Home विपक्ष विशेष सियासी साजिश की आग में धधक रहा सहारनपुर !

सियासी साजिश की आग में धधक रहा सहारनपुर !

सहारनपुर में जातीय हिंसा की सियासी साजिश का सटीक विश्लेषण

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13 अप्रैल, 2017 को सहारनपुर में डॉ भीम राव अंबेडकर शोभा यात्रा निकालने के क्रम में बवाल हो गया। दलित और मुसलमानों के बीच पथराव हुए और घटना ने सांप्रदायिक रूप ले लिया। लेकिन बड़ी बात ये थी कि एक पक्ष में जहां मुसलमान थे वहीं दूसरे पक्ष में सिर्फ दलितों की नहीं बल्कि हिंदू समाज की गोलबंदी हो गई। पुलिस की कार्रवाई के बाद मामला शांत पड़ने लगा। लेकिन 5 मई, 2017 को उसी सहारनपुर में जहां बहुसंख्यक आबादी गोलबंद हुई थी वहां शब्बीरपुर में महाराणा प्रताप शोभा यात्रा के दौरान उसमें टूट पैदा कर दी गई और दलित और ठाकुर आमने-सामने आ गए। सवाल ये कि बीते लोकसभा और विधानसभा चुनाव में सामाजिक समरसता कि मिसाल बने उत्तर प्रदेश में अचानक ऐसा क्यों हो रहा है?

जातिवादी राजनीति चमकाने की सियासी साजिश!
जातीय फसाद की आग में जल रहा सहारनपुर में सतही तौर पर भले दलितों और ठाकुरों की जातीय हिंसा लग रही है लेकिन इसके पीछे बड़ी राजनीतिक साजिश की बू आ रही है। दरअसल हजारों वर्षो के भारतीय इतिहास को अगर पलट कर देखें तो आप पाएंगे कि आजादी के 70 वर्षो बाद पहली बार ऐसा लग रहा है कि पूरे देश का बहुसंख्यक समाज जातीय बेड़ियों को तोड़कर एकता के गठबंधन में बंधकर एकता के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में समाज एकता के सूत्र में बंधकर विकास के रास्ते चलना चाहता है। लेकिन सियासतदानों को शायद ये एकता पसंद नहीं आ रही।

मायावती के दौरे के बाद फिर भड़क उठी हिंसा
शांति और समरसता की राह पर चल रहा सहारनपुर मंगलवार (23 मई, 2017) को एक बार फिर धधक उठा जब बीएसपी प्रमुख मायावती का दौरा हुआ। शब्बीरपुर में मायावती का कार्यक्रम शुरू होने से पहले और फिर खत्म होने के बाद बड़गांव थाना क्षेत्र जातीय हिंसा की चपेट में आ गया। नकाबपोश उपद्रवी युवाओं ने ठाकुरों के घरों पर पथराव किए, बिटोरों और घरों में आग लगा दी और महिलाओं से दुष्कर्म का भी प्रयास किया। वहीं दूसरी तरफ से भी हिंसा हुई जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गयी। जाहिर है मायावती की मंशा इस आग को शांत होने देने की तो कतई नहीं है।

 

राजनीतिक जमीन की तलाश में भीम आर्मी
सहारनपुर जातीय संघर्ष को भड़काने में ‘भीम आर्मी’ (भीम आर्मी भारत एकता मिशन) का नाम सामने आ रहा है। पेशे से वकील चंद्रशेखर आजाद ने इसका गठन जुलाई 2015 में किया था। कागजी उद्देश्य दलितों के अधिकारों की रक्षा करना है, लेकिन राजनीति बहुसंख्यक समाज को लड़ाने की और बांटने की है। भीम आर्मी पहली बार अप्रैल 2016 में हुई जातीय हिंसा के बाद सुर्खियों में आई थी। कुछ दिन पहले ही भीम आर्मी ने ढाई हजार दलितों के इस्लाम धर्म कबूल करने की घोषणा की थी, लेकिन जब समर्थन नहीं मिला तो महज पचास युवाओं ने बौद्ध धर्म अपनाने की घोषणा की।

2019 लोकसभा चुनाव पर विपक्ष की नजर
यह बात किसी से छुपी नहीं है कि भीम सेना बहुजन समाज पार्टी के लिए कार्य करती है। पिछले चुनावों में बीएसपी की हार की एक मुख्य वजह दलितों का बीजेपी की तरफ झुकाव था। चूंकि अगले महीने पूरे उत्तरप्रदेश में नगर निकायों के चुनाव होने वाले हैं, इसलिए दलितों के वोटबैंक को अपने तरफ झुकाने और अपनी राजनीतिक जमीन को फिर से तराशने के लिए दलितों और राजपूतों में दंगे करवाये जा रहे हैं। यही नहीं लोकसभा चुनाव में बहुसंख्यक आबादी की एकता में बिखराव पैदा करने के तहत यूपी की जनता को जातीय हिंसा की आग में झोंकने की बड़ी साजिश धरातल पर उतारी जा रही है।

