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ममता राज में लोकतंत्र की हत्या पर क्यों खामोश है मीडिया?

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पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा-प्रतिहिंसा का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। ऐसा लगता है ममता बनर्जी की सरकार में कार्यकर्ताओं को कानून हाथ में लेने का अधिकार हासिल कर लिया है। पंचायत चुनाव में भी यह साबित हुआ है कि टीएमसी अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को दबाने के लिए किसी भी स्तर पर जा सकती है। वामदल, कांग्रेस और भाजपा ने एक साथ ममता बनर्जी सरकार के दमन पर सवाल उठाए हैं, लेकिन वह किसी की नहीं सुन रही हैं। दूसरी ओर हकीकत ये है कि मीडिया भी पश्चिम बंगाल सरकार के दमनात्मक रवैये पर भी कोई सवाल खड़ा नहीं कर रहा है। 

ममता सरकार में लोकतंत्र की हत्या
पश्चिम बंगाल के 20 जिलों के 48,606 ग्राम पंचायत, 9217 पंचायत समिति और 825 जिला परिषद सीटों के लिए एक, तीन और पांच मई को चुनाव होना है। इस बीच हिंसक झड़पों की खबरें लगातार आ रही हैं। हिंसक झड़पों में दो लोगों की मौत भी हो चुकी है। दरअसल सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस विपक्षी दलों के उम्मीदवारों पर जानलेवा हमले कर रही है।

तृणमूल कांग्रेस की खुलेआम गुंडागर्दी
पश्चिम बंगाल में त्रि-स्तरीय पंचायत चुनाव में तृणमूल कांग्रेस खुलकर गुंडागर्दी कर रही है। बीरभूम जिले में भाजपा प्रत्याशियों को नामांकन से रोकने के लिए बमबाजी  के साथ गोलीबारी की गई। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, जलपाईगुड़ी, पूर्व और पश्चिम ब‌र्द्धमान, हुगली और पश्चिम- पूर्व मेदिनीपुर जिलों में भी नामांकन दाखिल करने को लेकर संघर्ष हुआ। जाहिर है टीएमसी कार्यकर्ताओं ने खुलेआम गुंडागर्दी की और विरोधी प्रत्याशियों को नामांकन ही करने नहीं दिया।

ममता बनर्जी की तानाशाही से बिना लड़ाई के मिली जीत
पहले तो चुनाव में नामांकन करने नहीं दिया गया और उसके बाद कई प्रत्याशियों को निर्विरोध विजेता भी घोषित कर दिया गया। बीरभूम जिला परिषद की 42 में से 41 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवारों को निर्विरोध जीता हुआ घोषित किया गया है। बीरभूम में पंचायत समिति की 19 में 14 सीटों पर राज्य की सत्ता पर काबिज टीएमसी उम्मीदवारों को निर्विरोध विजयी घोषित किया गया है। मुर्शिदाबाद के किंडी में टीएमसी के 30 में से 29 उम्मीदवारों को निर्विरोध विजयी घोषित किया है। भारतपुर-22 में पार्टी ने पंचायत समिति की सभी सीटें निर्विरोध जीत ली हैं। बरवान की सभी 37 पंचायत समिति सीटों पर टीएमसी को विजेता घोषित किया गया है।

ममता बनर्जी की तानाशाही के विरुद्ध भाजपा-कांग्रेस और वामदलों ने निर्वाचन आयोग में शिकायतें दर्ज करवाईं। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट भी गए, लेकिन ममता बनर्जी की सरकार ने विरोधी दलों को कोई तवज्जो नहीं दी। 

ममता और वाम दलों के शासन का खूनी इतिहास
बंगाल में राजनीतिक झड़पों का एक लंबा और रक्तरंजित इतिहास रहा है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2016 में बंगाल में राजनीतिक कारणों से झड़प की 91 घटनाएं हुईं और 205 लोग हिंसा के शिकार हुए। 2015 में राजनीतिक झड़प की कुल 131 घटनाएं दर्ज की गई थीं और 184 लोग इसके शिकार हुए थे। वर्ष 2013 में बंगाल में राजनीतिक कारणों से 26 लोगों की हत्या हुई थी, जो किसी भी राज्य से अधिक थी। 1997 में बुद्धदेब भट्टाचार्य ने विधानसभा मे जानकारी दी थी कि वर्ष 1977 से 1996 तक पश्चिम बंगाल में 28,000 लोग राजनीतिक हिंसा में मारे गये थे। 

भाजपा के उभार से डरीं ममता बनर्जी
पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की ताकत दोगुनी हो गई है। पश्चिम बंगाल के उलुबेरिया संसदीय क्षेत्र और नोआपोरा विधानसभा क्षेत्र में उपचुनाव हुए। दोनों जगहों पर भले ही भाजपा की जीत नहीं हुई, लेकिन पहली बार दोनों सीटों पर दूसरे स्थान पर रही। पिछले चुनाव के मुकाबले वोट शेयर में बहुत तेजी से इजाफा हुआ। उलुबेरिया संसदीय क्षेत्र में आम चुनाव 2014 के समय भाजपा को 1,37,137 वोट मिले थे, वहीं उपचुनाव 2018 में भाजपा को 2,93,046 वोट मिले। इसी सीट पर कम्युनिस्ट पार्टी को पिछले चुनाव में 3,69,563 वोट के मुकाबले 1,38,892 वोट मिले। जाहिर है जिस तरह से त्रिपुरा में तख्तापलट की तस्वीर बनी उसी तरह बंगाल की जनता के भीतर भी उबाल है और यह कभी भी तख्तापलट की तस्वीर बना सकती है।

 

 

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