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आपातकाल पर सर्वोच्च न्यायालय ने तो भूल सुधार ली, कांग्रेस कब माफी मांगेगी

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24 अगस्त 2017 को नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में निजता के अधिकार को नागरिकों का मौलिक अधिकार मानते हुए स्वीकार किया है कि किसी भी परिस्थिति में मौलिक अधिकारों को नागरिकों से छीना नहीं जा सकता है। इस कालजयी निर्णय में न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने 1976 में पांच न्यायधीशों की पीठ द्वारा जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला के मुकद्दमे में चीफ जस्टिस ए एन राय, एम एच बेग, वाई वी चंद्रचूड़ और पी एन भगवती के बहुमत के फैसले की तीखी आलोचना करते हुए रद्द कर दिया, लेकिन इस मामले में जस्टिस एच आर खन्ना के फैसले की प्रशंसा करते हुए उनके मत को पूर्ण रूप से स्वीकार किया। डीवाई चंद्रचूड़ ने इस ऐतिहासिक फैसले में अपने पिता वाई वी चंद्रचूड़ के बहुमत वाले मत को पूरी तरह से खारिज करते हुए लिखा है कि प्रजातंत्र तभी जीवित रह सकता है जब उसके नागरिकों के अधिकार सुरक्षित हो।

आपातकाल में मौलिक अधिकारों का हनन

25 जून, 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर पूरे देश को एक बड़े जेलखाने में बदल दिया था। इस दौरान लोगों के मौलिक अधिकारों को खत्म कर दिया था, यहां तक कि जीने का अधिकार भी छीन लिये थे। लोगों को जबरदस्ती जेलों में बंद किया जा रहा था। इंदिरा गांधी सरकार ने जयप्रकाश नारायण सहित लगभग एक लाख राजनीतिक विरोधियों को देश के अलग-अलग जेलों में ठूंस दिया था। कड़ा प्रेस सेंसरशिप लगा दिया गया था।

सर्वोच्च न्यायालय की ऐतिहासिक भूल

सरकार की इस तानाशाही के खिलाफ कुछ लोगों ने उच्च न्यायालयों में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं दायर कीं। उन याचिकाओं पर जबलपुर हाईकोर्ट सहित देश के 9 हाईकोर्ट ने यह कहा कि आपातकाल के बावजूद बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं दायर करने का नागरिकों को अधिकार है। लेकिन इंदिरा गांधी की सरकार विरोधियों को कुचलने पर आमादा थी, लिहाजा उसने इन निर्णयों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर दी। इन सभी मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक साथ सुनवाई की। यह ऐतिहासिक केस एडीएम, जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ल मुकदमे के नाम से चर्चित हुआ। इसी मुकद्दमे के फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायधीशों की पीठ में से चार जजों, चीफ जस्टिस ए एन राय, एम एच बेग, वाई वी चंद्रचूड़ और पी एन भगवती ने बहुमत से ये फैसला सुनाया था कि सरकार किसी भी नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन कर सकती है। इसी निर्णय को सर्वोच्च न्यायलय के ताजा फैसले में पलटते हुए जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा कि इन जजों का निर्णय त्रुटिपूर्ण तर्क पर आधारित था। जीवन जीने अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार मनुष्य जीवन के अस्तित्व के लिए परमआव श्यक हैं। ये अधिकार अनादि है, जो प्राकृतिक नियमों के अधीन आते हैं। कोई भी सभ्य समाज इन अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर सकता है। ये अधिकार किसी राज्य या संविधान ने नहीं दिए हैं। जीवन जीने का अधिकार, संविधान से पूर्व, अस्तित्व में था। जस्टिस खन्ना का यह मत सर्वदा सत्य है कि संविधान ने नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार को स्वीकार कर, यह शक्ति नहीं प्राप्त कर ली है कि कभी भी इन अधिकारों को छीना जा सकता है। ऐसा मानना, संविधान के उन मूल सिद्धांतों के विपरित है जो राज्य पर इन अधिकारों को देने के लिए अकुंश लगाता है। इसलिए न्यायालयों के पास नागरिकों के अधिकारों को सुरक्षित करने की पूरी शक्ति है।