भाजपा को मात देने के लिए ‘फूट डालो-राज करो’ की साजिश !
यूपी में 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की बंपर जीत ने सारे राजनीतिक समीकरणों को धता बता दिया था। मायावती से धोखा खाए दलित समुदाय ने भाजपा का साथ दिया। आलम ये रहा कि इस बार के विधानसभा चुनाव में 85 प्रतिशत रिजर्व सीटों पर भी बीएसपी को 24 प्रतिशत ही मत मिले। ओवरऑल भी बीएसपी को दलितों का महज 21 प्रतिशत वोट ही प्राप्त हुआ था। जाहिर है भाजपा को इस चुनाव में सभी जातियों का वोट मिला जिसमें दलितों का भी बहुत बड़ा योगदान है। अब यही बात विरोधी दलों को पच नहीं रही है।

‘सबका साथ-सबका विकास’ को हराने की साजिश
पीएम मोदी की सबका साथ-सबका विकास नीति ने अमीर-गरीब की खाई को पाटने का काम किया है। सत्ता-समाज में हाशिये पर रहे समाज को सरकार के जरिये साथ जोड़ने का उनका प्रयास जमीन पर भी दिख रहा है। बीते चुनावों से साफ होता जा रहा है कि पीएम मोदी की लोकप्रियता जिस तरह से बढ़ रही है वह विपक्ष की बैचेनी का कारण है। मोदी ने विकास की राजनीति के जरिये जिस तरह सबको घर, हर घर में गैस कनेक्शन जैसी योजनाएं बिना भेदभाव के जमीन पर उतारी हैं, लोगों का यकीन पीएम मोदी में बढ़ा है। लेकिन बुरी तरह मात खाया विपक्ष एक बार फिर जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति के जरिये सामाजिक एकता को छिन्न-भिन्न करने में लगा है। ये ठीक वैसे ही किया जा रहा है जैसे बिहार चुनाव के वक्त असहिष्णुता का मुद्दा उछाला गया था। आरक्षण के बारे में लोगों के बीच भ्रम फैलाया गया था। लेकिन देश के लोगों को पीएम मोदी की नीतियों और बातों पर भरोसा है।

घोटालों की फांस से बचने की अखिलेश, मायावती, लालू की साजिश
योगी सरकार ने मायावती शासन के कार्यकाल में 1180 करोड़ रुपये के घोटालों की जांच के आदेश दिए हैं। योगी सरकार ने अखिलेश यादव की सरकार में बने आगरा एक्सप्रेस-वे, गोमती रिवर फ्रंट जैसी योजनाओं में घोटालों के जांच के आदेश दिए हैं। वहीं बिहार में लालू प्रसाद यादव के 1500 करोड़ की बेनामी संपत्ति का खुलासा होने के बाद ये गोलबंदी और तेज हो गई है। 27 अगस्त को पटना में होने वाली रैली में ये तीनों नेता एक मंच पर साथ होंगे। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि घोटालों की फांस में फंसने जा रहे इन नेताओं ने ही सहारनपुर घटना की साजिश रची है, ताकि मोदी सरकार को दलित और पिछड़ा विरोधी बताया जा सके।

गुजरात-महाराष्ट्र से यूपी-बिहार तक जातिवादी साजिश
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबका साथ-सबका विकास नीति से बहुसंख्यक एकता विरोधियों को पच नहीं रही है। गुजरात में जहां ऊनाकांड की साजिश रची गई, वहीं महाराष्ट्र में मराठा समाज को मोदी विरोध में गोलबंद किया गया। बिहार चुनाव से पहले रोहित वेमुला आत्महत्या मामले को तूल दिया गया तो अब यूपी में सहारनपुर में जातीय हिंसा की पृष्ठभूमि तैयार की गई। इसके लिए हर प्रदेश में चेहरे तो अलग हैं, लेकिन साजिश का टारगेट पीएम मोदी और भाजपा की सरकारें हैं।

