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केजरीवाल के मंत्री सत्येंद्र जैन ने घोटाले का जुर्म कबूला, जेल से बचने के लिए कोर्ट की शरण !

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सत्ता के मद में चूर दिल्ली के विवादास्पद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की सरकार और उसके मंत्री अब निर्लज्जता की हदें पार कर रहे हैं। केजरीवाल के चहेते स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने अब मान लिया है कि वो टैक्स की चोरी करते रहे हैं और हवाला के माध्यम से कालेधन को इधर से उधर करना उनका धंधा रहा है। लेकिन, दलील दे रहे हैं कि उनका जो गोरखधंधा उजागर हुआ है वो बेनामी कानून लागू होने से पहले का है। इसीलिए उनपर मौजूदा कानून के तहत आपराधिक मामला नहीं चलना चाहिए। ये कोई पहला मामला नहीं है। केजरीवाल और उनके मंत्री जिस भ्रष्टाचार और कालेधन के मसले पर मतदाताओं को गुमराह कर सत्ता में आए, अब अपनी जुबान से वही गुनाह कबूलने भी लगे हैं। लेकिन ढिठई देखिए कि जब जेल की सलाखें नजर आ रही हैं, तो जनता की कमाई से लूटे गए पैसों के सहारे बचने के कानूनी दांव-पेंच तलाशने में जुटे हैं।

जेल से बचने के लिए फिर दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचे जैन
अंग्रेजी समाचार पोर्टल टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार सत्येंद्र जैन ने दिल्ली हाई कोर्ट से हवाला के जरिए लेन-देन से जुड़े टैक्स चोरी के मामले में हो रही कार्रवाई रोकने की गुहार लगाई है। याचिका में जैन की ओर से कहा गया है कि उनपर जो आपराधिक धाराएं लगाई गई हैं, वो अवैध कारोबार को अंजाम देते समय अस्तित्व में थी ही नहीं। इसीलिए उनपर से उन धाराओं को हटा लिया जाए। उनके वकील ने अदालत में बताया कि जैन पर मार्च, 2011 से मार्च 2016 के बीच हवाला के जरिए गैर-कानूनी लेन-देन का आरोप है, लेकिन तब Prohibition of Benami Properties Transactions (PBPT) Act लागू नहीं हुआ था। वकील ने अदालत में कहा कि इस कानून की धाराएं नवंबर, 2016 से लागू हुई हैं।

HC से जैन को हाल ही में लगी थी लताड़
इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि बेनामी संपत्ति कानून के तहत आयकर विभाग ने उनकी संदिग्ध संपत्तियों को जब्त कर कुछ भी गलत नहीं किया। न्यूज पोर्टल आउटलुक हिंदी के अनुसार आयकर विभाग की कार्रवाई के खिलाफ जैन की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली HC के जज ने कहा कि, ‘पहली नजर में मेरा मानना है कि आदेश में कुछ भी गलत नहीं है और विभाग के फैसले पर कोर्ट हस्तक्षेप नहीं करना चाहता।’ कोर्ट ने स्टे देने की जैन की मांग को भी खारिज कर दिया। लेकिन अब जैन दूसरे बहाने के साथ अदालत पहुंच गए हैं और कानून से बचने के सारे तिकड़म अपना रहे हैं। जैन ये सब क्यों कर रहे हैं, ये बात दुनिया जान चुकी है। क्योंकि जैसे-जैसे जैन कानून की गिरफ्त में आते जाएंगे, भ्रष्टाचार और कालेधन की असल डोर बहुत दूर तक पहुंच जाएगी। 

जैन की संदिग्ध संपत्तियों की जब्ती की मियाद बढ़ी
दरअसल जैसे-जैसे केजरीवाल के चहेते मंत्री पर कानून का शिकंजा कस रहा है उनकी छटपटाहट साफ महसूस की जा सकती है। जानकारी के अनुसार आयकर विभाग ने सत्येंद्र जैन से जुड़ी कम से कम 5 संपत्तियों को जब्त रखने की सीमा और बढ़ा दी है। कुछ महीने पहले आयकर विभाग ने Prohibition of Benami Properties Transactions (PBPT) Act के तहत उनकी संदिग्ध संपत्तियों को जब्त किया था। इसके अलावा केजरीवाल की चौकड़ी से अलग हुए पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा के खुलासों ने केजरीवाल और उनके भ्रष्ट गैंग की बेचैनी और बढ़ी रखी है। इसीलिए ये लोग अपनी करतूतों को छिपाने के लिए कभी विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर सियासी नौटंकी को अंजाम देते हैं, तो कभी कानूनी दांव-पेंच आजमा कर अपने कुकर्मों पर पर्दा डालने की कोशिश करते हैं।