न्यायाधीशों को अहसास हुआ अपनी भूल का

इस फैसले ने एक बार फिर से स्पष्ट कर दिया है कि आपातकाल के दौरान देश की न्यायपालिका भी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकी। इससे पूर्व भी सर्वोच्च न्यायालय ने 2 जनवरी 2011 को यह स्वीकार किया था कि देश में आपातकाल के दौरान इस कोर्ट से भी नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन हुआ था। आपातकाल के लगभग 35 साल बाद सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस आफताब आलम और जस्टिस अशोक कुमार गांगुली के पीठ ने 2011 में उस समय की अदालती भूल को स्वीकार किया।

आपातकाल के इस निर्णय से स्वयं पूर्व न्यायधीश पी एन भगवती, जो बहुमत के फैसले के साथ थे, ने 2011 में MyLaw.net के साथ इंन्टरव्यू में कहा कि “it was against my conscience…That judgment is not Justice Bhagwati’s.” और इस निर्णय पर अपने बारे में कहा कि “an act of weakness.”

कांग्रेस ने आपातकाल पर आजतक माफी नहीं मांगी

हालांकि सर्वोच्च न्यायलय के इस फैसले के प्रभाव को संविधान में 44 वें संशोधन द्वारा धारा 359 को संशोधित करके समाप्त कर दिया गया, लेकिन सर्वोच्च न्यायलय को आजतक अपनी उस एक गलती का अहसास होता रहा है। लेकिन कैसी विडंबना है कि जिस कांग्रेस पार्टी के प्रधानमंत्री ने इस देश में आपातकाल लगाया था उसे आजतक अफसोस नही हुआ है, उसने एक बार भी देश से मांफी मांगने की जरुरत नहीं समझी।

कांग्रेस ने देश के संवैधानिक संस्थाओं और मर्यादाओं के साथ जो खिलवाड़ किया है, उसका खामियाजा आज तक देश भुगत रहा है। इंदिरा गांधी ने अपने तानाशाही के बल पर कई अमर्यादित काम किये, सबसे बड़ा अनैनिक काम था कि वरिष्ठ न्यायधीश एचआर खन्ना, जिन्होंने एडीएम जबलपुर के मुकद्दमे मे सरकार के पक्ष का विरोध किया था, उन्हें सर्वोच्च न्यायलय का मुख्य न्यायधीश नियुक्त न करके, उनसे जूनियर न्यायधीश एम एच बेग को मुख्य न्यायधीश बना दिया, बाद में उन्हें सात सालों तक माइनारिटी कमीशन का चेयरमैन बनाये रखा।

इंदिरा का विरोध करने वाले जस्टिस खन्ना को सर्वोच्च न्यायालय ने दिया सम्मान

न्यायधीश एच आर खन्ना ने जिस तरह स्वतंत्र रुप से एडीएम जबलपुर मुकद्दमे में अपना फैसला देते हुए नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने के लिए अकेले इंदिरा के आपातकाल से लड़े, आज सर्वोच्च न्यायलय के फैसले ने उनका नाम न्यायिक इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिख दिया है। 1976 में अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार ने इस फैसले पर प्रतिक्रिया में लिखा था कि जब कभी देश प्रजातंत्र और स्वतंत्रता प्राप्त करेगा तो कोई अवश्य ही सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीश एच आर खन्ना के लिए एक यादगार स्तम्भ बनाएगा, न्यायाधीश खन्ना ने निडरता से स्वतंत्रता के लिए अपनी आवाज रखी।

“If India ever finds its way back to freedom and democracy that were proud hallmarks of its first eighteen years as an independent nation, someone will surely erect a monument to Justice H R Khanna of the Supreme Court. It was Justice Khanna who spoke out fearlessly and eloquently for freedom this week.”

आज कांग्रेस सर्वोच्च न्यायालय के निजता पर आये फैसले की प्रशंसा करने में पीछे नहीं है लेकिन जिस तरह आपातकाल में नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन किया था, उसके लिए माफी मांगने के लिए आगे नहीं आती।

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