कांग्रेस-AAP के इशारे पर काम कर रहे हैं जिग्नेश
11 जुलाई, 2016 को चार दलित युवकों की गुजरात के ऊना में पिटाई कर दी। इस घटना के बाद 34 गिरफ्तारियां हुईं और न्यायिक प्रक्रियाएं भी शुरू कर दी गईं। लेकिन कांग्रेस की ‘फूट डालो-राज करो’ की राजनीति को एक नई जमीन मिल गई। एक चेहरा भी सामने लाया गया जिग्नेश मेवानी का। पेशे से वकील जिग्नेश मेवानी को आम आदमी पार्टी और कांग्रेस की मिलीभगत से दलितों का चेहरा प्रोजेक्ट किया जाने लगा। हालांकि उनकी पोल तभी खुल गई जब ऊना में जिन दलितों की पिटाई हुई थी उन परिवारों ने ही जिग्नेश मेवानी पर उनकी अनदेखी करने का आरोप लगा दिया।

राजनीतिक महत्वाकांक्षा पाले बैठे हैं जिग्नेश मेवानी
गुजराती मैगजीन और एक गुजराती अखबार के लिए लगभग चार वर्ष तक काम कर चुके जिग्नेश ने ‘लड़त समिति’ का गठन किया था। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच का गठन किया है। फिर आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता बन गए। लेकिन आम आदमी पार्टी में राजनीतिक महत्वाकांक्षा की टकराहट की वजह से उन्होंने पार्टी छोड़ दी। अब वे गुजरात से बढ़कर राजस्थान में भी अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने की नीति पर चल रहे हैं। जाहिर है सामाजिक आंदोलन के नाम पर जब जिग्नेश की राजनीतिक महत्वाकांक्षा उजागर हुई तो उनकी पोल खुल गई है। वामपंथी संगठनों की गोद में खेलने वाले जिग्नेश की राजनीति लोगों के समझ में आने लगी है।

ऊना कांड में आया था कांग्रेस नेता का नाम
ऊना कांड बिहार चुनाव से ठीक पहले करवाया गया था। इसका मकसद था कि देश भर के दलितों में ये संदेश जाए कि बीजेपी के राज्यों में दलितों पर अत्याचार हो रहे हैं। लेकिन जांच में सामने आया कि समधियाल गांव का सरपंच प्रफुल कोराट ऊना के कांग्रेसी विधायक और कुछ दूसरे कांग्रेसी नेताओं के साथ संपर्क में था। अब तक की जांच में यह साफ हो चुका है कि सरपंच ने ही फोन करके बाहर से हमलावरों को बुलाया था। जो वीडियो वायरल हुआ था वो भी प्रफुल्ल कारोट के फोन से ही बना था। इस साजिश का बदला समधियाल के दलितों ने प्रफुल्ल कोराट को पंचायत चुनाव में हराकर ले लिया।


अहमद पटेल की साजिश थी ऊना दलित कांड!
ऊना कांड की सीआइडी जांच अभी चल रही है। लेकिन सूत्रों से जो जानकारी मिली है इसमें कांग्रेस की खतरनाक साजिश की ओर इशारा करती है। कहा जा रहा है कि कांग्रेस के बड़े नेता अहमद पटेल के इशारे पर कांग्रेस के वंश भाई भीम ने ये सारी साजिश रची थी। बहरहाल सच्चाई क्या है ये तो सामने आना बाकी है लेकिन ये तो साफ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दलित विरोधी साबित करने के लिए बुनी गई एक बड़ी राजनीतिक साजिश थी ऊना कांड।

रोहित वेमुला कांड के झूठ का भी हुआ पर्दाफाश
हैदराबाद विश्वविद्यालय से रोहित वेमुला की आत्महत्या की खबर आती है और राष्ट्रीय पटल पर यह चर्चा का विषय बन जाता है कि देश में दलितों के साथ अन्याय हो रहा है। सुर्खियां ये बनी कि दलितों को इस प्रकार से शोषित किया जा रहा है कि उन्हें आत्महत्या पर विवश किया जा रहा है। इस पर जेएनयू से लेकर हैदराबाद विश्वविद्यालय तक वामपंथी छात्रसंगठनों, राजनीतिक पार्टियों और सामाजिक संस्थानों ने जमकर राजनीतिक रोटियां सेंकी। राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल, सीताराम येचुरी, कन्हैया कुमार जैसे नेता धरने पर भी बैठे पर बाद में यह पता चला रोहित वेमुला दलित था ही नहीं। जाहिर है दलित के नाम पर ये नेता समाज में विद्वेष पैदा कर रहे थे। आज फिर एक बार सहारनपुर में ऐसा ही हो रहा है। दो गुटों की लड़ाई को जातीय संघर्ष में बदल दिया गया और बहुसंख्यक समाज में दरार पैदा कर दी गई है। जरूरत ऐसी राजनीतिक साजिशों को पहचानने की है और साजिशकर्ताओं को जवाब देने की है।

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