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कठुआ मामले पर हिंदू-मुस्लिम करने का दोषी कौन? 

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कठुवा कांड की सच्चाई धीरे धीरे सामने आनी ही है, और अब बहुत कुछ ऐसा निकलकर आ रहा है, जो की मीडिया की मनगढ़ंत कहानी से बिलकुल उलट है। सवाल उठने लगे हैं कि रेप पीड़ित बच्चियों के लिए इंसाफ की मांग जरूरी है, या फिर उनकी लाशों पर मंदिरों या मस्जिदों या धर्म को निशाना लक्ष्य है?  दरअसल बीते कुछ दिनों के प्रकरण साफ बता रहे हैं कि Justice for Asifa  अब War against Hindu बन गया है।

लाशों पर राजनीति करने वाले ‘लाल गिद्धों’ को पहचानिये!
2002 में दिल्ली के मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज की लड़की के साथ दिल्ली गेट के अंदर भरी दोपहरिया में रेप हुआ। इस खबर की पीड़िता का नाम और पता कभी मीडिया में नहीं आया।  2012 में दामिनी के साथ जब रेप और हत्या हुई तो पूरा देश सड़क पर आ गया। क्या आपको पता चला था कि बलात्कारी नाबालिग किस कौम से था?  सासाराम, मुंबई और सूरत जैसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं, लेकिन यह आप कहीं भी पीड़िता का नाम नहीं देखेंगे। लेकिन कठुआ मामले में पीड़िता का नाम बार-बार जाहिर किया गया। देश के सभी लोगों ने बच्ची के साथ अत्याचार पर रोष जाहिर किया है और सबने इसे मानवता के साथ अन्याय माना है। कठुआ में नाबालिग बच्ची के साथ भी वही अन्याय हुआ है, लेकिन इसे मजहब के आईने से देखा जा रहा है। बड़ी धूर्तता के साथ आसिफा को भारत की बेटी नहीं मुसलमान की बेटी बना दिया गया।

 ‘लाल गिद्धों’ ने बना दिया असंवेदनशीलता का तमाशा!
मासूम आसिफा को मुसलमान की बेटी बनाने वाले कौन हैं? क्या ये वही नहीं है जिसने गोधरा में 59 कारसेवकों को जलाने पर चुप्पी बना ली थी? क्या ये वही नहीं हैं जिसने गोधरा के बाद प्रतिक्रिया स्वरूप हुई घटना को मसाला लगा कर बेचा?  याद रखिये कि गोधरा के बाद की घटनाओं को इन्होंने बेचने की कोशिश तो जरूर की, लेकिन देश की जनता ने इसे खरीदा नहीं! सोशल मीडिया के दौर में अफवाहें फैलती हैं तो फरेबी पत्रकारों के लाल एजेंडे की पोल भी खुलते देर नहीं लगती। बहरहाल जब तक मामले की पूरी सच्चाई सामने नहीं आ जाती, लाल रंग के गिद्धों का जश्न जारी है…

रेपिस्ट का धर्म ढूंढने में आता है आनंद
रेपिस्ट का धर्म ढूंढकर पूरे हिंदू समुदाय को रेपिस्ट ठहराने की एक साजिश रची गई है। सीबीआई जांच से भागने वाला सेक्यूलर जमात अब अपनी गंदी हरकतों पर उतर आया है। बिना सबूत बिना किसी पुख्ता जांच, बिना किसी कोर्ट के आदेश के यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि हिंदुस्तान बलात्कारियों का देश है और हिंदू वहसी और दरिंदे हैं।

बेशर्मी का नंगा नाच करते हैं वामपंथी पत्रकार
कठुवा में बच्ची के साथ बलात्कार हुआ भी है इस बात पर अब भी संदेह है। दरअसल पीड़ित बच्ची के पिता को भी कुछ साल पहले संपत्ति विवाद में मार दिया गया था। तथ्य यह भी उभरकर आ रहे हैं कि यह संपत्ति विवाद का मामला हो सकता है। हालांकि कोई वामपंथी पत्रकार यह सवाल नहीं उठा रहा है कि जो जम्मू-कश्मीर पुलिस तीन बार अपनी ही रिपोर्ट बदल चुकी है और दो बार डॉक्टर अपनी रिपोर्ट बदल चुके हैं, उसपर कैसे यकीन किया जा सकता है? गौरतलब है कि जब ये लड़की गायब हुई, तो उसके कुछ दिन पहले इसके चाचा और इस लड़की के अभी के अभिवावक के बीच लड़ाई हुई थी। जब इस लड़की की लाश मिली तो शुरू में पुलिस ने लड़की के इस चाचा से भी पूछताछ की, जिसके बाद से ये फरार है।