जैन के भ्रष्टाचारों को घूसखोर केजरीवाल का संरक्षण !
दरअसल सत्येंद्र जैन पर भ्रष्टाचार के जितने भी आरोप लगे हैं, उसका लिंक कहीं न कहीं उनके विवादित बॉस से जाकर मिल जाता है। शायद यही वजह है कि जैन को संरक्षण देने में केजरीवाल कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे। उनके अपने ही कैबिनेट में सहयोगी रहे कपिल मिश्रा ने उन पर जैन से दो करोड़ रुपये की घूस लेने का आरोप लगाया। लेकिन केजरीवाल ने या तो चुप्पी साधे रखी या सीधे सवालों को टाल दिया। इतना ही नहीं कपिल मिश्रा ने उनकी सरकार पर टैंकर घोटाले और दवा घोटाने समेत कई अनगिनत भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं, लेकिन केजरीवाल को उनके आरोपों का जवाब देने की हिम्मत नहीं है। ये उस केजरीवाल का हाल है जो कालेधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ हुए जन- आंदोलन से जुड़े करोड़ों देश भक्तों की पीठ में छुरा घोंपकर राजनेता बना है। अब न तो उन्हें अपना भ्रष्टाचार नजर आता है और न ही अपने सियासी गुर्गों को। यही कारण है कि न तो वो आरोपों का जवाब देते हैं और न ही सत्येंद्र जैन जैसे आदमी को सरकार से बाहर करते हैं।

कसम खाकर तोड़ना बना सियासी धंधा
दरअसल राजनीति में जब कभी कसमें खाकर उन्हें तोड़ने वालों का नाम लिया जाएगा तो केजरीवाल उनमें अव्वल रहेंगे। अन्ना के साथ जन आंदोलन पर बैठे केजरीवाल ने राजनीति में नहीं जाने की कसम खाई थी… हवाला दिया था कि ये कुर्सी किसी को भी गंदा कर सकती है… डर जताया था कि कहीं वो भी राजनीति में जाएं तो वैसे ही गंदे ना हो जाएं… ये सब हवाला देकर उन्होंने कुर्सी से तौबा करने की बात कही थी। लेकिन केजरीवाल के सच से गुजरते हुए अब जाकर ये भी पता चल रहा है कि राजनीति से परहेज रखने की केजरीवाल की बात में भी एक राजनीति थी।

आम आदमी से खिलवाड़ का प्रतीक
केजरीवाल का चेहरा आज आम जनता को बड़े-बड़े सपने दिखाकर फिर उसके साथ खिलवाड़ करने का प्रतीक बन चुका है। गौर कीजिए कि छह साल पहले अन्ना हजारे के साथ जन लोकपाल आंदोलन के साथ शुरू हुआ केजरीवाल का सफर आज कहां तक पहुंच चुका है। केजरीवाल बिना सबूत के अपने राजनीतिक विरोधियों पर अनाप-शनाप आरोप लगाने से कभी बाज नहीं आते…लेकिन उनकी ये फितरत रही है कि वो अपने गिरेबां में कभी नहीं झांकते।

चंदे से चांदी काटते रहे केजरीवाल!
केजरीवाल के खिलाफ पार्टी फंडिंग के नाम पर गड़बड़झाला की शिकायतों का भी अंबार है। दो करोड़ रुपये के एक चंदे के मामले में इनकम टैक्स विभाग आम आदमी पार्टी की एक रिपोर्ट चुनाव आयोग को भी भेज चुका है। बताया जा रहा है कि इनकम टैक्स विभाग ने कम से कम छह चिट्ठियां इस चंदे को लेकर भेजीं… लेकिन पार्टी ने उस पर कोई जवाब नहीं दिया। दरअसल, चंदे के इस फंदे से गर्दन कैसे निकाली जाए…यह केजरीवाल को सूझ ही नहीं रहा तो फिर इनकम टैक्स को जवाब क्या देंगे वो? जानकारियों के मुताबिक केजरीवाल को ये रकम 50-50 लाख रुपये के चार ड्राफ्ट के माध्यम से मिली थी।

अन्ना और आम आदमी से विश्वासघात
जिस अन्ना के चलते केजरीवाल को लोगों ने जाना…उसी अन्ना के साथ विश्वासघात कर केजरीवाल ने सियासत का रास्ता अपना लिया। ये भी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए केजरीवाल की एक सुनियोजित चाल थी। दिल्ली तब कांग्रेस के शासन से परेशान थी…केजरीवाल ने जनता को बढ़-चढ़कर सपने दिखाने शुरू कर दिये…जनता कभी-कभी बातों में आ जाती है। 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में उसने केजरीवाल के चेहरे पर पूरा नहीं लेकिन थोड़ा भरोसा जताया। बहुमत से दूर रहे केजरीवाल ने तब अपने बच्चों की कसम खाकर कहा था कि वो कांग्रेस के साथ कभी सरकार नहीं बनाएंगे। लेकिन केजरीवाल तो कसमतोड़ू नेता हैं, अपनी उस कसम को भी तोड़कर दिखा दिया। फरवरी 2015 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों में दिल्ली की जनता ने लगभग सारी सीटें केजरीवाल के खाते में डाल दीं…शायद कुछ ऐसा सोचकर कि पहली बार बहुमत ना मिलने के चलते केजरीवाल कुछ ना कर पाए हों…इसलिए अपनी पूरी ही आस्था सौंप दो…लेकिन केजरीवाल ने जनता की उस आस्था का भी कत्ल कर दिया।

