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बेदाग, निष्पक्ष और कर्मठ व्यक्तित्व के धनी हैं कोविंद

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एनडीए के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद ग्रामीण इलाकों में शिक्षा की बेहतरी और दलितों के उत्थान के लिए काम करते रहे हैं। दलित नेता होने के बावजूद वो स्वभाव से काफी मिलनसार है और उनका हमेशा से ही संगठित होकर काम करने में विश्वास रहा है।

ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा पर रहा जोर
राज्यसभा सांसद रहते हुए रामनाथ कोविंद ने ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के विकास और विस्तार के लिए सबसे ज्यादा कार्य किया। उनके 12 साल के सांसद निधि के रिकार्ड की जब जांच की गई, तो सामने आया कि ज्यादातर सांसद निधि का पैसा गांवों में शिक्षा के क्षेत्र पर खर्च किया गया।

दलितों के लिए हमेशा उठाई आवाज
दलितों की भलाई के लिए वो हमेशा तत्पर रहते थे। उन्होंने ही एक बार 1000 के नोट पर बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की तस्वीर छापने की मांग की थी। बीजेपी नेता होने के साथ वो पार्टी के दलित मोर्चा के प्रमुख भी थे।

राज्यपाल के तौर पर निष्पक्ष भूमिका
जहां राजभवन हमेशा से ही राजनीतिक पार्टियों की लड़ाई का अखाड़ा बना रहता है, वहीं बिहार के राज्यपाल के तौर पर उनकी भूमिका की सराहना सभी ने की। खुद मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने कोविंद को निष्पक्ष और सबसे बेहतरीन राज्यपाल की संज्ञा दी। जिस कारण जेडीयू ने कोविंद के राष्ट्रपति पद के लिए अपने समर्थन की घोषणा कर दी है।

नियमों के आधार पर ही लेते हैं निर्णय
कोविंद जी बहुत शांत स्वभाव के हैं लेकिन जब कोई सार्वजनिक कार्यक्रम या फिर किसी निर्णय लेने की बात आती है तो वो हमेशा रुल बुक के मुताबिक ही निर्णय लेते हैं। उनके लिए नियमों से ऊपर कोई नहीं है।

बिहार में विश्वविद्यालयों में बड़े पैमाने पर किया सुधार
सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2012-13 में नियुक्त हुए उप-कुलपतियों की नियुक्ति रद्द होने के बाद राज्यपाल बने कोविंद ने नियुक्तियों में पारदर्शिता बरती और यही नहीं उन्होंने विश्वविद्यालय के शैक्षिक कैलेंडर में भी सुधार किया और इसे सख्ती से लागू किया और साथ ही बंद पड़े दीक्षांत समारोह को अपनी देख-रेख में फिर से शुरू करवाया।

सामाजिक सरोकारों से रहा जुड़ाव
समाज में चाहे किसी भी तरह की बुराई हो कोविंद जी उसका हमेशा विरोध करते थे। यही कारण है कि टीवी में बढ़ती अश्लीलता को रोकने के खिलाफ भी उन्होंने आवाज उठाई और शिकायत भी दर्ज की।

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