एक आरोपी के कारण पूरा हिंदू समुदाय ‘बलात्कारी’ कैसे?
बार-बार यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि आरोपी हिंदू हैं और पीड़ित बच्ची मुसलमान। वामपंथी पत्रकारों की जमात यह साबित करने में लगी है कि इसमें भाजपा का हाथ है। लेकिन इस दौरान वे बड़ी सफाई से यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि भाजपा को सपोर्ट करने वाले सभी हिंदू हैं और सभी भाजपाई बलात्कारी हैं। दरअसल इस सोच के पीछे वामपंथ की अस्तित्व खोती राजनीति से अधिक उनकी सोच है, जो बेहद ही ओछी है। मान लिया जाए कि इस मामले में कोई सच्चाई है भी और आरोपी दोषी भी हैं, लेकिन क्या इससे पूरा हिंदू समुदाय ही बलात्कारी हो जाता है या फिर भाजपा में जो भी हैं वे बलात्कारी हैं?

सीबीआई जांच की मांग क्यों नहीं कर रहे वामपंथी?
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जो खुद मुस्लिम है गुलाम अहमद मीर, वो भी कह चुके है की महबूबा सरकार इस मामले में असल दोषियों को बचा रही है। यही नहीं घटना के खुलासे की टाइमिंग को देखें तो साफ है कि यह बेहद ही सोची-समझी है। कांग्रेस के स्थानीय मुस्लिम नेता भी महबूबा सरकार पर सवाल उठा चुके हैं। यही नहीं आरोपी सांझी राम ने भी बार-बार कहा है कि सीबीआई जांच में अगर वह दोषी साबित हो जाएं तो उन्हें सरेआम फांसी पर लटका दिया जाए। आरोपियों के परिजनों की भी यही मांग है और कई स्थानीय मुस्लिमों की भी। हर मामले में सीबीआई जांच की मांग का झंडा बुलंद करने वाले लोग इस मामले में सीबीआई जांच से आखिर क्यों भाग रहे हैं?

मंदिर में तहखाने की बात सरासर झूठी
इस पूरे प्रकरण में जमकर राजनीति हो रही है और पत्रकारों का वह वर्ग केंद्र की मोदी सरकार पर टूट पड़ा है जो ‘असहिष्णुता ब्रिगेड’ की अगुआई कर रहा था। दूसरी ओर पुलिस कहती है की मंदिर में तहखाना है। तो क्या कोई मीडिया का आदमी उस तहखाने तक पहुंचा है। इतना ही नहीं बिना सबूत हिंदुओं और मंदिर के खिलाफ जहर उगला जा रहा है और पूरे समुदाय को बदनाम किया जा रहा है। आरोप ये है कि मंदिर में चार दिनों तक बच्ची को कैद रखा गया। तथ्य यह है कि मंदिर खुला हुआ है और वहां सुबह-शाम पूजा की जाती है। तो क्या एक बच्ची के साथ अन्याय में पूरे हिंदू समुदाय ने इन कुत्सित कृत्य के लिए समर्थन किया है? जाहिर है ये लोग एक मुहिम चला रहे हैं और रेप से ज्यादा मंदिर और हिंदुओं को हाई लाइट किया जा रहा है।

सफेद झूठ का खुला षडयंत्र है कठुआ मामला
पूरे हिंदू समुदाय को बदनाम करने के लिए कहा जा रहा है कि बलात्कारियों के समर्थन में लोग सड़कों पर तिरंगा लहरा रहे हैं। जाहिर है यह देश को बदनाम करने की बड़ी साजिश है। बलात्कारियों के समर्थन में कोई प्रदर्शन नहीं हुआ था। प्रदर्शन कर रहे लोग मामले की सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं, तो क्या हत्यारों को पकड़ने के लिए सीबीआई जांच की मांग करना गलत है? गांव वालों का कहना है कि उन्हें महबूबा मुफ्ती की पुलिस पर भरोसा नहीं है, तो क्या ऐसा कहना असंवैधानिक है?

हिंदुओं की आवाज को सेंसर क्यों किया जा रहा है?
गांव की कई हिंदू महिलाओं ने कैमरों पर कहा है कि सीबीआई जांच में अगर हमारे लोग दोषी पाए गए तो हम उन्हें जान से मार डालेंगे। ये बयान चैनलों से क्यों गायब हो गए? क्या ऐसा नहीं लग रहा है कि जम्मू के लोगों की आवाज सेंसर की जा रही है? कठुआ के लोगों के अलावा कुछ प्रदर्शन कश्मीर घाटी में भी हुए, जहां बच्ची को इंसाफ से ज्यादा हिंदुस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाए गए। मीडिया ने उसको क्यों छिपाया? प्रद्युम्न केस में भी मीडिया ने पुलिस की थ्योरी पर आंख मूंद कर भरोसा करके असली हत्यारे की मदद की थी, एक बार फिर से कहीं वही तो नहीं हो रहा?

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