विद्या ने इन मुद्दों  तूल दे दिया। विद्या के उस Tweet को पढ़िए

पत्रकारिता बना विरोध का शस्त्र-5-  विद्या सुब्रह्मण्यम ने सीबीआई कोर्ट के 2G घोटाले पर आए फैसले को भी प्रधानमंत्री मोदी के विरोध का हथियार बना दिया। विद्या उन्हीं पत्रकारों में शामिल थीं जिन्होंने 2012 में 2G घोटाले को सही माना था, और सर्वोच्च न्यायलय के 122 लाइसेंसों के आवंटन को उचित ठहराया था। आज वही पत्रकार एक निचली अदालत के फैसले पर पूरे ही प्रकरण को झूठा साबित करने पर लगे हैं। अब या तो ये पत्रकार 2012 में सही थे, या 2017 में सही हैं, लेकिन विद्या जैसे पत्रकारों को प्रधानमंत्री मोदी के विरोध के आगे कुछ सही या गलत नहीं दिखाई देता –

पत्रकारिता बना विरोध का शस्त्र-6- कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर के गुजरात चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मोदी को लेकर दिए गए अमर्यादित बयान का समर्थन करते हुए 7 दिसंबर के Tweet में विद्या लिखती हैं-

पत्रकारिता बना विरोध का शस्त्र-7- उत्तर प्रदेश के नगर निकाय चुनावों में मोदी और योगी के प्रभाव को स्वीकार करने से इंकार करते हुए 1 दिसंबर के Tweet में विद्या ने लिखा-

पत्रकारिता बना विरोध का शस्त्र-8- विद्या सुब्रह्मण्यम ने पत्रकारिता को प्रधानमंत्री मोदी के विरोध का शस्त्र बनाया है। विद्या खुलकर कांग्रेस पार्टी का समर्थन करती नजर आती हैं। उनकी पत्रकारिता का यह एजेंडा 23 जुलाई को उनके द्वारा किए गये कई Tweets से स्पष्ट होता है-

पत्रकारिता को प्रधानमंत्री के विरोध का शस्त्र बनाकर, भय और भ्रम फैलाना आजकल की पत्रकारिता का चरित्र हो चुका है। तथ्यों और आंकड़ों को तोड़ मरोड़ कर लोगों को गुमराह करना, संविधान के साथ किया जा रहा सबसे बड़ा मजाक है और विद्या सुब्रह्मण्यम जैसे पत्रकार खुलेआम यह सब कर रहे हैं।

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