जनता के पैसे पर अय्याशी!
खबरों के मुताबिक केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के विधायक और मंत्री ही नहीं उनके रिश्तेदारों ने भी जनता के पैसे पर खूब ऐश किये हैं। डेढ़ साल में सवा करोड़ रुपये समोसे-चाय पर उड़ाया जाना आखिर किस बात की तस्दीक करता है? दिल्ली सरकार की एक दावत में 16-16 हजार रुपये की थाली परोसे जाने का मामला भी ऐसा है कि आंखें खुली की खुली रह जाएं। केजरीवाल के पांच मंत्रियों की कम से कम 24 ऐसी विदेश यात्राएं सामने आई हैं जो उप राज्यपाल की अनुमति लिये बगैर की गई। कपिल मिश्रा ने इसको लेकर भी अनशन किया था कि आखिर ये सच सामने आए कि इन यात्राओं पर खर्च कितना हुआ, इनका प्रायोजक कौन था और मकसद क्या था?

केजरीवाल ने दिया भाई-भतीजावाद को बढ़ावा
आरोपों की मानें तो केजरीवाल भाई-भतीजावाद को भी आबाद करने में लगे हैं। मीडिया में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक केजरीवाल के दिवंगत साढ़ू सुरेंद्र कुमार बंसल के स्वामित्व वाली कंपनी रेणु कंस्ट्रक्शन के कामकाज को पीडब्ल्यूडी के इंजीनियरों ने लाल झंडी दिखा दी थी, इसके बावजूद जहांगीरपुरी में एक नाले से जुड़ा प्रोजेक्ट उससे वापस नहीं लिया गया। सरकारी दस्तावेजों के हवाले से ये पता चलता है कि सार्वजनिक परियोजना को अंजाम देने में केजरीवाल के रिश्तेदार की कंपनी की अयोग्यता से अवगत होने के बावजूद सत्ता का बेजा इस्तेमाल कर उसे प्रोजेक्ट सौंपा गया। इस मामले में एसीबी ने केजरीवाल के साढ़ू के घर के साथ उनकी कंपनियों पर छापेमारी भी कर चुकी है। पीडब्ल्यूडी विभाग से जुड़ा यह घोटाला करीब 250 करोड़ रुपये का बताया जा रहा जिसे फर्जी बिलों के सहारे अंजाम दिये जाने का आरोप है। अपनों को प्रोजेक्ट सौंपकर पैसों की बंदरबांट का ये बेहद संगीन आरोप है। 

अपने काम पर नहीं, सिर्फ दूसरों पर नजर
केजरीवाल अपने काम पर कम बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कामकाज में खमियां निकालने पर ज्यादा समय देते आए हैं। क्या दिल्ली की जनता ने केजरीवाल को उस पीएम में खामियां निकालने के लिए सत्ता में बैठाया है…जो भारत को आज दुनिया के सबसे ताकतवर देशों की श्रेणी में खड़ा करने में जुटा हुआ है? बदनाम भी हुए तो क्या नाम ना हुआ… केजरीवाल शायद इसी कहावत के साथ अपनी राजनीति को आगे बढ़ाना चाहते हैं। लेकिन इसी चक्कर में वो वित्त मंत्री अरुण जेटली की मानहानि के मामले में दूसरी बार फंस चुके हैं। केजरीवाल पर मानहानि के पहले केस में 10 करोड़ का दावा ठोका गया था तो उसी केस से जुड़ी सुनवाई के दौरान एक और मामले में उन पर 10 करोड़ का दावा ठोका गया है।

अपने ही बनाए फंदे में फंस चुके हैं केजरीवाल!

केजरीवाल हर तरफ से घिर चुके हैं। खुद से मोल ली हुई मुसीबतों के जाल से बाहर आने का रास्ता उन्हें नहीं सूझ रहा। लाभ के पद के मामले में उनके 21 विधायकों पर सुरक्षित रखा गया फैसला किसी भी दिन आ सकता है। दिल्ली नगर निगम चुनावों में मिली करारी शिकस्त के बाद उन्हें आने वाले समय में दिल्ली में भी सियासी मुश्किलों की गंध मिलने लगी है। ऐसे में ही वो ईवीएम में गड़बड़ी जैसे बेबुनियाद आरोप के साथ हल्ला मचाने लगाते हैं। एक अनावश्यक मुद्दे को उछालकर वो अपने ऊपर भ्रष्टाचार के कई सारे आरोपों को दबाने की कोशिश करते हैं। राजनीति से खुद को दूर रखने की कसमें खाने वाला शख्स आज राजनीति के स्तर को और भी ज्यादा कलंकित करने में लगा हुआ है। 

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